संपादकीय
19 मार्च 2018

छत्तीसगढ़ में कल पुलिस में प्रमोशन के लिए हो रही एक दौड़ में एक सिपाही की मौत हो गई। पिछले बरस भी ऐसा ही हुआ था। पचास बरस की उम्र में किसी सिपाही को हवलदार बनने के लिए अगर अपने फिटनेस की परीक्षा देनी हो, और उसके लिए दौड़ के नियम तय हों, तो हो सकता है कि हर कोई उसके लायक तैयार न हों, और ऐसा हादसा हो जाए। अब कल हुए इस हादसे के साथ एक दूसरी बात यह भी जुड़ी हुई है कि ऐसे शारीरिक परीक्षण के दौरान किसी डॉक्टर या इलाज का इंतजाम नहीं था। लेकिन इस छोटी जानकारी से परे यह समझने की जरूरत है कि पुलिस विभाग के छोटे कर्मचारी किस हाल में रहते हैं, और उनसे अचानक फिटनेस की ऐसी उम्मीद किस वजह से गलत है।
हम विभागीय पदोन्नति के लिए बनाए गए पैमानों के खिलाफ नहीं हैं, वे तो होने ही चाहिए, लेकिन इसके साथ-साथ छोटे पुलिस कर्मचारियों की तकलीफों, काम के उनके बुरे हालात, और उनके मनोबल के बारे में भी सोचने की जरूरत है जिस पर देश में बहुत सी कमेटियों और आयोगों की रिपोर्ट पड़ी हुई हैं। लेकिन हम पुलिस के कामकाज के हालात सुधारने के लिए सरकार में एक ईमानदारी और गंभीरता को काफी मानते हैं। अगर सरकार यह तय कर ले कि किसी पुलिस कर्मचारी को मंत्रियों और अफसरों के बंगलों पर, और यहां तक कि रिटायर्ड अफसरों के घरों पर, काम पर नहीं लगाया जाएगा, पुलिस से पुलिस का काम ही करवाया जाएगा, तो भी जनता के पैसे की बर्बादी थमेगी, और पुलिस कर्मचारियों को अपने काम में गौरव भी हासिल हो सकेगा। दूसरी बात यह कि जिस तरह राज्य सरकार बाग-बगीचों में, और सड़कों के किनारे कसरत की मशीनें लगा रही है, हर थाने के अहाते में ऐसी मशीनें लगानी चाहिए जिसका इस्तेमाल पुलिस कर्मचारी भी कर सकें, और आसपास के लोग भी। इससे पुलिस की एक जनकल्याणकारी तस्वीर भी लोगों के मन में बनेगी, और पुलिस में भी अपनी सेहत ठीक रखने का उत्साह होगा।
लेकिन जब तक यह सब न हो जाए तब तक पुलिस की फिटनेस परीक्षा को अचानक ही कर्मचारियों पर लादने के बजाय हर बरस उनकी फिटनेस ठीक रखने का अभियान चलाना चाहिए, और इसे महज प्रमोशन का पैमाना बनाकर दस-बीस बरस की चर्बी के ऊपर एकदम से नहीं डालना चाहिए। यह एक छोटी सी बात लग रही है, लेकिन पुलिस के तन-मन को बचाने के लिए, बनाए रखने के लिए जरूरी बात भी है। (Daily Chhattisgarh)
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