संपादकीय
28 मार्च 2018

कुछ दिन पहले समाजवादी पार्टी छोड़कर भाजपा में जाने वाले राज्यसभा सदस्य नरेश अग्रवाल आज संसद से विदाई पाने वाले लोगों में से एक थे। राज्यसभा में आज 40 सांसद कार्यकाल पूरा कर रिटायर हो गए हैं। इस मौके पर नरेश अग्रवाल के ताजा दल-बदल को लेकर कुछ लोगों ने मजाक किया, और कुछ ने तंज भी कसा। दल-बदल करने वाला कोई एक सांसद बहुत मायने नहीं रखता, लेकिन दल-बदल मायने रखता है। जिस लोकतंत्र में लिखित संविधान से कहीं अधिक महत्व परंपराओं का होना चाहिए, जिसकी संसदीय व्यवस्था से गरिमा की उम्मीद की जाती है, उस संसदीय लोकतंत्र में आज दल-बदल का दलदल घुटनों तक भरा हुआ है, और लोग उसमेें तैरते भी दिख रहे हैं। ऐसे में दल-बदल पर एक चर्चा जरूर होनी चाहिए, फिर चाहे देश की अधिकतर पार्टियां दल-बदल पर लार टपकाते हुए क्यों न दिखती हों। यह जरूरी तो है नहीं कि हमेशा संभावनाओं वाले विकल्प पर ही चर्चा हो, एक ऐसी काल्पनिक-सैद्धांतिक चर्चा भी तो हो सकती है जो कम से कम एक सोच की तरह दर्ज हो जाए।
आज भारत में चुनाव सामने आते ही दल-बदल का दलदल एकाएक बढ़ते दिखता है। आज किसी पार्टी की टिकट न मिली, तो कल दूसरी पार्टी में चले गए। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। भारतीय चुनाव व्यवस्था में एक ऐसा नियम लाना चाहिए कि लोग अगर किसी एक पार्टी के निशान पर कोई चुनाव लड़ते हैं, और जीतते हैं, तो उन्हें अगला चुनाव किसी और पार्टी के निशान पर लडऩे से रोकने का इंतजाम रहना चाहिए। यह बात थोड़ी सी अटपटी लग सकती है, लेकिन ऐसा हो जाने पर मतलबपरस्त नेता रातोंरात दूसरी पार्टी से उम्मीदवार बनने की गुंजाइश तलाशना कम कर देंगे। और यह नियम कुछ दूसरे दायरों में कुछ दूसरी जगहों पर आज भी इसीलिए लागू है कि हितों का टकराव न हो। केन्द्र सरकार में, या भारतीय न्यायपालिका से रिटायर होने वाले लोगों पर कुछ किस्म की बंदिशें कुछ बरसों के लिए रहती हैं कि वे कौन-कौन से काम नहीं कर सकते। ऐसी ही रोक नेताओं पर रहनी चाहिए कि एक पार्टी छोडऩे के बाद वे दूसरी पार्टी की तरफ से लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा, या विधान परिषद कितने बरस तक नहीं जा सकते। हो सकता है कि बहुत से लोग पांच बरस की ऐसी रोक को कुछ अधिक कड़ा मानें, और कुछ नरमी बरतना चाहें, लेकिन इस बारे में सोच-विचार तो होना ही चाहिए।
ऐसा न होने पर लोगों की अपने दल के लिए प्रतिबद्धता, उसकी नीतियों के लिए प्रतिबद्धता, विचारों की ईमानदारी, ये सब मानो मंडी में नीलाम के लिए तैयार रहती हैं, और बोली लगाकर कोई भी उन्हें खरीदकर ले जाते हैं। ऐसे में सार्वजनिक जीवन में विचारों की शुद्धता-पवित्रता चौपट हो गई है, और लोग संसदीय लोकतंत्र का सम्मान भी खत्म करते चल रहे हैं। देश की गिनी-चुनी ईमानदार पार्टियां ही शायद ऐसी सोच का साथ दें, लेकिन बाकी पार्टियों को भी इसके लिए मजबूर करना चाहिए। एक ऐसा जनजागरण अभियान चल सकता है जो कि पार्टी बदलकर उम्मीदवार बनने वाले लोगों को हराने का काम करे। आज भी देश में कुछ एनजीओ चुनावों पर निगरानी रखने, उम्मीदवारों की दौलत का विश्लेषण करने, और उनकी जुर्म की डायरी को जनता के सामने रखने का काम कर ही रहे हैं। एक अभियान ऐसा छिड़े जो कि दलबदलुओं को हराने के लिए जनता को जागरूक करे, तो लोगों की दलबदल की बेशर्मी भी घटेगी, और जिन नई पार्टियों में लोग जाएंगे, वहां भी उन्हें उम्मीदवार बनाने की हड़बड़ी नहीं रहेगी। (Daily Chhattisgarh)
-सुनील कुमार
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