ऐसी चापलूसी पर सोनिया चुप?
03 जनवरी 2012
संपादकीय
नए साल की पहली सुबह देश की राजधानी दिल्ली में चापलूसी की एक नई ऊंचाई, या गहराई, के साथ देखी। एक बड़े नामी-गिरामी अखबार, द हिन्दू, का पहला पूरा पेज सोनिया गांधी के लिए एक कांग्रेसी नेता के दिए हुए इश्तहार का था। तमिलनाडु के एक कांग्रेस नेता और एक टीवी चैनल के मालिक, कारोबारी, ने यह विज्ञापन दिया था जिसका पूरे पेज पर बिखरा हुआ बड़ा सा नारा था- 'हम हमेशा आपके चरणों में पड़े रहेंगे।Ó इसका संदर्भ भी विज्ञापन लिखा हुआ था- 'राज्याभिषेक के बाद श्रीरामचन्द्रजी ने हनुमान से पूछा था- तुम क्या पुरस्कार पसंद करोगे?... निष्ठावान सेवक हनुमान का विनम्र जवाब था- मुझे हमेशा अपने चरणों में पड़े रहने देंÓ।
कांग्रेस की चापलूसी की लंबी परंपरा रही है और आपातकाल में इस देश में कांग्रेस के तानाशाह, नेहरू-गांधी कुनबे के संजय गांधी के किसी सरकारी कुर्सी पर न रहते हुए भी उनके लिए मुख्यमंत्री और राज्यपाल अपने कपड़ों से कुर्सियां पोंछते जनसभाओं के मंचों पर नजर आते थे, उनकी चप्पलें उठाते दिखते थे और कांग्रेस पार्टी और उनके चापलूसों को संजय गांधी ने इस विशाल और महान लोकतंत्र का भविष्य दिखता था। कांग्रेस पार्टी के इस विधायक रहे तमिल नेता के टीवी चैनल का उद्घाटन सोनिया गांधी ने तीन-चार बरस पहले दिल्ली के कांग्रेस मुख्यालय से किया था, इसलिए इसे कोई छोटा-मोटा और अनजान नेता मानना ठीक नहीं होगा। वैसे भी दिल्ली के एक महंगे अखबार में दसियों लाख रूपए का ऐसा इश्तहार सोनिया गांधी की नजरों से अछूता तो रहा नहीं होगा और अब तक हमें इस चापलूसी पर पार्टी हाईकमान या उनकी ओर से किसी और की नाराजगी की बात कहीं पढऩे नहीं मिली है।कल ही एक समाचार चैनल पर मायावती के एक मंत्री रहे ऐसे नेता जोर-जोर से रोते दिख रहे थे जिनकी टिकट भी इस विधानसभा चुनाव के लिए कट गई है। मायावती ने कांग्रेस की चापलूसी की परंपरा को सौ कदम और आगे बढ़ाते हुए लोगों के लिए यह मौका ही नहीं छोड़ा कि वे उनकी चापलूसी करें। दसियों लाख की माला वे खुद अपने गले में डलवा लेती हैं, सैकड़ों करोड़ के अपने बुत वे खुद बनवा लेती हैं और संजय गांधी सरीखे तानाशाह अंदाज में वे राज करते हुए, दलित की बेटी होने की रियायत भी ले लेती हैं। इस तरह की कुछ लालू चालीसाएं भी बाजार में आ जाती हैं, कहीं किसी नेता के मंदिर बनने लगते हैं, किसी के मरने पर राज्य में अलग-अलग वजहों से होने वाली मौतों को भी सदमा-मौत में गिनने के लिए साजिश हो जाती है और कहीं पर लोग नेताओं के बच्चों में पार्टी और देश-प्रदेश का भविष्य देखने लगते हैं। यह सिलसिला सिर्फ हिन्दुस्तान में हो, ऐसा भी नहीं। बेनजीर के मरने के बाद उनके कॉलेज पढ़ रहे बेटे बिलावल भुट्टो को पार्टी का अध्यक्ष बना दिया गया, बांग्लादेश, श्रीलंका जैसी कई जगहों पर कुनबापरस्ती देखने मिली जो कि चापलूसी की ही एक शक्ल है।
लेकिन सोनिया गांधी के चरणों में पड़े रहने की अतृप्त लालसा रखने वाले इस कलयुगी हनुमान को सोनिया खुद बर्दाश्त करेंगी, ऐसा हमें नहीं लग रहा था। इस पर कम से कम उनकी तरफ से एक जाहिर नाखुशी या नाराजगी सामने आई होती, तो भी कांग्रेस के बाकी लोगों को आगे इस किस्म की चापलूसी से बचने का एक इशारा मिलता। आज एक अरबपति चरणों में पड़े रहना चाहता है, इसे देखकर कल कोई दूसरा इन्हीं चरणों के तले रेंगने का इश्तहार दे सकता है। यह सिलसिला बहुत खतरनाक है और जब ऐसी सार्वजनिक चापलूसी पर कोई नाराजगी सामने नहीं आती, तो वह चापलूसी पार्टी की संस्कृति मान ली जाती है, और बाकी लोगों के लिए मार्गदर्शक भी। जिस पार्टी में नेहरू की बेटी ने अपने बददिमाग बेटे को देश का भविष्य मान लिया था, उस पार्टी को आज भी जारी कुनबापरस्ती के बीच अपनी सोच को खुशामदखोरों से दूर रखना चाहिए। सोनिया गांधी ने हो चुके राज्याभिषेक को छोड़कर अपने सिर पर धरा गया ताज मनमोहन सिंह के सिर पर रखा था। सत्ता के मोह को इस हद तक छोड़कर, और साथ-साथ राजनीतिक समझदारी का एक फैसला लेते हुए सोनिया गांधी जब पार्टी के तमाम लोगों की अपील को विनम्रता से खारिज कर दिया था, तो आज राम के राज्याभिषेक और उनके सेवक हनुमान से तुलना वाले ऐसे विज्ञापन को भी उन्हें खारिज कर देना चाहिए, ऐसी चापलूसी से उनका नुकसान छोड़ और कुछ नहीं हो रहा।
छोटी सी बात
छोटी सी बात
3 जनवरी 2012
