संपादकीय
8 अगस्त 2018

तमिलनाडू में प्रदेश के सबसे बड़े नेता रहे एम. करूणानिधि के गुजरने पर उनके अंतिम संस्कार के लिए राजधानी चेन्नई के सबसे प्रमुख मरीना बीच पर सरकार की ओर से इजाजत नहीं दी जा रही थी, क्योंकि अभी तक केवल मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए लोगों के अंतिम संस्कार और उनकी समाधि इस जगह पर हुई है, और करुणानिधि वैसे तो पांच बार के मुख्यमंत्री रहे, लेकिन वे अभी भूतपूर्व मुख्यमंत्री ही थे। इस जगह को लेकर आज सुबह से मद्रास हाईकोर्ट को जूझना पड़ा, और जजों के सामने कई तरह के नाटकीय घटनाक्रम हुए। मरीना समुद्र तट पर ऐसे कोई अंतिम संस्कार न किए जाएं, और कोई समाधि न बनाई जाए इसे लेकर एक जनहित याचिका वहां चल रही थी, और याचिकाकर्ता ने आनन-फानन इसे वापिस लिया ताकि करुणानिधि की अंतिम इच्छा पूरी हो सके। सरकार ने अदालत के सामने इसके खिलाफ तर्क रखे, और यह भी गिनाया कि खुद करुणानिधि ने मुख्यमंत्री रहते हुए अपनी विरोधी पार्टी के एक भूतपूर्व मुख्यमंत्री के अंतिम संस्कार के लिए मरीना समुद्र तट की इजाजत नहीं दी थी। लेकिन भावनाओं के सैलाब के बीच समुद्र तट डूब गया, और मद्रास हाईकोर्ट ने इस बात की इजाजत दे दी।
हम चेन्नई के आज के इस मामले से परे भी ऐसे होने वाले और बहुत से मामलों को लेकर यह कहना चाहते हैं कि नेताओं के लिए सरकारी संपत्ति, या सार्वजनिक जगह इन दोनों का ऐसा कोई भी इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। दिल्ली ने ऐसी कई बुरी मिसालें देखी हैं जिनमें मीरा कुमार ने बंगले को खाली करने से मना कर दिया और उसे जगजीवन राम का स्मारक बना दिया, या ऐसा भी हुआ कि पी.वी. नरसिंहराव के गुजरने पर दिल्ली में इस भूतपूर्व प्रधानमंत्री के अंतिम संस्कार और समाधि की इजाजत यूपीए सरकार ने नहीं दी, और कहा जाता है कि सोनिया गांधी की निजी नापसंद के चलते नरसिंहराव को अंतिम संस्कार के लिए आन्ध्र ले जाने पर दबाव डाला गया क्योंकि दिल्ली में सोनिया गांधी एक और समाधि नहीं चाहती थीं। लेकिन एक दूसरी मिसाल जो सबसे ही भयानक है, वह है संजय गांधी की। संजय गांधी किसी संवैधानिक या सरकार पद पर नहीं थे, उनकी मौत देश के किसी काम को करते हुए भी नहीं हुई थी, न ही किसी आतंकी हमले में हुई थी। इसके बावजूद संजय गांधी के अंतिम संस्कार और उनकी समाधि के लिए वैसी ही जगह सरकार ने आबंटित की जैसी कि गांधी या नेहरू के लिए है। यह फैसला एकदम ही भयानक था, और सत्ता का ऐसा बुरा इस्तेमाल शायद ही कोई दूसरा हुआ होगा। संजय गांधी से भारत की राजनीति की महज बुरी यादें ही जुड़ी हुई हैं, और ऐसे आदमी के लिए गांधी-नेहरू, शास्त्री-इंदिरा जैसे लोगों की तरह समाधि बहुत ही नाजायज थी, लेकिन इंदिरा और संजय के तेवर इमरजेंसी के बाद की हार के बाद फिर सत्ता में आने पर कुछ-कुछ बदले थे, कुछ-कुछ नहीं भी बदले थे।
हमारा ख्याल है कि राजनीति और सार्वजनिक जीवन में जो लोग हैं, उन्हें देश के प्रति, मानवता के प्रति अपनी जवाबदेही रखते हुए जीते जी अपने देहदान की घोषणा कर देनी चाहिए, ताकि उनके गुजरने के बाद वे धरती और समाज पर, सरकार और सार्वजनिक जगहों पर बोझ न बनें, और चिकित्सा विज्ञान के काम आएं। यह चलन भारतीय राजनीति में बढ़ाने की जरूरत है ताकि देश और प्रदेशों की राजधानियां स्मारकों के नीचे, समाधि और समाधि-स्थलों के नीचे दबती न चली जाएं। यह बात आज मद्रास हाईकोर्ट में बहुत खुलकर सामने आई है जिस तरह समुद्र तट की हिफाजत के लिए खुद अदालत के बनाए गए नियम-कायदों के खिलाफ जाकर अदालत ने आज जिस तरह की इजाजत दी है, वह केवल भीड़ के दबाव के नीचे दी है। आज जब अदालत में यह सुनवाई चल रही थी तब खबरें आ रही थी कि मद्रास हाईकोर्ट को केन्द्रीय सुरक्षा बलों ने घेरकर रखा है। राज्य की पुलिस के बजाय केन्द्रीय सुरक्षा बल की तैनाती की जरूरत बताती है कि वहां तनाव और खतरा किस किस्म का था। किसी भी नेता को ऐसा नहीं होना चाहिए कि अपने गुजरने के बाद के लिए भी वे ऐसे इंतजामों की आखिरी इच्छा छोड़कर जाएं जो कि सरकार, समाज, धरती, पर्यावरण, और अदालत इन सब पर भारी पड़े। (Daily Chhattisgarh)

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