5 अक्टूबर 2011
हर बरस की तरह इस बार भी दशहरे का त्यौहार रावण को जलाकर पूरा हो जाएगा। रावण बहुत सहूलियत लेकर आता है। वो ना रहे तो लोग जलाएंगे किसे? एक होली का मौका आता है कि लोग अपनी हसरतें पूरी कर पाते हैं, और एक दशहरा आता है, लेकिन रावण तो कबका चला गया। अब बात आ गयी है बुराई की, तो उसके लिए होली पर लकडिय़ाँ और दशहरे पर पुतले लोगों ने गढ़ लिए। रावण था या नहीं, राम थे या नहीं, इसको लेकर मतभेद हो सकता है, लेकिन कम से कम राम की कहानी तो थी ही। उस कहानी से बिना भक्ति-भाव के भी अगर कुछ सीखने का है, तो वह अच्छाई और बुराई के बीच फर्क है। आज एक फर्क करने के लिए हिन्दुस्तान की बड़ी-बड़ी बुराइयों की चर्चा ना भी करें, और महज छोटी-छोटी बुराइयाँ गिनें, तो हिंदुस्तान में हर किसी के भीतर ऐसे रावण दिखते हैं कि उनमें से दस-दस सर छांटकर उनको लोग हर बरस जलाते जाएँ, तो उनके अपने मरने तक ऐसे कुछ सर कम हो पाएंगे। ऐसा भी तब हो पायेगा जब लोग इस दशहरे को अपने भीतर के मारे गए सिरों को फिर सर ना उठाने दें, और हर बरस अपनी बाकी बुराइयों के पुतले बनाते जाएँ. दरअसल जब एक कोई ऐसा आसान निशाना मिल जाता है, कि जिसे मारकर लोगों को लगता है कि उन्होंने बुराई मार दी, तो फिर उसी बात से अपने किये गलत कामों की आत्मग्लानि ख़त्म हो जाती है, और दशहरे की शाम लोग सोनपत्ती बांटते हुए इस फख्र के साथ घूमते हैं, कि बुराई का ऐसा ही अंजाम वे करते रहेंगे। लेकिन इसके बाद वे अगले बरस दशहरे तक के लिए बेफिक्र हो जाते हैं, कम से कम होली तक के लिए तो हो ही जाते हैं।
लेकिन सबको यह सोचने की जरूरत है कि अपने आप को धोखा देने का यह सिलसिला कब तक चलाया जाएगा, और राम-रावण के किस्सों से क्या सचमुच हिंदुस्तान के लोग अपना भला कर पा रहे हैं? अयोध्या वाले उत्तर प्रदेश में आये दिन लोग कमजोर तबकों की लड़कियों से बलात्कार करके उन्हें मार डाल रहे हैं, जि़ंदा जला दे रहे हैं। क्या रामजन्मभूमि के करीब रहने से इंसानों के भीतर का रावण मारा गया? अगर दशहरे के त्यौहार के प्रतीकों से ही किसी का भला हुआ होता, तो फिर रामजन्मभूमि के आस-पास आज लाल-बत्तियों में रावण ही रावण क्यों दिखते होते? लेकिन जिस तरह तमाम किस्म के बुरे लोग रोज़ मंदिर-मस्जिद जाकर ना सिर्फ इश्वर को (अगर वह कहीं है तो) बल्कि अपने आपको, पूरे समाज को झांसा देते रहते हैं। बहुत बरस हुए रायपुर में एक जाली नोट चलाने वाला भक्त पकड़ाया था जो रोज कई मंदिरों में जाकर सौ-सौ के नोट चढ़ाता था, और 95 रूपये वापिस लेता था। इस तरह वह जाली नोट खपा देता था। पकड़े जाने के ठीक पहले तक लोग उसे बहुत बड़ा भक्त मानते रहे। दुनिया भर में लोग रात-दिन ऐसे धोके देते रहते हैं। रावण या होली को बुराई के प्रतीक के रूप में जलाना उसी दर्जे का काम है।
बहुत ही सीधी-सादी बुराइयों को छांटकर अगर उनको ईमानदारी से ना जलाया जाये, तो दशहरा सौ रूपये का जाली नोट है, और होली पचास रूपये का। अपने निजी बर्ताव में, सार्वजनिक जिन्दगी में, लोगों को इतनी बुराइयां छोडऩे की जरूरत है, कि जो लोग ऐसा कर पते हैं, वे आस-पास रावणों की भीड़ देखकर लगातार भड़ास से भरे रहते हैं। दूसरों के साथ बदतमीजी करने वाले किसी भड़ास में नहीं रहते, लेकिन हमेशा अच्छा सुलूक करने वाले लोग लगातार दूसरों की बदतमीज़ी झेल-झेलकर तकलीफ पाते रहते हैं। दशहरे पर रावन जलाना बंद करना चाहिए और लोगों को अपने निजी- सार्वजनिक रावण निपटाने के बारे में सोचना चाहिए। अपने मन की बहादुरी के लिए ऐसे प्रतीकों का इस्तेमाल समाज के लिए घातक है।