संपादकीय
4 मार्च 2018

उत्तर-पूर्वी राज्यों के, खासकर त्रिपुरा के, चुनावी नतीजों के बाद शरद यादव ने एक तस्वीर पोस्ट की है जिसमें वे कुछ गैरभाजपाई नेताओं के साथ बात करते दिख रहे हैं। तस्वीर के बारे में उन्होंने लिखा है कि देश के आज के राजनीतिक हालात और भविष्य की रणनीति बनाने पर चर्चा के लिए आज विपक्ष के नेता मेरे घर पर एक चर्चा के लिए इकट्ठा हुए। यह बात सही है कि कल के चुनावी नतीजों में भाजपा ने जो कामयाबी साबित की है, उससे तमाम गैरभाजपाईयों को बैठकर न सिर्फ चर्चा करनी चाहिए, न सिर्फ भविष्य की रणनीति बनानी चाहिए, बल्कि अपने पिछले दस-बीस बरस पर भी नजर डालनी चाहिए, कुछ हफ्ते आत्मविश्लेषण, आत्ममंथन करना चाहिए, और फिर अगले चुनावों की फिक्र किए बिना अपनी बुनियाद में मरम्मत की फिक्र करनी चाहिए। लोगों को याद होगा कि कुछ ओलंपिक पहले, जब हिन्दुस्तान को शायद एक भी मैडल नहीं मिला था, और लगातार तीन ओलंपिक ऐसे निकले थे, तब हिन्दुस्तान में यह चर्चा होनी लगी कि क्या भारत को अगले ओलंपिक में अपनी टीम भेजने के बजाय एक ओलंपिक से सन्यास लेकर महज तैयारी करनी चाहिए?
आज देश में गैरभाजपाई, और गैरएनडीए पार्टियों के साथ नौबत तकरीबन ऐसी ही आ गई है। पौराणिक किस्से-कहानियों में एक ऐसे अश्वमेध यज्ञ की बात आती है जिसमें किसी एक राजा का घोड़ा उसका झंडा लिए दूर-दूर तक जाता है, और जिन देशों को इस घोड़े के राजा का राज मंजूर नहीं होता, उन्हें यह लडऩे की चुनौती रहती है। आज भाजपा की हालत वही हो गई है। भाजपा की कामयाबी के आंकड़े अगर देखें तो वह अपने गठबंधन के साथ देश की करीब तीन चौथाई आबादी पर राज करने जा रही है, अभी उससे जरा ही दूर है लेकिन आसार उसी तरफ इशारा करते हैं। भाजपा की यह पूरी कामयाबी मोटे तौर पर भारत में प्रचलित लोकतांत्रिक तौर-तरीकों से हासिल की गई है, और इसीलिए यह दूसरी पार्टियों के लिए अधिक खतरनाक भी है। उत्तरप्रदेश के चुनाव के बाद जिस तरह इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में छेड़छाड़ करके जीतने की तोहमत भाजपा पर लगाई गई थी, वह उस वक्त भी खोखली और बोगस लगती थी, और अब उत्तर-पूर्व के अलग-अलग कई राज्यों में भाजपा की बुलडोजरी कामयाबी के बाद वह एक बोगस आरोप के रूप में इतिहास में दर्ज होगी क्योंकि इस बार ईवीएम से पर्चियां भी निकल रही थीं, और इसके बाद फर्जी मतदान के आरोप की गुंजाइश नहीं थी। पाकिस्तान की एक चर्चित पत्रकार ने आज सुबह ट्वीट किया है कि वह भारत की खबरों में लगातार एक ही पार्टी भाजपा की जीत की खबरें पढ़ते आ रही है, और ऐसे में दूसरी पार्टियों को भाजपा से सीखना चाहिए कि चुनाव कैसे जीता जाता है।
भाजपा की यह जीत भारत के लोकतंत्र में अपने किस्म की एक अभूतपूर्व घटना है। हिन्दुस्तान में निर्विवाद रूप से एक सबसे ईमानदार मुख्यमंत्री माने जाने वाले त्रिपुरा के सीपीएम के माणिक सरकार की सरकार पच्चीस बरस बाद जिस तरह से मतदाताओं ने बाहर की है, वह पिछले आम चुनावों में नरेन्द्र मोदी के सत्ता में आने से भी अधिक बड़ी घटना है, यह अलग बात है कि यह सिर्फ एक राज्य में है। जिस तरह से देश के इस आखिरी खालिस वामपंथी राज्य में तीन चौथाई सीटें पाई हैं, वह दुनिया के किसी भी चुनावी-राजनीति के शोधकर्ता के लिए एक महत्वपूर्ण विषय है। त्रिपुरा के पिछले चुनाव में भाजपा के तमाम उम्मीदवार जमानत जब्त करवा चुके थे, और पूरा प्रदेश कम्युनिस्ट पार्टी के झंडे का लाल था। आज अपने पांचवें कार्यकाल के बाद बेदाग माणिक सरकार जिस तरह से खारिज किए गए हैं, वह अविश्वसनीय है। लेकिन इसके साथ-साथ समझने की जरूरत एक दूसरी बात पर भी है, जिन आदिवासियों के बीच वामपंथियों की मजबूत पकड़ होनी चाहिए, उनके बीच हाल और खराब रहा। त्रिपुरा की तमाम 22 आदिवासी सीटें भाजपा ने जीत लीं, और अब न सिर्फ वामपंथियों को, बल्कि लोकतंत्रवादियों को भी इस देश के भविष्य में उनकी भूमिका और उनकी संभावनाओं के बारे में सोचने की जरूरत होगी। इतने चुनावों के बाद अब भाजपा पर अलोकतांत्रिक तौर-तरीकों, साम्प्रदायिकता, पैसों से चुनाव खरीदने जैसी तोहमतों का दौर खत्म हो चुका है। अब गैरभाजपा-गैरएनडीए पार्टियों के सामने रास्ता बड़ा साफ है, वे भारतीय लोकतंत्र की मौजूदा सोच को समझकर आगे का अपना रास्ता तय करें, या फिर हाशिए पर चले जाएं। नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी की मौजूदा ताकत और क्षमता को तोहमतों से हराने का वक्त अब रह नहीं गया है। किसी मैच में खेल के मौजूदा तौर-तरीकों को समझे बिना उस खेल को छोड़ देने का काम ही हो सकता है। भारतीय विपक्ष को अब खेल के ताजा नियमों के मुताबिक खेलने का तरीका सीखना होगा, यह उनकी हस्ती बचाए रखने के लिए भी जरूरी है, और भारतीय लोकतंत्र के लिए भी। भारतीय जनता पार्टी कामयाबी की अभूतपूर्व लहरों पर सवार है, और नरेन्द्र मोदी-अमित शाह एक अविश्वसनीय आत्मविश्वास से भरे हुए भी हैं। (Daily Chhattisgarh)
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