भ्रष्ट सांसद-विधायकों के घर लोकतंत्र पानी भरता है

संपादकीय
5 मार्च 2018


पिछले कई महीनों से बिहार के एक सबसे बड़े नेता लालू यादव के कुनबे के बारे में उनकी तकलीफ की खबरें ही आ रही हैं। लालू खुद एक के बाद दूसरे चारा घोटाले में सजा पा रहे हैं, और इसी किस्म की सजा के लायक अगले कई केस अदालत में खड़े हुए हैं। ऐसा लगता है कि इस दौर के निपटने तक लालू खुद भी भूल चुके होंगे कि उन्हें किस-किस मामले में कितने-कितने बरस की कैद हुई है। उन्हें सजा मिलने का यह सिलसिला पिछली यूपीए सरकार के वक्त से चल रहा है, इसलिए मुकदमा चलाने वाली एजेंसी, सीबीआई, अगर पिंजरे में बंद तोता है, तो यह तोता उस वक्त से लालू को सजा दिला रहा है जब वह यूपीए का मि_ू था। ऐसा लगता है कि लालू यादव का भ्रष्टाचार निर्विवाद रूप से साबित पुख्ता भ्रष्टाचार है, जो कि सीबीआई की विशेष अदालत में सजा पा चुका है, और ऊपर की अदालतों तक भी ये फैसले खड़े रहेंगे। 
लेकिन अदालती फैसलों से परे एक दूसरे मोर्चे पर लालू की सांसद बेटी मीसा भारती और उसके पति लगातार कालेधन और पैसों की गैरकानूनी अफरा-तफरी, अनुपातहीन संपत्ति के मामलों में बहुत किस्म की जांच के बाद अब अदालत से जमानत पा रहे हैं, और सैकड़ों करोड़ की जायदाद जब्त हो रही है, या जांच के घेरे में है। लोगों को याद होगा कि कुछ महीने पहले लालू यादव के बेटों की जायदाद को लेकर कई तरह के आरोप सामने आए थे, और उनकी जांच चल रही है। इस दौरान यह बात भी सामने आई थी कि लालू यादव ने लोगों को अपनी पार्टी का टिकट देने के एवज में उनसे जमीन-जायदाद अपने कुनबे के नाम करवाई। इन सारे मामलों को एक नजर में देखें तो लगता है कि लालू कुनबे की अनुपातहीन संपत्ति कहीं न कहीं तो राजनीतिक भ्रष्टाचार से आई हुई है। एक ऐसा भ्रष्टाचार जो निहायत गैरजरूरी था, और अपनी राजनीतिक ताकत के बदौलत लालू यादव वैसे भी अपने कुनबे को सुख-सुविधा दे सकते थे। सत्ता पर बैठकर अंधाधुंध पैसा कमाने की हवस उन पर हावी थी, और अगली पीढ़ी को उन्होंने विरासत में विधानसभा और संसद में कुर्सियां तो दिला दीं, लेकिन जेल की कोठरी के खतरे में भी डाल दिया है। 
आज इस बात की चर्चा इसलिए सूझ रही है कि मीसा भारती को पति सहित जमानत मिलने की खबर है, और बहुत से लोग इस बात को लिख रहे हैं कि देश का सबसे गरीब और सबसे ईमानदार मुख्यमंत्री त्रिपुरा में किस तरह चुनाव हारा है, और न केवल वह चुनाव हारा है, बल्कि वहां पर लोकतंत्र भी चुनाव हार गया है। यह बात समझने की जरूरत है कि देश का एक सबसे भ्रष्ट साबित हो रहा लालू कुनबा बिहार में सबसे बड़ी पार्टी बनकर चुनाव जीतता है, और देश का सबसे गरीब मुख्यमंत्री चुनाव हार जाता है। इसे भारतीय लोकतंत्र में जागरूकता का कौन सा दर्जा माना जाए? देश भर में अलग-अलग पार्टियों में ऐसे अनगिनत नेता हैं जो कि जाहिर तौर पर, और घोषित रूप से भ्रष्ट हैं, लेकिन वे न सिर्फ चुनाव जीतते हैं, बल्कि बड़ी-बड़ी पार्टियां चलाते हैं, और सरकार भी बनाते हैं। हरियाणा में लंबे समय तक राज करने वाले देवीलाल का चौटाला परिवार आज जेल में है क्योंकि मुख्यमंत्री रहते हुए जो भ्रष्टाचार किया था, उसे देश के सबसे महंगे वकील भी अदालत में नकार न सके, और सजा हुई। लेकिन इस कुनबे का भ्रष्टाचार जब जगजाहिर था, तब भी यह कुनबा बार-बार चुनाव जीतता था। इसलिए क्या ईमानदारी से जीत का कोई रिश्ता है? 
आगे की यह बात बहुत ही निराशाजनक है कि भारतीय लोकतंत्र में ईमानदारी की कोई जगह नहीं है, और भ्रष्टाचार किसी तरह की कमजोरी नहीं बनता। बल्कि हकीकत तो यह है कि जनता का एक बहुत बड़ा हिस्सा अपने नेता के भ्रष्टाचार का अघोषित समर्थन करता है क्योंकि रॉबिनहुड अगर लूटेगा नहीं तो बांटेगा क्या? जनता यह उम्मीद करती है कि उसका नेता मुसीबत में उसका साथ दे, इलाज के लिए पैसे दे, शादी के वक्त कम से कम अनाज और शक्कर के बोरे भिजवा दे, बच्चे के कॉलेज-दाखिले के लिए कुछ नगद दे दे। हिन्दुस्तानी लोकतंत्र में आज भ्रष्ट नेता इसलिए भी लगातार जीतते हैं क्योंकि वे अपनी लूट का कुछ हिस्सा अपने वोटरों के बीच बांटते हैं। वोटरों की इतनी समझ नहीं रहती, और अंदाज लगाने का उनके पास कोई जरिया नहीं रहता कि अरबों की लूट में से करोड़ों बांटकर भी नेता किस तरह लोकतंत्र को अपने पांवतले दबाकर रखने की ताकत जुटा लेता है। 
हमारा तजुर्बा यह है कि पार्टियां अपने सबसे भ्रष्ट मंत्रियों की टिकट काट नहीं पाती क्योंकि उनको यह मालूम रहता है कि किसी और को उम्मीदवार बनाने पर अरबपति मंत्री किस तरह उस उम्मीदवार को हटाने की ताकत रखते हैं। ऐसे में पार्टियां उन्हीं पर दांव लगाती हैं, क्योंकि उन्हें यह मालूम रहता है कि मंत्री के पास इतनी दौलत है, और अगले पांच बरस की संभावना खरीदने की इतनी हसरत है कि वह चुनाव में अंधाधुंध खर्च करके जीत को खरीद ही लेगा। किसी भी पार्टी को सरकार बनाने के लिए गिनती की जरूरत होती है, और ऐसी गिनती में सबसे भ्रष्ट की खासी बड़ी संभावना भी होती है। इसलिए लोकतंत्र उन लोगों के जूते तले दबे हुए सांस लेता है जिन्होंने अगले कई चुनाव खरीदने की ताकत जुटा ली है। हमने बात शुरू तो लालू कुनबे से की थी, लेकिन उसे खत्म हम देश भर में बिखरे हुए उन तमाम भ्रष्ट सांसद-विधायकों पर कर रहे हैं जिनके घर लोकतंत्र पानी भरता है। ईमानदार नेता अपने घर खुद पानी भरता है, और बेईमान नेताओं के घर लोकतंत्र पानी भरने जाता है। (Daily Chhattisgarh)

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