2 अक्टूबर
इस देश में गांधी को साल भर में सबसे अधिक अगर किसी दिन कोसा जाता है तो वह उनके जन्मदिन 2 अक्टूबर को। देश भर में शराब की दुकानें इस दिन बंद रहती हैं और इस सरकारी फैसले की वजह से इस दिन छुट्टी मनाने वाले लोगों का मजा किरकिरा होता है और रोज पीने वाले बेचैन रहते हैं। नतीजा यह होता है कि करोड़ों लोग शायद आज के दिन यह कहते हुए गांधी को याद करते हैं कि खुद तो चले गया, हमें प्यासा मार डाला। लेकिन इससे परे भी इस दिन लोगों के मुंह में बहुत कड़वाहट घुलती है। जितनी बात गांधी का चेहरा टीवी पर दिखता है, नेताओं के भाषण छपते हैं और राह चलते कहीं-कहीं गांधी की प्रतिमाओं पर जलसा दिखता है, उतनी ही बार लोगों को यह बात अधिक तल्खी के साथ याद पड़ती है कि गांधी का नाम लेकर चलने वाले देश के ताकतवर नेता इस तरह गांधी की सोच पर शौच करते हुए देश चला रहे हैं। गरीब के हक, समाज के प्रति जिम्मेदारी, और जिंदगी में किफायत, ईमानदारी और इंसाफ, बराबरी का बर्ताव, इनमें से तमाम बातों को कुचलते हुए जो तबका चलता है वही आज राजघाट से लेकर कस्बों तक गांधी प्रतिमाओं पर माला चढ़ाकर शोहरत का एक और मौका दुह लेता है।
जो तबका लाल-पीली बत्तियों में चलता है, सायरन और काफिले में चलता है, जो महलों की तरह के सरकारी बंगलों में रहता है, मुफ्तखोरी करता है, देश को लूटता है उसे गांधी के पास पहुंचने से कैसे रोका जा सकता है, यह तरकीब सोचने की जरूरत है। जिसका चाल-चलन, जिसकी नीयत गांधी के ठीक खिलाफ है, वह तबका गांधी जयंती पर अपने-आपको भला साबित करने का एक और मौका पा जाता है। इस देश के गरीब अपने पूरे चौबीस घंटों का खर्च छब्बीस रूपए रोज में चलाने के हकदार माने जा रहे हैं, और ऐसे हजार-हजार लोगों के हक को एक-एक दिन में खर्च करने वाले लोग सरकारी सहूलियतों को भोगते हुए इस लोकतंत्र को राजतंत्र में तब्दील कर चुके हैं लेकिन गरीब की आह को लेकर कबीर का लिखा हुआ भी आज के इस जमाने में बेअसर हो चुका है और लोहा तो दूर खादी का कपड़ा भी आज उस आह से भस्म नहीं होता।
ऐसे तमाम मौके जो कि आजादी की चर्चा के रहते हैं, वे देश के लोगों को याद दिलाते हैं कि आजादी कहां-कहां लुट चुकी है। जब-जब एक किफायत और महानता वाले महात्मा की चर्चा होती है तो याद पड़ता है कि उसे चबूतरों पर किस तरह कैद करके रखा गया है और नेता अपनी वल्दियत में बापू का नाम लिखाकर किस तरह आधी सदी से ज्यादा के काले राजा बने हुए हैं। महानता और अच्छी बातों की चर्चा के तमाम मौके देश के लोगों के मन में निराशा को और अधिक भर देते हैं, हताशा को और अधिक बढ़ा देते हैं। हमारे हिसाब से गांधी को जो तबका आज याद करते हुए अपने शाही अंदाज और लूटमार एक दिन के कुछ घंटों के लिए रोकता है वह देश के साथ और गांधी के साथ बराबरी की ज्यादती करता है। इसके खिलाफ लोगों को किसी जनहित याचिका को लगाकर ऐसे नियमों की अपील करना चाहिए कि जो गांधीवादी तरीकों से जीकर और चलकर गांधी जयंती समारोहों तक पहुंचे, वैसे ही लोगों को वहां पहले माला का मौका मिलना चाहिए।
गांधी को जितना ही अधिक याद करें, उतना ही अधिक आम लोगों के मन में गांधीवादी अहिंसा से परे हटकर एक हिंसा अपनाने की बात उठती है। गांधी ने जब यह कहा था कि हिंसा को बर्दाश्त करना भी एक हिंसा है, तो क्या उन्हें आज के हिंदुस्तान की नक्सल हिंसा जैसी नौबत का अंदाज था? आज देश भर में जगह-जगह गांधी की जुबान के दरिद्रनारायण जैसी हालत में जी रहे हैं और जैसी हालत में मर रहे हैं उन्हें देखें तो लगता है कि गांधी के नामलेवा वारिसों ने उन्हें दरिद्र बनाए रखने की मानो कसम ही खा रखी है। जिस तरह किसी फटेहाल गरीब को कोई महंगा त्यौहार भारी पड़ता है, उसी तरह गांधी पर भरोसा रखने वालों को गांधी जयंती का यह दिन गांधीवाद पर से भरोसा खत्म करने वाला लगता है। गांधी के सम्मान के नाम पर अपना सम्मान बढ़वाने की ऐसी फर्जी कोशिशें खत्म करवानी चाहिए। हम राजघाट और देश भर में उस जैसे दूसरे जलसों से नेताओं को और सत्ता के दूसरे तबकों को दूर रखने के लिए देश में एक सामाजिक जागरूकता के आंदोलन की भी कल्पना करते हैं। तमाम किस्म के दागी तबकों और लोगों को गांधी की यादों की विरासत से दूर रखना चाहिए।
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