किसी से मिली सूचना या खबर को आगे बढ़ाने के पहले उसे जांच-परख लें कि वह सच है या नहीं। इन दिनों फोन-इंटरनेट के चलते कोई कोई भी झूठ फैलाना आसान है और नासमझ लोग इसमें हाथ बंटाते रहते हैं।
छोटी सी बात
छोटी सी बात
2 जनवरी 2012
आपके बच्चों की नजरों में आप उतने ही अच्छे रहते हैं, जितने अच्छे एसएमएस आपके फोन पर आते-जाते हैं।
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विदेशों में भारतीयों पर हमले सिर्फ नस्लीय नफरत से नहीं
02 जनवरी 2012
संपादकीय
ब्रिटेन में एक भारतीय छात्र की हत्या के बाद वहां की पुलिस ने इसे एक नस्लीय हत्या मान लिया है। इसके बाद कल कनाडा में एक भारतीय छात्र की गोली मारकर हत्या कर दी गई। पिछले एक-डेढ़ बरस में आस्ट्रेलिया में बहुत से भारतीय लोगों पर हमले हुए हैं जिन्हें कुछ लोग नस्ल की वजह से हुए हमले मानते हैं और कुछ लोग यह भी मानते हैं कि इसके पीछे दूसरे किस्म के तनाव हैं या फिर ये सीधे-सीधे अपराध की घटनाएं हैं।
भारत के लोग आज जिस तरह दुनिया के बहुत से देशों में जाकर पढ़ रहे हैं, काम कर रहे हैं और बसे हुए हैं, उन सबको देखते हुए यह जाहिर है कि वहां के समाज के भीतर भारत के लोगों को लेकर अच्छी और बुरी कई तरह की बातें हो रही होंगी। इसके पीछे धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक फर्क की वजहें तो ही सकती हैं, बहुत से ऐसे मामले हैं जिनमें आर्थिक कारणों से स्थानीय लोग बाहरी लोगों का विरोध करते हैं। ऐसे तनाव देखने के लिए हमको दूर जाने की जरूरत नहीं है, भारत के भीतर ही कभी मुंबई में उत्तर भारतीयों का विरोध होता है तो कभी असम में बड़ी संख्या में हिन्दी भाषी लोग मार डाले जाते हैं। छत्तीसगढ़ में ही बिहार से आए मजदूरों को लेकर कभी विरोध होता है तो कभी उड़ीसा में मारवाड़ी भगाओ आंदोलन चला था। जब स्थानीय लोग काम नहीं पाते और बाहर से आए हुए लोग अधिक मेहनत से काम करते हैं क्योंकि वे बाहर से आए हुए होते हैं और उनका परिवार, समाज उस दूसरी जगह पर बड़ा सीमित होता है, वे अपनी घरेलू जिंदगी की चुनौतियों के साथ नई जगह पर अधिक घंटे, अधिक कड़ा काम करने को तैयार रहते हैं इसलिए वे स्थानीय लोगों के बीच कुछ तनाव की वजह भी बनते हैं।
इन तमाम विकसित देशों के लोगों से बात करें तो यह समझ आता है कि भारत या एशिया के इस हिस्से से गए हुए कामकाजी लोग वहां पर स्थानीय तौर-तरीकों के खिलाफ जाकर बहुत अधिक घंटे काम कर लेते हैं और पाई-पाई को बचाकर रखने की कोशिश करते हैं ताकि उसे घर भेज सकें। ये चूंकि कम मजदूरी पर, कम तनख्वाह पर काम करने को राजी हो जाते हैं इसलिए वे उन विकसित देशों के लोगों के रोजगार के मौकों को कम भी करते हैं। और ऐसा सिर्फ वहां पूरे वक्त काम करने वाले लोगों के साथ नहीं होता, वहां पर पढऩे के लिए गए हुए बच्चे दिन के कुछ घंटे काम करके अपना खर्च निकालते हैं, और इसमें भी वे उनके लिए बांधी गई सीमा से अधिक काम करने लगते हैं, सस्ते में काम करने लगते हैं और उन देशों के स्थानीय बच्चों के लिए एक अनचाहा तनाव भी खड़ा कर बैठते हैं। इसके अलावा कुछ स्थानीय बेरोजगार ऐसे रहते हैं जो खुद मेहनत करना नहीं चाहते लेकिन बाहर के लोगों को मेहनत से आगे बढ़ते देखकर जो बौखलाए रहते हैं। ऐसे निठल्ले लोग हमको छत्तीसगढ़ में भी दिखते हैं जो अपने आपको बेहतर बनाने के बजाए बाहरी लोगों को गालियां देते हुए खाली बैठे रहते हैं। इंसानी मिजाज सभी जगहों पर कमोबेश एक सा होता है इसलिए कई देशों में जब भारतीय लोगों के खिलाफ कोई तनाव होता है तो उसके पीछे ऐसे आर्थिक कारण भी हो सकते हैं जो कि नस्ल के बजाय रोजगार से जुड़े हुए अधिक होते हैं।
और जहां तक नस्ल के आधार पर हमलों की बात है तो भारत के भीतर ही दलितों और आदिवासियों को अपनी जाति की वजह से कितने किस्म की सामाजिक प्रताडऩा, सामाजिक भेदभाव और हिंसक हमले नहीं झेलने पड़ते? यह तो रोजाना की बात है जब देश में कहीं न कहीं जाति या धर्म के आधार पर हमले होते हों। इसलिए यह मान लेना कि अधिक पढ़े-लिखे या अधिक विकसित देश नफरत से आजाद हो गए हों, यह व्यावहारिक बात नहीं होगी। ऐसे तमाम हमलों को इस बात के साथ जोड़कर देखना चाहिए कि वहां पर भारत से गए हुए कितने लोग बसे हैं, वे कितनी आजादी के साथ वहां बराबरी के मौके पाते हैं, आगे बढ़ते हैं, कमाते हैं, बस जाते हैं और अपनी तरक्की का फायदा देश को भी वापिस भेजते हैं। ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया और कनाडा, इन तमाम जगहों पर हिन्दुस्तान के लोग दसियों लाख बसे हुए हैं। इसलिए उनमें से किसी न किसी के साथ कभी न कभी ऐसे तनाव हो जाते होंगे जो कि नस्ल पर भी कभी-कभी आधारित होते हों। हिन्दुस्तान में क्या कोई ऐसा एक भी हफ्ता गुजरता है जब किसी न किसी विदेशी पर्यटक पर हमला न होता हो या उससे बलात्कार न होता हो? इसलिए ऐसी बातों को एक अनुपात में ही, संतुलित नजरिए से ही देखना चाहिए और इन्हें नस्लीय नफरत बढऩे के किसी सुबूत की तरह देखना गलत होगा।
