संपादकीय
6 अगस्त 2018

छत्तीसगढ़ में इस वक्त बस्तर के सुकमा से आ रही खबर बताती है कि राज्य पुलिस की अगुवाई में सुरक्षाबलों ने पन्द्रह नक्सलियों को मार गिराया है, और बहुत सा हथियार भी बरामद किया है। यह शायद बस्तर में अपने किस्म की सबसे बड़ी कामयाबी है, और वहां पिछले कुछ बरसों में कमजोर हो रही नक्सल हिंसा को एक बड़ी चोट है। वैसे तो नक्सली बीच-बीच में हमले करते रहते हैं, लेकिन जैसा कि किसी भी जगह गुरिल्ला युद्ध में होता है, सरकार के खिलाफ लडऩे वाले लोगों के पास हमला करने के मौके और तरीके अधिक होते हैं क्योंकि वे लड़ाई के किसी नियम-कायदे से बंधे नहीं रहते। दूसरी तरफ सरकारी सुरक्षा बल बहुत सी लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति जवाबदेह रहते हैं, और इसीलिए उनके हाथ बंधे रहते हैं। नक्सली तो जमीन के नीचे विस्फोटक लगाकर सुरक्षा कर्मचारियों को थोक में मार सकते हैं, लेकिन सुरक्षा बल इसके जवाब में ऐसे हथियार इस्तेमाल नहीं कर सकते।
आज की छत्तीसगढ़ पुलिस की यह बड़ी कामयाबी ऐसे मौके पर आई है जब चार दिन पहले ही पुलिस ट्रेनिंग स्कूल के परेड के मौके पर मुख्यमंंत्री डॉ. रमन सिंह ने नक्सलियों को खुली चेतावनी दी थी कि या तो वे हथियार डालकर लोकतंत्र की मूलधारा में आ जाएं, या वे मरने के लिए तैयार रहें। उनका यह रूख उनके इसके पहले तक के इस रूख से थोड़ा अलग था जिसमें वे नक्सलियों से बार-बार बातचीत की मेज पर आने को कहते थे। वैसे भी भारत के नक्सली आंदोलन, या दूसरे हथियारबंद आंदोलनों के जानकार लोगों का तजुर्बा यही रहा है कि हथियारबंद लोग बातचीत की मेज पर आने को तभी तैयार होते हैं जब वे सरकारी बंदूकों से घिरे रहते हैं। बस्तर में माहौल कुछ ऐसा ही दिख रहा है और वहां पर अब सही समय है कि सरकार इस दबाव को जारी रखते हुए भी नक्सलियों से बातचीत का रास्ता खुला रखे। जब नक्सलियों के सामने यह बात साफ हो जाएगी कि गोलियों से बचने का उनके पास सिर्फ एक ही गलियारा बाकी है जो कि सरकारी बातचीत की मेज तक जाता है, तो वे बात करने को तैयार भी होंगे।
लेकिन बंदूकों की कामयाबी के साथ-साथ सरकार को एक लोकतांत्रिक नजरिया जारी रखना चाहिए, और ऐसे लोगों को बीच में डालना चाहिए जो कि नक्सलियों को बातचीत के लिए सहमत कर सकें। ऐसे लोग सरकार के बाहर के ही हो सकते हैं, और ऐसे लोग जाने-माने, परिचित चेहरे भी हैं जिन्होंने पहले भी नक्सलियों के साथ कभी-कभी मध्यस्थता की है। छत्तीसगढ़ में भी एक कलेक्टर के अपहरण के बाद उसकी रिहाई के लिए राज्य सरकार ने अपने कुछ मौजूदा अफसरों और नक्सलियों के भरोसे के कुछ गैरसरकारी लोगों को बीच में डाला था और बात एक सकारात्मक किनारे पर पहुंची थी। उस बातचीत में शामिल इस राज्य के मुख्य सचिव रहे हुए सुनील कुमार आज भी राज्य सरकार के सलाहकार हैं, और योजना मंडल के उपाध्यक्ष भी हैं। वे अपने निजी लोकतांत्रिक विचारों के लिए जाने जाते हैं, और राज्य सरकार उनके मार्फत बाकी कुछ और मध्यस्थ लोगों को जोड़ सकती है।
जब नक्सली लगातार हथियारबंद हिंसा कर रहे हैं, बेकसूरों को बड़ी संख्या में मार रहे हैं, तो हम सरकार को हथियारों का इस्तेमाल न करके महज बातचीत करने की नसीहत नहीं दे सकते, लेकिन इस मौके पर सरकार को ऊपर दी गई सलाह के साथ-साथ हम नक्सलियों, और उनके शहरी परिचित लोगों को यह सलाह जरूर दे सकते हैं कि लोकतंत्र के भीतर आकर ही नक्सली जनता का अधिक भला कर सकते हैं, और इस बारे में नक्सलियों को बातचीत के लिए तैयार करने की क्षमता जिन लोगों में भी हो, उन्हें लोकतंत्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। (Daily Chhattisgarh)
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