छोटी सी बात

5 अक्टूबर
कोई आपसे बदतमीजी करे तो कभी चुप रहकर बर्दाश्त न करें। रूबरू बता दें कि आप उसे समझते हैं और यह आपको मंजूर नहीं। बदतमीज की दूकान से कभी कोई सामान न लें। इन दिनों बाजार में किसी सामान का एकाधिकार नहीं है। इसलिए बेहतर सामान, कंपनी या डीलर छांटें। अपने साथ हुई बेईमानी या बदतमीजी को लेकर आस-पास के लोगों से चर्चा जरूर करें।

अपने को धोखा देने की सालगिरह


5 अक्टूबर 2011
हर बरस की तरह इस बार भी दशहरे का त्यौहार रावण को जलाकर पूरा हो जाएगा। रावण बहुत सहूलियत लेकर आता है। वो ना रहे तो लोग जलाएंगे किसे? एक होली का मौका आता है कि लोग अपनी हसरतें पूरी कर पाते हैं, और एक दशहरा आता है, लेकिन रावण तो कबका चला गया। अब बात आ गयी है बुराई की, तो उसके लिए होली पर लकडिय़ाँ और दशहरे पर पुतले लोगों ने गढ़ लिए। रावण था या नहीं, राम थे या नहीं, इसको लेकर मतभेद हो सकता है, लेकिन कम से कम राम की कहानी तो थी ही। उस कहानी से बिना भक्ति-भाव के भी अगर कुछ सीखने का है, तो वह अच्छाई और बुराई के बीच फर्क है। आज एक फर्क करने के लिए हिन्दुस्तान की बड़ी-बड़ी बुराइयों की चर्चा ना भी करें, और महज छोटी-छोटी बुराइयाँ गिनें, तो हिंदुस्तान में हर किसी के भीतर ऐसे रावण दिखते हैं कि उनमें से दस-दस सर छांटकर उनको लोग हर बरस जलाते जाएँ, तो उनके अपने मरने तक ऐसे कुछ सर कम हो पाएंगे। ऐसा भी तब हो पायेगा जब लोग इस दशहरे को अपने भीतर के मारे गए सिरों को फिर सर ना उठाने दें, और हर बरस अपनी बाकी बुराइयों के पुतले बनाते जाएँ. दरअसल जब एक कोई ऐसा आसान निशाना मिल जाता है, कि जिसे मारकर लोगों को लगता है कि उन्होंने बुराई मार दी, तो फिर उसी बात से अपने किये गलत कामों की आत्मग्लानि ख़त्म हो जाती है, और दशहरे की शाम लोग सोनपत्ती बांटते हुए इस फख्र के साथ घूमते हैं, कि बुराई का ऐसा ही अंजाम वे करते रहेंगे। लेकिन इसके बाद वे अगले बरस दशहरे तक के लिए बेफिक्र हो जाते हैं, कम से कम होली तक के लिए तो हो ही जाते हैं।

लेकिन सबको यह सोचने की जरूरत है कि अपने आप को धोखा देने का यह सिलसिला कब तक चलाया जाएगा, और राम-रावण के किस्सों से क्या सचमुच हिंदुस्तान के लोग अपना भला कर पा रहे हैं? अयोध्या वाले उत्तर प्रदेश में आये दिन लोग कमजोर तबकों की लड़कियों से बलात्कार करके उन्हें मार डाल रहे हैं, जि़ंदा जला दे रहे हैं। क्या रामजन्मभूमि के करीब रहने से इंसानों के भीतर का रावण मारा गया? अगर दशहरे के त्यौहार के प्रतीकों से ही किसी का भला हुआ होता, तो फिर रामजन्मभूमि के आस-पास आज लाल-बत्तियों में रावण ही रावण क्यों दिखते होते? लेकिन जिस तरह तमाम किस्म के बुरे लोग रोज़ मंदिर-मस्जिद जाकर ना सिर्फ इश्वर को (अगर वह कहीं है तो) बल्कि अपने आपको, पूरे समाज को झांसा देते रहते हैं। बहुत बरस हुए रायपुर में एक जाली नोट चलाने वाला भक्त पकड़ाया था जो रोज कई मंदिरों में जाकर सौ-सौ के नोट चढ़ाता था, और 95 रूपये वापिस लेता था। इस तरह वह जाली नोट खपा देता था। पकड़े जाने के ठीक पहले तक लोग उसे बहुत बड़ा भक्त मानते रहे। दुनिया भर में लोग रात-दिन ऐसे धोके देते रहते हैं। रावण या होली को बुराई के प्रतीक के रूप में जलाना उसी दर्जे का काम है।
बहुत ही सीधी-सादी बुराइयों को छांटकर अगर उनको ईमानदारी से ना जलाया जाये, तो दशहरा सौ रूपये का जाली नोट है, और होली पचास रूपये का। अपने निजी बर्ताव में, सार्वजनिक जिन्दगी में, लोगों को इतनी बुराइयां छोडऩे की जरूरत है, कि जो लोग ऐसा कर पते हैं, वे आस-पास रावणों की भीड़ देखकर लगातार भड़ास से भरे रहते हैं। दूसरों के साथ बदतमीजी करने वाले किसी भड़ास में नहीं रहते, लेकिन हमेशा अच्छा सुलूक करने वाले लोग लगातार दूसरों की बदतमीज़ी झेल-झेलकर तकलीफ पाते रहते हैं। दशहरे पर रावन जलाना बंद करना चाहिए और लोगों को अपने निजी- सार्वजनिक रावण निपटाने के बारे में सोचना चाहिए। अपने मन की बहादुरी के लिए ऐसे प्रतीकों का इस्तेमाल समाज के लिए घातक है।

