सत्ता की चोटी पर किफायत बरतने का यह आखिरी मौका

संपादकीय
30 अगस्त 2018


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के नए सरकारी हिस्से, नया रायपुर का नाम बदलकर अटल नगर कर दिया गया है, और सरकार उसे आबाद करने के लिए हर कोशिश कर रही है। कुछ सरकार के भीतर इस नई राजधानी में काम करने जाने, और वहां रहने दोनों को लेकर बड़ा प्रतिरोध चल रहा है, और न वहां मंत्री रहने जाना चाहते, और न ही बड़े अफसर। शहर से 25 किमी दूर मंत्रालय पहुंचते हुए 10-15 किमी का सुनसान रास्ता तय करना पड़ता है, और नया रायपुर में बनी हुई कॉलोनियों में पहुंचने के लिए शायद इससे भी कुछ अधिक। नतीजा यह है कि पुराने रायपुर और नए रायपुर के बीच का फासला इस डेढ़ दशक में भी पट नहीं पाया है, और पिछले पांच बरस से सरकार की तमाम कोशिशें भी सरकारी कर्मचारियों तक को इस नए शहर में नहीं भेज पाई हैं। गरीबी की रेखा के नीचे की आधी आबादी वाले इस राज्य में दसियों हजार करोड़ की इस नई राजधानी का रख-रखाव करना, और वहां पर लोगों को बसाने की कोशिश करना इस गरीब राज्य के साथ एक बड़ी बेइंसाफी की तरह जारी है। 
लेकिन विधानसभा को अटल नगर ले जाना, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, और मंत्री-अफसरों के बंगलों को नए रायपुर में बनाना अब और सैकड़ों करोड़ के खर्च का काम है, और सरकार इस पर आमादा है। अब सवाल यह है कि इतनी गरीबी वाले राज्य में  सरकार को अपने ऊपर कितना खर्च करना चाहिए? देश की विशालतम नई राजधानी बनाने की जिद ने जोगी सरकार से लेकर रमन सरकार तक के दसियों हजार करोड़ रूपए लगवा दिए। इस लागत और इसके आगे के खर्च को देखें तो यह देश की शायद सबसे महंगी राजधानी भी होगी। और ऐसे विकराल खर्च के बीच अब जब बड़े लोगों के बड़े बंगले बनाने का वक्त आया है तो राज्य सरकार को इस बारे में यह याद रखना चाहिए कि यह किफायत की जिंदगी जीने वाले गांधी का देश है, और उस नेहरू का देश भी है जिसने अपनी निजी जायदाद, तीन मूर्ति भवन सरीखी इमारत देश को दे दी थी, देश का खर्च अपने ऊपर नहीं करवाया था। यह तो बाद के बरसों में हुआ कि सत्ता पर आने वाले लोग जनता की जरूरत के सीमित पैसों पर अपनी असीमित सहूलियतें जुटाते चले गए। 
छत्तीसगढ़ की नई राजधानी में बड़े बंगलों पर निर्माण की लागत तय करते हुए राज्य सरकार को एक भारी किफायत का नजरिया इसलिए भी रखना चाहिए कि बड़े बंगलों का घोषित और अघोषित रख-रखाव जनता के मत्थे ही पड़ता है। आज भी पुरानी राजधानी में ऐसे सरकारी बंगले हैं जिनमें पौन-पौन सौ एयर कंडीशनर लगे हैं, और जिनको लगाने की लागत के बाद उससे भी भयानक लागत उनको चलाने की होती है। बड़े बंगलों के रख-रखाव के लिए सरकारी कर्मचारियों की फौज लगती है, और यह सब कुछ घोषित रूप से नहीं होता, इसका बहुत कुछ हिस्सा अघोषित रूप से भी खर्च होता है जो कि सरकार के अलग-अलग मद से चुपचाप जुटाया जाता है। इसलिए मंत्रियों और अफसरों के ऐसे बड़े बंगले बनाना एक गरीब राज्य में अलोकतांत्रिक है, फिर चाहे उस राज्य का एक हिस्सा संपन्न ही क्यों न हो। इस राज्य का एक बड़ा हिस्सा एक रूपए किलो चावल की वजह से भरे पेट सोता है, ऐसी आधी आबादी वाले राज्य में किसी को भी अपने पर अंधाधुंध खर्च नहीं करना चाहिए। 
फिर एक दूसरी बात यह भी है कि जब छत्तीसगढ़ राज्य में हाईकोर्ट की इमारत बनने की बात आई, तो मौजूदा जजों ने उसे अधिक से अधिक आलीशान बनाने के लिए राज्य सरकार से अधिक से अधिक खर्च करवाया। ऐसा ही कुछ नई विधानसभा के साथ हो सकता है, और दूसरी संवैधानिक संस्थाओं के साथ हो भी रहा है जिनमें से हरेक के लिए बड़ी-बड़ी इमारतें बन रही हैं, और जाहिर है कि इनका आगे का जिंदगी भर का खर्च भी सरकार के ही मत्थे पड़ेगा। लोकतंत्र के नाम पर बनी ऐसी संस्थाओं को भी किफायत छू नहीं जाती है, और नतीजा यह होता है कि सत्ता के तमाम सरकारी और संवैधानिक हाथ-पांव अपने-अपने लिए महंगे से महंगे ऐशोआराम जुटाते चल रहे हैं। इस राज्य में गरीबी की वजह से इलाज का इंतजाम नहीं है, पढ़ाई का इंतजाम नहीं है, पीने को साफ पानी नहीं है, और पुलिस जरूरत से कम है, अदालतों में देर जरूरत से अधिक है। ऐसे में आखिर किसको हक बनता है कि वे अपने ऊपर अंधाधुंध खर्च करें? राज्य सरकार के सामने यह आखिरी मौका है कि वह सत्ता के सबसे ऊपर के दायरे में किफायत बरतकर एक मिसाल पेश करे, एक बार इस विकराल राजधानी के अनुपात में विकराल आकार के बंगले बन गए, तो फिर वे जिंदगी भर इसी गरीब छत्तीसगढ़ी जनता की छाती पर मूंग दलकर चलेंगे। (Daily Chhattisgarh)

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