गबरू वोटर की असली पसंद!

संपादकीय
28 अगस्त 2018


देश के चार राज्यों में चुनाव के साथ-साथ अब संसद के चुनावों की भी या तो साथ-साथ होने की बात हो रही है, या फिर यह चर्चा चल रही है कि आने वाले वक्त में केन्द्र और राज्यों के चुनाव एक साथ हो जाने चाहिए ताकि पूरे पांच बरस सरकारें बिना चुनावी-राजनीतिक दबाव के, बिना लुभावने-लोकप्रिय फैसलों की कोशिश करने के, खुलकर सरकार चला सकें। ऐसा होना कुछ लोगों को जायज और मुमकिन लग रहा है, कुछ लोगों को यह नाजायज और नामुमकिन लग रहा है। जो भी हो, यह सोच, खासकर इस सोच का यह पहलू अच्छा है कि सरकारें पांच बरस बिना कहीं पर चुनाव की फिक्र किए हुए जरूरी कड़वे फैसले भी ले सकें। लेकिन यह तो एक पहलू हुआ। साथ-साथ होने वाले किसी भी संभावित चुनाव के वक्त जनता के पास भी यह दोहरा बोझ रहेगा कि वह किसे चुने? एक पार्टी जो राज्य में खराब है, लेकिन केन्द्र में अच्छी है उसे चुने? या फिर जो राज्य में तो अच्छी है, लेकिन केन्द्र में बोगस है उसे चुने? आज वैसे भी भारतीय राजनीति में लोगों के सामने दुविधा छोटी नहीं रहती है। आज भी लोगों को दो चीजों का एक जोड़ा ही चुनना होता है। पार्टी और प्रत्याशी, इनको साथ-साथ चुनना होता है, या साथ-साथ इनको छोड़ देना होता है। आज जिस तरह किसी भी प्रत्याशी को वोट न देने के लिए वोटरों के पास नोटा नाम का एक विकल्प आ गया है, क्या उसी तरह का कोई एक ऐसा विकल्प कभी आएगा कि लोग पार्टी को अलग वोट दें, और उम्मीदवार को अलग? ऐसा होने पर पार्टियों को अपने उम्मीदवारों के बारे में जनता की सोच का पता भी लगेगा। वैसे यह सोच बहुत असंभव नहीं है। ऐसा इंतजाम करके यह भी किया जा सकता है कि विधानसभा या संसद की कुछ सीटें पार्टियों को मिलने वाले वोटों के अनुपात में मनोनयन के लिए अलग से रखी जा सकें, और विधायक या सांसद सीधे निर्वाचित हो जाने के बाद पार्टियां अपने को मिले लोकप्रिय वोटों के अनुपात में कुछ गिने-चुने लोगों को और सदन में भेज सकें। 
लेकिन वोटर की जिस दोहरी जिम्मेदारी से यह बात शुरू की गई है, उसे देखें तो यह बात आसान नहीं रहती कि वह एक अच्छे प्रत्याशी को बुरी पार्टी के निशान पर वोट दे, या फिर बुरे प्रत्याशी को अच्छी पार्टी के निशान पर वोट दे। ऐसी एक काल्पनिक स्थिति अगर सच में ही सामने आ जाए कि हर वोटर दो वोट अलग-अलग डाले, एक वोट स्थानीय उम्मीदवार को, और दूसरा वोट पार्टी को, तो भी मतदाता की असली पसंद सामने आ पाएगी। हालांकि आज तक भारतीय चुनावों के संदर्भ में ऐसी कोई बात सोचने में भी नहीं आई है, लेकिन अगर हम मतदाताओं की असली और खरी पसंद की बात करें, तो यह एक बेहतर चुनाव का जरिया होगा। आज भी राजनीतिक दल अपने सांसदों और विधायकों की कुल गिनती के अनुपात में राज्यसभा में अपने कुछ उम्मीदवार भेजते हैं। यह तरीका सीधे जनता से चुनकर आए हुए मनोनीत सदस्यों का होगा, जिनकी गिनती तो जनता के वोटों से निकलेगी, लेकिन उन पर चेहरे तय करने का हक पार्टी का होगा। 
आज जब देश में एक साथ चुनाव पर चर्चा चल रही है, और लोग इस सोच के मुरीद भी हो रहे हैं, और इसे खारिज भी कर रहे हैं, तब ऐसी सैद्धांतिक चर्चा भी होनी चाहिए जो कि संसद और विधानसभाओं में जनता के वोट के अधिक से अधिक ईमानदार प्रतिनिधित्व का रास्ता निकाल सके। आज जिस तरह देश में होने वाले बहुत से चुनावी सर्वे नेता और पार्टी दोनों पर जनता की अलग-अलग सोच पूछते हैं, भारत का चुनाव ऐसा कुछ नहीं पूछता है। होना तो यही चाहिए कि वोटिंग मशीन पर हर चुनाव क्षेत्र में वोटर दो बटनों को दबाए, एक तो पसंद के उम्मीदवार के नाम वाली, और दूसरी पसंद की पार्टी वाली। ऐसा होने पर ही पार्टी को यह समझ आएगा कि कौन सा उम्मीदवार उससे कम या अधिक लोकप्रिय है। 
फिलहाल जब तक ऐसा कोई क्रांतिकारी फेरबदल भारत की चुनाव प्रणाली में नहीं होता, तब तक के लिए लोगों को यह सोचना चाहिए कि उनके सामने आज जोड़े से जो विकल्प आते हैं, उनमें से वे किसको चुनें? अगर उम्मीदवार और पार्टी दोनों उनकी पसंद के हैं, तब तो कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन अगर दोनों में से कोई एक गड़बड़ है, तो उन्हें बहुत ध्यान से वोट डालना चाहिए। हमारा यह कहना अधिक आसान है, लेकिन ऐसा कर पाना बहुत मुश्किल है क्योंकि जब लोग विधानसभा चुनाव में विधायक चुनने के लिए भी वोट डालते हैं, तो उस पल उनके ध्यान में संभावित मुख्यमंत्री का चेहरा भी रहता है कि उनका वोट आखिर किसे मुख्यमंत्री बनाएगा? तो क्या एक ऐसी चुनाव प्रणाली हो सकती है जो कि एक वोटिंग मशीन पर तीन बटनें रखे, जिससे लोग अपने स्थानीय विधायक या सांसद चुने, दूसरी बटन से पसंदीदा पार्टी को वोट दें, और तीसरी बटन से वे मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री चुनें? एक चुनाव में ऐसी तीन बटनें क्या जनता की असली पसंद साबित करेंगी? 
-सुनील कुमार 

(Daily Chhattisgarh)

1 टिप्पणी:

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