ठेले-साइकिल पर जाते मरीज-मुर्दों की तस्वीरें...

संपादकीय
5 अगस्त 2018


देश भर के बहुत से राज्यों से खबरें आती हैं कि कहीं बीमार या जख्मी को अस्पताल ले जाने के लिए एम्बुलेंस नहीं मिली, तो कहीं किसी गरीब लाश को घर तक जाने के लिए साइकिल या ठेला ही नसीब होता है। यह हाल प्रदेशों की राजधानियों से लेकर बड़े-बड़े जिला अस्पतालों तक से निकलकर आता है और तस्वीरों सहित दिखता है। ऐसी तस्वीरें सरकारों के इंतजाम की नाकामयाबी भी बताती हैं, और समाज की यह हकीकत भी बताती हैं कि किसी के दुख-तकलीफ में आसपास के लोग मुंह मोडऩा बेहतर समझते हैं। बल्कि अभी लगातार कई खबरें ऐसी भी आई हैं जिनमें जाति व्यवस्था के आधार पर बिरादरी के लोगों ने जातबाहर का अंतिम संस्कार नहीं होने दिया, और परिवार के किसी अकेले को साइकिल पर लाश ले जाकर अंतिम संस्कार करना पड़ा, या फिर दूसरी जाति के लोगों ने मदद करके किसी तरह लाश जलाई। जितनी बेरहम सरकारी व्यवस्था दिखती है, उतनी ही बेरहम जाति व्यवस्था भी है, और उतना ही बेरहम समाज भी है जो कि सब देखते हुए अनजान बने रहता है। 
ऐसी बहुत सी खबरों को लेकर जब अस्पतालों के अफसरों से पूछा जाता है तो बंधा-बंधाया, रटा-रटाया जवाब मिलता है कि उनके पास कोई शिकायत आएगी तो वे जांच करेंगे। लेकिन सरकार अपनी इस बुनियादी जिम्मेदारी से मुंह चुराते दिखती है कि ऐसी शिकायत पैदा न हो, इसके लिए तो वह बहुत से छोटे-बड़े कर्मचारी-अफसर को तनख्वाह देती है, गाडिय़ों का इंतजाम रखती है, और हर बात के लिए जवाबदेही कम से कम कागजों पर तो है ही। इतना सब कुछ होते हुए भी अगर गरीब और बेबस के लिए किसी के भीतर तथाकथित इंसानियत नहीं जागती, तो यह महज सरकार की नाकामयाबी नहीं है, यह पूरी इंसानियत की नाकामयाबी है। अस्पतालों से ही ऐसी भयानक खबरें भी मिलती हैं कि पोस्टमार्टम करने वाले कर्मचारियों को कुछ सौ या कुछ हजार रूपए न दे पाने वाले लोगों को चीरी हुई लाश बिना सिले दे दी गई, या कह दिया गया कि खुद सिल लो। दूसरे कई राज्यों की तरह छत्तीसगढ़ में भी जगह-जगह से ऐसी खबरें आती हैं, और जिस राजधानी में पूरी सरकार बसती है, वहां भी यह नाकामयाबी जारी है। 
ऐसे में याद पड़ता है कि पाकिस्तान में एक बुजुर्ग अब्दुल सत्तार ईदी अभी दो बरस पहले गुजरे हैं, जिन्होंने दुनिया की सबसे बड़ी एम्बुलेंस सेवा खड़ी की, और वे पूरे पाकिस्तान में चौबीसों घंटे एम्बुलेंस उपलब्ध कराते थे। वे कई अस्पताल भी चलाते थे, समाजसेवा के दूसरे काम भी करते थे, और पिछली बार वे खबरों में तब आए थे जब भारत से पाकिस्तान भटककर पहुंची हुई एक हिन्दुस्तानी लड़की को उन्होंने अपनी बेटी बनाकर रखा था, हिन्दू रीति-रिवाजों से रखा था, और बाद में वह लड़की भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की मदद से भारत आई, और अब तक उसके परिवार की तलाश जारी है। जब ईदी साहब गुजरे, तब उनका संगठन पाकिस्तान भर में 1800 एम्बुलेंस चला रहा था, और वहां के करांची में उस वक्त उनकी गाडिय़ां हर दिन छह हजार तक मरीज या जख्मी अस्पताल पहुंचा रही थीं। 
भारत में भी बहुत से समाजसेवी ट्रस्ट एम्बुलेंस या शव वाहन चलाते हैं। लेकिन इनमें से किसी ने भी पाकिस्तान के इस ट्रस्ट के मुकाबले दस फीसदी भी काम किया हो, ऐसा खबरों में पढ़ा हुआ याद नहीं पड़ता। सरकार के इंतजाम तो बेरहम रहते ही हैं क्योंकि सरकार एक फौलादी ढांचा रहती है, उसका कोई दिल नहीं होता। लेकिन सामाजिक और निजी क्षेत्र के लोग तो ऐसा काम कर ही सकते हैं जिससे सबसे गरीब लोगों की मदद हो सके। इस सिलसिले में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के एक संगठन, बढ़ते कदम, का जिक्र जरूरी है जिसने अपने सीमित साधनों से भी शव वाहन, और शवगृह जैसे काम किए हैं, शवदान, नेत्रदान, और रक्तदान को बढ़ावा दिया है। हर शहर में इतने संपन्न लोगों की इतनी भीड़ तो रहती ही है कि वे अपने धर्म, अपनी जाति, अपनी प्रांतीयता, या किसी और आधार पर समाज सेवा के ऐसे काम कर सकें जिससे उनका सम्मान बढ़े, इलाके और देश-प्रदेश का सम्मान बढ़े, और सबसे बेसहारा गरीब-बेबस की मदद हो सके। पाकिस्तान को हिन्दुस्तान में बहुत सी बातों को लिए नियमित रूप से गालियां पड़ती हैं, वहां के ईधी फाऊंडेशन से कुछ सीख भी लेना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें