मेनस्ट्रीम मीडिया को बेबस करता हुआ सोशल मीडिया

संपादकीय
29 अगस्त 2018


सोशल मीडिया पिछले करीब एक दशक में हिन्दुस्तान में एक वैकल्पिक मीडिया के रूप में जिस तरह सामने आया है, वह एक बड़ा दिलचस्प मामला है जो कि मीडिया पर शोध करने वाले लोगों के काम का तो है ही, लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति पर शोध करने वाले लोगों के लिए शायद और अधिक काम का है। परंपरागत मीडिया एक मालिकाना ढांचे के तहत, बाजार और सरकार के इश्तहारों पर जिंदा रहने वाला एक ऐसा कारोबार हो चुका था, जिस पर चुनावों के वक्त आत्मा बेच देने की तोहमत साबित होते जा रही थी, और जिसने बड़े कारोबार के हिमायती बनकर बेजुबान लोगों के हितों के खिलाफ काम करने की मिसालें भी पेश की थीं। ऐसे में सोशल मीडिया अपने पूरे अराजक तेवरों के साथ आज जब लोगों की सोच के एक बड़े हिस्से पर काबिज है, उस पर असर डाल रहा है, तो लोगों को इसका यह बेकाबू और अराजक पहलू बड़ा परेशान कर रहा है। 
दरअसल इंटरनेट एक ऐसी तकनीक है जो कि बुनियादी तौर पर बेकाबू है, सस्ती है, और तकरीबन हर किसी की उस तक पहुंच है। इसलिए सदियों से चली आ रही सत्ता की बंदिशों से वह बाहर है, और जिस तरह परंपरागत, पेशेवर, और मूलधारा का कहा जाने वाला मेनस्ट्रीम मीडिया काबू में किया जा सकता है, वैसा सोशल मीडिया के साथ नहीं हो सकता। इसलिए जब किसी देश-प्रदेश या किसी इलाके का परंपरागत मीडिया किसी बात की तरफ से आंखें बंद भी कर लेना चाहता है, तब भी सोशल मीडिया उन बातों को जिंदा रखने, आगे बढ़ाने, और चर्चा में लाने की ताकत रखता है। नतीजा यह हो रहा है कि आज का मेनस्ट्रीम मीडिया सोशल मीडिया को अनदेखा करके एक पल भी नहीं चल पा रहा है। अब सवाल पूछने और चुप्पी रखने पर, देखने और अनदेखा करने पर उसका सदियों का परंपरागत एकाधिकार टूट चुका है, और उसकी परवाह किए बिना सोशल मीडिया बेबाक बोल पा रहा है, और लोगों तक उस हकीकत को पहुंचा पा रहा है जिसे कि कारोबार और सरकार का गठजोड़, या ये दोनों अलग-अलग भी, रोकना चाहते हैं। ऐसी हकीकत अब छपे हुए शब्दों, या कि टीवी तक किसी बात को पहुंचाने की ताकत रखने वाले महंगे चैनलों की मोहताज नहीं रह गई है, और आज इन दो किस्मों का मीडिया कुछ भी अनदेखा करने के पहले कनखियों से सोशल मीडिया में झांक लेता है कि क्या-क्या अनदेखा करना मुमकिन नहीं है। 
लोगों को याद होगा कि इस देश में पिछली मनमोहन सिंह सरकार के दो हिस्से थे। उसका पहला कार्यकाल वामपंथी दलों के बाहरी समर्थन का मोहताज था, और वह सरकार वामपंथियों के प्रति अपनी बहुत सी बातों के लिए जवाबदेह थी। नतीजा यह हुआ था कि यूपीए सरकार के चेहरे पर जितने घोटालों की कालिख लगी, वह तकरीबन सारी की सारी दूसरे कार्यकाल में लगी, जब वह सरकार वामपंथियों के बाहरी समर्थन की मोहताज नहीं थी। आज अगर सोशल मीडिया न होता, तो हिन्दुस्तान का प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया यूपीए-2 की तरह का हो जाता, जिसे कि किसी के प्रति जवाबदेह न रहना हो। लेकिन आज सोशल मीडिया पर बेबाक और बेकाबू लोग अपनी पूरी अराजक जम्हूरियत के साथ लगे रहते हैं, और उन्होंने ही बिना कहे हुए यह नौबत ला दी है कि मेनस्ट्रीम मीडिया को न सिर्फ उनका नोटिस लेना पड़ता है, बल्कि सोशल मीडिया पर तैरने वाली बातों को उठाकर खबर भी बनाना पड़ता है क्योंकि अखबार और टीवी चाहे कितने ही दबकर चलना चाहें, उन्हें पाठक और दर्शक की जरूरत तो रहती ही है, और अगर ये तबके सोशल मीडिया पर और अधिक आश्रित हो गए, तो विज्ञापनदाता भी उस तरफ और अधिक मुड़ जाएंगे। इसलिए अपनी खुद की हस्ती बचाए रखने के लिए मेनस्ट्रीम मीडिया सोशल मीडिया के असर को अनदेखा करके नहीं चल सकता, और आज कम से कम भारत के लोकतांत्रिक नजारे में यह साफ दिखता है कि कोई भी समझौता करने के पहले, किसी भी बात को अनदेखा करने के पहले, किसी भी झूठ को गढऩे और आगे बढ़ाने के पहले परंपरागत मीडिया को इस नए सोशल मीडिया को देखना पड़ता है, उसे तौलना पड़ता है, और फिर उसके मुताबिक अपने समझौतों को दुबारा से तय करना पड़ता है। (Daily Chhattisgarh)

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