सेक्स को लेकर पाखंडी समाज से

4 अक्टूबर
एक भरोसेमंद अंतरराष्ट्रीय संस्था द्वारा किए गए एक सर्वे में यह पाया गया है कि भारत में सेक्स की उम्र वाले नौजवान उम्र के लोगों में से 72 फीसदी ऐसे हैं जिन्होंने किसी नए साथी के साथ बिना किसी सुरक्षा के सेक्स संबंध बनाए। इस सर्वे के मुताबिक 40 फीसदी नौजवान लोगों ने यह कहा है कि उन्हें जरूरत के वक्त गर्भनिरोधकों का पाना मुश्किल हो जाता है। इसी सर्वे में 36 फीसदी लोगों ने यह कहा है कि वे परिवार या दोस्तों में कोई ऐसा मामला जानते हैं जिसमें गर्भनिरोधक न होने से लड़की गर्भवती हो गई। विश्व गर्भनिरोधक दिवस 26 सितंबर को मनाया जाता है और इसी के आसपास इससे जुड़े हुए सर्वे की यह रिपोर्ट जारी हुई है। यह भी पाया गया कि सर्वे में जवाब देने वाले स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं या डॉक्टरों से गर्भनिरोधकों के बारे में पूछने में हिचकते हैं और इनमें से बहुतों को स्कूल में यौनशिक्षा नहीं मिलती। यह सर्वे 29 देशों में ऑनलाईन किया गया था, जिसका एक मतलब यह भी है कि इसके जवाब देने वाले नौजवान समाज के संपन्न या शिक्षित या शहरी इंटरनेट उपभोक्ता थे। भारत में सभी राज्यों में यह सर्वे किया गया था और इसमें 20 से 25 बरस की उम्र के लड़के-लड़कियों को शामिल किया गया था। दुनिया भर के आंकड़ों में यह मिला कि हर बरस 20 करोड़ से अधिक युवतियां गर्भवती होती है जिनमें से 41 फीसदी गैरइरादतन मां बनने की राह पर चल पड़ती हैं।
इस सर्वे के आंकड़े तो अंतहीन हैं लेकिन हम इसे भारत के एक खास संदर्भ में देखना चाहते हैं। यहां पर समाज का जो तबका अधिक बोलता है वह अधिक कट्टर और दकियानूसी भी है। भारत की एक काल्पनिक संस्कृति को जिंदा रखने और उसके झंडे तले साम्प्रदायिकता, धर्मान्धता या एक पाखंडी नैतिकता की अपनी दूकान चलाने के लिए यह तबका पे्रम संबंधों के सिर तोड़ता है मानो कृष्ण कभी इस देश में हुए ही नहीं, सेक्स की चर्चा से भी कतराता है मानो वात्सायन किसी और देश में हुए थे, यौनशिक्षा से कतराता है मानो तवायफों के कोठों पर संपन्न तबके के रईस नौजवानों की शिक्षा किसी और देश में होती रही हो। पूरी तरह एक पाखंड में जीकर, हकीकत पर हमलावर भारत का समाज अपनी नौजवान पीढ़ी को एक अंतहीन निराशा में पटक देता है जहां पर उसे अपने बराबरी के लड़के-लड़कियों से दोस्ती रखने के पहले आसपास के समाज को देखना होता है। लेकिन शहरीकरण, पढ़ाई, कामकाज के चलते अब पूरे देश में ऐसी नौबत बढ़ती चल रही है कि लड़के-लड़कियों के बीच उठना-बैठना, घूमना-फिरना, साथ काम करना अधिक होता है। लेकिन ऐसी नौबत के लिए न तो उन्हें एक वैज्ञानिक आधार पर बनी यौनशिक्षा मिली होती है और न ही समाज का वातावरण ऐसा होता है कि कोई लड़की जाकर किसी दूकान से गर्भनिरोधक खरीद सके। हम अपने आसपास के दायरे को देखें तो क्या ऐसा वातावरण दिखेगा कि किसी दवा दूकान पर जाकर कोई लड़की कंडोम खरीद सके? और ऐसा न होने पर वह बीमारियों और गर्भ से बचने के लिए अपने साथी लड़के पर पूरी तरह आश्रित हो जाती है।
