संपादकीय
23 मार्च 2018

एक तरफ दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक, फेसबुक पर से दुनिया की सबसे बड़ी डेटा-चोरी सामने आई है, और दूसरी तरफ भारत के सुप्रीम कोर्ट में आधार कार्ड के खिलाफ चल रही एक सुनवाई में आधार कार्ड परियोजना के मुखिया ने कहा है कि यह तकनीक पूरी तरह परफेक्ट नहीं है। इन दो बातों से परे भी यह समझ में आ रहा है कि जिस रफ्तार से भारत को डिजिटल, ऑनलाईन, कैशलेस बनाने की कवायद चल रही है वह खतरे से खाली नहीं है। हर पीएम, सीएम, या डीएम का यह हक तो होता है कि वे अपने कार्यकाल में मील के कुछ पत्थर लगाकर जाएं, लेकिन सवाल यह है कि कार्यकाल तो पांच बरस का होता है, और लोगों की जानकारी जिंदगी भर के लिए होती है। ऐसे में सरकार को अपने ही साइबर सुरक्षा सलाहकार के चार-छह दिन पहले आए एक बयान को देख लेना चाहिए जिसमें उन्होंने कहा है कि वे ऑनलाईन बैंकिंग कम से कम करते हैं, नहीं के बराबर। और इसके लिए वे एक खाते में 25 हजार रूपए अलग से रखते हैं, अपने मुख्य खाते से वे ऑनलाईन बैंकिंग नहीं करते। सरकार को यह भी समझने की जरूरत है कि जिस रफ्तार से देश को कैशलेस बनाने की कोशिशें चल रही हैं वे जनता पर कितनी भारी पड़ रही हैं।
यहां पर दो बातें बिल्कुल अलग-अलग हैं, लेकिन ये दोनों ही बातें सरकार की डिजिटल और साइबर महत्वाकांक्षाओं से जुड़ी हुई हैं। जब दुनिया में फेसबुक जैसी बड़ी कंपनी भी अपने डेटा की हिफाजत नहीं कर पा रही है, तो भारत सरकार को भी यह मानना चाहिए कि उसका डेटा पूरी तरह सुरक्षित शायद न भी हो। और ऐसे में लोगों की बायोमैट्रिक जानकारी को इक_ा करके उसे देश-विदेश के सर्वर पर डालकर रखने से लोगों की निजी जिंदगी खतरे में पड़ रही है। आज भी दुनिया में ऐसी तकनीक मौजूद है जिससे लोगों के फिंगर प्रिंट को लेकर उसका बेजा इस्तेमाल किया जा सके। और भारत में तो तकरीबन पूरी आबादी के फिंगर प्रिंट, उनकी आंखों के भीतर की जानकारी, सब कुछ सरकार के पास है, और सब कुछ बहुत बुरी तरह के खतरे में भी है। लगे हाथों सरकारी महत्वाकांक्षा के एक दूसरे पहलू पर भी चर्चा जरूरी है। मोदी सरकार ने देश से नगदी कारोबार को कम से कम करने के लिए नोटबंदी की, और उसके बाद बैंक से नगद निकालने पर भी सौ तरह की रोकटोक लागू की। लेकिन अभी यह तथ्य सामने आया है कि बैंक किसी एटीएम कार्ड के हर इस्तेमाल पर चार्ज लगा रहे हैं, चाहे उससे पैसा निकला हो, या न निकला हो। बैंक उसे उसी तरह गिनकर चल रहे हैं कि मानो कोई चेक बाऊंस हो गया हो, और उस पर जुर्माना लग रहा हो। अगर सरकार सचमुच ही कैश का लेन-देन घटाना चाहती है, तो उसे एटीएम कार्ड के इस्तेमाल को इतना महंगा नहीं करना चाहिए। ऐसा लगता है कि बैंक अपने बड़े कर्जों पर जो हजारों करोड़ रूपया अपनी ही जालसाजी से खो रहे हैं, उसकी भरपाई वे आम जनता से कर रहे हैं। यह सिलसिला लोगों का भरोसा बैंकों पर से घटा रहा है, और लोगों को इस बात के लिए मजबूर भी कर रहा है कि वे एक बार में ही जरूरत से अधिक नगदी निकालकर रख लें क्योंकि बाद में हर ट्रांजेक्शन पर बैंक वसूली-उगाही करेगा, जुर्माना लगाएगा।
भारत सरकार को अपनी साइबर नीति, अपनी आधार नीति, और अपनी बैंक नीति इन सबके बारे में फिर से सोचना चाहिए क्योंकि जिंदगी की निजता को खतरे में डालना अलोकतांत्रिक बात है, और इसी तरह गरीब जनता पर ऐसी कैशलेस व्यवस्था लादना भी अलोकतांत्रिक है जिसमें उसे हर बार भुगतान या जुर्माना देना पड़े। (Daily Chhattisgarh)
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