मुफ्त की दुधारू गाय का फायदा उठाने से सरकारें अब तक बेखबर
आजकल
2 जनवरी 12सुनील कुमार
अन्ना हजारे और दिग्विजय सिंह के बारे में इंटरनेट पर छोटे-छोटे, एसएमएस जैसी लंबाई वाले ट्विटर पिछले महीनों में भरे रहे। अन्ना हजारे की तरफ से कबीर बेदी जैसे जाने-माने लोगों से लेकर उनके दसियों हजार समर्थक इस सबसे लोकप्रिय हो चुकी वेबसाइट पर भ्रष्टाचार के खिलाफ लिखते रहे और मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी, राहुल गांधी और उनकी तरफ से लगभग अकेले लड़ रहे दिग्विजय सिंह के खिलाफ रात-दिन तरह-तरह के नारे गढ़े जाते रहे। दूसरी तरफ दिग्विजय सिंह अन्ना हजारे के अभियान पर जो लिखते रहे, वे उत्तरप्रदेश के चुनाव और राहुल गांधी की ट्रेनिंग से बचे हुए समय में लिखी बातें रहीं, कांग्रेस की तरफ से उसके कोई हमदर्द विरोधियों पर हमला करने वाले यहां नहीं दिखे। अन्ना हजारे के मुद्दों से सहमत कुछ नामी-गिरामी पत्रकार निखिल वागले चौबीसों घंटे ट्विटर पर उनके पक्ष में लिखते रहे और इस हद तक लिखते रहे कि वे मुझ जैसे लोगों को अभियान का एक हिस्सा लगे, और दोस्ताना हमलों में मैंने बार-बार निखिल को यह लिखा भी कि वे अन्ना हजारे का साथ देते हुए लोकतंत्र के खिलाफ चले जा रहे हैं।
ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में अभी कुछ शोधकर्ताओं ने ट्विटर पर जन आंदोलनों को चलाने पर काम किया है। स्पेन में मई के महीने में हुए एक बड़े आंदोलन को ट्विटर से बढ़ावा देने के लिए किस तरह एक छोटा सा समर्पित समूह एक रणनीति के साथ लगे रहा और उसने कैसे धीरे-धीरे इस आंदोलन के बीज दूसरे लोगों में बोए, कैसे समर्थन जुटाया इस पर यह पूरी रिसर्च हुई है। इसी तरह पिछले कुछ महीनों में अरब दुनिया में कई देशों में क्रांतिकारी घटनाएं हुईं, सत्ता पलटी गई, और इस दौरान भी इंटरनेट के ट्विटर जैसे माध्यम में सड़कों से परे एक ऐसा बड़ा आंदोलन चला जिसकी वजह से लाखों लोग सड़कों पर जुटे। तीसरी बड़ी घटना अमरीका में वहां के वित्तीय संस्थानों और वॉलस्ट्रीट नाम के वहां के शेयर बाजार के खिलाफ जनता का एक प्रतीकात्मक आंदोलन रहा। आकुपाई वॉलस्ट्रीट नाम से शुरू हुआ यह आंदोलन बाद में अमरीका के दूसरे शहरों में भी उन शहरों पर कब्जा करने के प्रतीक के रूप में फैला और वहां के जनमत को उसने इस बात के लिए झकझोरा कि कुछ गिनी-चुनी वित्तीय संस्थाएं किस तरह पूरी दुनिया की जिंदगी को कब्जा कर चुकी हैं।
अन्ना हजारे के उठाए हुए जनलोकपाल के मुद्दे को देश के बाहर बसे हुए हिन्दुस्तानियों के एक तबके ने इतना बढ़ावा दिया कि अमरीका के कैलिफोर्निया में जब वहां के भारतीय समुदाय के लोगों ने दांडीमार्च-2 का आयोजन किया तो उसमें शामिल होने के लिए हिन्दुस्तान से अमरीका जाकर करीब 20 दिन मैंने भी लगाए। उस वक्त मुझे जनलोकपाल आंदोलन और अन्ना हजारे की इस बारे में सोच की जानकारी कम थी। लेकिन वहां पन्द्रह दिनों तक रोजाना 18-19 मील पैदल चलते हुए भारतीय समुदाय के लोगों से मिलते हुए, उन्हें यह सुझाते हुए कि किस तरह वे भारत में अपने निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को भ्रष्टाचार के खिलाफ लिखें और किस तरह अपनी पहचान के लोगों को भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में शामिल होने के लिए लिखें। लिखने का यह पूरा सिलसिला अब सिर्फ इंटरनेट पर ही रह गया है और तब से लेकर अब तक दांडीमार्च-2 के हमारे साथ लगातार भारत में भी इस आंदोलन को वहां बैठे हुए बढ़ावा दे रहे हैं।
