27 अक्टूबर 2026
एक चक्रवाती तूफान के चलते आज से तीन दिन चार राज्यों में भारी बारिश की मौसमी-भविष्यवाणी की गई है। हर बारिश गरीबों की बहुत बड़ी आबादी के लिए दिक्कत-परेशानी लेकर आती है। एक वक्त था जब मुम्बई की मानसूनी बारिश देखने के लिए खाड़ी के देशों से शेख कुनबे सहित आकर मुम्बई में समंदर किनारे की होटलों में रूकते थे, और बारिश देखते थे, क्योंकि रेगिस्तान वाले देशों में कभी ऐसी मानसूनी बारिश उन्हें देखने नहीं मिलती थी। लेकिन गरीब हिन्दुस्तानी के लिए बारिश में जीना दूभर होता है। किसान और खेतिहर मजदूर तो खेतों की फसल के मुताबिक बारिश से खुश रहते हैं, लेकिन कृषि अर्थव्यवस्था से परे के लोगों की निजी जिंदगी तकलीफ में डूब जाती है। शहरी बस्तियां अराजक और अनियोजित तरीकों से बसी हुई हैं, और वे तेज बारिशों में डूब जाती हैं। लोगों के घरों का सामान बर्बाद हो जाता है। कई दिनों तक रोजी छिन जाती है क्योंकि वे घर छोडक़र काम पर निकलने की हालत में नहीं रहते, और बर्बादी भी बहुत होती है। पानी में डूबा हुआ सामान बाद में काम का नहीं रह जाता।
लेकिन फसल और जल आपूर्ति के दो बड़े मकसद ऐसे हैं जो कि पानी से जुड़े हुए हैं। अभी पिछले तीन-चार दिनों से लगातार ये खबरें आ रही हैं कि दक्षिण भारत के जलाशयों में पानी कितना कम रह गया है। कल की ही हैदराबाद की खबर थी कि वहां पर बीते बरसों के मुकाबले पानी के टैंकरों से सप्लाई कितने गुना बढ़ गई है, और यह मानसून के तुरंत बाद का हाल है। अभी ठंड के पूरे महीने बाकी हैं, और उसके बाद उस गर्मी के महीने बाकी हैं जो कि आज के लबालब प्रदेशों को भी सुखा डालती है। फिर खेती के लिए जो बारिश जरूरी और अच्छी होती है, उसके बारे में भी यह समझने जरूरी है कि फसल में पानी की जरूरत पूरे वक्त एक सरीखी नहीं रहती, कभी पानी कम लगता है, और कभी अधिक। ऐसे में जब जलवायु परिवर्तन के चलते हुए बारिश के महीने और हफ्ते बदल जा रहे हैं, कभी बहुत सीमित समय में बहुत अधिक बारिश हो जा रही है, जो कि बहकर नदियों के रास्ते समंदर चली जाती है, और कभी जब बारिश की जरूरत है, तो सूरज तपते रहता है, बादलों का ठिकाना नहीं रहता है। ऐसे में खेतों, इंसानों, और जानवरों की पानी की जरूरत पूरी होने का ठिकाना नहीं रह गया है। इसके अलावा आज देश में बहुत से कारखाने खूब सारा पानी मांगते हैं, और उन कारखानों को अधिकतर प्रदेशों में प्राथमिकता से पानी दिया जाता है, क्योंकि कोई भी राज्य कारखाने खोना नहीं चाहते। ऐसे में बांधों के जलाशयों में लगातार घटते चले जा रहे जलभंडार के बंटवारे में एक ऐसी खींचतान चल रही है, जिसमें लुभावनी राजनीति, कृषि और औद्योगिक अर्थव्यवस्था की प्राथमिकता तय करने का गलाकाट मुकाबला चलते रहता है।
अभी समुद्री तूफान से जुड़ी इस बेमौसम की बारिश, और उसमें भी अंधाधुंध बारिश को लेकर दो बातें लगती हैं। एक तो यह कि छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में धान की जो फसल खेतों में तैयार खड़ी है, वह तेज बारिश में गिर सकती है जिससे कटाई के बाद उपज कम मिलेगी। दूसरी बात यह कि पिछले बरस का भी जो धान अभी तक मंडियों के अहातों में खुले में पड़ा हुआ है, उसका और नुकसान होगा। धान का यह पूरा चक्र अपने आपमें एक आर्थिक दुष्चक्र सरीखा रहता है क्योंकि इसमें भारी सरकारी अनुदान के साथ किसान की फसल खरीदी जाती है, जिसमें सरकारी