चुनौतियों वाले मौकों पर चुप रह जाने या नदारत रहने वाले राहुल

संपादकीय
20 मार्च 2018


अभी कांग्रेस का राष्ट्रीय अधिवेशन हुआ तो उसमें राहुल गांधी के भाषण में देश के मोदी और भाजपा विरोधियों को उम्मीद दिखाई दी। कुछ लोगों ने राहुल गांधी की बातों में एक नई परिपक्वता देखी, तो कुछ लोगों ने मोदी सरकार पर भ्रष्टाचार की राहुल की तोहमतों को खासा तेज हमला माना। लेकिन राहुल गांधी के व्यक्तित्व और उनकी सोच में अगर कोई बदलाव आया है, और वह अहमियत रखता है, तो उसे समझते हुए आज की एक ट्वीट को देखना भी जरूरी है। एक पत्रकार ने लिखा है- राहुल गांधी का भाषण बताता है कि पप्पू बड़ा हो गया है, तब तक, जब तक कि वे योरप की अगली फ्लाईट न पकड़े।
अब राहुल गांधी के साथ दिक्कत यह है कि उनकी जवाबदेही बहुत ही कम है। अपनी पार्टी के भीतर उनका राज किसी काबिलीयत की वजह से नहीं है, अपने डीएनए की वजह से है। और इसमें भी कोई बहुत अटपटी बात नहीं है, हिंदुस्तान में आज शायद तीन-चौथाई पार्टियां लोकतंत्र के बजाय डीएनए पर चल रही हैं, और कांगे्रस शायद उनमें सबसे बड़ी पार्टी है, इसलिए वह कुनबापरस्ती की तोहमतों में एक बड़े हिस्से की, सबसे बड़े हिस्से की, हकदार भी है। लेकिन आज यहां इस मुद्दे पर लिखने का मकसद कांगे्रस की कुनबापरस्ती को गिनाना नहीं है, वह बात अब आई-गई हो गई, अब भारतीय लोकतंत्र में कांगे्रस के सामने जो चुनौतियां खड़ी हैं, उन पर कांगे्रस पार्टी और उसकी लीडरशिप का रूख एक मुद्दा है जो सोचने-विचारने के लायक है। 
राहुल गांधी समंदर में आए ज्वारभाटा की लहरों सरीखे रहते हैं, कभी वे कोई ऊंचा और आक्रामक बयान देते हैं, तो कभी वे सतह से मिलने की हद तक सपाट लहर बन जाते हैं। जब देश में कोई बड़ा मुद्दा होता है, जब जलती-सुलगती कोई बात होती है जिस पर हर पार्टी और हर नेता से जनता उनका रूख उजागर होने की उम्मीद करती है, तो ऐसे बहुत से मौकों पर राहुल गांधी विदेश में छुट्टियां मनाते रहते हैं। और आज का वक्त तो ऐसा भी नहीं है कि दूसरे देश में रहते हुए लोग अपने देश की हलचल को जान न सकें, उस पर कुछ बोल न सकें। लेकिन राहुल गांधी ठीक अपनी मां सोनिया गांधी की तरह देश की जनता और अपनी पार्टी की उम्मीदों से ऐसे अछूते नेता हैं जो कि वन-वे टै्रफिक वाली सड़क के एक सिरे पर बैठे और बसे हुए हैं। उनको जब और जो कहना ठीक लगता है, उनकी पार्टी और उनके वोटरों को उसे ही काफी मानना होता है। उससे अधिक इस कुनबे से कुछ पाना नहीं हो पाता।
भारत की तरह का चुनावी लोकतंत्र चुनिंदा मौकों पर चुनिंदा बातें बोलकर चुनौतियों के मौकों पर चुप रह जाने या नदारत रहने जैसा लोकतंत्र नहीं है। एक तरफ नरेन्द्र मोदी किस्म के नेता हैं जो कि घर-बार से दूर, अकेले और आजाद, अठारह घंटे तक रोज काम करने के आदी हैं जिन्होंने छुट्टियां शायद कभी देखी नहीं है। इसलिए जब चुनावी मुकाबला ऐसे लीडर से हो, तो जनता दूसरे लीडर को भी देखती है और उसकी तुलना किए बिना भी नहीं रहती। ऐसे में चुनौती के वक्त अदृश्य रहने वाले गैरमौजूद नेता की राह आसान नहीं हो सकती। अगर राहुल गांधी को देश के विपक्ष की राजनीति में प्रासंगिक बने रहना है, तो उन्हें अपने वक्त पर अपने निजी हक का तौर-तरीका छोड़कर देश और जनता के प्रति अधिक जवाबदेह होना होगा। आज भी अधिकतर मोदी-विरोधी लोग राहुल को एक नॉनसीरियस, गैरगंभीर नेता मानते हैं, और उन्हें इस जनधारणा को बदलने के लिए खासी मेहनत करनी पड़ेगी, तब कहीं जाकर वे जनमत को बदलने की स्थिति में आ पाएंगे। (Daily Chhattisgarh)

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