टोपी से मुंदी हुई आंखों के लिए


23 दिसंबर 2011
संपादकीय
टोपी से मुंदी हुई आंखों के लिए

भारत का लोकतंत्र इस मामले में बहुत अनोखा है और बहुत कामयाब भी है कि जब इसके तीन घोषित स्तंभों और पे्रस नाम के चौथे अघोषित स्तंभ में से कोई कमजोर पड़ता है तो बाकी तीन में से कोई न कोई लडख़ड़ाते हुए उस स्तंभ को उसी अंदाज में थाम लेते हैं जिस अंदाज में पिए हुए या चक्कर खा रहे किसी साथी को कोई दूसरा थाम लेता है। आज शोहरत की जिस शराब के नशे में अन्ना हजारे और उनके साथी अपने-आपको इस विशाल और महान लोकतंत्र के अकेले भाग्यविधाता मान बैठे हैं और इसे हांकने के लिए रालेगान सिद्धि से कोड़ा लेकर निकले हुए हैं, उस शराब के नशे को आज मुंबई हाईकोर्ट ने ठंडा पानी डालकर उतारने की कोशिश की है। उसने अन्ना हजारे की ओर से मुंबई में मुफ्त मैदान पाने के लिए लगाई गई याचिका पर जो कुछ कहा है वह हम आज के ही पहले पन्ने पर खुलासे से दे रहे हैं इसलिए उस पूरी बात को यहां दुहराना ठीक नहीं है और यह संपादकीय पढऩे वाले लोग उस खबर को पढऩे के बाद ही इसे पढ़ें।
 
मुंबई हाईकोर्ट अपनी जागरूकता के लिए, नागरिक अधिकारों के लिए पहले से एक लंबी परंपरा के साथ चल रहा है। लेकिन उसने जो कड़े सवाल टीम अन्ना के सामने खड़े किए हैं वे इस देश की जनता के एक मंत्रमुग्ध तबके की आंखें खोलने के लायक तो हैं, अब शराब का नशा कितना टूटता है और यह मोह कितना टूटता है यह देखने की बात है। अदालत ने यह साफ किया कि जब बिल संसद में पेश हो चुका है और संसद में जब इस पर बहस हो रही है तो इस पर समानांतर आंदोलन की क्या जरूरत है? हाईकोर्ट ने कहा कि लोकतांत्रिक तरीके से संसद को काम करने दीजिए।  यह बात हमारे पाठकों को याद होगी कि हम लगातार उठाते आ रहे हैं और कल संसद में दिन भर जो बहस चली है उस बहस में लालू यादव जैसे लोगों ने जिस धाकड़ अंदाज में अन्ना हजारे के तौर-तरीकों पर वार किया है वह सुनने लायक था। कुछ वामपंथी नेताओं ने भी कल जो मुंह खोला है वह भी उनकी पार्टियों के कुछ नेताओं के उस रूख के खिलाफ था जो कि उन्होंने अन्ना के आंदोलन में शामिल होकर सामने रखा था और जिसके खिलाफ हमने कुछ दिन पहले यह लिखा था कि यह वामपंथियों की एक और ऐतिहासिक गलती के रूप में भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में दर्ज किया जाएगा। लेकिन कल संसद में जिस तरह से अन्ना हजारे के आंदोलन की धज्जियां उड़ाई गईं उससे हमारे सरीखे आलोचक का कलेजा ठंडा हुआ है और हमें यह भी लगा कि अपनी सोच में हम पूरी तरह अकेले नहीं हैं। कल की संसद के बाद आज का मुंबई हाईकोर्ट और राहत लेकर आया है। 

हम पाठकों से यह बात फिर कहना चाहेंगे कि संसद की पूरी जिम्मेदारी और पूरे हक को खारिज करते हुए जिस तरह से आज अरविंद केजरीवाल का एक बयान सामने आया है कि उन्हें संसद पर कोई भरोसा नहीं है, इस खतरे को जनता को समझने की जरूरत है। एक वक्त था जब आपातकाल लगाने के लिए संजय गांधी और इंदिरा गांधी के मातहत गिरोह ने इंदिरा इज इंडिया का नारा लगाया था और भारतीय लोकतंत्र पर विदेशी हाथ के खतरे का फर्जी नारा देते हुए देश के लोगों के मौलिक अधिकार छीन लिए थे। उस दौर में भाजपा सहित जिन पार्टियों ने जेल काटी थी, वे लोग आज अन्ना हजारे नाम की एक दूसरी ऐसी तानाशाही का साथ दे रहे हैं जो कि आज तो कांगे्रस और यूपीए के लिए तो परेशानी का सबब बनी हुई है लेकिन कल वह अपने-आपमें लोकतांत्रिक संस्थाओं के हत्यारे के रूप में गलत परंपराओं के साथ अगली सरकार के सामने भी खड़ी रहेगी। भाजपा को आज अगर संसद के भीतर कांगे्रस और यूपीए की फजीहत अच्छी लग रही है तो उसे यह याद रखना चाहिए कि उसके भीतर भी आने वाले कल में किसी सत्तारूढ़ गठबंधन की मुखिया बनने की संभावनाएं हैं और उसकी राजनीति किसी मंजिल को लेकर चल रही है। कुछ दिन पहले हमने एक दूसरे नामीगिरामी पत्रकार की बात यहां लिखी थी कि भाजपा के आज के तौर-तरीके ऐसे लग रहे हैं मानो अब वह सत्ता में नहीं आने वाली है। हम तो अन्ना नाम के खतरे को सिर्फ सत्ता पर खतरा मानकर नहीं चलते, हमारा मानना है कि यह पूरे लोकतंत्र पर एक खतरा है, और आज मुंबई हाईकोर्ट ने जो कहा है उसे लोगों को ध्यान से पढऩा चाहिए और उसके बारे में सोचना चाहिए। गांधी टोपी में एक तह मुड़ी हुई होती है। जिन सिरों पर से टोपी की यह तह खिसककर नीचे आकर आंखों को ढाक चुकी है, उन सिरों को भी किसी और से खबर में हाईकोर्ट की आज की फटकार पढऩी चाहिए।

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