संपादकीय
1 मार्च 2018

आज सुबह की दो खबरें ऐसी हैं जिनके बारे में हम हर कुछ महीनों में लोगों को सावधान करते रहते हैं। दिल्ली में 70 बरस के एक मौलवी ने अपने मदरसे में पढऩे आने वाली 9 बरस की बच्ची से रेप किया, उसे गिरफ्तार कर लिया गया है। दूसरी तरफ ब्रिटेन में एक ऐसी नौजवान और शादीशुदा शिक्षिका को गिरफ्तार किया गया है जिसने अपने ही 14 बरस के छात्र को अपनी नग्न तस्वीरें भेजकर, और उसे नशा कराकर उसके साथ देहसंबंध बनाए। इन दोनों बातों को देखें तो यह समझ आता है कि यौन शोषण के मुजरिम की न तो कोई उम्र सीमा होती, और न ही उसका औरत या मर्द होना जरूरी होता। इस तरह के बहुत से मामले रिश्तेदारी के भीतर और परिवार में भी होते हैं, और अड़ोस-पड़ोस, खेल के मैदान, अस्पताल पर भी जान-पहचान के प्रशिक्षक या चिकित्सक के हाथों बच्चों का शोषण होता है। अलग-अलग धर्मों में, या आध्यात्म के संप्रदायों में सेक्स-शोषण के मामले हिन्दुस्तान के आश्रमों से लेकर वेटिकन के चर्चों तक, और अमरीका में इस्कॉन के हॉस्टलों तक सामने आते ही रहते हैं।
अब इन खबरों को देख-पढ़कर भी अगर लोग सावधान नहीं होते हैं, तो वे अपने बच्चों को बहुत बुरे खतरे में डालते हैं। लोगों को अपनी अंधश्रद्धा, और अपने अंधविश्वास से अपने परिवार को खतरे में डालना बंद करना चाहिए। आसाराम पर अपने जिस भक्त की नाबालिग बेटी के साथ बलात्कार का आरोप है, वह बच्ची आसाराम की ही एक स्कूल में पढ़ती थी, वहीं के हॉस्टल में रहती थी, और वहां की प्रिंसिपल भी आसाराम के ही एक भक्त परिवार की थी। इसी किस्म का अंधविश्वास राम-रहीम के मामले में सामने आया, या और कई मामलों में दिखा। धर्मगुरू, आध्यात्मिक गुरू, बड़े फिल्मी सितारे, बड़े कलाकार, पॉप सिंगर, ताकतवर राजनेता, इन सबका अपने आसपास एक प्रभामंडल होता है, जिसके साये में आने वाले लोग उनसे प्रभावित होकर अपनी तर्कशक्ति खो बैठते हैं। इनकी आकर्षण उन्हें भले-बुरे की सोच छोड़ देने पर मजबूर करता है, और अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन वहां के राष्ट्रपति भवन की एक प्रशिक्षु मोनिका लेविंस्की के साथ सेक्स-संबंध बनाने में कामयाब हो जाते हैं, और फिर यह बात उनके पूरे कुनबे के लिए अंतरराष्ट्रीय शर्मिंदगी की बात बन जाती है, लेकिन मोनिका लेविंस्की भी एक सामान्य जिंदगी नहीं जी पातीं।
लोगों को अपने बच्चों की हिफाजत करने में चौकन्ना तो रहना चाहिए, लेकिन स्कूल-कॉलेज या खेल संस्थानों के लोग, दफ्तरों के लोग या रोजगार के किसी और जगह के इंचार्ज लोगों को अपने मातहत लोगों को शोषण से बचाने के लिए सावधान भी रहना चाहिए। बहुत सी ऐसी स्थितियां रहती हैं जिनमें बरसों से किसी खेल में मेहनत करने वाले खिलाडिय़ों को किसी टीम में जगह पाने के लिए प्रशिक्षक या चयनकर्ता के सामने समर्पण करना पड़ता है, ठीक उसी तरह जिस तरह की किसी फिल्म या टीवी सीरियल में काम पाने के लिए कलाकारों को निर्माता के सामने बिछ जाना पड़ता है। सरकारी दफ्तरों में कभी प्रमोशन के लिए, तो कभी किसी चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारी के लिए, और कभी-कभी महज नौकरी बचाए रखने के लिए भी लोगों को अपने बड़े अफसरों के सामने मजबूरी में लेट जाना पड़ता है। इसी किस्म के एक शोषण का विरोध करने वाली एक मामूली सी सिपाही को छत्तीसगढ़ सरकार ने जब पिछले एक बरस से अधिक से भी गुजर जाने पर इंसाफ नहीं दिया, तो अब हाईकोर्ट ने डेढ़ महीने में इस यौन-शोषण मामले की जांच रिपोर्ट पर कार्रवाई का हुक्म दिया है। अब देखना यह है कि छत्तीसगढ़ सरकार एक अदना सी महिला सिपाही के बुनियादी हक को और कब तक कुचलने के लिए और कितने किस्म के बहाने ईजाद करके अपने एक बड़े अफसर को बचाने का काम करती है। हालांकि यह तय है कि अगर सरकार ने अब भी कार्रवाई नहीं की, तो सुप्रीम कोर्ट से भी सरकार को बुरी फटकार लगना और जिम्मेदारों को कोई सजा होना है।
यह चर्चा जिन दो मिसालों से शुरू की है, वैसी मिसालें जिंदगी में कदम-कदम पर बिछी हुई हैं, और जरूरत है उन्हें अनदेखा न करने की। (Daily Chhattisgarh)
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