संपादकीय
24 अगस्त 2018

राहुल गांधी जर्मनी सहित कुछ और देशों की यात्रा पर हैं, और वहां अलग-अलग समूहों या कार्यक्रमों में वे भारत के बारे में काफी कुछ बोल रहे हैं। समाचारों से कई बार यह पता नहीं लगता कि किसी ने खुद होकर कौन सी बात कही, और कौन सी बात किसी सवाल के जवाब में कही, लेकिन बात तो बात रहती है, और कई बार ऐसी बातों पर विवाद खड़ा होता है। यह सवाल उठता है कि देश के बाहर जाकर देश के बारे में बुरी बातों को गिनाकर आलोचना करना कितना सही है? कल से भाजपा के प्रवक्ता राहुल गांधी की बातों को लेकर उनके खिलाफ काफी कुछ बोल रहे हैं, लेकिन ऐसे में भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री, भूतपूर्व भाजपा नेता यशवंत सिन्हा ने जो कहा है उस पर गौर किया जाना चाहिए। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा है कि देश के बाहर जाकर देश के बारे में नकारात्मक बातें करना ठीक नहीं है, और नेताओं को इससे बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह सिलसिला प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुरू किया है, लेकिन बाकी नेताओं को उसके जवाब में वैसा ही काम नहीं करना चाहिए।
अब यह देखा जाए कि देश के बारे में आलोचनात्मक बातें देश के बाहर करना क्या इतना नाजायज है कि उन्हें सवालों के जवाब के रूप में भी न कहा जाए? लोगों को याद होगा कि प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी के अमरीका में जो बड़े-बड़े कार्यक्रम हुए, उनमें न्यूयार्क का मेडिसन स्क्वेयर का कार्यक्रम हजारों की भीड़ वाला था, और उसका जीवंत प्रसारण दुनिया भर में हुआ था। ऐसे बहुत से कार्यक्रमों में मोदी ने कहीं पिछले 70 बरस तो कहीं पिछले 50 बरस की सरकारों को कोसा था, और भारत की बदहाली के लिए पिछली सरकारों को जिम्मेदार ठहराया था। इसलिए देश के बाहर जाकर देश के लोगों के बारे में, देश की पिछली सरकारों के बारे में, या देश के हाल के बारे में नकारात्मक या आलोचनात्मक बातें कहना न तो नया है, और न ही यह अकेले कांग्रेस की फितरत है। फिर सवाल यह भी है कि आज जब विदेशों में बसे हुए भारतवंशियों के बीच चुनाव प्रचार से लेकर चंदा इक_ा करने तक का अभियान चलता है, जब संयुक्त राष्ट्र से लेकर कई देशों की संसदों तक में भारत के घरेलू मुद्दों के बारे में खुलकर चर्चा होती है, संसदों में प्रस्ताव पास होता है, तो यह बात जाहिर और जायज है कि दूसरे देशों में जाकर हिन्दुस्तानी नेता भी भारत के बारे में अपनी सोच को सामने रखें। इसलिए अगर उस सोच में कोई गलत बात है, तो वह भारत के भीतर भी गलत है, और भारत के बाहर भी। और अगर किसी नेता की ऐसी बातें हकीकत पर खड़ी हैं, और खरी हैं, तो वे देश के भीतर भी जायज है, और देश के बाहर भी।
अब भारतीय लोकतंत्र में अलग-अलग पार्टियों के बीच शिष्टाचार ऐसा तो रह भी नहीं गया है कि लोग एक-दूसरे के बारे में गंदी या गैरजरूरी-कड़वी बातें न कहें। अब यह आम हो चुका है, और भारत की संसदीय राजनीति की हवा गंदी और जहरीली हो चुकी है। इसलिए नेताओं और पार्टियों के बीच एक न्यूनतम-बुनियादी शिष्टाचार भी खत्म हो चुका है, और लोग बिना किसी काबू के एक-दूसरे के बारे में बोलते हैं। देश के भीतर बोलना, या देश के बाहर बोलना, आज के इंटरनेट और सोशल मीडिया के जमाने में अलग-अलग बातें नहीं हैं। और देश और विदेश का ऐसा कोई फर्क भी नहीं रह गया है। क्योंकि कहीं भी कही गई बातों पर दुनिया भर से लोग बहस में शामिल हो ही जाते हैं। मुद्दा यह है कि जब तक भारतीय राजनीति की हवा जहरीली बनी रहेगी, उस जहर के जवाब में और जहर पैदा होते रहेगा, फिर चाहे नेताओं की सांसें देश में निकलती रहें, या विदेश में। (Daily Chhattisgarh)

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