ब्रिटेन में अभी हुए इस रिसर्च के पहले भी, मैंने कुछ मौकों पर यह लिखा है कि इन दिनों लगातार फिल्मों के लोग, टेलीविजन के लोग और अखबारों के भी लोग किस तरह लगातार अपने काम को ट्विटर और फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों के मार्फत बढ़ावा देते चल रहे हैं। किसी अखबार में एक स्तंभकार के कॉलम को हो सकता है कि लाख लोग पढ़ते हों, लेकिन जब ऐसे स्तंभकार ट्विटर पर करोड़ों लोगों तक अपने कॉलम के बारे में सूचना पहुंचाते हैं, और उस कॉलम तक पहुंचने का ऐसा हॉटलिंक साथ में देते हैं जिससे कि एक क्लिक करते ही लोग उनके पेज तक पहुंच सकें, तो वे अपनी पहुंच को सैकड़ों गुना बढ़ा लेते हैं। भारत के समाचार टीवी चैनलों के कुछ जाने-माने चेहरों के ट्विटर पर पांच-पांच लाख फॉलोअर हैं, और जब ऐसे टीवी प्रस्तुतकर्ता एक लाइन ट्विटर पर डालते हैं तो उन पांच लाख लोगों तक तो वह लाइन सीधे ही पहुंच जाती है, उनमें से जिन लोगों के और दूसरे फॉलोअर हैं, उन तक भी वह बात पहुंच जाती है। मतलब यह कि पांच लाख से कई गुना अधिक लोग उस सूचना को पल भर में देख लेते हैं।
अमिताभ बच्चन से लेकर दूसरे बहुत से लोगों तक, हर किसी को अब यह जरूरी हो गया है कि अगर उन्हें प्रचार चाहिए तो वे टीवी और अखबारों से परे भी इस तरह लगे रहें, और अब अपने-अपने मोबाइल फोन से जब लोग ट्विटर पर पल-पल कुछ डाल सकते हैं, तो यह प्रचार बहुत मायने रखता है। अब दक्षिण भारत के किसी शहर में अगर किसी मरीज को खून की जरूरत है तो उसकी मांग लोग ट्विटर पर डालते हैं, उसके आखिर में आरटी (रीट्वीट) की अपील करते हैं और खून की यह जरूरत ट्विटर पर दुनिया के अलग-अलग कोनों से अलग-अलग लोग अपने सारे फॉलोवरों को पल भर में भेज देते हैं और बिखरे हुए पेट्रोल की आग की तरह कोई भी बात चारों तरफ फैल जाती है।एक वक्त था जब टीवी समाचार चैनल अपनी खबरों के बीच नीचे एक पट्टी पर ब्रेकिंग न्यूज दिखाते थे। अब कोई भी खबर पहली बार किसी चैनल पर नहीं आती, वह अमूमन हर बार ट्विटर पर पहले आती है क्योंकि किसी भी संवाददाता के पहले उस घटना के गवाह, उस घटना के भागीदार लोग ही ट्वीट कर देते हैं। किसी हादसे के शिकार लोग पुलिस और एम्बुलेंस आने के पहले भी घटना और अपने बारे में इंटरनेट पर डालना शुरू कर देते हैं और सूचना इतनी तेजी से देने का काम कोई समाचार माध्यम कैसे कर सकता है?
दूसरी बात यह कि बड़े-बड़े नामी-गिरामी लोग ट्विटर पर जो लिखते हैं, उस पर पल भर के भीतर लोगों की लिखी बातें भी आने लगती हैं और बात शुरू करने वाले ऐसे नामी-गिरामी लोग सीधे-सीधे अपने चाहने वालों से, या नफरत करने वालों से रूबरू हो जाते हैं। देश के बड़े-बड़े अर्थशास्त्री, नामी-गिरामी इतिहासकार, दुनिया के आज के वक्त के बड़े-बड़े दार्शनिक और विचारक, बड़े-बड़े लेखक और कलाकार, खिलाड़ी और पत्रकार अपनी लिखी बातों पर जब पूरी दुनिया के लोगों की प्रतिक्रिया सीधे-सीधे पाने लगते हैं, उनमें से कुछ बातों का जवाब देकर वे जवाब में और भी कुछ पाने लगते हैं, तो लोगों की नब्ज टटोलने का इससे अधिक कारगर और कौन सा तरीका हो सकता है?
लेकिन मैंने पिछले कुछ महीनों में ट्विटर जैसे धारदार, असरदार औजार पर जितना देखा है, मुझे लगता है कि भारत की सरकारें अब तक इसकी ताकत का अंदाज नहीं लगा पाई हैं। दो-चार मुख्यमंत्री इस पर दिखते हैं और उनमें जम्मू कश्मीर के नौजवान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला खुलकर अपनी बात कहते हैं, लोगों से बहस में उलझते हैं, लेकिन वे अपनी, पार्टी और सरकार की सोच को असरदार तरीके से तकरीबन रोजाना लोगों के सामने रख देते हैं। केन्द्र सरकार के दो-चार मंत्री हैं जो कि अपनी बातों को यहां पर कहते हैं। कांग्रेस पार्टी की तरफ से दिग्विजय सिंह अकेले ही यहां सक्रिय दिखते हैं और कई बार मुझे ऐसा लगता है कि जिन मुद्दों पर कांग्रेस सही रहती है, और वैसे मौकों पर उसकी हिमायत में जो तर्क हम लिखते हैं, वैसे तर्कों को भी कांग्रेस की तरफ से ट्विटर पर लिखने वाले कोई नहीं रहते। दूसरी तरफ भाजपा के नेताओं और उनके समर्थकों की भीड़ इंटरनेट पर दिखती है और सुषमा स्वराज जैसे नेता पल-पल यह बताते रहते हैं कि वे कितने मिनट के भीतर संसद में किस मुद्दे पर भाषण देने वाले हैं, या भंडारा की आमसभा की मंच से सुषमा यह ट्वीट करते रहती हैं कि किस तरह वे रमन सिंह और नितिन गडकरी के साथ शक्कर कारखाने के कार्यक्रम में हैं और ये दोनों नेता क्या कह रहे हैं।
बाजार प्रचार का कोई भी मौका नहीं चूकता। इसलिए लाखों-करोड़ों नामों से बाजार अलग-अलग सामानों और सेवाओं को ढंके-छुपे अंदाज में लोगों तक ट्वीट करते रहता है और इनसे बचकर रहना एक बड़ी चुनौती रहती है ताकि लोग सिर्फ अपनी पसंद की बातों को वहां पढ़ सकें। इसी तरह धार्मिक, आध्यात्मिक और तरह-तरह की नफरत वाली बातें भी सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों से दुनिया के एक तबके तक लगातार पहुंच रही हैं और इस टेक्नालॉजी की सुविधा के चलते ऐसी बातें समर्थकों से आगे हजार-हजार गुना बढ़ती भी जा रही हैं।
