लोकतंत्र में बढ़ता हुआ अंधेरा और कहां तक?

संपादकीय
30 मार्च 2018


देश में एकाएक कई प्रदेशों में साम्प्रदायिक हिंसा या साम्प्रदायिक तनाव की वारदातें हो रही हैं। बिहार में एक पखवाड़े में चार जिलों में यह नौबत आ गई है, और वहां एक केन्द्रीय मंत्री का बेटा साम्प्रदायिकता भड़काने के आरोप में फरार है। दूसरी तरफ जगह-जगह धर्मस्थलों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। उधर बंगाल में साम्प्रदायिक तनाव में कई मौतें हो चुकी हैं। राजस्थान में हनुमान जयंती के मौके पर इंटरनेट बंद करना पड़ा है ताकि लोग भड़काऊ संदेश इधर-उधर न भेजें। इस बीच उत्तरप्रदेश के राज्यपाल राम नाईक की कड़ी मेहनत के बाद वहां पर योगी सरकार ने सरकारी रिकॉर्ड में डॉ. बाबा साहब अंबेडकर के नाम के बीच में उनके पिता के नाम का एक हिस्सा, रामजी, जोडऩे का फैसला लिया है, और इस पर खुद भाजपा के दलित नेता भड़क गए हैं, मायावती तो भड़की ही हैं। इसके साथ-साथ पिछले कुछ दिनों से भाजपा की एक महिला सांसद की अगुवाई में उत्तर भारत के बहुत से सांसद दलित मुद्दों को लेकर भारी नाराजगी में हैं।
यह पूरा सिलसिला देश को एक निहायत ही गैरजरूरी तनाव में डालने का चल रहा है। पूरे देश में जिस तरह से धर्मान्धता और कट्टरता को बढ़ावा दिया जा रहा है, वे धर्म और जाति के मुद्दों को जिंदगी के असल और अहम मुद्दों के ऊपर लादा जा रहा है, वह बहुत खतरनाक सिलसिला है। सामाजिक रूप से भी, और आर्थिक रूप से भी। दिक्कत यह है कि यह तनाव खड़ा करने वाले लोग बिना किसी कार्रवाई के बच निकलते हैं, और एक ऐसा माहौल बन गया है कि साम्प्रदायिकता को फैलाना एक नवराष्ट्रवाद है। इस बीच कर्नाटक में राज्य सरकार ने पोस्टकार्ड नाम के एक ऐसे न्यूज पोर्टल के संपादक को साम्प्रदायिक नफरत फैलाने के जुर्म में गिरफ्तार किया है जो कि रात-दिन झूठी खबरें गढ़कर देश में नफरत फैलाने का एक अभियान सा चला रहा था। लेकिन इसके अलावा एक और बात भी दो दिन पहले सामने आई है जो कि इन सबसे अधिक फिक्र की है। देश में जलते-सुलगते असल मुद्दों की कोई कमी नहीं है, जनता बहुत बदहाली में है, लेकिन ऐसे में गैरजरूरी मुद्दों को इस तरह देश पर लाद देना देश को आगे बढऩे रोकने के बराबर है।
देश में कई सरकारों के राज में, सरकारों और पार्टियों के घपलों, साम्प्रदायिक संगठनों की साजिशों का भांडाफोड़ करने वाले एक सनसनीखेज न्यूज पोर्टल कोबरा पोस्ट ने एक लंबे स्टिंग ऑपरेशन अभियान के सुबूत सामने रखे हैं कि किस तरह देश के बड़े-बड़े नामी-गिरामी अखबार, और कई न्यूज चैनल किस तरह करोड़ों रूपए भुगतान के एवज में साम्प्रदायिकता और नफरत फैलाने के लिए एक पैर पर खड़े हुए मिले। कोबरा पोस्ट के संवाददाता ने एक हिन्दू साम्प्रदायिक बनकर खुफिया कैमरों के साथ बड़े-बड़े मीडिया घरानों के बड़े लोगों का स्टिंग ऑपरेशन किया, और वे लोग विपक्षी नेताओं को बदनाम करने के लिए भी तैयार हो गए, हिन्दू साम्प्रदायिकता फैलाने को भी तैयार हो गए, और किसी हिन्दू पार्टी की चुनावी संभावनाओं को बढ़ाने के लिए भी तैयार हो गए। किसी को ऐसी साजिश में भागीदार होने से परहेज नहीं मिला।
अब सवाल यह है कि चुनावी राजनीति में जीत हासिल करने के लिए राजनीतिक दल तो ऐसी साजिश करते आए हैं, लेकिन आज ऐसी नफरत फैलाने में देश के मीडिया के बड़े चर्चित और बड़े नाम अगर बेसब्र और उतारू दिखते हैं, और मीडिया की आत्मा को हिंसा के हथियार की तरह पेश कर रहे हैं, तो फिर लोकतंत्र में बाकी क्या है? क्यों मीडिया को कोई भी खास दर्जा दिया जाए? और क्यों न यह भी मान लिया जाए कि आज देश के कई बड़े राज्यों में जो साम्प्रदायिक हिंसा चल रही है, उसे करवाने वालों में मीडिया का ऐसा ही कोई हिस्सा शामिल है? भारतीय लोकतंत्र की यह नौबत बहुत ही खराब है। एक साम्प्रदायिक न्यूज पोर्टल बनाकर एक साजिश के तहत लगातार झूठ को पोस्ट करने पर अगर एक आदमी को गिरफ्तार किया जा रहा है, तो घंटे भर में ऐसा दूसरा न्यूज पोर्टल बनकर इसी काम को और आगे भी बढ़ाया जा सकता है, इस पर कोई रोक तब तक नहीं लग सकती जब तक कि कानून कड़ा न हो, उस पर अमल तेज रफ्तार न हो, और अदालतों का हौसला इंसाफ देने का न हो। आज तो इस बात को इसी बात पर खत्म करना वाजिब होगा कि न्यायपालिका के काम में भारत की सरकार की दखल का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट के एक जज ने मुख्य न्यायाधीश को एक चिट्ठी लिखी है। (Daily Chhattisgarh)

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