छोटी सी बात

4 अक्टूबर
आपके  दोस्त पीने वाले हों, तो उनके अधिक पी लेने के बाद आप उनसे अलग-अलग लोगों की चर्चा करके उनकी असली भावनाएं जान सकते हैं। इससे आपको यह भी समझ आज जाएगा कि वे कितनी दोस्ती के लायक हैं।
और पीने वाले लोग इस खतरे को ठीक से समझ लें। नशे में कह दिया था, कहकर सॉरी कहने से फटे हुए दिल नहीं जुड़ जाते।

सेक्स को लेकर पाखंडी समाज से

4 अक्टूबर
एक भरोसेमंद अंतरराष्ट्रीय संस्था द्वारा किए गए एक सर्वे में यह पाया गया है कि भारत में सेक्स की उम्र वाले नौजवान उम्र के लोगों में से 72 फीसदी ऐसे हैं जिन्होंने किसी नए साथी के साथ बिना किसी सुरक्षा के सेक्स संबंध बनाए। इस सर्वे के मुताबिक 40 फीसदी नौजवान लोगों ने यह कहा है कि उन्हें जरूरत के वक्त गर्भनिरोधकों का पाना मुश्किल हो जाता है। इसी सर्वे में 36 फीसदी लोगों ने यह कहा है कि वे परिवार या दोस्तों में कोई ऐसा मामला जानते हैं जिसमें गर्भनिरोधक न होने से लड़की गर्भवती हो गई। विश्व गर्भनिरोधक दिवस 26 सितंबर को मनाया जाता है और इसी के आसपास इससे जुड़े हुए सर्वे की यह रिपोर्ट जारी हुई है। यह भी पाया गया कि सर्वे में जवाब देने वाले स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं या डॉक्टरों से गर्भनिरोधकों के बारे में पूछने में हिचकते हैं और इनमें से बहुतों को स्कूल में यौनशिक्षा नहीं मिलती। यह सर्वे 29 देशों में ऑनलाईन किया गया था, जिसका एक मतलब यह भी है कि इसके जवाब देने वाले नौजवान समाज के संपन्न या शिक्षित या शहरी इंटरनेट उपभोक्ता थे। भारत में सभी राज्यों में यह सर्वे किया गया था और इसमें 20 से 25 बरस की उम्र के लड़के-लड़कियों को शामिल किया गया था। दुनिया भर के आंकड़ों में यह मिला कि हर बरस 20 करोड़ से अधिक युवतियां गर्भवती होती है जिनमें से 41 फीसदी गैरइरादतन मां बनने की राह पर चल पड़ती हैं।
इस सर्वे के आंकड़े तो अंतहीन हैं लेकिन हम इसे भारत के एक खास संदर्भ में देखना चाहते हैं। यहां पर समाज का जो तबका अधिक बोलता है वह अधिक कट्टर और दकियानूसी भी है। भारत की एक काल्पनिक संस्कृति को जिंदा रखने और उसके झंडे तले साम्प्रदायिकता, धर्मान्धता या एक पाखंडी नैतिकता की अपनी दूकान चलाने के लिए यह तबका पे्रम संबंधों के सिर तोड़ता है मानो कृष्ण कभी इस देश में हुए ही नहीं, सेक्स की चर्चा से भी कतराता है मानो वात्सायन किसी और देश में हुए थे, यौनशिक्षा से कतराता है मानो तवायफों के कोठों पर संपन्न तबके के रईस नौजवानों की शिक्षा किसी और देश में होती रही हो। पूरी तरह एक पाखंड में जीकर, हकीकत पर हमलावर भारत का समाज अपनी नौजवान पीढ़ी को एक अंतहीन निराशा में पटक देता है जहां पर उसे अपने बराबरी के लड़के-लड़कियों से दोस्ती रखने के पहले आसपास के समाज को देखना होता है। लेकिन शहरीकरण, पढ़ाई, कामकाज के चलते अब पूरे देश में ऐसी नौबत बढ़ती चल रही है कि लड़के-लड़कियों के बीच उठना-बैठना, घूमना-फिरना, साथ काम करना अधिक होता है। लेकिन ऐसी नौबत के लिए न तो उन्हें एक वैज्ञानिक आधार पर बनी यौनशिक्षा मिली होती है और न ही समाज का वातावरण ऐसा होता है कि कोई लड़की जाकर किसी दूकान से गर्भनिरोधक खरीद सके। हम अपने आसपास के दायरे को देखें तो क्या ऐसा वातावरण दिखेगा कि किसी दवा दूकान पर जाकर कोई लड़की कंडोम खरीद सके? और ऐसा न होने पर वह बीमारियों और गर्भ से बचने के लिए अपने साथी लड़के पर पूरी तरह आश्रित हो जाती है।
