चौड़ी सड़कें, ताकतवर गाडिय़ां, नियमों पर ढीला अमल, मौतें...

संपादकीय
1 अगस्त 2018


तमिलनाडू के कोयम्बटूर से एक दिल दहलाने वाली खबर है कि किस तरह एक महंगी तेज रफ्तार कार सड़क किनारे खड़े ऑटो से जा भिड़ी और लोगों को कुचल दिया। इनमें से सात लोग मारे गए जिनमें एक स्कूली बच्ची भी है। आज भारत में दो चीजें देश के अधिकतर हिस्से में देखने मिल रही हैं। पहली बात तो यह कि सड़कें चौड़ी हो रही है, और उन पर गाडिय़ों की रफ्तार कानूनी रूप से भी बढ़ती चल रही है। दूसरी बात यह कि महंगी गाडिय़ां अब इतनी तेज रफ्तार हैं कि उनके इश्तहारों में यही लिखा दिखता है कि वे कितने सेकंड में कितने किलोमीटर की रफ्तार पकड़ लेती हैं। अब जो लोग दसियों लाख रूपए खर्च करके ऐसी बड़ी गाडिय़ां लेते हैं, उनके हाथ में बड़े से इंजन की अंधाधुंध ताकत रहती है, और यह ताकत उनको बेदिमाग और बददिमाग दोनों ही बना देती है। जिसके हाथ में जितने अधिक हॉर्सपॉवर का इंजन होता है, उनका अहंकार भी उतने ही हॉर्सपॉवर का हो जाता है। ऐसे में लोग सड़क पर बाकी लोगों को हटाना अपना हक समझते हैं, और न हटने वालों को कुचलना भी। इसलिए कहीं पर किसी खरबपति कारोबारी की बिगड़ैल औलाद, तो कहीं पर कोई फिल्मी सितारा फुटपाथ पर सोए लोगों पर गाडिय़ां चढ़ा देते हैं। जब गाडिय़ां कम रफ्तार की होती थीं, तो चलाने वाले पर ताकत का इतना नशा नहीं रहता था। 
लेकिन देश को अगर तरक्की करना है, तो उसमें सड़कें भी चौड़ी होंगी, ट्रैफिक भी अधिक रफ्तार का होगा, और संपन्नता के साथ-साथ बड़ी गाडिय़ां भी आएंगी ही आएंगी। ऐसे में केवल एक ही तरीका है जो सड़कों पर मौतों को रोक सकता है, और वह है ट्रैफिक के नियम-कायदों को अधिक कड़ाई से लागू करना। आज हिन्दुस्तान में कुछ ऐसे शहर जरूर होंगे जहां पर ट्रैफिक नियम ताकत से लागू होते हैं, लेकिन हम अपने आसपास देखते हैं कि बड़ी गाड़ी अपने आपमें एक किस्म की सत्ता बन जाती है, और उसकी ताकत से लोग नियमों को कुचलते हुए चलते हैं। आज देश में बहुत साफ-साफ ऐसी जरूरत है कि जितने लाख की गाड़ी, जुर्माना उसी अनुपात में। आज एक छोटी गाड़ी, और एक बड़ी गाड़ी के ट्रैफिक चालान में कोई फर्क नहीं है, जबकि जो अधिक संपन्न हैं, जो अधिक बड़ी गाड़ी चला रहे हैं, उनसे उसी नियम तोडऩे के लिए अधिक जुर्माना लेना चाहिए। 
आज सड़कों पर गाडिय़ों की भीड़ भी लगातार बढ़ रही है, और हाईवे पर गाडिय़ों की आवाजाही भी बढ़ रही है क्योंकि सफर तेज रफ्तार और आसान हो गया है। ऐसे में लापरवाह ड्राइवर सावधान और जिम्मेदार ड्राइवरों की गाडिय़ों को भी कुचलते हैं, और सड़कों पर बेकसूर और सावधान लोग भी सजा पाते हैं क्योंकि उनका काबू महज अपनी गाड़ी तक होता है, किसी और गैरजिम्मेदार गाड़ी तक नहीं। इसके साथ-साथ यह लगातार देखने में आता है कि मुसाफिर बसों के ड्राइवर नशे में, मोबाइल पर बात करते हुए, या अंधाधुंध रफ्तार की वजह से एक्सीडेंट करते हैं। ऐसे मामलों में भी घायलों और दूसरे लोगों का मुआवजा बस के दाम और बस की टिकट के अनुपात में तय होना चाहिए। जब तक देश में एक जैसा जुर्माना रहेगा, तब तक ताकतवर गाडिय़ों की बददिमागी पर काबू नहीं हो सकेगा। 
ट्रैफिक नियमों को लागू करना राज्यों की जिम्मेदारी है, और सच तो यह है कि ट्रैफिक का जुर्माना अच्छा खासा होता है जिससे राज्य अपनी ट्रैफिक पुलिस का खर्च भी निकाल सकते हैं। सड़कों पर नियम लागू करना, और ऐसा करते हुए जुर्माना कमाना एक आकर्षक काम होना चाहिए, लेकिन पुलिस बहुत से राज्यों में अपने संगठित भ्रष्टाचार के चलते हुए कार्रवाई नहीं करती है, और सड़कों पर तबाही बढ़ती चलती है। जिम्मेदार राज्यों को चाहिए कि वे गाडिय़ों के रजिस्ट्रेशन से मिलने वाले पैसों का एक निश्चित अनुपात ट्रैफिक पुलिस के लिए अलग से रखे। (Daily Chhattisgarh)

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