भारत की सरकार, यहां के राज्यों की सरकारें, केन्द्र और राज्य के बहुत से सार्वजनिक प्रतिष्ठान, संवैधानिक संस्थाएं मुफ्त में हासिल ऐसी वेबसाइटों का इस्तेमाल करते नहीं दिख रहीं जबकि कम्प्यूटर-इंटरनेट या मोबाइल-इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले तमाम लोगों तक पहुंचने के लिए यह एक बहुत कारगर तरीका हो सकता है। सरकारी प्रचार के परंपरागत तरीके पत्र-पत्रिकाओं और रेडियो-टीवी के लायक तो हैं, लेकिन सामाजिक अंतरजाल को खड़ा करने और उसके माध्यम से अपनी बात को एक बढ़ते चल रहे तबके तक पहुंचाने का काम अभी नहीं दिख रहा है। एक तरफ तो केन्द्र सरकार के पास सैम पित्रोदा से लेकर नंदन निलेकेणी तक बहुत से ऐसे जानकार लोग हैं जो कि अपनी तकनीकी खूबियों के चलते ही सरकार तक पहुंचे हैं। और फिर आज तो सोशल नेटवर्किंग की क्षमता को दुहने का काम तो बहुत कम जानकार, बेरोजगार नौजवान भी करते दिखते हैं।
पूरी दुनिया में आंदोलनों के लिए कहीं औजार और कहीं हथियार की तरह इस्तेमाल होने वाली सोशल नेटवर्किंग की क्षमता का जनहित में इस्तेमाल सरकारों, स्थानीय संस्थाओं और जनकल्याणकारी संगठनों को सोचना चाहिए।
रत्न और कंकड़
01 जनवरी 2012
संपादकीय
नए साल में लोगों को अपनी सामाजिक जिम्मेदारी की अधिक समझ पैदा हो यह शुभकामना हम सबको देना चाहते हैं। आज दूसरा कोई बहुत बड़ा मुद्दा इस जगह लिखने को नहीं है इसलिए कुछ हफ्ते पहले प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष जस्टिस काटजू के कहे एक बयान पर हम चर्चा करना चाहते हैं कि फिल्मी सितारों और क्रिकेट खिलाडिय़ों को भारत रत्न देने के बजाय गालिब सरीखे महान शायर को भारत रत्न देना बेहतर होगा। उनके इस बयान के कई महीने पहले हमने अमिताभ बच्चन और सचिन तेंदुलकर जैसे लोगों को भारत रत्न देने की मांग का विरोध इसी जगह इसी संपादकीय कॉलम में किया था और हमारा यह तर्क था कि अपने पेशे से अरबपति बने हुए इन लोगों का समाज के लिए इतना कम योगदान है कि इन्हें भारत रत्न देने का कोई औचित्य नहीं है। इन्हें अपने अभिनव और अपने खेल से इतना कुछ मिल चुका है कि उस दौलत और शोहरत के बाद वे और किसी अतिरिक्त सम्मान के हकदार नहीं है। अमिताभ बच्चन के बारे में लंबे समय से हमारी यह शिकायत रही है कि अपने ससुराल-गांव भोपाल की गैस त्रासदी के बारे में कभी उनका मुंह नहीं खुला और न ही उन्होंने वहां के तकलीफजदा मरते हुए लोगों के लिए कुछ किया। दरअसल बच्चन परिवार में कारखानों की चिमनियों की तरह हर सदस्य टकसाल सा कमाता है लेकिन समाज के जरूरतमंद लोगों के लिए एक धेला कभी देते हुए उन्हें नहीं देखा गया, सिर्फ मंदिरों में कभी-कभार का चढ़ावा तस्वीरों में आता है। मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्री रहते हुए अमिताभ बच्चन ने उत्तरप्रदेश में अपनी बहू ऐश्वर्या राय बच्चन के नाम पर एक कॉलेज खोलने की घोषणा की थी, लेकिन मुलायम राज जाने के बाद वह घोषणा भी खत्म हो गई। हमारे लिए यह भी एक अजीब बात थी कि अपने स्वर्गीय माता-पिता के नाम पर स्कूल-कॉलेज का नाम रखने की भारतीय परंपरा से परे जाकर अमिताभ बच्चन ने जाने क्या सोचकर अपनी बहू के नाम पर इस कॉलेज की घोषणा की थी। लेकिन अजीब होने के अलावा इस बात में गलत कुछ नहीं था, और यह उनकी अपनी मर्जी थी कि वे नाम किसके नाम पर रखें, लेकिन समाज सेवा का वह एक काम भी नहीं हुआ। दूसरी तरफ हमने सचिन तेंदुलकर की कई बार इस बात को लेकर आलोचना की थी कि जब उन्हें विदेश में कई करोड़ रूपए की एक लक्जरी कार तोहफे में मिली तो उन्होंने भारत सरकार से इसके आयात शुल्क में लगने वाले कुछ करोड़ रूपए की माफी मांगी थी। इसके पहले भी सचिन अरबपति हो चुके थे।