हमें इस बात का पूरा अंदाज है कि इस मुद्दे पर हमारे साफ-साफ लिखने को लेकर हमारे बहुत से पाठक कुछ असुविधा महसूस करेंगे और हो सकता है कि इस अखबार को अपने जवान बच्चों की नजरों से परे रखने की कोशिश भी करेंगे। लेकिन हम ऐसे मां-बाप से भी यह जानना चाहते हैं कि दिन में कई घंटे बाहर रहकर पढऩे, खेलने और काम करने वाले अपने जवान बच्चों की वे कितनी निगरानी कर सकते हैं? उनके अपने बराबरी के लोगों से संबंधों को लेकर वे कितने आश्वस्त रह सकते हैं? और अगर वे अपने मन के भीतर इस तरह की खुशफहमी पाल कर भी रखते हैं तो वे जान लें कि कोई भी पीढ़ी रोक के बांध को तोड़कर या उसमें दरार पैदा करके अपना रास्ता निकालते आई है। ऐसे जवान बच्चे तो अपने किसी जोड़ीदार के लिए उस तरह तो वफादार रहने को बेबस नहीं रहते जैसे कि शादीशुदा जोड़े आपस में होते हैं, इसलिए उनकी जिंदगी में नए या अनजान लोगों से, अचानक किसी मौके पर सेक्स के खतरे आ सकते हैं और वैसे भी गर्भनिरोधकों की सावधानी उन्हें बचा सकती है। कोई भी मां-बाप अपने गैरशादीशुदा जवान बच्चों के बैग में कंडोम देखकर दहशत में तो आ सकते हैं, लेकिन हमारा यह मानना है कि कुंवारी बेटी को गर्भवती पाकर या जवान बेटे-बेटियों को एड्स जैसी बीमारी का शिकार पाकर उन्हें जो दहशत होगी वह कंडोम की दहशत से लाख गुना अधिक होगी। जो लोग यह मानते हैं कि उनकी नसीहतें और उनकी निगरानी उनके बच्चों को सेक्स से दूर रख लेती है, वे एक झांसे में जी रहे हैं और उन्हें आज की पीढ़ी की हकीकत का अहसास नहीं है। और फिर हम सिर्फ इसी पीढ़ी की बात क्यों करें, पहले की पीढिय़ां भी शायद ऐसी ही रही हों तभी तो जगह-जगह नवजात बच्चे घूरों में फेंके जाते थे। अगर हम जरा सा याद करें तो पहले हमारे भी शहर में हर हफ्ते-दस दिन में ऐसी कोई हत्या किसी गटर में तैर जाती थी, लेकिन आजकल ऐसी खबरें कम आती हैं, शायद गर्भनिरोधकों की वजह से या फिर गर्भपात करवाने की सरकारी और निजी सुविधा बढऩे की वजह से। दूसरी तरफ    भारत में एड्स के खतरों की हालत अब तक साफ नहीं है कि हकीकत में ये आंकड़े कितने हैं। सरकारी अस्पतालों तक पहुंचने वाले मामले हमें भरोसेमंद नहीं लगते हैं और हमारा मानना है कि सामाजिक बदनामी के डर से ऐसे अधिकांश मामले उजागर ही नहीं हो पाते होंगे और नाम-पता लिखने वाले सरकारी अस्पतालों से दूर बहुत से लोग निजी अस्पतालों में या दूसरे शहरों में चले जाते होंगे।
कुल मिलाकर हम यह कहना चाहते हैं कि हिंदुस्तान के नौजवानों को उनकी उम्र की शारीरिक और भावनात्मक जरूरतों के मुताबिक एक सेहतमंद जिंदगी जीने देने के लिए माहौल देने की जरूरत है और सरकार को समाज के साथ मिलकर इसकी पहल करनी होगी। इसकी शुरूआत बैंक के एटीएम की तरह कंडोम की मशीनें लगाकर की जा सकती है, और कोई हर्ज नहीं कि रात-दिन खुली रहने वाली सरकारी जगहों, सार्वजनिक सुविधाओं पर ऐसी मशीनें लगाई जाएं जहां से कोई लड़की या महिला भी अपने लिए ऐसा बचाव खरीद सके। जो लोग यह मानते हैं कि ऐसी सुविधाएं बढऩे से लोगों के बीच सेक्स की संस्कृति बढ़ेगी, उन्हें आज की हकीकत का अंदाज ही नहीं है।

