25 अक्टूबर 2026
छत्तीसगढ़ के सरगुजा इलाके की खबर है कि एक गांव में 50 साल के बेटे ने अपने 70 साल के बाप का कत्ल कर दिया। यह बेटा कुछ अरसा पहले दूसरी जाति की एक लडक़ी या महिला से शादी करके अपने घर ले आया था, और पिता को डर था कि गैरजात में शादी से परिवार का सामाजिक बहिष्कार हो जाएगा। इसे लेकर बाप-बेटे में आए दिन झगड़ा होते रहता था, और इसी झगड़े के चलते बेटे ने बूढ़े बाप को मार डाला। छत्तीसगढ़ आदिवासी, दलित, और ओबीसी समुदायों की बहुतायत वाला प्रदेश है। बहिष्कार की जो बीमारी एक समय सवर्णों और नीची कही जाने वाली जातियों के लोगों के बीच चलती थी, वह अब चारों तरफ फैल गई है। एक जाति के भीतर ही उपजातियों के रिश्तों को लेकर बहिष्कार होने लगे हैं, कहीं सगोत्र विवाहों पर बहिष्कार होता है, तो कहीं दूसरी जाति पर। ऐसा लगता है कि जात और समाज के संगठन बहिष्कार की लाठी चला-चलाकर ही अपना दबदबा कायम रखते हैं। छत्तीसगढ़ में एक ओबीसी जाति में तो अंतरजातीय विवाहों पर इतने कड़े जाति बहिष्कार का चलन हो गया है कि 16 हजार से अधिक परिवार ऐसे बहिष्कार के शिकार हैं। फिर यह भी है कि ऐसे सारे बहिष्कार कुछ लाख रूपए का जुर्माना देकर खत्म भी करवाए जा सकते हैं। मतलब यह कि संपन्न परिवारों के लिए बहिष्कार कोई मुद्दा नहीं रहता, उनके लिए वह एक बार का एक खर्च ही रहता है। लेकिन बहुत से ऐसे गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार रहते हैं, जो कि बहिष्कार के नाम से कांपते हैं, और कोशिश करते हैं कि कुछ जुर्माना भरकर किसी तरह जाति में वापिसी हो जाए। एक तरफ तो न सिर्फ छत्तीसगढ़ में, बल्कि पूरे देश में शहरीकरण बढ़ रहा है जो कि जाति व्यवस्था के बाहुबल को कमजोर करने वाला विकास है, और दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में जाति बहिष्कार करने का एक बाहुबल है जिसके दम पर किसी जाति के नेता अपनी हुकूमत बनाए रखते हैं।
आज जब दुनिया कहीं से कहीं निकल चुकी है, जब दुनिया का एक सबसे विकसित, संपन्न, और ताकतवर देश अमरीका दुनिया का मेल्टिंग पॉट कहलाता है, यानी एक ऐसा बर्तन जिसमें अलग-अलग कई धातुओं को पिघलाकर एक किया जाता है। दुनिया भर की अलग-अलग राष्ट्रीयता, धर्म, रंग, जाति के लोग मिल-जुलकर नए परिवार बनाते हैं, एक बिना सरहद वाला समाज बनाते हैं, और आगे बढ़ते हैं। ऐसे अमरीका के मुकाबले आज जब पिछड़े हुए हिन्दुस्तान के पिछड़े हुए प्रदेश छत्तीसगढ़ में पिछड़ी जातियों के लोग बहिष्कार नाम की तलवार चलाते हुए अपने ही लोगों का सिर काटते हैं, तो समझ पड़ता है कि ऐसे समाज अगले सौ-दो सौ साल भी मेल्टिंग पॉट वाले समाज का मुकाबला नहीं कर पाएंगे। छत्तीसगढ़ तो फिर भी बहिष्कार करके संतुष्ट हो जाता है, भारत के कई हिस्सों में जाति या धर्म, या फिर महज संपन्नता का भेदभाव इतना हिंसक है कि पारिवारिक शान के नाम पर खून बहा दिया जाता है। और यह फिजूल की फर्जी शान सिर्फ परिवार की लडक़ी से जुड़ी रहती है। लडक़ी ने अगर किसी ऐसी जाति या धर्म के लडक़े से मर्जी से शादी कर ली जिसे कि उसका परिवार अपने से नीचा मानता है, तो ऑनरकिलिंग के नाम पर ऐसी लडक़ी को भी मार डाला जाता है, और कई मामलों में प्रेमी से उसके पति बने हुए व्यक्ति को भी। कत्ल करने को यह समाज अपनी शान समझता है, और फिर ऐसे कत्ल के बाद चाहे बाप-बेटे, चाचा-ताऊ कई लोग जेल ही क्यों न चले जाएं। हो सकता है कि जेल में भी वे अपनी मूंछें ऐंठते हुए घूमते रहते हों कि उन्होंने खानदान की इज्जत मिट्टी में मिलाने वाली बेटी को ही खत्म कर दिया, और साथ-साथ उसके प्रेमी या पति को भी। छत्तीसगढ़ अभी इतना खूनी नहीं हो पाया है, और यहां के जाति संगठन जाति बहिष्कार करके अपने बोकरा-भात का इंतजाम करते रहते हैं, कमाई भी करते रहते हैं।