बजट का एक खासा हिस्सा खर्च होता है। इसके बाद इस धान के परिवहन से लेकर उसकी मिलिंग तक, और फिर उस चावल के राज्य और केन्द्र सरकार के गोदामों में पहुंचाने तक भ्रष्टाचार का एक बड़ा सिलसिला चलता है। इसके साथ-साथ एक दूसरा भ्रष्टाचार चलता है कि छत्तीसगढ़ जैसे बेहतर इंतजाम वाले राज्य में अड़ोस-पड़ोस के राज्यों से चोरी-छुपे लाकर धान बेचा जाता है, और उस पर भी छत्तीसगढ़ का धान-अनुदान बर्बाद होता है। इन सबके साथ-साथ जब मौसम की मार से भी धान खराब होता है, तो मानो बाजार भाव से खासे महंगे में खरीदे गए धान, और बनवाए गए चावल की तरह-तरह की बर्बादी होती है। इसी से जुड़ा हुआ चावल का दुष्चक्र शुरू होता है जिसमें केन्द्र और राज्य सरकारों की रियायती अनाज योजनाओं के तहत मुफ्त या सस्ते में चावल दिया जाता है, और उसमें भी एक बड़ी चोरी चलती है।
एक तरफ जलवायु परिवर्तन के चलते खेती की अर्थव्यवस्था पर न सिर्फ हिन्दुस्तान में, बल्कि पूरी दुनिया में खतरा मंडरा रहा है। दूसरी तरफ लुभावनी राजनीति के चलते केन्द्र और राज्यों सरकारों की फसल-अनुदान और राशन योजनाओं पर जो भारी-भरकम रकम खर्च होती है, उसका एक बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार और बर्बादी में भी चले जाता है। ऐसे में जब कभी मौसम की मार पड़ती है, तो उससे ये दोनों ही बातें बड़ी रफ्तार से बढ़ती हैं। देश में धान जैसी फसलों का मौसमी उत्पादन इतना अधिक है, और उसे गोदामों में कुछ महीनों ही रखने की जरूरत पड़ती है, इसलिए पक्के गोदाम बनाने का काम पूरी फसल के अनुपात में तो होने का कोई आसार नहीं दिखता है। आज की इस तूफानी बारिश के खतरे के वक्त गोदामों की कमी और भी अधिक खलती है। चाहे फसल राज्य सरकार की खरीदी हुई हो, या वह मिलिंग के लिए निजी राईसमिलरों को दी गई हो, या फिर वह केन्द्र और राज्य सरकार के अनाज गोदामों में पहुंची हुई हो, किसी भी वजह से उसका बर्बादी एक राष्ट्रीय बर्बादी है। आज जब केन्द्र सरकार देश में निजीकरण को बढ़ाते चल रही है, तो ऐसे में एक कल्पनाशील योजना बनाकर पक्के गोदामों को बढ़ाने का काम करना चाहिए ताकि फसल, या उससे तैयार किया गया अनाज रखने के लिए गोदाम रहें, और बर्बादी न हो। राज्यों को भी यह सोचना चाहिए कि आज उन्हें झेलनी पड़ रही बर्बादी के मुताबिक अगर वे अलग-अलग जिलों में, या अनाज उत्पादक केन्द्रों के बीच बड़े-बड़े निजी गोदामों को बढ़ावा दें, तो उससे उनकी कितनी बचत होगी? आज बाजार के कारोबारी नए कारोबार की संभावनाओं को देखकर तुरंत ही हिसाब लगा लेते हैं कि उनके पूंजीनिवेश पर मुनाफा कितना होगा। बड़े-बड़े फसल और अनाज गोदामों के लिए सरकारें अगर अपनी खाली जमीनें दें, और गोदामों को किराए पर लेने की किसी तरह की गारंटी दे सकें, तो इससे राष्ट्रीय बर्बादी घट सकती है। केन्द्र और राज्यों में अलग-अलग पार्टियों, और गठबंधनों की सरकारों की पौन सदी हो चुकी है। अब तक अर्थशास्त्रियों, विशेषज्ञ-अफसरों, और कृषि-प्रबंधकों के पास पर्याप्त अनुभव हो चुका है। हम अपनी सीमित समझ से कोई असीमित सुझाव देना नहीं चाहते, लेकिन लगातार चल रही बर्बादी, और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को नुकसान देखते भी नहीं बन रहा है। देखें कि कौन सी सरकार कारोबार के साथ मिलकर एक संभावना ढूंढ पाती है।
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