16 दिसंबर 2011
संपादकीय
हितों के टकराव ऐसे दिग्गज वकील न समझें, तो कौन समझेगा?
जिन लोगों को ज्योतिष और भविष्यवाणी पर भरोसा हो वे कह सकते हैं कि यूपीए, कांगे्रस और चिदंबरम के दिन ठीक नहीं चल रहे। जिन लोगों को ऐसे पाखंड के बजाय कुदरत पर अधिक भरोसा हो, वे कह सकते हैं कि जो जैसा बोता है, वो वैसा काटता है। जिन लोगों को सार्वजनिक जीवन में नैतिकता पर अब भी भरोसा हो वे नेहरू-गांधी को याद कर सकते हैं कि एक वक्त उनकी रही पार्टी का आज ऐसा बुरा हाल हो गया है। लेकिन हम साफ-साफ लफ्जों में अगर लोकतंत्र और कानून के हिसाब से कड़ी और खड़ी बात करें तो गृहमंत्री पी. चिदंबरम एक बात के गुनहगार हैं कि उन्होंने अपनी वकालत के वक्त के मुवक्किलों में से एक के खिलाफ मामला वापिस लेने की नौबत अपने मंत्रालय में आने दी। पूरी जांच के पहले हम अभी उन्हें सोच-समझकर ऐसा करने का गुनहगार तो नहीं कहेंगे लेकिन यह बात साफ है कि जो लोग किसी एक पेशे में रहते हैं, उन लोगों को कोई भी सार्वजनिक पद संभालते हुए यह याद रखना चाहिए कि बीते कल तक वे जिस धंधे में थे, उस धंधे का कोई नफा-नुकसान तो आज उनके दफ्तर से, उनके मातहतों के हाथों से नहीं हो रहा?
हमारे पाठकों को याद होगा कि दो-तीन बरस पहले जब अर्जुन सिंह केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री थे तब उनके मंत्रालय में स्कूली बच्चों के दोपहर के भोजन की योजना में गर्म पके भोजन के बजाय कारखानों से बने पैकेटबंद बिस्किट देने की एक साजिश चली थी। बिस्किट कारखानादारों ने इसके लिए सभी पार्टियों के सांसदों के बीच एक बड़ी लॉबिंग की थी। अर्जुन सिंह के मंत्रालय में उनकी बेटी ने जाकर एक आईएएस अफसर से बात की थी जिसने इस बात को फाईल पर दर्ज कर दिया था। वह एक मामला एक नेता के विभाग में हितों के टकराव का मामला था जिसमें तेरह हजार करोड़ रूपए से अधिक की यह सालाना योजना दसियों करोड़ बच्चों के सेहत को बेचकर धंधेबाजों को कमाई करवाने की कोशिश थी। ऐसे मेें मंत्री का परिवार किसी भी तरह से अगर दखल देता है तो विभाग का फैसला उससे खराब हो सकता है। ऐसा ही हितों का टकराव हम चिदंबरम के इस मामले में देखते हैं। केंद्र सरकार में आने के बाद किसी भी बड़े वकील को यह चाहिए कि वह अपने पुराने मुवक्किलों की एक फेहरिस्त बनाकर सरकार को दे दे ताकि उनसे जुड़े हुए कोई भी मामले सामने आने पर वे अपने को उस फैसले से अलग रखें।
सरकारों में यह जगह-जगह सामने आता है कि नेता या अफसर अपने से जुड़े हुए मामलों, अपने रिश्तेदारों, दोस्तों और भागीदारों के मामलों को भी खुद देखते रहते हैं। हमारा मानना है कि किसी भी पद की जो शपथ ली जाती है, या फिर सेवा-शर्तों के तहत जो लोग नौकरी करते हैं उन सबसे यह पूरी तरह हलफनामे पर ले लेना चाहिए कि किसी भी मामले में उनके दूर के भी संबंध होने या उनके हित प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़े होने पर वे खुद होकर उसकी घोषणा करेंगे और अपने-आपको फैसले से अलग कर लेंगे। अदालतों में ऐसी परंपरा हमेशा से रही है कि हर जज को यह घोषणा करनी होती है कि उनके कौन से संबंधी वकालत करते हैं। इसी तरह अपनी पुरानी फर्म के मामलों को वे जज नहीं देख सकते। एक बड़े कमाऊ वकील रह चुके चिदंबरम से यह उम्मीद तो की ही जाती है कि वे अपने से जुड़े हुए मामलों को लेकर यह बात पहले ही सरकार के सामने साफ कर देते कि वे कहां किस चीज से जुड़े रहे हैं। ऐसा न करके उन्होंने एक अनैतिक काम तो किया ही है, आगे जाकर जांच में यह भी साबित हो सकता है कि उन्होंने एक पक्षपाती काम भी किया। यह उनकी पार्टी और उनके गठबंधन के लिए भी एक शर्मनाक बात होगी, आज भी है।
और यह बात सिर्फ उन्हीं के बारे में हम नहीं लिख रहे, देश और सभी प्रदेशों में लोगों को यह साफ-साफ उजागर करना चाहिए कि कहां-कहां उनके निजी हित जुड़े हुए हैं और वे अपने-आपको कुछ मामलों से अलग क्यों रखें। इन दिनों छत्तीसगढ़ में एक ऐसी चर्चा चल रही है कि एक जज का परिवार कहीं और वकालत कर रहा है, इधर जज के सामने सरकार के खिलाफ कई मामले हैं, और उधर जज के संबंधी को सरकार ने अपना वकील बनाया है। अगर ऐसी बातें सच साबित होती हैं तो ये इन तीनों पक्षों के लिए एक शर्मिंदगी की बात हो सकती है।
संपादकीय
हितों के टकराव ऐसे दिग्गज वकील न समझें, तो कौन समझेगा?