अखबारों में आए दिन खबरें छपती हैं कि यह देश किस कदर गरीब है, गरीबी के रेखा के नीचे 70 फीसदी आबादी होने का अंदाज भारत सरकार के एक रिपोर्ट में आ चुका है। अर्जुन सेन गुप्ता की ऐसी रिपोर्ट को स्वर्गीय अदम गोंडवी की एक गजल से जोड़कर भी देखा जाता है कि सौ में सत्तर आदमी जब मुल्क में नाशाद हैं, दिल पे रखकर हाथ कहिए मुल्क क्या आजाद है...। ऐसे देश में एक अरबपति खिलाड़ी जब कुछ करोड़ की रियायती ऐसी सरकार से मांगता है जो अपनी तीन चौथाई जनता को भूख से आजादी भी नहीं दिला पा रही है, तो वह कम से कम हमें तो इस देश का ऐसा रत्न नहीं दिखाई पड़ता जिसे कि देश का सबसे बड़ा सम्मान दिया जाए। इस मुद्दे पर लिखने की जरूरत इसलिए है कि चार दिन पहले ही यह खबर आई है कि सचिन तेंदुलकर ने मुंबई के अपने नए मकान का सौ करोड़ का बीमा करवाया है। जिसका घर सौ करोड़ का हो, बाकी जायदाद और पूंजी निवेश अलग हों, और कमाई अभी जारी ही हो, वह सरकार से टैक्स की छूट मांगे! और ऐसे देश में वह उस आयात शुल्क से छूट मांगे जिस छूट के बिना दवाईयां और कई तरह के इलाज के सामान इतने महंगे हो जाते हैं कि गरीब उन्हें खरीद पाने के बजाय मौत को खरीदने को बेबस होते हैं, ऐसे देश में करोड़ों के तोहफे पर करोड़ों की छूट पाने की सोच क्या इस देश का रत्न है? कोई व्यक्ति अपने पेशे में बहुत कामयाब और शायद बहुत महान हो सकता है। लेकिन हम कामयाबी के दाने-दाने को भुना लेने वाले और देश की जरूरतों को पूरी तरह से भुला देना वालों को किसी तरह के रत्न में नहीं गिनते। एक बार फिर जस्टिस काटजू के बयान के बाद रत्नों की चर्चा होने लगी है, सिनेमा और टीवी के पर्दे पर, खेल के मैदान में और इश्तहारों के बाजार में जो रत्न हैं, उनका वहीं कारोबारी सम्मान हो रहा है। हमारे हिसाब से देश के जरूरतमंदों के लिए योगदान के मामले में ये दोनों लोग और इस तरह के और लोग कंकड़ हैं।
यह टाइमपास नहीं, दिमागफेल
31 दिसंबर 2011
संपादकीय
एक साल पूरा होने और दूसरा साल शुरू होने का मौका यूं तो जश्न से परे के लोगों के लिए किसी भी एक दूसरे दिन की तरह का होता है, लेकिन चूंकि कैलेंडर बदलता है, इस मौके पर लोग बहुत सी बातों तय करते हैं। कुछ अपने मन में और कुछ दूसरे लोगों के बीच, कि इस नए साल में कौन-कौन सी बातें नहीं करेंगे और कौन-कौन सी बातें करेंगे। ऐसे में कुछ लोग हमसे भी पूछते हैं कि नए साल के लिए हमारी क्या राय है।
पिछले एक बरस में भारत में एक बड़ी चीज यह देखी कि खबरों का सैलाब किस तरह लोगों को बहाकर ले जाता है और किसी ऐसी जगह खड़ा कर देता है जिस मंजिल के बारे में, जहां तक पहुंचने की राह के बारे में उन्होंने पहले कभी सोचा भी न रहा हो। समाचारों और विचारों की आज की बाजार व्यवस्था अपने कारोबार से और अधिक किसी की आगे ले जाने के लिए फिक्रमंद नहीं होती। कहने को तो मीडिया न्यूज और व्यूव्ज, खबर और खयाल, से जुड़ा हुआ कारोबार है लेकिन सच और टीआरपी (टीवी की दर्शक संख्या का पैमाना) के बीच जब पसंद की बात आती है तो भारत के अधिकांश टीवी समाचार चैनलों की असली पसंद के बारे में कोई शुबहा नहीं रह जाता। इसी तरह अखबारों का जो गलाकाट मुकाबला चलता है, उसमें सतह पर तैरती सनसनीखेज जानकारी उसी तरह काम की मानी जाती है जिस तरह किसी कोल्ड ड्रिंक की बोतल में भरे हुए बुलबुलों की सनसनी को जरूरी माना जाता है। लेकिन यह तो एक आजाद और उदार अर्थव्यवस्था के भीतर का खुला कारोबार है जिसे किसी भी तरह का कोई मिशन या लोकतंत्र का पाया मानना फिजूल की बात है और हम न इस कारोबार के लिए किसी अतिरिक्त सम्मान को ठीक समझते हैं और न ही इस कारोबार से आदर्शों की किसी अतिरिक्त उम्मीद को जोडऩा ठीक समझते हैं।
तो जब मीडिया को हम समाचारों और विचारों के कारोबार से अधिक जिम्मेदार नहीं मानते तो फिर यह पढऩे, देखने और सुनने वालों की जिम्मेदारी बन जाती है कि वे कैसे बेहतर खबरें पाएं, छांटें और पढ़ें। कैसे बेहतर खबरों को देखें। यह चर्चा जरूरी इसलिए है कि 2011 को भारत में लोगों की भावनाओं को भड़काने वाले साल की तरह भुगता है और इस कदर भुगता है कि शहरी, संपन्न, शिक्षित और मोटे तौर पर सतही समझ के शिकार तबके की लोकतंत्र पर से आस्था हट सी गई थी। मजे की बात यह थी कि यह सब लोकतंत्र के नाम पर ही हो रहा था। नए बरस में अगर हम कोई एक उम्मीद लोगों से करेंगे, तो वह यह है कि लोग अच्छे और बुरे को पढऩे और देखने-सुनने का फर्क ध्यान से करें। जिंदगी में काम और आराम के घंटों के बाद बचे वक्त में से अधिकतर लोग एक चौथाई वक्त अखबार और टीवी पर लगा देते हैं। न तो आराम पर लोगों का बस रहता, न काम के घंटों पर रहता, और बचे हुए वक्त का इस्तेमाल अगर बहुत सोच-समझकर बहुत समझदारी के अखबारों, खबरों और विचारों, टीवी के जिम्मेदार समाचार बुलेटिनों पर नहीं लगाया गया तो अगला हर दिन लोगों को जिम्मेदारी और समझदारी, सच और सरोकार की बातों से परे ले जाएगा और यह लोकतंत्र प्रोपेगंडा के असर में दबा-कुचला रह जाएगा।