हिंदुस्तान की जनता यह सब कब तक बर्दाश्त करेगी?

03 अक्टूबर 2011
भारतीय लोकतंत्र की हालत और इंसान से लेकर भगवान तक की हालत बहुत नफरत पैदा करने वाली है। हम बार-बार कोशिश करते हैं कि कुछ मुद्दों पर कम से कम कुछ हफ्तों तक दुबारा न लिखें लेकिन ऐसा न करना एक अलग किस्म की हैवानियत होगी इसलिए लिखे बिना कोई गुजारा नहीं है। आज ही पहले पन्ने पर हम खबर छाप रहे हैं कि किस तरह कर्नाटक में कल तक भाजपा के मंत्री रहे वहां के सबसे बड़े खदान माफिया रेड्डी बंधुओं और उनके आसपास के लोगों पर सीबीआई के छापे पड़ रहे हैं और वहां के खदान मालिकों और देश के सबसे बड़े स्टील उद्योगपतियों पर सीबीआई ने छापे डाले हैं। यह कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट अपने निगरानी में करवा रहा है तब हो रही है वरना कर्नाटक की भाजपा सरकार से लेकर केंद्र की यूपीए सरकार तक सबके हाथ इन खदान चोरों के सिर पर उसी तरह थे जिस तरह इन रेड्डी बंधुओं के सिर पर सुषमा स्वराज के हाथ की तस्वीरें मीडिया में तैर रही हैं। इसी के साथ दूसरी दिल दहलाने वाली खबर यह है कि इसी लूटे जा रहे कर्नाटक में कुपोषण से हजारों बच्चे मारे जा रहे हैं और ये आंकड़े खुद वहां की सरकार के हैं। लोहा खदानों की इन चोरियों से परे जिस रायचूर जिले में सोने की खदान चलती है वहां पिछले दो बरस में ढाई हजार से अधिक बच्चे कुपोषण से मारे गए हैं और यहां के खदान चोर मंत्रियों के चढ़ाए हुए पैंतालीस करोड़ के मुकुट से तिरूपति के भगवान को कोई परहेज नहीं रहा और न ही वहां के ट्रस्टियों को ऐसे चोरों से चढ़ावा लेने में कोई दिक्कत हुई।
लोकतंत्र से लेकर ईश्वर तक का कारोबार गले-गले तक भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है और ऐसी मौतों वाले राज्य की लूट से जब देश का सबसे दौलतमंद ईश्वर अपनी सजावट करता है तो ईश्वर और धर्म की सोच पर भी सवाल खड़े होते हैं। हम बहुत से भक्तों को नाराज करने की कीमत पर भी यह सवाल उठाना चाहते हैं कि लुटेरों की बस्ती में गरीब और मासूम बच्चों की भूख और कुपोषण से ऐसी मौतों की रिपोर्ट मौत का हिंदू भगवान, यमराज अपने से बड़े किसी भगवान को जमा करता है या नहीं? और इसके बाद भी इन हजारों लाशों के हक के निवालों को निगलकर राक्षसों से ताकतवर हो चुके वहां के इन नेताओं के चढ़ावे को यह भगवान वापिस क्यों नहीं कर सकता? अगर उसका कोई अस्तित्व है तो वह ऐसे वक्त सामने क्यों नहीं आता? और बिना हथियार उठाए जो लोग हजारों लाखों लोगों को इस तरह बेमौत मारने में रात-दिन लगे हैं उनको अगर यह ईश्वर रोक नहीं सकता तो उसके अस्तित्व की धारणा और उसकी सत्ता का और क्या सुबूत हो सकता है? और देश में लोकतंत्र की सत्ता का और क्या सुबूत हो सकता है? और इस देश से भ्रष्टाचार को खत्म करने के नाम पर पूरे देश में वाहवाही पाने वाले अन्ना-बाबा जैसे लोगों की कर्नाटक की लूटमार पर चुप्पी से बड़ा और क्या सुबूत हो सकता है उनकी नीयत के बारे में? जब चारों तरफ की इंसानी और भगवानी ताकतें ऐसी लूटमार पर चुप हैं और लोकतंत्र ऐसी लूटमार के कई बरस निकल जाने के बाद एक अदालती दखल से ही इसमें झांक पा रहा है तो फिर ऐसे लोकतंत्र की जरूरत आखिर किसको है?
खदानों वाले इस कर्नाटक में जब भाजपा का मुख्यमंत्री अपने बेटे-दामाद को करोड़ों का दस्तावेजी फायदा पहुंचाने में फंसा हुआ है और उसी कर्नाटक की राजधानी में बसे हुए ऑर्ट ऑफ लिविंग के भगवान श्रीश्री रविशंकर को उस कर्नाटक में कोई बुराई नहीं दिखती और दिल्ली के रामलीला मैदान में वे देश के भ्रष्टाचार के खिलाफ झंडा उठाते हैं तो यह भी लगता है कि धर्म से परे आध्यात्म का अपनी आंखों के सामने हो रहे ऐसे लूटमार और हो रही ऐसी मौतों पर क्या सोचना है? यह एक बहुत बड़ा ऑर्ट ऑफ लिविंग है जिसमें कुपोषण से होने वाली हजारों मौतों और उसके लिए जिम्मेदार सरकार के लोगों की रात-दिन की दसियों हजारों करोड़ की लूटमार को साथ-साथ देखते हुए उस पर मौन व्रत रखना और रामलीला मैदान के अन्ना-बाबा के व्रत को तुड़वाने के लिए वहां पहुंचना।
यह पूरा सिलसिला भारत के लोकतंत्र से लेकर इंसानियत तक पर से विश्वास को खत्म कर देने वाला है। यह सिलसिला धर्म से लेकर आध्यात्म तक और भगवान से लेकर उसके एजेंटों तक पर से आस्था खत्म कर देने वाला है। यह सिलसिला योगियों से लेकर गांधीवादियों तक पर से विश्वास को खत्म कर देने वाला है। और आज छापे में घिरे कांगे्रस विधायक की पार्टी से लेकर भाजपा विधायक की पार्टी तक और देश के सबसे बड़े उद्योगपतियों तक पर से विश्वास को खत्म कर देने वाला है। ऐसे में देश की जनता की भावनाओं में जो विकल्प बचते हैं वे भयानक हैं। कुछ को लगता है कि इससे तो अंगे्रजों का राज अच्छा था, कुछ को लगता है कि अब इस देश को फौज के हवाले कर देना चाहिए, और कुछ को लगता है कि नक्सली बाकी देश में क्यों नहीं फैल रहे। हमें यही लगता है कि हिंदुस्तान की जनता यह सब कब तक बर्दाश्त करेगी?

