सांसदों को काम नहीं करना है तो तनख्वाह किस बात की?

02 दिसंबर 2011
संपादकीय
पिछले एक हफ्ते में हम शायद तीसरी बार यह बात लिख रहे हैं कि एफडीआई हो या कोई और मुद्दा, देश की संसद को चलने न देना बहुत ही गैरजिम्मेदारी का काम है। आज नौ दिन खराब करने के बाद संसद अगले कई दिनों के लिए स्थगित हो गई और इस संसद को चुनने वाली जनता राजनीतिक दलों और सांसदों को कोसते हुए इस चर्चा में लगी है कि अगर इन्हें काम नहीं करना है तो उन्हें तनख्वाह किस बात की दी जाए। यह एक बहुत खराब नौबत है जब राजनीतिक धु्रवीकरण इतना अधिक हो गया है कि खुदरा क्षेत्र में विदेशी पूंजी निवेश के मुद्दे पर कांगे्रस और भाजपा बिना किसी बातचीत के आमने-सामने खड़े हैं और यह कल तक की बात है जब भाजपा रिटेल सेक्टर में एफडीआई की हिमायती थी, और यह कुछ घंटे तक की बात है जब भाजपा की एनडीए की सहयोगी पार्टी अकाली दल ने एफडीआई का समर्थन घोषित किया था। केंद्र सरकार के इस फैसले का इस तरह विरोध हो रहा है मानो केंद्र इसे देश भर पर थोप रहा है। हकीकत यह है कि केंद्र सरकार ने एक इजाजत दी है, और इसके तहत अगर कोई राज्य अपने प्रदेश में विदेशी रिटेल कारोबार की इजाजत देना चाहता है तो वह दे सकता है, जो नहीं देना चाहता है वह न दे। यह कोई बंदिश न होकर एक इजाजत है, लेकिन इसे न्याय और तर्क से परे के नारों से इस तरह स्थापित किया जा रहा है मानो यह एक जबर्दस्ती देश पर थोपी जा रही है। भाजपा या एनडीए के राज्य, या कांगे्रस और यूपीए के राज्य अपनी मर्जी से ऐसी दूकानें न खुलने देना वैसे भी घोषित कर चुके हैं। मजाक की बात करें तो यह ऐसा हो गया है कि किसी होटल के बाथरूम में बाथटब उपलब्ध होने का इसलिए विरोध हो रहा है कि इससे वहां ठहरने वाले को जबर्दस्ती टब में पानी में डूबने को कहा जा रहा है।
हम रिटेल सेक्टर में विदेशी पूंजी को लेकर नफे और नुकसान के किसी एक निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाय इस पर देश की संसद को एक खुली चर्चा करते देखना पसंद करते, लेकिन विपक्ष को यूपीए सरकार से जितना कड़ा और जितना बड़ा परहेज हो गया है, उसके चलते अब चर्चा, बहस और तर्क-वितर्क की संसदीय संभावनाएं खत्म हो गई हैं। भारत का लोकतंत्र एक बहुत ही मनहूस दौर देख रहा है जब अन्ना-बाबा जैसे लोग फुटपाथ और मैदानों से संसदीय फैसले करना चाहते हैं और संसद के भीतर फैसलों का हक जिन सांसदों का है वे वहां काम करने के बजाय सड़कों के आंदोलन पर अधिक भरोसा कर रहे हैं। लोकतंत्र इस तरह नहीं चल सकता। हमने एक अलग संपादकीय में इस बात को लिखा था कि सांसद लालबत्तियों की जिस तरह मांग कर रहे हैं वह बात पूरी तरह नाजायज है, अब जनता तो इन दो बातों को जोड़कर भी देखती है कि काम नहीं करना है, रियायती मुर्गा खाना है और लालबत्ती में घूमना है। यह कैसा लोकतंत्र है और यह कैसी संसद है? जब लोकतांत्रिक संस्थाएं इस तरह का बर्ताव करती हैं तब गैरलोकतांत्रिक ताकतों को लोकप्रियता पाने का मौका मिलता है। आज देश में जगह-जगह, उत्तर-पूर्व से लेकर कश्मीर तक और आधा दर्जन से अधिक दूसरे राज्यों में हिंसक, उग्रवादी और आतंकी आंदोलन चल रहे हैं। जब देश की न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका अपनी जिम्मेदारियों से मुंह चुराने का खुला काम करें तो फिर लोगों की आस्था लोकतंत्र पर से घटकर अलोकतांत्रिक ताकतों की तरफ खिसक जाना हैरानी की बात नहीं है।
हम यह मांग करते हैं कि संसद में सांसदों को उनके काम के घंटों के हिसाब से तनख्वाह और भत्ते मिलने चाहिए। जो जितने घंटे कामचोरी करे, बहिष्कार और बहिर्गमन करे, उसका मीटर देखकर ही उसे भुगतान मिलना चाहिए। यह गरीब देश जो बत्तीस रूपए रोज पर जीने वाले को गैरगरीब मान रहा है, वह बत्तीस-बत्तीस हजार रूपए या बत्तीस-बत्तीस लाख रूपए का खर्च सांसद पर और संसद पर हर दिन, हर घंटे क्यों करे? इस देश में एक भयानक अराजकता का माहौल खड़ा किया जा रहा है और अन्ना हजारे जैसों की शक्ल में इस देश के विपक्ष को सरकार को घेरने का एक ऐसा हथियार मिल गया है जिसके वार से सरकार तो पता नहीं घायल होगी या नहीं, देश का लोकतंत्र जरूर घायल हो गया है। पूरे देश में एक गैरअन्नावादी, गैरबाबावादी आंदोलन ऐसा चलना चाहिए जो कि संविधान और लोकतंंत्र की मूल भावना के मुताबिक देश की संसदीय परंपराओं और लोकतांत्रिक संस्थाओं की जिम्मेदारियों और अधिकारों का कुचलना बंद करने की बात उठाए। आज अगर किसी को यह खतरा नहीं दिख रहा है कि इससे भारतीय लोकतंत्र कहां जा रहा है, भारत की अर्थव्यवस्था किस कदर चौपट हो रही है, अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की विरोधी और भारत की प्रतिद्वंद्वी ताकतों को किस कदर फायदा हो रहा है, तो इसके लिए एक अपराध कथा लिखने वाले किसी उपन्यासकार की जरूरत है जो यह कल्पना कर सके कि भारत के आज के आंदोलन क्या किसी अंतरराष्ट्रीय साजिश के तहत खड़े किए जा रहे हैं? हम ऐसा नहीं मानते, या कम से कम हमारे पास ऐसा मानने के लिए कोई सुबूत नहीं हैं लेकिन अपराध कथा लेखक की कल्पना तो ऐसी किसी जगह तक पहुंच ही सकती है।

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