हिंदुस्तान की जनता यह सब कब तक बर्दाश्त करेगी?

03 अक्टूबर 2011
भारतीय लोकतंत्र की हालत और इंसान से लेकर भगवान तक की हालत बहुत नफरत पैदा करने वाली है। हम बार-बार कोशिश करते हैं कि कुछ मुद्दों पर कम से कम कुछ हफ्तों तक दुबारा न लिखें लेकिन ऐसा न करना एक अलग किस्म की हैवानियत होगी इसलिए लिखे बिना कोई गुजारा नहीं है। आज ही पहले पन्ने पर हम खबर छाप रहे हैं कि किस तरह कर्नाटक में कल तक भाजपा के मंत्री रहे वहां के सबसे बड़े खदान माफिया रेड्डी बंधुओं और उनके आसपास के लोगों पर सीबीआई के छापे पड़ रहे हैं और वहां के खदान मालिकों और देश के सबसे बड़े स्टील उद्योगपतियों पर सीबीआई ने छापे डाले हैं। यह कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट अपने निगरानी में करवा रहा है तब हो रही है वरना कर्नाटक की भाजपा सरकार से लेकर केंद्र की यूपीए सरकार तक सबके हाथ इन खदान चोरों के सिर पर उसी तरह थे जिस तरह इन रेड्डी बंधुओं के सिर पर सुषमा स्वराज के हाथ की तस्वीरें मीडिया में तैर रही हैं। इसी के साथ दूसरी दिल दहलाने वाली खबर यह है कि इसी लूटे जा रहे कर्नाटक में कुपोषण से हजारों बच्चे मारे जा रहे हैं और ये आंकड़े खुद वहां की सरकार के हैं। लोहा खदानों की इन चोरियों से परे जिस रायचूर जिले में सोने की खदान चलती है वहां पिछले दो बरस में ढाई हजार से अधिक बच्चे कुपोषण से मारे गए हैं और यहां के खदान चोर मंत्रियों के चढ़ाए हुए पैंतालीस करोड़ के मुकुट से तिरूपति के भगवान को कोई परहेज नहीं रहा और न ही वहां के ट्रस्टियों को ऐसे चोरों से चढ़ावा लेने में कोई दिक्कत हुई।
लोकतंत्र से लेकर ईश्वर तक का कारोबार गले-गले तक भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है और ऐसी मौतों वाले राज्य की लूट से जब देश का सबसे दौलतमंद ईश्वर अपनी सजावट करता है तो ईश्वर और धर्म की सोच पर भी सवाल खड़े होते हैं। हम बहुत से भक्तों को नाराज करने की कीमत पर भी यह सवाल उठाना चाहते हैं कि लुटेरों की बस्ती में गरीब और मासूम बच्चों की भूख और कुपोषण से ऐसी मौतों की रिपोर्ट मौत का हिंदू भगवान, यमराज अपने से बड़े किसी भगवान को जमा करता है या नहीं? और इसके बाद भी इन हजारों लाशों के हक के निवालों को निगलकर राक्षसों से ताकतवर हो चुके वहां के इन नेताओं के चढ़ावे को यह भगवान वापिस क्यों नहीं कर सकता? अगर उसका कोई अस्तित्व है तो वह ऐसे वक्त सामने क्यों नहीं आता? और बिना हथियार उठाए जो लोग हजारों लाखों लोगों को इस तरह बेमौत मारने में रात-दिन लगे हैं उनको अगर यह ईश्वर रोक नहीं सकता तो उसके अस्तित्व की धारणा और उसकी सत्ता का और क्या सुबूत हो सकता है? और देश में लोकतंत्र की सत्ता का और क्या सुबूत हो सकता है? और इस देश से भ्रष्टाचार को खत्म करने के नाम पर पूरे देश में वाहवाही पाने वाले अन्ना-बाबा जैसे लोगों की कर्नाटक की लूटमार पर चुप्पी से बड़ा और क्या सुबूत हो सकता है उनकी नीयत के बारे में? जब चारों तरफ की इंसानी और भगवानी ताकतें ऐसी लूटमार पर चुप हैं और लोकतंत्र ऐसी लूटमार के कई बरस निकल जाने के बाद एक अदालती दखल से ही इसमें झांक पा रहा है तो फिर ऐसे लोकतंत्र की जरूरत आखिर किसको है?
खदानों वाले इस कर्नाटक में जब भाजपा का मुख्यमंत्री अपने बेटे-दामाद को करोड़ों का दस्तावेजी फायदा पहुंचाने में फंसा हुआ है और उसी कर्नाटक की राजधानी में बसे हुए ऑर्ट ऑफ लिविंग के भगवान श्रीश्री रविशंकर को उस कर्नाटक में कोई बुराई नहीं दिखती और दिल्ली के रामलीला मैदान में वे देश के भ्रष्टाचार के खिलाफ झंडा उठाते हैं तो यह भी लगता है कि धर्म से परे आध्यात्म का अपनी आंखों के सामने हो रहे ऐसे लूटमार और हो रही ऐसी मौतों पर क्या सोचना है? यह एक बहुत बड़ा ऑर्ट ऑफ लिविंग है जिसमें कुपोषण से होने वाली हजारों मौतों और उसके लिए जिम्मेदार सरकार के लोगों की रात-दिन की दसियों हजारों करोड़ की लूटमार को साथ-साथ देखते हुए उस पर मौन व्रत रखना और रामलीला मैदान के अन्ना-बाबा के व्रत को तुड़वाने के लिए वहां पहुंचना।
यह पूरा सिलसिला भारत के लोकतंत्र से लेकर इंसानियत तक पर से विश्वास को खत्म कर देने वाला है। यह सिलसिला धर्म से लेकर आध्यात्म तक और भगवान से लेकर उसके एजेंटों तक पर से आस्था खत्म कर देने वाला है। यह सिलसिला योगियों से लेकर गांधीवादियों तक पर से विश्वास को खत्म कर देने वाला है। और आज छापे में घिरे कांगे्रस विधायक की पार्टी से लेकर भाजपा विधायक की पार्टी तक और देश के सबसे बड़े उद्योगपतियों तक पर से विश्वास को खत्म कर देने वाला है। ऐसे में देश की जनता की भावनाओं में जो विकल्प बचते हैं वे भयानक हैं। कुछ को लगता है कि इससे तो अंगे्रजों का राज अच्छा था, कुछ को लगता है कि अब इस देश को फौज के हवाले कर देना चाहिए, और कुछ को लगता है कि नक्सली बाकी देश में क्यों नहीं फैल रहे। हमें यही लगता है कि हिंदुस्तान की जनता यह सब कब तक बर्दाश्त करेगी?

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