पेशेवर झूठों की कहानी

3 अक्टूबर 2011
आजकल
सुनील कुमार

इंटरनेट पर सुब्रमण्यम स्वामी को रोजाना दर्जनों ट्वीट पोस्ट करते देखना बड़ा दिलचस्प भी रहता है और हैरान करने वाला भी। उनकी कुछ बातों को गंभीरता से लेना इसलिए जरूर लगता है क्योंकि वे सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचकर अपने कई आरोपों को दस्तावेजों के साथ साबित करने का काम कर चुके हैं और दुनिया के बड़े जाने-माने विश्वविद्यालयों में उन्हें पढ़ाने के लिए बुलाया जाता है। इसलिए उन्हें महज साम्प्रदायिक, शिगूफेबाज कहकर खारिज कर देना जायज नहीं होगा। उनकी बातें साम्प्रदायिकता के जहर से भरी रहती हैं लेकिन वे अपने आरोपों को देश की सबसे बड़ी अदालत तक ले जाकर उन्हें सही साबित करने का हौसला दिखाने वाले कुछ गिने-चुने नेताओं में से हैं जिनकी अपनी पार्टी का न कोई बड़ा ढांचा है और न ही उन्हें इस लड़ाई में किसी और से बहुत बड़ा सहारा मिलता।
मैंने उनसे ट्विटर पर कुछ आरोपों को लेकर जब सुबूत मांगे तो उनका जवाबी हमला तो कम था लेकिन उनके समर्थन में चौकन्नी और मेहनत करने वाली टीम ने सीधी गाली-गलौज शुरू करने और बिना किसी जानकारी के मुझे कांगे्रस की तनख्वाह पर जीने वाला लिखना शुरू कर दिया। उन्हें यह जानकर थोड़ी सी निराशा हो सकती है कि कांगे्रस के कुछ लोग मुझे भाजपा की तनख्वाह पर जीने वाला मानते हैं, सरकार में बैठे कुछ लोग नक्सलियों का मददगार मानते हैं, नक्सलियों से हमदर्दी रखने वाले मुझे सरकार का हिमायती मानते हैं। कुल मिलाकर कोई भी मुझे अपना नहीं मानता क्योंकि किसी व्यक्ति या संगठन के बजाय जब मुद्दों पर लिखना होता है तो कभी किसी के खिलाफ कड़वी बातें लिखी जाती हैं तो कभी उनके किसी विरोधी के खिलाफ। और इंटरनेट के ट्विटर पर मेरे सरीखे छोटे शहर के अखबारनवीस के बारे में अधिक लोग जानते नहीं हैं इसलिए किसी से एक लाईन का सीधा सवाल भी लोगों को तुरंत उकसा देता है कि वे गाली-गलौज शुरू कर दें।
खुद सुब्रमण्यम स्वामी ने सुबूत की मांग के मेरे ट्वीट के जवाब में लिखा कि भारतीय मीडिया किसी सुबूत को परखने की ताकत नहीं रखता।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट तक अपनी लड़ाई को तर्कसंगत और न्यायसंगत साबित करने में लगे हुए, दुनिया के सबसे अच्छे विश्वविद्यालयों में पढऩे और पढ़ाने वाले सुब्रमण्यम स्वामी जिस तरह की बातें लिखते हैं उससे यह हैरानी होती है कि ऐसे बेबुनियाद झूठ की उन्हें जरूरत क्यों पड़ती है? अभी उन्होंने लिखा-विष कन्या की बहन, अनुष्का उर्फ अलेजान्द्रा ने सोनिया के हमशक्ल का रोल निभाना शुरू कर दिया है। वह पी.चिदंबरम को आदेश जारी करती है। दो अक्टूबर को सुबह राजघाट पर ध्यान से देखें। उन्होंने आगे लिखा कि अनुष्का रोजाना उस पर (यह शायद चिदंबरम के बारे में ही है) चीखती है-स्वामी को गिरफ्तार करो, भारतीय संविधान टायलेट पेपर है उसे फेंक दो। वे आए दिन इटेलियन माफिया जैसे आरोप लगाते रहते हैं। उन्होंने यह भी लिखा कि सोनिया और जेटली प्रेस को कहते रहते हैं कि वे उनके (स्वामी के) बारे में कोई भी अच्छी खबर न छापे।
मुझे ऐसी किसी अनुष्का नाम के विष कन्या के बारे में अलग से जानकारी नहीं है कि स्वामी किसके बारे में लिख रहे हैं, लेकिन मुझे उनके इस आरोप पर जरा भी भरोसा नहीं है कि कोई सोनिया गांधी की हमशक्ल होकर राजघाट पर पहुंचेगी।
इस मुद्दे पर आज लिखने की इसलिए सूझ रही है कि कांगे्रस के चर्चित, विवादास्पद और ताकतवर महासचिव दिग्विजय सिंह की एक शिकायत पर दिल्ली पुलिस ने बाईस लोगों या वेबसाईटों के खिलाफ जुर्म कायम किया है जहां पर उनके बारे में अपमानजनक बातें लिखी गई हैं। सुब्रमण्यम स्वामी जिस तरह के आरोप रोज कई बार लगा रहे हैं, उनको साबित करना शायद उनके जैसे ताकतवर अदालतबाज के लिए भी मुश्किल होगा और उनसे अदालत में सोनिया से जुड़े मुद्दों पर बहस करना कांगे्रस तय करती है या नहीं इसका अंदाज लगाना मुश्किल होगा। लेकिन जो सोनिया गांधी मीडिया में किसी से किसी तरह की बात न करने के लिए जानी जाती है वह मीडिया के लोगों को स्वामी के पक्ष की कोई खबर न बनाने को कहे, यह बात भरोसमंद नहीं लगती।
