संपादकीय
25 अगस्त 2018

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कलेक्टर ओ पी चौधरी ने नौकरी से इस्तीफा दे दिया है, और उनके भाजपा में शामिल होकर चुनाव लडऩे की खबरें हैं। वे छत्तीसगढ़ी माटीपुत्र हैं, गांव के गरीब परिवार से, अकेली मां के बढ़ावे से पढ़ते हुए आगे बढ़े, और बिना अंग्रेजी के भी वे आईएएस तक पहुंचे। राजधानी में उन्होंने ऐसे बहुत से काम किए जो कि किसी भी एक कलेक्टर की कामयाबी के सुबूत हो सकते हैं, लेकिन इसके पहले उन्होंने बस्तर में आदिवासी इलाके के बीच एक बड़ा शैक्षणिक केन्द्र विकसित करके वाहवाही पाई थी। वे एकदम नौजवान हैं, और आगे की लंबी नौकरी को छोड़कर वे जिस तरह राजनीति में आ रहे हैं, उससे नौकरशाही का नुकसान है, और राजनीति का फायदा। राजनीति में भले लोगों के आने से राजनीति भली हो सकती है, और बुरे लोगों की भीड़ राजनीति को एक गाली तो बना ही चुकी है।
आज भारत में राजनीति के साथ कई ऐसी बातें जुड़ी हुई हैं कि बहुत भले और काबिल लोग, कामयाब लोग इसमें आना नहीं चाहते। कुनबापरस्ती से परे राजनीति में गुंजाइश घट जाती है, हालांकि रहती तो है। इसके बाद अलग-अलग पार्टियों की अपनी-अपनी खामियां रहती हैं, कोई पार्टी धर्म की राजनीति करती है, कोई पार्टी जाति की राजनीति करती है, और अधिकतर पार्टियां भ्रष्टाचार की राजनीति करती हैं। ऐसे में जो लोग ईमानदार हैं, वे राजनीति में कब तक और कहां तक जिंदा रह पाएंगे, यह अंदाज लगाना थोड़ा सा मुश्किल होता है। हालांकि राजनीतिक दल भी चतुर होते हैं, और वे हाथी दांत की तरह कुछ ईमानदारों को दिखावे के लिए जरूर साथ रखते हैं, और गंदगी के अपने काम अपने पसंदीदा भ्रष्ट लोगों से करवाते रहते हैं। छत्तीसगढ़ में ही जोगी सरकार में दारू के धंधे में जितना भ्रष्टाचार करना था, वह पूरी तरह जारी रहा, और दूसरी तरफ निर्विवाद रूप से ईमानदार एक नेता, रामचन्द्र सिंहदेव, को आबकारी मंत्री बनाकर रखा गया, ठीक उसी तरह जिस तरह कि दुकानों के शोकेस में खूबसूरत पुतले खड़े रखे जाते हैं।
लेकिन समय-समय पर भारतीय राजनीति में कई अफसर नौकरी छोड़कर भी आए हैं, और वे अपने-अपने किस्म से कामयाब भी रहे हैं। दिल्ली में ही अरविंद केजरीवाल आयकर विभाग की नौकरी छोड़कर आए, और एक नई पार्टी बनाकर, नए किस्म की राजनीति करके उन्होंने कांग्रेस और भाजपा के मिलेजुले गढ़ दिल्ली को जीतकर दिखा दिया। उन्हें लेकर सोशल मीडिया पर मजाक अधिक चलते हैं, लेकिन कई खामियों के बावजूद उन्होंने खूबियों वाली एक राजनीति की है, और यह भी साबित किया है कि राजनीति कांग्रेस और भाजपा के एकाधिकार का कारोबार नहीं है। ऐसे में सरकारी कुर्सी पर बैठकर राजनीतिक काम करने के बजाय कुर्सी छोड़कर राजनीति में आने, और जनता के बीच जाने की चुनौती मानने का काम बेहतर है। आज भारत के राजनीतिक दलों में या तो कुनबे की विरासत की शक्ल में लोग आते हैं, या फिर औसत दर्जे के लोग पहुंचते हैं। बहुत काबिल, बहुत होनहार, और तजुर्बेकार लोग राजनीति में कम ही आते हैं। नतीजा यह होता है कि ऐसे लोग जब सत्ता में पहुंचते हैं, तो सरकार में मंत्रियों का कामकाज बहुत औसत दर्जे का हो जाता है, या फिर वह अफसरों की मेहरबानी से चलता है। दूसरी तरफ अगर वे विपक्ष में रहते हैं, तो सरकार को घेरने और जनहित के मुद्दों को उठाने का काम वे मजबूती से नहीं कर पाते क्योंकि उन्हें सरकारी कामकाज का तजुर्बा कम रहता है। इसलिए अगर कोई नौजवान और होनहार अफसर, जमीन से जुड़े रहने के अपने तजुर्बे के साथ राजनीति में आए, तो उससे राजनीति का भला हो सकता है। न सिर्फ सरकारी नौकरी से निकले हुए, बल्कि समाजसेवा के क्षेत्र से निकले हुए कुछ पेशेवर लोग भी अगर चुनाव लड़ते हैं, तो वे अपने लंबे अनुभव का फायदा राजनीति को दे सकते हैं। एक एनजीओ में बरसों काम करने के बाद संदीप दीक्षित ने पूर्वी दिल्ली से लोकसभा चुनाव लड़ा था, और वे संसद पहुंचे थे।
सभी राजनीतिक दलों को यह चाहिए कि वे समाज के अलग-अलग दायरों के अनुभव संपन्न लोगों को, कामयाब और भले लोगों को अपनी पार्टी में लेकर आएं, और अपनी पार्टी को बेहतर बनाएं। ऐसे दुस्साहस से गैरराजनीतिक और कामयाब नौजवानों का सुरक्षित भविष्य जरूर कुछ खतरे में पड़ सकता है, लेकिन कहा गया है कि गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में...। (Daily Chhattisgarh)

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