जिन लोगों को ज्योतिष और भविष्यवाणी पर भरोसा हो वे कह सकते हैं कि यूपीए, कांगे्रस और चिदंबरम के दिन ठीक नहीं चल रहे। जिन लोगों को ऐसे पाखंड के बजाय कुदरत पर अधिक भरोसा हो, वे कह सकते हैं कि जो जैसा बोता है, वो वैसा काटता है। जिन लोगों को सार्वजनिक जीवन में नैतिकता पर अब भी भरोसा हो वे नेहरू-गांधी को याद कर सकते हैं कि एक वक्त उनकी रही पार्टी का आज ऐसा बुरा हाल हो गया है। लेकिन हम साफ-साफ लफ्जों में अगर लोकतंत्र और कानून के हिसाब से कड़ी और खड़ी बात करें तो गृहमंत्री पी. चिदंबरम एक बात के गुनहगार हैं कि उन्होंने अपनी वकालत के वक्त के मुवक्किलों में से एक के खिलाफ मामला वापिस लेने की नौबत अपने मंत्रालय में आने दी। पूरी जांच के पहले हम अभी उन्हें सोच-समझकर ऐसा करने का गुनहगार तो नहीं कहेंगे लेकिन यह बात साफ है कि जो लोग किसी एक पेशे में रहते हैं, उन लोगों को कोई भी सार्वजनिक पद संभालते हुए यह याद रखना चाहिए कि बीते कल तक वे जिस धंधे में थे, उस धंधे का कोई नफा-नुकसान तो आज उनके दफ्तर से, उनके मातहतों के हाथों से नहीं हो रहा?
हमारे पाठकों को याद होगा कि दो-तीन बरस पहले जब अर्जुन सिंह केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री थे तब उनके मंत्रालय में स्कूली बच्चों के दोपहर के भोजन की योजना में गर्म पके भोजन के बजाय कारखानों से बने पैकेटबंद बिस्किट देने की एक साजिश चली थी। बिस्किट कारखानादारों ने इसके लिए सभी पार्टियों के सांसदों के बीच एक बड़ी लॉबिंग की थी। अर्जुन सिंह के मंत्रालय में उनकी बेटी ने जाकर एक आईएएस अफसर से बात की थी जिसने इस बात को फाईल पर दर्ज कर दिया था। वह एक मामला एक नेता के विभाग में हितों के टकराव का मामला था जिसमें तेरह हजार करोड़ रूपए से अधिक की यह सालाना योजना दसियों करोड़ बच्चों के सेहत को बेचकर धंधेबाजों को कमाई करवाने की कोशिश थी। ऐसे मेें मंत्री का परिवार किसी भी तरह से अगर दखल देता है तो विभाग का फैसला उससे खराब हो सकता है। ऐसा ही हितों का टकराव हम चिदंबरम के इस मामले में देखते हैं। केंद्र सरकार में आने के बाद किसी भी बड़े वकील को यह चाहिए कि वह अपने पुराने मुवक्किलों की एक फेहरिस्त बनाकर सरकार को दे दे ताकि उनसे जुड़े हुए कोई भी मामले सामने आने पर वे अपने को उस फैसले से अलग रखें।
सरकारों में यह जगह-जगह सामने आता है कि नेता या अफसर अपने से जुड़े हुए मामलों, अपने रिश्तेदारों, दोस्तों और भागीदारों के मामलों को भी खुद देखते रहते हैं। हमारा मानना है कि किसी भी पद की जो शपथ ली जाती है, या फिर सेवा-शर्तों के तहत जो लोग नौकरी करते हैं उन सबसे यह पूरी तरह हलफनामे पर ले लेना चाहिए कि किसी भी मामले में उनके दूर के भी संबंध होने या उनके हित प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़े होने पर वे खुद होकर उसकी घोषणा करेंगे और अपने-आपको फैसले से अलग कर लेंगे। अदालतों में ऐसी परंपरा हमेशा से रही है कि हर जज को यह घोषणा करनी होती है कि उनके कौन से संबंधी वकालत करते हैं। इसी तरह अपनी पुरानी फर्म के मामलों को वे जज नहीं देख सकते। एक बड़े कमाऊ वकील रह चुके चिदंबरम से यह उम्मीद तो की ही जाती है कि वे अपने से जुड़े हुए मामलों को लेकर यह बात पहले ही सरकार के सामने साफ कर देते कि वे कहां किस चीज से जुड़े रहे हैं। ऐसा न करके उन्होंने एक अनैतिक काम तो किया ही है, आगे जाकर जांच में यह भी साबित हो सकता है कि उन्होंने एक पक्षपाती काम भी किया। यह उनकी पार्टी और उनके गठबंधन के लिए भी एक शर्मनाक बात होगी, आज भी है।
और यह बात सिर्फ उन्हीं के बारे में हम नहीं लिख रहे, देश और सभी प्रदेशों में लोगों को यह साफ-साफ उजागर करना चाहिए कि कहां-कहां उनके निजी हित जुड़े हुए हैं और वे अपने-आपको कुछ मामलों से अलग क्यों रखें। इन दिनों छत्तीसगढ़ में एक ऐसी चर्चा चल रही है कि एक जज का परिवार कहीं और वकालत कर रहा है, इधर जज के सामने सरकार के खिलाफ कई मामले हैं, और उधर जज के संबंधी को सरकार ने अपना वकील बनाया है। अगर ऐसी बातें सच साबित होती हैं तो ये इन तीनों पक्षों के लिए एक शर्मिंदगी की बात हो सकती है।
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