इस एक बात के साथ-साथ जुड़ी हुई दूसरी बात यह है कि भारतीय समाज का सबसे मुखर तबका, जो मीडिया में जगह पाता है, और जिसके लिए मीडिया काम करता है, वह देश के बहुत से जरूरी पहलुओं से, असर मुद्दों से और दुनिया की बहुत सी जरूरी बातों से अनछुआ रह जाता है। मिसाल के लिए लोग टीवी के बाकी समाचार चैनल छोड़कर कुछ दिनों के लिए दूरदर्शन और लोकसभा चैनल-राज्यसभा चैनल को देखें तो उन्हें यह पता लगेगा कि टीआरपी की लड़ाई में रात-दिन अपने बखान करने वाले चैनलों की सनसनी भारत के एक बहुत छोटे हिस्से को ही दिखाती है। सरकार के इन चैनलों से भारत की असल जिंदगी से जुड़े हुए बहुत से ऐसे मुद्दों पर खबरें रात-दिन मिलती हैं कि जिनके साथ-साथ सत्ता के पसंदीदा एक-दो नेताओं का कुछ अधिक कवरेज देख लेना कोई नुकसान की बात नहीं होती। हम मीडिया के सामाजिक योगदान को बाजारू-कारोबारी मुकाबले के चलते बहुत बुरी तरह पिछड़ते देख चुके हैं, और यही वजह है कि प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया के मुखिया जस्टिस काटजू को बहुत सी ऐसी कड़वी बातें कहनी पड़ीं जिन्होंने मीडिया के बादशाहों को बौखलाकर रख दिया है। तो देश और दुनिया की जरूरी बातों को, अहमियत वाली बातों को पाठक और दर्शक कहां पर पाएंगे, यह समझ और इसकी जरूरत आने वाले इस बरस में लोगों में बढ़े तो ही देश और दुनिया का एक बड़ा फायदा हो सकता है, या एक बड़ा नुकसान थम सकता है।
जो लोग यह समझते हैं कि अखबार और टीवी के न्यूज चैनल टाइमपास का सामान हैं, वे यह भी समझ लें कि ऐसी समझ पैदा करके एक कारोबार तो पास हो गया है लेकिन मीडिया-कारोबार का ग्राहक फेल हो गया है और उसके साथ-साथ समाज और लोकतंत्र भी फेल हो रहे हैं। बाजार में कुछ चुनिंदा कारोबार जैसे-जैसे आगे बढ़ते हैं वे सोची-समझी साजिश के तहत अपने ग्राहक के दिमाग को छोटा और जेब को बड़ा करने की तरकीबें रात-दिन निकालते रहते हैं और लोगों पर आजमाते भी रहते हैं। उपभोक्तावाद अब सिर्फ वॉलमार्ट से नहीं बढ़ता, मीडिया उसके लिए सबसे बड़ा उपजाऊ खेत हो गया है। लोगों को यह सावधानी रखनी होगी कि टाइमपास करते हुए उनका दिमागफेल तो नहीं हो रहा है।
राज्यसभा में कल हार किसकी हुई, यह समझने की जरूरत
30 दिसंबर 2011विशेष संपादकीय
सुनील कुमार
लोकपाल विधेयक को लेकर कल राज्यसभा में जो हुआ उसकी व्याख्या हो जाने के पहले से ही टीवी चैनलों पर शुरू हो गई थी और कुछ समाचार चैनलों में पहले से एक ऐसी साजिश की खबर दी थी कि यूपीए अपने पाले के किसी एक विपक्षी दल की मदद से सदन में ऐसा हंगामा करवाएगी जिससे कि उसे मतदान टालने का बहाना मिल जाए। राज्यसभा में जब यह विधेयक लोकसभा और राष्ट्रपति से होते हुए पहुंचा, तब भी यह बात जगजाहिर थी कि यूपीए के पास राज्यसभा में बहुमत तो है ही नहीं, गठबंधन के कुछ साथी इस विधेयक की कुछ बातों को लेकर खुलकर खिलाफ थे और उन संशोधनों के बिना वे साथ देने वाले नहीं थे। लेकिन लोकसभा के बाद विधेयक का राज्यसभा में जाना एक बहुत स्वाभाविक और नियमित संसदीय प्रक्रिया है और लोकसभा में भी इस विधेयक के पेश होने के पहले से न सिर्फ यूपीए को बल्कि गिनती जानने वाले हर भारतीय तक यह जानकारी थी कि कांग्रेस के पास लोकसभा में पूर्ण बहुमत नहीं है और राज्यसभा में वह अल्पमत में है। इसके बावजूद अन्ना की धमकी से डरी-सहमी यूपीए-मुखिया कांग्रेस पार्टी ने इस विधेयक को हड़बड़ी में तैयार किया और सरकार से संसद तक का रास्ता यूपीए मंत्रियों ने एक किस्म से घुटनों पर ही तय किया। उसका एक नतीजा यह था कि इस विधेयक से कोई संतुष्ट नहीं हो पाया और इसकी खामियां-कमजोरियां उजागर होती चली गईं। लेकिन कागजी खामियों से कहीं अधिक यह उजागर होते गया कि सरकार ने अन्ना हजारे के दबाव में, देश में बने हुए बागी तेवरों को देखते हुए ऐसी हड़बड़ी में यह विधेयक बनाया जो कि देश के लोकतंत्र के ढांचे के ही खिलाफ जाते दिख रहा है। राज्यसभा में कल रात मतदान हुआ या नहीं हुआ, यह बात इतनी महत्वपूर्ण नहीं है जितनी महत्वपूर्ण बातें कल वहां रामविलास पासवान, वामपंथी सीताराम येचुरी और जदयू के शिवानंद तिवारी वगैरह ने कहीं। लेकिन उन बातों पर भी हम अभी जाना नहीं चाहते, उनके बारे में पहले भी लिखा गया है और आगे फिर लिखा जाएगा। आज हम यह चर्चा करना चाहते हैं कि कल राज्यसभा में इस विधेयक पर मतदान न होना क्या बताता है।
