सुप्रीम कोर्ट को सरकार की नसीहत पूरी तरह नाजायज

संपादकीय
9 अगस्त 2018


केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने यह कहने का हौसला दिखाया है कि जनहित याचिकाओं की सुनवाई करते हुए जजों को कड़ी और कड़वी बातें नहीं बोलना चाहिए क्योंकि इनका देश की कई समस्याओं पर असर पड़ता है। केन्द्र सरकार के सबसे बड़े वकील, अटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने एक मामले की सुनवाई के दौरान अदालत को यह नसीहत दी, और अदालत ने उसे पूरी तरह खारिज कर दिया। वेणुगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट जजों से कहा कि जनहित याचिकाओं की सुनवाई करते हुए जब सुप्रीम कोर्ट ने टूजी स्पेक्ट्रम आबंटन के खिलाफ आदेश दिया, तो उससे भारत में विदेशी पूंजीनिवेश बहुत बुरी तरह प्रभावित हुआ। जब सुप्रीम कोर्ट ने देश भर में हाईवे के किनारे पांच सौ मीटर की दूरी तक शराब बिक्री पर रोक लगाई  तो हजारों लोगों के रोजगार गए। सरकारी वकील ने अदालत से कहा कि वह जितने किस्म के मामलों में निर्देश देती है, उस पर अगर सरकार को खर्च करना पड़़ता है तो वह किसी न किसी दूसरी योजना में कटौती करके ही हो पाता है। इसलिए अदालत को  जनहित याचिकाओं पर टिप्पणी या आदेश करते हुए सरकार के कार्यक्षेत्र में दखल नहीं देना चाहिए। 
सुप्रीम कोर्ट की इस बेंच में मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा भी थे, और बेंच में इस पूरी नसीहत को खारिज करते हुए वेणुगोपाल को गिनाया कि एक तरफ वे सरकार पर आर्थिक बोझ की बात कर रहे हैं, और दूसरी तरफ इसी अदालत के आदेश से अलग-अलग जुर्माने या शुल्क से सवा लाख से डेढ़ लाख करोड़ रूपए जमा होकर पड़े हैं, और सरकार उसका इस्तेमाल नहीं कर पा रही है। इसमें निर्माण-मजदूरों की भलाई के लिए इक_ा तीस हजार करोड़ रूपए भी हैं जिनसे कि सरकार ने लैपटॉप और वाशिंग मशीनें खरीदने जैसा काम किया है। जजों ने याद दिलाया कि जिनके पास पहनने को कपड़े नहीं हैं उनके कल्याण-कोष से वाशिंग मशीनें खरीदी जा रही हैं, वे मजदूर अनपढ़ हैं, लेकिन उनके नाम पर जमा पैसे से लैपटॉप खरीदे जा रहे हैं। अदालत ने बहुत ही कड़ाई से वेणुगोपाल को कहा- जाकर से अपनी सरकार से कहो कि इस देश के कानून का पालन करे। 
यह पूरी बातचीत काफी लंबी है, और बड़ी दिलचस्प भी है। आमतौर पर यह माना जाता है कि निर्वाचित सरकारें अपने वोटों का ख्याल रखकर गरीब आम जनता के लिए लुभावनी योजनाएं इस हद तक लागू करती हैं कि उसमें फिर चाहे सरकारी खजाना खाली ही क्यों न हो जाए। दूसरी तरफ जजों को तो कोई चुनाव लडऩा नहीं रहता है, और उनकी बातों और उनके फैसलों का लुभावना होना भी जरूरी नहीं होता। लेकिन पिछले बरसों में यह लगातार समझ में आ रहा है कि देश की तमाम बड़ी अदालतें का अधिकतर समय सरकार की गलतियों और सरकार के गलत कामों से जूझने में निकल रहा है। आज अगर बड़ी अदालतों पर पहाड़ सा बड़ा बोझ पड़ा हुआ है, तो उसके लिए सरकार के लोगों के गलत फैसले और गलत काम जिम्मेदार हैं। और सरकार के गलत काम कभी भी मासूम तो होते नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जंगल और पेड़ काटने के एवज में मुआवजा-वृक्षारोपण के लिए जमा करवाए गए दसियों हजार करोड़ का जिक्र भी किया है कि सरकार उसका इस्तेमाल ही नहीं कर पा रही है। हम छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में लगातार यह देखते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की निगरानी वाले इस फंड में से किस-किस तरह के बेजा इस्तेमाल किए जाते हैं। कुछ ऐसा ही हाल जिला खनिज कोष का है, इसमें भी छत्तीसगढ़ सहित तमाम खनिज राज्यों में भरपूर बेजा इस्तेमाल हुआ है, और जो जिले कुपोषण के शिकार हैं, वहां पर महिला-बच्चों पर खर्च करने के बजाय जिला कलेक्टरों ने बड़े-बड़े पुल और शहरी ढांचे बनाने पर इस कोष का भरपूर बेजा इस्तेमाल किया है। इसलिए सरकार और अदालत के बीच की इस तनातनी में हम अदालत के साथ हैं, और यह मानते हैं कि सरकारों पर आज अगर थोड़ी-बहुत लगाम बाकी है तो वह अदालतों की वजह से ही है, और आरटीआई जैसे कानूनों की वजह से है जिनसे सरकारी भ्रष्टाचार और गलत कामों का भांडा फूटता है, और कुछ मामलों में अदालती दखल हो पाती है। भारत के सुप्रीम कोर्ट और भारत के हाईकोर्ट के जितने फैसले हमें एक पल में याद पड़ते हैं, उनमें तकरीबन सभी फैसले जायज हैं, और कुछ जजों के भ्रष्टाचार, कुछ गलत फैसलों को लेकर अदालतों के महत्व और उनकी भूमिका को कम नहीं किया जा सकता। यह याद रखना होगा कि भारतीय लोकतांत्रिक ढांचे के मुताबिक जब कभी सरकार या संसद अपना काम ठीक से नहीं करेंगी, अदालती दखल की गुंजाइश खड़ी होगी। वैसे तो संसद सबसे ऊपर है, लेकिन भारत में संसद अपनी प्रासंगिकता कुछ उसी तरह खो चुकी है जिस तरह दुनिया के मामलों में संयुक्त राष्ट्र संघ अप्रासंगिक हो चुका है। जब संसद महज बजट और कानून के लिए एक न्यूनतम औपचारिकता का मकसद ही पूरा कर रहा है, तो फिर लोकतंत्र की कोई न कोई और संस्था तो दखल देगी ही। सरकार अगर अपना काम ठीक से नहीं कर रही है, और आज की हकीकत यही है कि वह अपना काम ठीक से नहीं कर रही है, तो ऐसे में अदालत को नसीहत देना सरकार का एक अहंकार है, और सरकार का यह रूख पूरी तरह नाजायज है।  (Daily Chhattisgarh)

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