हमें इस बात का पूरा अंदाज है कि इस मुद्दे पर हमारे साफ-साफ लिखने को लेकर हमारे बहुत से पाठक कुछ असुविधा महसूस करेंगे और हो सकता है कि इस अखबार को अपने जवान बच्चों की नजरों से परे रखने की कोशिश भी करेंगे। लेकिन हम ऐसे मां-बाप से भी यह जानना चाहते हैं कि दिन में कई घंटे बाहर रहकर पढऩे, खेलने और काम करने वाले अपने जवान बच्चों की वे कितनी निगरानी कर सकते हैं? उनके अपने बराबरी के लोगों से संबंधों को लेकर वे कितने आश्वस्त रह सकते हैं? और अगर वे अपने मन के भीतर इस तरह की खुशफहमी पाल कर भी रखते हैं तो वे जान लें कि कोई भी पीढ़ी रोक के बांध को तोड़कर या उसमें दरार पैदा करके अपना रास्ता निकालते आई है। ऐसे जवान बच्चे तो अपने किसी जोड़ीदार के लिए उस तरह तो वफादार रहने को बेबस नहीं रहते जैसे कि शादीशुदा जोड़े आपस में होते हैं, इसलिए उनकी जिंदगी में नए या अनजान लोगों से, अचानक किसी मौके पर सेक्स के खतरे आ सकते हैं और वैसे भी गर्भनिरोधकों की सावधानी उन्हें बचा सकती है। कोई भी मां-बाप अपने गैरशादीशुदा जवान बच्चों के बैग में कंडोम देखकर दहशत में तो आ सकते हैं, लेकिन हमारा यह मानना है कि कुंवारी बेटी को गर्भवती पाकर या जवान बेटे-बेटियों को एड्स जैसी बीमारी का शिकार पाकर उन्हें जो दहशत होगी वह कंडोम की दहशत से लाख गुना अधिक होगी। जो लोग यह मानते हैं कि उनकी नसीहतें और उनकी निगरानी उनके बच्चों को सेक्स से दूर रख लेती है, वे एक झांसे में जी रहे हैं और उन्हें आज की पीढ़ी की हकीकत का अहसास नहीं है। और फिर हम सिर्फ इसी पीढ़ी की बात क्यों करें, पहले की पीढिय़ां भी शायद ऐसी ही रही हों तभी तो जगह-जगह नवजात बच्चे घूरों में फेंके जाते थे। अगर हम जरा सा याद करें तो पहले हमारे भी शहर में हर हफ्ते-दस दिन में ऐसी कोई हत्या किसी गटर में तैर जाती थी, लेकिन आजकल ऐसी खबरें कम आती हैं, शायद गर्भनिरोधकों की वजह से या फिर गर्भपात करवाने की सरकारी और निजी सुविधा बढऩे की वजह से। दूसरी तरफ    भारत में एड्स के खतरों की हालत अब तक साफ नहीं है कि हकीकत में ये आंकड़े कितने हैं। सरकारी अस्पतालों तक पहुंचने वाले मामले हमें भरोसेमंद नहीं लगते हैं और हमारा मानना है कि सामाजिक बदनामी के डर से ऐसे अधिकांश मामले उजागर ही नहीं हो पाते होंगे और नाम-पता लिखने वाले सरकारी अस्पतालों से दूर बहुत से लोग निजी अस्पतालों में या दूसरे शहरों में चले जाते होंगे।
कुल मिलाकर हम यह कहना चाहते हैं कि हिंदुस्तान के नौजवानों को उनकी उम्र की शारीरिक और भावनात्मक जरूरतों के मुताबिक एक सेहतमंद जिंदगी जीने देने के लिए माहौल देने की जरूरत है और सरकार को समाज के साथ मिलकर इसकी पहल करनी होगी। इसकी शुरूआत बैंक के एटीएम की तरह कंडोम की मशीनें लगाकर की जा सकती है, और कोई हर्ज नहीं कि रात-दिन खुली रहने वाली सरकारी जगहों, सार्वजनिक सुविधाओं पर ऐसी मशीनें लगाई जाएं जहां से कोई लड़की या महिला भी अपने लिए ऐसा बचाव खरीद सके। जो लोग यह मानते हैं कि ऐसी सुविधाएं बढऩे से लोगों के बीच सेक्स की संस्कृति बढ़ेगी, उन्हें आज की हकीकत का अंदाज ही नहीं है।

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