हर कोई ऐसी नौबत से बचे जो सम्मान कम, अपमान अधिक

संपादकीय
10 मार्च 2018


दिल्ली उच्च न्यायालय की कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल ने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर न्यायपालिका की समझ रखने वाले तमाम लोगों को हक्का-बक्का कर दिया। उन्होंने केन्द्र सरकार द्वारा दिया गया नारी शक्ति पुरस्कार लेकर जजों के बीच के इस अलिखित, अघोषित सिद्धांत को तोड़ दिया कि जजों को सरकार से कोई सम्मान नहीं लेना चाहिए। ऐसा इसके पहले किसी को याद नहीं पड़ता है, और ऐसा कहा गया है कि सरकार से सम्मान लेने वाली वे पहली जज हैं। इसके पहले जस्टिस पी.एन.भगवती, जस्टिस एम.एम. वेंकटचलैया, को रिटायर होने के बाद, और जस्टिस जे.एस. वर्मा को गुजर जाने के बाद पद्म सम्मान दिए गए थे। जस्टिस गीता मित्तल के सम्मान लेने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की एक जानी-मानी वकील इंदिरा जयसिंह ने सार्वजनिक रूप से मोर्चा खोला है, और कहा है कि उन्हें ऐसे तमाम मामलों की सुनवाई के लिए अपात्र घोषित करना चाहिए जिनमें सरकार कोई पक्ष हो। 
न्यायपालिका के लोग आमतौर पर सामाजिक जीवन में अपनी भूमिका सीमित रखते हैं, ताकि तरह-तरह के संबंध उनके कामकाज में आड़े न आएं। एक वक्त था कि जज सार्वजनिक संस्थाओं में सदस्य भी नहीं बनते थे क्योंकि उन्हें संबंध विकसित हो जाने का खतरा लगता था, लेकिन मध्यप्रदेश के लोगों को याद है कि हाईकोर्ट के एक जज, जस्टिस गुलाब गुप्ता किस तरह रोटरी क्लब में सक्रिय रहते थे, और एक वक्त वे रोटरी के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर भी बने जिसके लिए छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, और ओडिशा के रोटरी क्लबों का समर्थन जुटाने के लिए उन्हें लंबा-चौड़ा जनसंपर्क करना पड़ा था। लेकिन वैसी कोई मिसाल तब तक सामने नहीं आई थी, और न्यायपालिका से जुड़े लोगों ने उनके उस फैसले को अच्छा भी नहीं माना था। लेकिन यह बात तो लोगों की कल्पना से भी परे की है कि कोई जज केन्द्र सरकार का कोई पुरस्कार या सम्मान मंजूर करे। खासकर दिल्ली हाईकोर्ट की कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश, जिसका कि वास्ता दिल्ली और केन्द्र सरकार के बहुत से मामलों से रोजाना ही पड़ता है। 
हम सैद्धांतिक रूप से सरकार के किसी भी पुरस्कार या सम्मान देने के खिलाफ हैं। दुनिया में ऐसे तमाम पुरस्कार और सम्मान जिनका कि खुद का सम्मान है, वे सब गैरसरकारी हैं। शांति, साहित्य, विज्ञान, अर्थशास्त्र जैसे क्षेत्रों के दुनिया के सबसे बड़े नोबल पुरस्कार का पूरा ढांचा सरकार से परे की एक कमेटी का है। फिल्मों में दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण माने जाने वाले ऑस्कर सम्मान समारोह के तेवर तो अमूमन सरकार विरोधी रहते हैं, और सरकार का उन्हें तय करने में कोई दखल भी नहीं रहता। गुलाम हिन्दुस्तान में जिन लोगों ने ब्रिटिश महारानी की ओर से दिया जाने वाला सरकारी सम्मान मंजूर किया था, उन्हें आजादी के लड़ाके हिकारत की नजर से देखते थे, और आज भी इतिहास में उनका नाम किसी इज्जत के