भ्रष्ट बैंकों की साजिश पर समय रहते कार्रवाई जरूरी

संपादकीय
23 अगस्त 2018


केन्द्र सरकार की तरफ से बैंकों को यह निर्देश आया है कि बैंक से कर्ज लेकर धोखाधड़ी करने वाले लोगों के खिलाफ अगर बैंक अफसर जानकारी रखते हुए भी समय पर रिपोर्ट नहीं करेंगे, तो उन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 120 बी के तहत जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। आईपीसी का यह प्रावधान उन लोगों पर लागू होता है जो कि आपराधिक साजिश में शामिल होते हैं, और इसमें दो साल की कैद से लेकर मौत की सजा तक का प्रावधान है। सरकार ने बैंकों को एक चेतावनी के रूप में यह निर्देश दिया है क्योंकि आज देश भर में कई बैंक ऐसे कर्ज डुबाकर दीवालिया होने की कगार पर हैं जिन कर्जों को मंजूर करने में बैंकों के अफसर शामिल रहे हैं। बैंक के नियमों और पैमानों के खिलाफ जाकर भ्रष्टाचार के रास्ते ऐसे कर्ज मंजूर किए गए जिनकी वसूली मुमकिन ही नहीं थी। इसी सिलसिले में अभी दो दिन पहले एक दूसरी खबर आई थी कि संसद की एक समिति ने पिछले एक आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन को अपनी सुनवाई में आने के लिए लिखा है ताकि समिति के सदस्य-सांसद उनसे यह समझ सकें कि भारतीय बैंकों में ऐसे डूबे हुए कर्ज, एनपीए, की नौबत क्यों आई, और उसका क्या समाधान निकाला जा सकता है। इस सिलसिले में यह बात दिलचस्प है कि संसदीय समिति को मनमोहन सरकार द्वारा बनाए गए आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन का नाम मोदी सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) रहे अरविंद सुब्रमण्यम ने सुझाया था। उन्होंने एनपीए संकट को पहचानने और इसका हल निकालने का प्रयास करने के लिए बीजेपी नेता मुरली मनोहर जोशी की अगुवाई वाली संसद की प्राक्कलन समिति के सामने राजन की प्रशंसा की थी। 
भारत के बैंकों के डुबाए गए कर्ज के बारे में कारोबार की दुनिया के लोगों को यह अच्छी तरह मालूम है कि बहुत सारे कर्ज देते समय ही बैंक अफसरों को मालूम रहता है कि उनसे कोई वसूली होने वाली नहीं है। ऐसे में सिर्फ राजनीतिक दबाव के चलते बैंक ऐसे कर्ज दें, यह मुमकिन नहीं लगता। और जाहिर तौर पर बैंकों के बड़े-बड़े अफसर बड़े-बड़े कर्ज किसी भ्रष्टाचार और साजिश के तहत ही मंजूर करते हैं। आज आए समाचार के मुताबिक इन मामलों में कोष के दूसरे जगह उपयोग समेत धोखाधड़ी गतिविधियों का पता लगाने के लिये बैंक तथा जांच एजेंसियां इसकी जांच कर रही हैं। बैंकों खासकर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों पर फंसे कर्ज (एनपीए) को लेकर खासा दबाव है। इन बैंकों का एनपीए आठ लाख करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच गया है। इसके अलावा बैंकों में कई तरह की धोखाधड़ी का भी पता चला है। इसमें पीएनबी में 14,000 करोड़ रुपये का घोटाला प्रमुख है, जिसे कथित रूप से हीरा कारोबारी नीरव मोदी और उसके सहयोगियों ने कुछ बैंक अधिकारियों के साथ मिलकर अंजाम दिया।
सरकार को बैंक अफसरों की साजिश के खिलाफ जांच में तेजी का इंतजाम करना चाहिए। आज हालत यह है कि बैंकों के साथ धोखाधड़ी हो गई, साजिश के तहत उनसे करोड़ों रूपए निकाल लिए गए, और बैंकों में रहन रखे गए सामान गायब हो गए, और बैंक अफसरों को बरसों तक इसकी रिपोर्ट लिखाने की जरूरत भी नहीं लगी। इन्हीं अफसरों के घर से अगर कुछ हजार रूपए का भी कोई सामान गायब होता, तो वे आधी रात को थाने पहुंचकर रिपोर्ट लिखाते। लेकिन गायब सामान या स्टॉक के खिलाफ जब बैंक बरसों तक रिपोर्ट नहीं लिखाता है, और ऐसी साजिश में शामिल भ्रष्ट अफसर तरक्की पाते जाते हैं, तो यह बात जाहिर रहती है कि आरबीआई या सरकार का कोई काबू ऐसे भ्रष्ट बैंकों पर नहीं है। इसका दूसरा तरीका यह हो सकता है कि बैंकों के ग्राहकों के जो संघ देश में हैं, वे भ्रष्ट बैंकों से आम ग्राहकों के खाते हटवाने का एक आंदोलन चलाएं। यह याद रखने की जरूरत है कि अभी कुछ महीने पहले तक केन्द्र सरकार इस बात पर आमादा थी कि कानून में फेरबदल करके संसद से ऐसा कानून बनवा दिया जाए जिससे कि किसी बैंक का दीवाला निकलने पर वहां लोगों की जमा रकम पूरी न निकल सके, और उसका एक हिस्सा ही जमाकर्ता को मिले, और बाकी से बैंक अपने भ्रष्ट-घाटे की भरपाई करे। यह तो बैंक कर्मचारियों के संगठन ने समय रहते इस साजिश का भांडाफोड़ किया, और फिर देश भर में जब इस प्रस्तावित फेरबदल के खिलाफ माहौल बना, तो पीएनबी घोटाले से घेरे में आई हुई केन्द्र सरकार को यह प्रस्तावित कानून वापिस लेना पड़ा। आज भी देश के जमाकर्ताओं को चाहिए कि वे उन्हीं बैंकों मेंं अपनी रकम जमा करें जो कि अभी तक भ्रष्टाचार और घोटाले की साजिशों के घेरे में नहीं आए हैं। 
मनमोहन सरकार के आरबीआई गवर्नर रहे रघुराम राजन का भी यह नैतिक दायित्व है कि वे संसदीय समिति के सामने पेश होकर बैंक भ्रष्टाचार से उबरने के लिए उनकी जो भी सोच है, उसे सामने रखें। ऐसा अधिक मौकों पर होता नहीं है, कि मोदी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार पिछली मनमोहन सरकार के आरबीआई गवर्नर की ऐसी तारीफ करें, और बैंक घोटालों से उबरने के लिए उनका नाम सुझाएं। आज देश में बैंकों के भ्रष्टाचार पर बरसों तक कोई कार्रवाई नहीं होती है, और इससे ही भ्रष्ट अफसर बैंकों को डुबाना जारी रखते हैं। ऐसा कड़ा कानून भी बनाना चाहिए कि जाहिर तौर पर जो अफसर भ्रष्ट हैं, उनको कैद हो, और वह लोगों को दिखे भी। (Daily Chhattisgarh)

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