संपादकीय
27 मार्च 2018

अमरीकी राष्ट्रपतिमहाराष्ट्र के पुणे की खबर है कि वहां पर एक महिला पति से तलाक लेने अदालत पहुंची है, और उसने अपनी अर्जी में जो वजह गिनाई है वह हैरान करने वाली है। उसका कहना है कि पति इंजीनियर है, और वह रोटी का व्यास 20 सेंटीमीटर चाहता है, और अगर रोटी बिल्कुल इस आकार की न बने तो वह मारपीट करता है। खाने के पहले रोटी नापता है। वह हर बात में परफेक्शन चाहता है, और यह भी चाहता है कि दिन भर में उसने क्या-क्या काम किया है, इसे कम्प्यूटर के एक्सेल शीट पर अलग-अलग रंगों में बनाकर उसे रोज दिया जाए। ऐसा न होने पर वह हिंसक हो जाता है, गालियां देता है, और ठंडा पानी डालकर एसी कमरे में बंद कर देता है।
अब यह मामला अपने किस्म का एक अनोखा मामला है जिसमें परफेक्शन की जिद वाला एक पति कहीं भी कमी दिखने पर हिंसा पर उतर आता है। लेकिन इससे परे भी असल जिंदगी में ऐसे कई मामले रहते हैं जिसमें लोग परफेक्शन पर अड़े हुए बहुत बर्बादी करते हैं, दूसरों को बहुत तनाव देते हैं, और खुद भी बहुत तनाव लेते हैं। जिंदगी का तजुर्बा कहता है कि परफेक्शन की जिद लोगों का नफा कम करती है, नुकसान अधिक करती है। एक सीमा से अधिक सही होने की जिद उत्पादकता के खिलाफ तो जाती ही है, इसके साथ-साथ परफेक्शन पर उतारू इंसान का सुख-चैन भी छीन लेती है, और घर-दफ्तर के लोगों से उनके संबंध भी खराब होते चलते हैं।
दरअसल असल जिंदगी की सीमाओं को समझना भी जरूरी है। जब आपके साथ या आपके इर्द-गिर्द काम करने वाले लोगों पर काम का बोझ बहुत अधिक हो, या उनकी काबिलीयत कम हो, और उनसे उम्मीदें आसमान छूती लगा ली जाएं, तो नतीजा बर्बादी और तबाही का होता है। कई लोग कम तनख्वाह के लोगों के साथ काम करते हैं, और उनसे बहुत ही हुनरमंद लोगों सरीखा प्रदर्शन चाहते हैं। ऐसी ही नौबत के लिए बड़े-बुजुर्गों ने एक वक्त लिखा था कि मूंगफली जैसा भुगतान करने पर बंदरों की तरह के कामगार ही मिलते हैं। अब यह बात एक गलत मिसाल को लेकर जरूर लिखी गई है क्योंकि बंदर तो कम या अधिक कैसी भी तनख्वाह पर काम करते नहीं हैं, और इंसान हैं कि वे अच्छा काम भी करते हैं, और कमजोर प्रदर्शन भी दिखाते हैं। लोगों का कामकाज, या घर के भीतर उनका रहन-सहन, उनके तौर-तरीके बहुत सी बातों पर निर्भर करते हैं, और जब उनसे पूरी तरह से शानदार प्रदर्शन की उम्मीद की जाती है, तो उसके लिए उन्हें शानदार माहौल भी देने के बारे में सोचना चाहिए।
इसके साथ-साथ यह भी समझने की जरूरत है कि किस बात में कितने परफेक्शन की जिद जायज है। अब रोटी 20 सेंटीमीटर की नहीं बनी, और 19 या 21 सेंटीमीटर की बन गई, तो न तो हाथ उसे खारिज करेंगे, न ही मुंह, और न ही पेट। एक बददिमाग इंसान ही उसे खारिज कर सकता है, और जो लोग ऐसी जिद पर आमादा रहते हैं वे अपनी खुद की जिंदगी को नर्क भी बनाने का काम करते हैं, आसपास के लोगों का तो जीना हराम करते ही हैं। लोगों को बहुत व्यवहारिक होना चाहिए कि उनकी स्थितियों में काम कितना अच्छा हो सकता है, और कितना अच्छा होना जरूरी है, और उससे अधिक की जिद आत्मघाती होती है। (Daily Chhattisgarh)
-सुनील कुमार
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