जिन नेताओं से कुछ लोग समाज सुधार की उम्मीद करते हैं, उनमें से कुछ तो खुद ही ऐसे बहिष्कार का शिकार रहते हैं, और वे खुद भी अपनी जाति व्यवस्था के आतंकतले दबे रहते हैं। चूंकि वोटों के लिए ऐसे नेता इसी समाज व्यवस्था के मवाली ठेकेदारों के मोहताज रहते हैं, इसलिए इस कट्टर व्यवस्था के खिलाफ कोई मोर्चा भी नहीं खोलते। हम तो यह देखकर हैरान रहते हैं कि देश के अलग-अलग प्रदेशों में आज से एक-डेढ़ सदी पहले समाज सुधारकों ने जिस हौसले और बहादुरी से बाल विवाह और सतीप्रथा के खिलाफ मोर्चे खोले थे, जिस बहादुरी से छुआछूत को खत्म करवाया था, जिस बहादुरी से आर्य समाज ने हिन्दू धर्म के भीतर की जातियों के बीच शादियां करवाना शुरू किया था, वह पूरी बहादुरी छत्तीसगढ़ से दूर-दूर ही दिखती है। इस राज्य के इतिहास को याद करें तो जाति व्यवस्था की कट्टरता के खिलाफ कोई सामाजिक मोर्चा पहली नजर में तो याद नहीं पड़ता है। लोग अधिक से अधिक अपने आपको इस जाति व्यवस्था का शिकार बनने से किसी तरह बचा लेते हैं, और वही उनकी मानो सबसे बड़ी बहादुरी है।
हर कुछ महीनों में कहीं न कहीं से ऐसी खबर आती है कि जाति से बहिष्कृत किए गए परिवार में कोई मौत होने पर अंतरजातीय विवाह वाली किसी संतान के पहुंचने पर पूरा गांव या समाज मृतक की शवयात्रा को भी छोडक़र चले जाता है। अगर अंतरजातीय विवाह वाले अपने बच्चों को भी कोई परिवार आने-जाने देता है, तो बाकी समाज उससे रोटी-बेटी का रिश्ता तोड़ लेता है। कहने के लिए तो किसी भी किस्म के बहिष्कार के खिलाफ छत्तीसगढ़ में एक बड़ा कड़ा कानून बनाया गया है जो कि अंधविश्वास से लेकर जाति व्यवस्था की कट्टरता तक की हिंसा कम करने के लिए है। लेकिन बहुत से लोग अदालतों तक जाकर सिर पटकते रहते हैं कि उनकी जाति के भीतर उनका बहिष्कार चल रहा है, गांव में न उन्हें कोई काम देते, और न ही कोई उनसे लेन-देन करते, लेकिन अदालतें असरदार नहीं दिखती हैं। यह सिलसिला आज 21वीं सदी के दूसरे चौथाई हिस्से में भी ज्यों का त्यों बरकरार है। अब ऐसे में दो धर्मों के बीच किसी तरह के संबंध की तो बात भी करना बेकार है।
बीते जाने कितने ही दशक हो चुके हैं, भारत के और राज्यों में भी कहीं से जाति व्यवस्था के खिलाफ कोई सुधारवादी आंदोलन सुनाई नहीं पड़ता है। हाल के दशकों में तो लगातार कट्टरता ही बढ़ती चल रही है, क्योंकि बढ़ती कट्टरता ही वोटों के ध्रुवीकरण में काम आती है। लेकिन ऐसी नौबत में एक बात को लेकर हैरानी होती है कि क्या बहिष्कृत किए गए लोगों को उसी समाज में लौटने की कोशिश भी करनी चाहिए, और क्यों करनी चाहिए? छत्तीसगढ़ में एक रामनामी सम्प्रदाय है, जब राम के पूजक हिंदू समाज ने अपने इन दलित लोगों को मंदिरों में आने नहीं दिया था, तो इन लोगों ने पूरे बदन पर राम-राम गुदवाकर अपनी देह को ही मंदिर सा बना लिया था। यह पूरा का पूरा सम्प्रदाय, और इसकी प्रथाएं उसी छुआछूत के प्रति एक बहुत ताकतवर विद्रोह थी। राम का तो कोई अस्तित्व है नहीं कि उससे इस अन्याय को खत्म करने की उम्मीद की जाती, राम के नाम पर पूजा के हक के एकाधिकारवादियों के खिलाफ यह विद्रोह किया गया था, और उसने एक ताकतवर सम्प्रदाय को जन्म दिया। यह एक अलग बात है कि यह विद्रोह समाज व्यवस्था के दूसरे आर्थिक पहलुओं तक नहीं पहुंच पाया, और सिर्फ धार्मिक उपासना तक सीमित रहा। लेकिन क्या आज छत्तीसगढ़ में जाति व्यवस्था के तहत हिंसक और कट्टर बहिष्कार के शिकार परिवारों को इससे विद्रोह करके इस फौलादी ढांचे से बाहर निकलने की नहीं सोचना चाहिए? और यह सुझाते हुए खुद हमें लगता है कि छत्तीसगढ़ में जिस जाति में बहिष्कार नाम की हिंसा सबसे अधिक व्यापक है, उसी जाति के लोगों का हिन्दू धर्म छोडक़र ईसाई बनना क्या उसी किस्म का विद्रोह नहीं है? हम तो केवल आज एक मुद्दे पर चर्चा शुरू करके छोड़ दे रहे हैं, कोई लंबा समाजशास्त्रीय अध्ययन यहां पर मुमकिन नहीं है, लेकिन हमारे पाठक बहस को आगे बढ़ा सकते हैं, इस पर सोचने की जरूरत है कि एक बूढ़े बाप के लिए अपने अधेड़ बेटे को विजातीय विवाह के लिए ताने कसना जरूरी लगता था, और इस बेटे को इस तनाव में बूढ़े बाप का कत्ल करके बकाया उम्र जेल में काटना भी बेहतर लगने लगा था। छत्तीसगढ़ की यह ताजा घटना भी अगर लोगों को सोचने पर मजबूर न करे, तो फिर यह समाज विचारविहीन हो चुका है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें