ट्रांसजेंडरों पर अमरीका से लेकर भारत तक का रूख

संपादकीय
24 मार्च 2018


अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वहां के ट्रांसजेंडर्स को बीमारी का शिकार बताते हुए उन्हें अमरीकी सेना के लिए अनफिट बताया है। उन्होंने जो आदेश जारी किया है उसमें यह भी कहा गया है कि ट्रांसजेंडर एक प्रकार की बीमारी से पीडि़त होते हैं, और उन्हें सही इलाज की जरूरत होती है। ऐसे में इन्हें मिलिट्री सर्विस के लिए अयोग्य माना जाता है। अमरीकी राष्ट्रपति की ओर से यह भी कहा गया है कि ऐसा इतिहास रखने वाले लोग मिलिट्री के लिए खतरा हो सकती हैं। ट्रंप राष्ट्रपति बनने के बाद से ट्रांसजेंडर लोगों के खिलाफ लगातार कुछ न कुछ बोलते आ रहे थे, और उन्होंने इन पर पूरी तरह रोक लगाने के लिए बयान दिए थे। 
दुनिया में ट्रांसजेंडरों के अलावा भी जितनी किस्म के दूसरे यौन प्राथमिकताओं वाले लोग रहते हैं, उनके खिलाफ एक परंपरागत माहौल चले आ रहा है। भारत में भी समलैंगिक लोगों के खिलाफ समाज से लेकर सरकार तक, और सड़क से लेकर संसद तक एक नापसंदगी का माहौल दिखता है। हालांकि हिन्दुस्तान के इतिहास में सैकड़ों बरस से ट्रांसजेंडर लोग जो कि पहले हिजड़े कहे जाते थे, और फिर कम अपमानजनक वैकल्पिक शब्द, किन्नर, कहे जाने लगे, उन्हें तरह-तरह से सामाजिक अपमान झेलना पड़ता है। लेकिन छत्तीसगढ़ देश के ऐसे गिने-चुने राज्यों में से रहा जिसने ट्रांसजेंडर या थर्डजेंडर कहे जाने वाले लोगों के लिए सामाजिक-आर्थिक पुनर्वास की नीति बनाई, और उनको बढ़ावा दिया। नतीजा यह निकला कि अभी पिछले हफ्ते गुजरात से ट्रांसजेंडर लोगों का एक प्रतिनिधि मंडल छत्तीसगढ़ यह देखने के लिए आया कि इस राज्य की नीतियों को गुजरात में किस तरह लागू किया जा सकता है, और इस तबके के कल्याण कार्यक्रम वहां कैसे लागू हो सकते हैं। 
दरअसल हिन्दुस्तान सहित दुनिया के बहुत बड़े हिस्से में सामान्य कहे जाने वाले आदमी और औरत के अलावा तमाम लोगों को असामान्य कहा और माना जाता है। भारत में समलैंगिकता को एक बीमारी माना जाता है, और इससे छुटकारा पाने के लिए इलाज सुझाया जाता है। कानून में इसके लिए सजा का इंतजाम है, और सुप्रीम कोर्ट तक ने कुछ अरसा पहले इस मामले में बड़ा ही दकियानूसी रूख दिखाया था, जिसे बाद में बदला। लोकतंत्र के भीतर भी सेक्स की पसंद और अपने आपको किसी भी यौन-प्राथमिकता वाले तबके में रखने की पसंद को समाज का बहुमत वाला हिस्सा कुचलकर रख देता है। लोकतंत्र के भीतर अपने से परे दूसरे किस्म के लोगों के लिए बर्दाश्त विकसित होने में भी वक्त लगता है, और जिस अमरीका में बराबरी के अधिकार अधिकतर मामलों में लागू होते चल रहे हैं, वहां भी राष्ट्रपति ट्रंप जैसे दकियानूसी और कट्टर आदमी की सरकार आने के बाद सभ्यता घटती चल रही है। 
अपनी पसंद से परे जीने की आजादी दूसरों को देना कोई आसान बात नहीं है, और इसमें लोगों की सहिष्णुता अधिक रहना जरूरी है, उनकी सोच वैज्ञानिक होना जरूरी है, उनके बीच समानता के अधिकार का सम्मान होना जरूरी है। देश की संसद और सुप्रीम कोर्ट पर देश की जनता की सोच का भी असर पड़ता है। इसलिए भारत में लोगों के बीच सभी किस्म के यौन-अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए बर्दाश्त बढ़ाने की जरूरत है। (Daily Chhattisgarh)
-सुनील कुमार

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