दिग्विजय सिंह के दायर किए गए मामले से बहुत पहले ही फेसबुक पर कई लोगों से इस बात को लेकर मेरा गहरा मतभेद रहा कि कुछ साम्प्रदायिक सोच के लोगों का रोज का लिखा हुआ झूठ कई लोग एक सच की तरह फैलाना शुरू कर देते हैं और जब मैं उनसे जान-पहचान होने के नाते जांच-परख लेने की अपील करता हूं तो वे मुझे इस खेमे का या उस खेमे का एजेंट लिखने लगते हैं। इंटरनेट की मेहरबानी से झूठ को फैलाना जितना आसान है, उतना ही आसान झूठ को पकड़ लेना भी है। जब बहुत ही सनसनीखेज और बड़े-बड़े आरोप लगते हैं तो उनको जांच लेना मेरी आदत में शुमार हो गया है। नतीजा यह होता है कि सोनिया या राहुल के बारे में, सोनिया के मायके के बारे में, सोनिया के इटेलियन माफिया या पोप से रिश्तों के बारे में जितने तरह की बातें इंटरनेट पर तैरती हैं वे सारी की सारी बातें घोर साम्प्रदायिकता फैलाने वाली एक-दो दर्जन वेबसाईटों तक जाकर खत्म हो जाती हैं, और इससे आगे भी किसी भी भरोसेमंद समाचार स्रोत तक नहीं पहुंच पातीं। सोनिया गांधी के न्यूयॉर्क में इलाज के दौरान सुब्रमण्यम स्वामी ने बहुत किस्म के ऐसे आरोप लगाए कि अमरीकी अदालतों में सोनिया की कांगे्रस पार्टी के दायर किए गए मुकदमे कैसे वापिस लिए जा रहे हैं या इस किस्म की कुछ और बातें। उनके बारे में पूछने पर उनके पास कोई जवाब नहीं था और उनके हिमायतियों के पास गंदी गालियां थीं।
कोई सच का साथ इस हद तक छोड़कर झूठ की बुनियाद पर अपनी दुश्मनी की इमारत को कब तक खड़ा रख सकता है, उससे एक लंबे सार्वजनिक जीवन में उसका क्या फायदा हो सकता है, यह सोचना बड़ा मुश्किल है लेकिन सुब्रमण्यम स्वामी इसकी एक बहुत बड़ी मिसाल हैं।
आज जिन लोगों को भारत की सूचना तकनीक कानून की जानकारी नहीं है उन्हें यह जान लेना बेहतर होगा कि अखबार में किसी को बेइज्जत करके दसियों बरस तक संपादक बचे रह सकता है, लेकिन आईटी एक्ट इतना कड़ा है और उसमें सजा की संभावना, या आशंका जो भी कहें, इतनी अधिक है कि लोगों का बचना खासा मुश्किल होगा। लोगों को इंटरनेट पर किसी के खिलाफ झूठ लिखते हुए एक धेले का भी खर्च नहीं होता, जबकि अखबार को छापना खासा मुश्किल होता है। ऐसे में लोगों को किसी के चाल-चलन से लेकर किसी के परिवार तक के बारे में सफेद झूठ लिखने में भी पल भर नहीं लगता और फिर उस झूठ में दिलचस्पी रखने वाले लोग उसे एक संक्रामक रोग की तरह फैलाने में जुट जाते हैं।
दिग्विजय सिंह ने पुलिस में जो मामला दर्ज करवाया है वह कुछ लोगों को जब तक सजा दिलवाने में कामयाब हो सके तब तक बहुत से और लोग लापरवाही से किसी के भी बारे में झूठ लिखना जारी रख सकते हैं। लेकिन आज इस मुद्दे पर लिखने का एक मकसद यह भी है कि कम से कम इस कॉलम को पढऩे वाले लोग ऐसी गलती से भी बचें, और किसी सजा के खतरे से भी। सच और झूठ, जायज और नाजायज, तय करने का मामला तो अपने-अपने नजरिए से लोग करते हैं, लेकिन अदालत में जब कोई मामला जाता है तो वहां पर सच सिर्फ वही होता है जो अदालत में सच साबित किया जा सके। जो लोग नेहरू-गांधी परिवार की रगों में दौडऩे वाले खून को लेकर एक डीएनए टेस्ट के सुबूत की तरह साम्प्रदायिक नफरत को रात-दिन लिख रहे हैं और फैला रहे हैं वे लोग तभी तक कानून से बचे हैं जब तक कोई उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू नहीं करता और उन्हें अनदेखा करना बेहतर समझता है। अब तक बहुत से अखबार भी अपनी छापी झूठी बातों के साथ भी इसलिए चलते रहते हैं क्योंकि उनके खिलाफ कोई अदालत तक जाने को लोग वक्त, खर्च और इज्जत की और अधिक बर्बादी मानते हैं। लेकिन इंटरनेट के मामले में चूंकि कानून बहुत अधिक कड़ा है इसलिए लोग इसे छोटी बर्बादी मानते हुए झूठे को बर्बाद करना भी तय कर सकते हैं।