साथ दर्ज नहीं होता है। हम पहले भी बरसों से यह बात लिखते आए हैं कि सरकारों को सम्मान और पुरस्कार देने की ताकत का मोह छोड़ देना चाहिए। छत्तीसगढ़ में ही राज्य की स्थापना दिवस के मौके पर जो सालाना जलसा होता है, और जिसमें बहुत से सम्मान-पुरस्कार दिए जाते हैं, उनका तजुर्बा यह है कि अब तो धीरे-धीरे उनके लायक नाम भी सूझना बंद हो गए हैं। वैसे भी सरकार के दिए गए सम्मान और पुरस्कार की न तो कोई विश्वसनीयता होती है, और न ही सच में किसी सम्माननीय व्यक्ति का सम्मान उससे बढ़ सकता है। सरकारें राजनीतिक दलों की होती हैं जिनके सामने वोट पाने का दबाव हर वक्त बने रहता है। ऐसे में सत्तारूढ़ दल अपनी पसंद और नापसंद से देश के कुछ लोगों को दूसरे लोगों के मुकाबले अधिक इज्जतदार साबित करने का काम करते हैं, जो कि एक नाजायज काम है। सम्मान और पुरस्कार देने का काम गैरसरकारी संगठनों को करना चाहिए, और उन्हीं को करना चाहिए। इसके लिए भी नाम और सुझाव सार्वजनिक रूप से आमंत्रित किए जाने चाहिए, एक पूरी तरह से पारदर्शी, विश्वसनीय, और सम्माननीय निर्णायक मंडल होना चाहिए। उसे पारदर्शी प्रक्रिया से, दबावमुक्त होकर नाम तय करने चाहिए। इसके बाद तय किए गए नामों को तय करने की वजहें सार्वजनिक की जानी चाहिए। तब कहीं जाकर सचमुच के इज्जतदार लोगों को यह सोचना-विचारना चाहिए कि वे ऐसे सम्मान-पुरस्कार मंजूर करना चाहते हैं या नहीं। 
जहां तक जजों का सवाल है, तो उन्हें तो किसी भी सम्मान के मोह से परे रहना चाहिए, और हमारा यह भी मानना है कि उन्हें रिटायर होने के बाद कम से कम पांच बरस तक ऐसे हर मनोनयन से परे रहना चाहिए जहां पर किसी रिटायर्ड जज को ही मनोनीत करना संवैधानिक रूप से जरूरी न हो। पांच बरस तक मनोनयन से परे रहने पर सत्ता से फायदा पाने की उम्मीद से सत्ता पर अदालती मेहरबानी करने का खतरा भी खत्म हो जाएगा। इसके अलावा हमारा यह भी मानना है कि जिस राज्य सरकार के कार्यकाल में उस राज्य के किसी जज ने काम किया हो, तो रिटायर होने के बाद भी उस राज्य के किसी पद पर उसके मनोनीत होने पर साफ रोक लगनी चाहिए। आज हम छत्तीसगढ़ में ही एक के बाद एक ऐसे कई मनोनयन देख चुके हैं जो कि इसी राज्य से रिटायर होने वाले जजों को इसी राज्य सरकार के द्वारा दिए गए हैं। अगर किसी कुर्सी पर रिटायर्ड जज की ही जरूरत है, तो ऐसे जज दूसरे राज्यों से रिटायर होने वाले होने चाहिए, न कि उसी राज्य से रिटायर होने वाले। देश में सुप्रीम कोर्ट के जज रिटायर होते ही जब राज्यपाल बनकर कहीं जाते हैं, तो वे न्यायपालिका की विश्वसनीयता को घटाते हैं क्योंकि राज्यपाल तो किसी गैरजज को भी बनाया जा सकता था। 
आज देश में अलग-अलग लोकतांत्रिक संस्थानों पर विश्वसनीयता का खतरा मंडरा रहा है। ऐसे में लोगों को वृद्धावस्था-पुनर्वास का मोह छोडऩा चाहिए, और सम्मान-पुरस्कार का मोह भी। बहुत से सम्मान ऐसे होते हैं जो देने वालों और लेने वालों के नाजुक रिश्तों की वजह से, या देने वालों की विश्वसनीयता न होने की वजह से, सम्मान कम, अपमान अधिक रहते हैं। 
(Daily Chhattisgarh)

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