इज्जत से मरने का हक देना, सुप्रीम कोर्ट का सही फैसला

संपादकीय
9 मार्च 2018


सुप्रीम कोर्ट ने आज एक बड़े नाजुक मसले पर फैसला देते हुए देश में पहली बार इच्छामृत्यु को कुछ मामलों में कानूनी हक माना, और बहुत सी शर्तों के साथ उसे इजाजत दी है। ऐसे मरीज जो कि ठीक नहीं हो सकते, वे अपने राज्य के हाईकोर्ट में अपील करके इलाज बंद करने की अर्जी दे सकते हैं, और मेडिकल बोर्ड उनके मामलों में हाईकोर्ट को रिपोर्ट देकर मरने का रास्ता बना सकता है। लेकिन यह इच्छामृत्यु न तो मरीज या किसी और की खुद की आत्महत्या वाली है, और न ही किसी मरीज को जहर देकर मारने जैसी, कुछ दूसरे देशों जैसी है। यह एक बहुत सीमित दायरे के लिए दिया गया फैसला है जिसमें लाइलाज नौबत आ जाने पर मरीज कृत्रिम मशीनों या इलाज को बंद करवाकर जान देने की अर्जी दे सकते हैं। लोगों को याद होगा कि जैन धर्म में संथारा नाम की एक प्रथा कुछ इसी किस्म की है जिसमें उम्रदराज लोग खाना-पीना छोड़कर, बिना किसी इलाज के मौत का इंतजार करते हैं, और उनका परिवार, उनका समाज इसे एक धार्मिक-सामाजिक कार्यक्रम की तरह मनाता है। 
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एक ऐसे मामले पर हाईकोर्ट के फैसले को आगे बढ़ाते हुए आया है जिसमें मुंबई की एक अस्पताल की एक नर्स के 42 साल कोमा में रहने के बावजूद उसे जिंदा रखने के लिए लगाई गई मशीनों को हटाने की इजाजत भी हाईकोर्ट ने नहीं दी थी। चूंकि वह उसी अस्पताल की नर्स थी, इसलिए वहां की नर्सों ने इसे अपनी नैतिक और सामूहिक जिम्मेदारी मानते हुए उसकी अच्छी से अच्छी देखरेख की थी, और उसे 42 बरस तक जिंदा भी रखा था। ऐसे मरीजों पर भारत की सीमित चिकित्सा सुविधा को खर्च न किया जाए, ऐसा बहुत से लोगों का मानना रहता है। दूसरी तरफ ऐसे कई मामले हैं जिनमें अस्पतालों में वेंटिलेटर जैसी मशीनों पर लोग बरसों तक जिंदा रह जाते हैं, और उन्हें जिंदा रखने के खर्च में रईस परिवार भी मर जाते हैं। यह सिलसिला कोई अच्छा नहीं है जिसमें कोमा में अंतहीन समय तक लोगों को जिंदा रखा जाए। यह उन लोगों के शरीर का भी अपमान है जिन्हें चाहे-अनचाहे घरवाले, या अस्पताल वाले जिंदा रखते हैं। लोगों को इज्जत के साथ जीने का हक रहना चाहिए, और इज्जत के साथ मरने का हक भी रहना चाहिए। 
अभी सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला आया है, वह बहुत ही कंजूसी से और तंगनजरिए से दिया गया फैसला है, और सही फैसला है। चूंकि भारत में आज न ऐसा कानून है, न ऐसे सरकारी नियम हैं, और न ही ऐसी वसीयत करके रखने का इंतजाम है कि जिससे लोगों के कोमा में पहुंचने के बाद या लाइलाज हो जाने के बाद उनको चैन से मरने दिया जा सके, इसलिए यह जरूरी है कि सरकार को इसके लिए कानून और नियम दोनों बनाने का वक्त मिले। अदालत की यह फिक्र भी जायज है कि जमीन-जायदाद पाने के लिए, या कोई पारिवारिक हिसाब चुकाने के लिए लोग परिवार के किसी बुजुर्ग या बीमार को ऐसे कानून का बेजा इस्तेमाल करके मार भी सकते हैं। इसी धरती पर इंसान ऐसे सभी जुर्म करते मिलते हैं, और उसे कोई अनोखा अपवाद नहीं मानना चाहिए। 
लेकिन हमारा ख्याल है कि इस हक को और इसके नियम-कानून को इस नजरिए से भी देखने की जरूरत है कि लाइलाज मरीज के अंग कौन से दूसरे जरूरतमंद मरीजों को जिंदगी दे सकते हैं। मरने के ऐसे हक के साथ अपने अंगदान करने के हक को अनिवार्य रूप से जोडऩा चाहिए, और उसे परिवार के बाकी जिंदा बचे सदस्यों की मर्जी पर नहीं छोडऩा चाहिए, न ही धार्मिक रीति-रिवाजों को निजी फैसले के ऊपर मानना चाहिए। अगर कोई हिन्दुस्तानी लाइलाज नौबत आने पर इच्छामृत्यु की वसीयत कर देते हैं, तो उसके साथ-साथ उनके अंगों के बेहतर इस्तेमाल का विकल्प भी जोडऩा चाहिए ताकि वे समाज के लिए कुछ छोड़कर जा सकें। अभी चूंकि केन्द्र सरकार इसका कानून बनाएगी, इसलिए इस पहलू को भी उसमें जोडऩे की जरूरत है। हम इस फैसले को पूरी तरह सही मानते हैं क्योंकि चिकित्सा विज्ञान तो इतने किस्म की सहूलियतें पेश करते जा रहा है कि जिन्हें जुटाने में मरीज का पूरा परिवार ही भूख से मर सकता है, या फिर अपनी किडनी बेचकर ही इलाज का खर्च जुटा सकता है। यह बात किसी के लिए भी ठीक नहीं है, और चैन से, इज्जत से मरने का एक विकल्प सबके सामने रहना चाहिए। कानून बनाते हुए सरकार को यह भी ध्यान रखना होगा कि हेल्थ इंश्यूरेंस करने वाली कंपनियां अपना बीमा लिए हुए लोगों के इलाज का खर्च न देने के लिए तो इस तरह की कोई साजिश न करने लगें। ऐसे तमाम पहलू आने वाले दिनों में चर्चा में आएंगे, और सरकार को बहुत सोच-विचारकर, हर किस्म के जुर्म का खतरा खारिज करते हुए ही नियम-कानून बनाना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

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