छोटी सी बात

2 अक्टूबर
किसी के परिवार में बैठें तो अपनी उम्र के लोगों से बात करने के बजाय उस परिवार के बच्चों और बूढ़ों से अधिक बात करें। अपनी बराबरी के लोगों से तो आप और भी कहीं बात कर सकते हैं।

गांधी से इन सबको दूर रखो


2 अक्टूबर

इस देश में गांधी को साल भर में सबसे अधिक अगर किसी दिन कोसा जाता है तो वह उनके जन्मदिन 2 अक्टूबर को। देश भर में शराब की दुकानें इस दिन बंद रहती हैं और इस सरकारी फैसले की वजह से इस दिन छुट्टी मनाने वाले लोगों का मजा किरकिरा होता है और रोज पीने वाले बेचैन रहते हैं। नतीजा यह होता है कि करोड़ों लोग शायद आज के दिन यह कहते हुए गांधी को याद करते हैं कि खुद तो चले गया, हमें प्यासा मार डाला। लेकिन इससे परे भी इस दिन लोगों के मुंह में बहुत कड़वाहट घुलती है। जितनी बात गांधी का चेहरा टीवी पर दिखता है, नेताओं के भाषण छपते हैं और राह चलते कहीं-कहीं गांधी की प्रतिमाओं पर जलसा दिखता है, उतनी ही बार लोगों को यह बात अधिक तल्खी के साथ याद पड़ती है कि गांधी का नाम लेकर चलने वाले देश के ताकतवर नेता इस तरह गांधी की सोच पर शौच करते हुए देश चला रहे हैं। गरीब के हक, समाज के प्रति जिम्मेदारी, और जिंदगी में किफायत, ईमानदारी और इंसाफ, बराबरी का बर्ताव, इनमें से तमाम बातों को कुचलते हुए जो तबका चलता है वही आज राजघाट से लेकर कस्बों तक गांधी प्रतिमाओं पर माला चढ़ाकर शोहरत का एक और मौका दुह लेता है।
जो तबका लाल-पीली बत्तियों में चलता है, सायरन और काफिले में चलता है, जो महलों की तरह के सरकारी बंगलों में रहता है, मुफ्तखोरी करता है, देश को लूटता है उसे गांधी के पास पहुंचने से कैसे रोका जा सकता है, यह तरकीब सोचने की जरूरत है। जिसका चाल-चलन, जिसकी नीयत गांधी के ठीक खिलाफ है, वह तबका गांधी जयंती पर अपने-आपको भला साबित करने का एक और मौका पा जाता है। इस देश के गरीब अपने पूरे चौबीस घंटों का खर्च छब्बीस रूपए रोज में चलाने के हकदार माने जा रहे हैं, और ऐसे हजार-हजार लोगों के हक को एक-एक दिन में खर्च करने वाले लोग सरकारी सहूलियतों को भोगते हुए इस लोकतंत्र को राजतंत्र में तब्दील कर चुके हैं लेकिन गरीब की आह को लेकर कबीर का लिखा हुआ भी आज के इस जमाने में बेअसर हो चुका है और लोहा तो दूर खादी का कपड़ा भी आज उस आह से भस्म नहीं होता।
ऐसे तमाम मौके जो कि आजादी की चर्चा के रहते हैं, वे देश के लोगों को याद दिलाते हैं कि आजादी कहां-कहां लुट चुकी है। जब-जब एक किफायत और महानता वाले महात्मा की चर्चा होती है तो याद पड़ता है कि उसे चबूतरों पर किस तरह कैद करके रखा गया है और नेता अपनी वल्दियत में बापू का नाम लिखाकर किस तरह आधी सदी से ज्यादा के काले राजा बने हुए हैं। महानता और अच्छी बातों की चर्चा के तमाम मौके देश के लोगों के मन में निराशा को और अधिक भर देते हैं, हताशा को और अधिक बढ़ा देते हैं। हमारे हिसाब से गांधी को जो तबका आज याद करते हुए अपने शाही अंदाज और लूटमार एक दिन के कुछ घंटों के लिए रोकता है वह देश के साथ और गांधी के साथ बराबरी की ज्यादती करता है। इसके खिलाफ लोगों को किसी जनहित याचिका को लगाकर ऐसे नियमों की अपील करना चाहिए कि जो गांधीवादी तरीकों से जीकर और चलकर गांधी जयंती समारोहों तक पहुंचे, वैसे ही लोगों को वहां पहले माला का मौका मिलना चाहिए।
गांधी को जितना ही अधिक याद करें, उतना ही अधिक आम लोगों के मन में गांधीवादी अहिंसा से परे हटकर एक हिंसा अपनाने की बात उठती है। गांधी ने जब यह कहा था कि हिंसा को बर्दाश्त करना भी एक हिंसा है, तो क्या उन्हें आज के हिंदुस्तान की नक्सल हिंसा जैसी नौबत का अंदाज था? आज देश भर में जगह-जगह गांधी की जुबान के दरिद्रनारायण जैसी हालत में जी रहे हैं और जैसी हालत में मर रहे हैं उन्हें देखें तो लगता है कि गांधी के नामलेवा वारिसों ने उन्हें दरिद्र बनाए रखने की मानो कसम ही खा रखी है। जिस तरह किसी फटेहाल गरीब को कोई महंगा त्यौहार भारी पड़ता है, उसी तरह गांधी पर भरोसा रखने वालों को गांधी जयंती का यह दिन गांधीवाद पर से भरोसा खत्म करने वाला लगता है। गांधी के सम्मान के नाम पर अपना सम्मान बढ़वाने की ऐसी फर्जी कोशिशें खत्म करवानी चाहिए। हम राजघाट और देश भर में उस जैसे दूसरे जलसों से नेताओं को और सत्ता के दूसरे तबकों को दूर रखने के लिए देश में एक सामाजिक जागरूकता के आंदोलन की भी कल्पना करते हैं। तमाम किस्म के दागी तबकों और लोगों को गांधी की यादों की विरासत से दूर रखना चाहिए।

छोटी सी बात

1 अक्टूबर
जिनको आप पसंद नहीं करते, उनकी चर्चा में कितना वक्त बर्बाद करते हैं। क्या इतना वक्त उनकी चर्चा में आप लगाते हैं जिनको आप दिल से चाहते हैं।

