दानवी हंसी हरा सकती है

संपादकीय
27 अगस्त 2018


कुछ और राज्यों के साथ छत्तीसगढ़ चुनाव में जा रहा है, और अब सत्तारूढ़ भाजपा का पार्टी संगठन, सरकार में बैठे नेता और कांग्रेस पार्टी के लोग सभी एक-एक मुद्दे के चुनावी इस्तेमाल में लगे हुए हैं। सरकार है कि लाखों मोबाइल बांट रही है, और कांग्रेस है कि उनमें से कुछ मोबाइल फटने और फूटने के मुद्दों को लेकर सरकार को घेर रही है। दोनों अपनी-अपनी जगह सही हैं, और ऐसे चौकन्नेपन से जनता का कुछ भला हो भी सकता है। अभी चार दिन पहले जब अटल बिहारी वाजपेयी की अस्थियां आईं, तो स्टेज पर प्रदेश के दो बड़े ताकतवर मंत्री, बृजमोहन अग्रवाल और अजय चंद्राकर जिस तरह से हंसी-ठिठोली करते हुए कैमरों पर कैद हुए, उससे भाजपा की पेट भरकर किरकिरी हुई। आज हालत यह है कि ये दो मंत्री चुनाव प्रचार करते हुए अटलजी का नाम लेने की हालत में नहीं हैं क्योंकि इनके विरोधी इनकी हंसी के वीडियो तब तक इतनी बार पेश कर चुके होंगे कि लोगों को यह विकराल और अमानवीय हंसी याद रहेगी, और इनकी कही अटल-स्तुति उनके कानों में नहीं जा पाएगी। 
लोकतंत्र में जनधारणा रातोंरात अच्छी तो नहीं हो सकती है, लेकिन बुरी जरूर हो सकती है। आज डेंगू से होने वाली मौतों को लेकर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री अजय चंद्राकर के जिस तरह के बयान टीवी पर देखने मिलते हैं, और अखबारों में पढऩे मिलते हैं वे हक्का-बक्का करते हैं कि क्या अपने विभाग की नाकामयाबी को कोई इस तरह छिटक सकते हैं, और उससे हाथ धो सकते हैं? छत्तीसगढ़ में यह सिलसिला अमर अग्रवाल के स्वास्थ्य मंत्री रहने के वक्त से चले आ रहा है जब वे अपने विधानसभा क्षेत्र बिलासपुर के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में नसबंदी मौतों के बाद पहुंचे मुख्यमंत्री की मौजूदगी में जोर-जोर से हंसते हुए कैमरों में कैद हुए थे, और बाद में उस विकराल हंसी को लेकर उनके खिलाफ जनधारणा ऐसी हुई थी कि उन्हें वह विभाग छोडऩा ही बेहतर लगा। 
लोकतंत्र में वैसे तो चुनाव सामने न रहे तब भी लोगों को अपनी जुबान पर काबू रखना चाहिए, अपने हावभाव ठीक रखने चाहिए, और सार्वजनिक जीवन में जनभावनाओं का सम्मान करना चाहिए। कहीं लाशों पर हंसी, तो कहीं अस्थि कलश पर हंसी, इन सबमें भाजपा सरकार के लोगों के खिलाफ जनता के मन में नाराजगी और बढ़ा दी है। और ऐसा लगता है कि सत्ता के प्रतीक बन गए कम से कम कुछ लोगों को तो जनता इस चुनाव में निपटाएगी। यह बात बड़ी सुनाई पड़ती है कि भाजपा इस बार चेहरे बहुत बदलने वाली है, और चेहरों से जुड़ी नाराजगी भाजपा सरकार के खिलाफ नाराजगी में नहीं बदल पाएगी। लेकिन सच तो यह है कि सत्ता के जो चेहरे तुरंत ही बदल देने लायक हैं, वे चेहरे ऐसी अरबों की कमाई कर चुके हैं कि उनको हटाया गया तो वे अपनी कमाई का कुछ हिस्सा खर्च करके अपनी पार्टी के नए उम्मीदवार को हराने की ताकत रखते हैं। ऐसे में कई बार सत्तारूढ़ पार्टी एक समझौता करके चलती है, और कभी ऐसे बड़े भ्रष्ट लोगों से पार्टी फंड में मोटी रकम जमा करवाने के बाद उन्हें टिकट देती है, या फिर इस उम्मीद में देती है कि वे अपने अरबों का कुछ हिस्सा खर्च करके किसी तरह भी चुनाव जीत जाएंगे, और विधानसभा में विधायक दल की गिनती बढ़ाएंगे, ताकि सरकार चलाई जा सके। 
किसी भी पार्टी को यह चाहिए कि वह अपने मंत्रियों और नेताओं को इतना संपन्न न होने दे कि वे लोग बददिमागी को अपना बुनियादी हक मान लें, और आम जनता को लात खाने के लायक समझने लगें। कहने के लिए तो भाजपा का संगठन बड़ा ताकतवर और सक्रिय बताया जाता है, लेकिन जिस भ्रष्टाचार की जानकारी, जिस बददिमागी और बदमिजाजी की जानकारी पूरे प्रदेश को रहती है, क्या वह पार्टी को ही नहीं रहती? यह बात तो ठीक है कि चुनाव इतने खर्चीले हो गए हैं कि सत्तारूढ़ पार्टी की खर्च करने की अपार ताकत विपक्ष को रौंदकर रख सकती है, लेकिन छत्तीसगढ़ में भाजपा को यह भी याद रखना चाहिए कि उसकी दस बरस की सरकार के बाद के चुनाव में कांग्रेस उससे महज पौन फीसदी पीछे थी, एक फीसदी से भी कम! ऐसे में दानवी हंसी वाले एक वीडियो का असर भी इस पौन फीसदी को कुचल देने वाला हो सकता है। भाजपा को अपने नेताओं और अपने अफसरों के तौर-तरीकों, उनकी जुबान, इन सब पर काबू रखना चाहिए, वरना कांग्रेस के खिलाफ पिछले पन्द्रह बरस से किसी नाराजगी का तो कोई काम जनता को पड़ा नहीं है। (Daily Chhattisgarh)

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