संभावित भारत रत्न की नीयत

01 अक्टूबर 2011
सचिन तेंदुलकर ने दो दिन पहले मुंबई में अपने नए घर में गृहप्रवेश किया तो अच्छी खबर के साथ-साथ एक यह विवाद भी शुरू हो गया कि मुंबई म्युनिसिपल से उन्होंने निर्माण पूरा होने के बाद रहना शुरू करने की इजाजत नहीं ली और इसके लिए म्युनिसिपल ने कुछ लाख का नोटिस उन्हें दिया है। फिर यह खबर आई कि राज्य सरकार ने मुंबई महानगरपालिका को यह जुर्माना माफ करने को कहा है। लेकिन इसके साथ-साथ कुछ दूसरी बातें जो याद पड़ती हैं वे खटकने वाली हैं।
सचिन तेंदुलकर को लेकर कुछ दूसरी खबरें भी सामने हैं जिनमें उन्हें केंद्र सरकार ने एक कार पर उन्हें आयातकर में करोड़ की छूट देना तय किया था और जिसके खिलाफ अदालत में भी मामला गया था। करोड़ों की यह कार सचिन को विदेश में तोहफे में मिली थी और भारत में उन्होंने सरकार से इस पर आयात शुल्क माफ करने की अपील की थी। अभी कुछ महीने पहले जब उन्होंने यह कार सूरत के एक कारोबारी को बेच दी तो फिर यह सवाल उठा कि इस पर सरकार को माफ किया गया आयात शुल्क क्या फिर वसूलना चाहिए? सचिन तेंदुलकर को लेकर इस कार के विवाद के साथ यह बात उठकर खड़ी हो गई थी कि अरबपति बन चुके इस क्रिकेट खिलाड़ी को टैक्स में रियायत की अपील क्यों करना चाहिए? यह माफी एनडीए की सरकार के रहते दी गई थी और इससे लोगों को यह लगा था कि इतने कमाने वाले लोग भी अगर गरीबों से लबालब इस देश में ऐसी रियायत चाहते हैं तो वह किसके मुंह का कौर छीनकर दी जा रही है?
बड़े-बड़े लोगों की माफी की ऐसी अर्जी उनके लिए भी शर्मनाक है और हमारा मानना है कि किसी भी सरकार को ऐसी माफी के लिए का कोई हक भी नहीं है। जब इस देश में छब्बीस रूपए रोज में किसी इंसान को जिंदा रहने का अंदाज यहां का योजना आयोग लगाता है तो ढाई करोड़ की ऐसी माफी को किस तरह देखा जाए? आज सचिन तेंदुलकर अपने उस घर में रहने गए हैं जिसे खरीदी के कागजात के मुताबिक ही करीब चालीस करोड़ में खरीदा गया था और फिर उस जगह पर दुबारा बनाने में दसियों करोड़ और लगाए गए। अब इसके बाद अगर कुछ लाख के जुर्माने से उन्हें फिर माफी दी जाती है तो यह मुंबई के उन लाखों गरीब लोगों के साथ बेइंसाफी होगी जिन्हें सरकार तरह-तरह से जुर्माना पटाने पर बेबस करती है। ऐसी रियायत उन लोगों को क्यों दी जाए जो कि अपने पल-पल की कमाई करते हैं और जिनका कोई सामाजिक योगदान दिखाई भी नहीं पड़ता है। सचिन जैसों के मामले में पहला योगदान तो यही हो सकता था कि वे करोड़ों की कार मुफ्त में पाने के बाद उस पर आयात शुल्क के कुछ करोड़ रूपए अपनी किसी छोटी-मोटी जेब से निकालकर चुका देते। इस देश का कानून बहुत से टूर्नामेंट की ट्रॉफी तक को बिना आयात शुल्क इस देश में लाने नहीं देता और सचिन को तो यह कार किसी टूर्नामेंट की ट्रॉफी की तरह भी नहीं मिली थी।
यही हाल इस देश में बहुत से नेताओं और दूसरे ताकतवर तबकों का देखने मिलता है जो सरकारी खर्च पर ऐसे तमाम काम करते हैं जो कि वे अपने खुद के पैसों पर बहुत आसानी से कर सकते हैं। अपने अधिकारों से परे की ऐसी फिजूलखर्ची के अलावा लोग अपनी तरह-तरह की निजी जरूरतों को दिखाते हुए सरकारी खजाने से दान पाने की अर्जी भी लगाते हैं और खासे ताकतवर लोग जब ऐसी अर्जियां लेकर खड़े हो जाते हैं तो लगता है कि सबसे गरीब को तो ऐसी कतार के पीछे भी लगने का हक शायद ही कभी मिल पाए। ताकतवर लोगों को गरीबों के हक पर डाका डालने के पहले यह भी सोचना चाहिए कि उससे उनकी अपनी तस्वीर कैसी बनेगी? जिस सचिन को लेकर देश में एक यह अभियान चल रहा है कि उन्हें भारत रत्न दिया जाए, ऐसे सचिन को ऐसे भारत के लिए इतना रहम तो दिखाना चाहिए कि वे छब्बीस रूपए रोज पर जीने वाले लोगों के पेट में जाने वाले पैसों को छीनने की कोशिश न करें।
और देश की जनता को यह चाहिए कि ऐसी रियायत पाने वाले या उसकी कोशिश करने वाले लोगों को उजागर करने की अपनी जिम्मेदारी वह पूरी करे। ऐसे एक दो मामले ही सचिन को भारत रत्न से दूर धकेलने के लिए काफी हैं और ऐसी किसी ताजपोशी के वक्त ये अभी ताजा पाटी गई, या अब तक खुली हुई कब्र से निकलकर सामने खड़े हो जाएंगे।