जैसी कि जानकारी कल आधी रात तक आती रही, लोकसभा में सभी पार्टियों के सामने पेश इस विधेयक पर बहुत से संशोधन सामने आए जिनमें से करीब पौन दर्जन संशोधन सरकार ने मान भी लिए। इसके बाद वहां से कोई विधेयक जब संशोधनों पर राष्ट्रपति सहमति को लेकर राज्यसभा में आता है तो एक संसदीय-संवैधानिक समझ यह भी है कि पार्टियों ने लोकसभा में संशोधन पेश कर दिए हैं, और अब राज्यसभा में उतना अधिक काम नहीं बचा होगा। राज्यसभा में संशोधनों का एक और मतलब यह होता है कि विधेयक एक बार फिर लोकसभा में जाएगा और वहां पर राज्यसभा के किए हुए संशोधनों पर लोकसभा फिर से फैसला लेगी, और लोकसभा के उस ताजा फैसले पर राष्ट्रपति यह फैसला लेंगी कि लोकसभा को मान लिया जाए या फिर संसद का एक संयुक्त सत्र बुलाकर दोनों सदनों के सदस्यों को एक साथ मतदान का मौका दिया जाए।
ऐसे में कल जब राज्यसभा में पौने दो सौ से अधिक संशोधन पेश किए गए, और सरकार से यह उम्मीद की गई कि उन सब पर विचार करके, जिनको मानना है मानकर, जिनको न मानना है न मानकर रात के पहले मतदान करवा ले क्योंकि कल सत्र का आखिरी दिन था, तो यह उम्मीद हमारी साधारण संसदीय समझ से कुछ बाहर है। क्या देश में इतना बड़ा कोई कानून ऐसी हड़बड़ी में बनना चाहिए जिसमें 187 संशोधनों पर सदन की कार्रवाई के चलते-चलते सरकार बाहर विचार भी कर ले, और भीतर अपने फैसले की घोषणा भी कर दे? हम इस नौबत के मद्देनजर इस बात को कम महत्वपूर्ण मानते हैं कि सरकार के पास वहां पर कितने वोट थे और कितने नहीं थे। सरकार तो वहां अल्पमत में इस विधेयक के पहुंचने के पहले से थी, और है। इस अल्पमत में और कमी यही आ सकती थी कि तृणमूल कांग्रेस जैसे साथी मतदान में यूपीए का साथ नहीं देते, लेकिन इससे भी मतदान में तो सरकार की हालत में कोई फर्क नहीं पडऩा था। इसलिए हम मतदान को महत्वपूर्ण नहीं मानते और हम इस कानून को महत्वपूर्ण मानते हैं जिसे लेकर देश को पिछले कई महीनों से एक ऐसे उकसावे में रखा गया है कि मानो लोकपाल आज बनेगा और कल एक बंदूक लेकर देश के सारे भ्रष्ट लोगों को 'सिंघमÓ की तरह मार डालेगा। साठ बरस में जब लोकपाल नहीं बना था तो दो-चार महीने के बाद के सत्र तक और कौन सा कहर टूट पड़ रहा था? यह ठीक है कि आज कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार की साख गटर के नीचे पहुंची हुई है, लेकिन जब बात देश के भले के एक कानून की आती है तो हम इतने संशोधनों को एक दिन के भीतर देखकर, उन पर विचार करके सदन में आधी रात तक, या अगले दो-चार दिनों में भी (अगर सत्र बचा होता तो) विधेयक को मतदान के लिए पेश करने की उम्मीद को नाजायज मानते हैं।
भारत का इतिहास गवाह है कि महत्वपूर्ण कानून जब हड़बड़ी में बनते हैं तो उनमें संशोधन अगले ही सत्र से शुरू हो जाते हैं। जिन लोगों को आईपीसी (भारतीय दंड संहिता) के बनने की जानकारी है, वे बता सकते हैं कि डेढ़ सौ बरस पहले यह कानून बनाने में अंग्रेजों ने दस बरस का समय लिया था। यही वजह है कि अपनी कुछ बुराईयों के साथ ही सही, आईपीसी आज तक चली आ रही है। लोकपाल एक बहुत अलग धारणा है और इसमें लोकतंत्र की संवैधानिक संस्थाओं के अधिकारों और जिम्मेदारियों का एक बार फिर सीमांकन हो रहा है। इस देश में अगर कोई किसान अपनी जमीन को पटवारी से नपवाना चाहता है, तो भी व्यवस्था यह है कि बारिश के कीचड़ में वह नाप नहीं होता कि कोई चूक न हो जाए। ऐसे में संसद, सरकार, अदालत और दूसरी संवैधानिक संस्थाओं के बीच, जांच एजेंसियों के बीच, केन्द्र और राज्य के जटिल अंतरसंबंधों के बीच एक नए लोकपाल के ढांचे जब तय करना है तो उसके लिए इस तरह की हड़बड़ी कल दिखाई गई कि मानो एक जनवरी को लोकपाल का काम सम्हाल लेना जरूरी है। किसी बड़ी इमारत को डिजाइन करते हुए जितना वक्त तैयारी में लगाया जाता है, उतनी ही बचत बाद में तोडफ़ोड़ से बचकर होती है। और हम कुछ हफ्तों या कुछ महीनों के बाद के सत्र में इस लोकपाल विधेयक पर मतदान को बेहतर समझेंगे अगर तब तक सरकार उस पर बारीकी से गौर कर सकती है। विपक्ष की कल की हड़बड़ी एक बहुत छोटी सी राजनीतिक बात का मजा लेने की थी कि सरकार का विधेयक राज्यसभा में पास नहीं हो सकता। जब देश की बात है, और जब सत्तारूढ़ पार्टियों और विपक्षी पार्टियों, इन दोनों की सरकारों की लूटपाट देश भर में जगह-जगह दिख रही है, तो जनता की सेहत पर इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि किस सदन में कौन अपना बाहुबल साबित कर पाता है। बेहतर यही है कि कल तक सरकार जिस तरह अन्ना हजारे के दबाव में हड़बड़ी में गिरते-पड़ते यहां तक पहुंची है, अब वह विपक्ष के प्रोपेगंडा के दबाव की हड़बड़ी में गिरते-पड़ते कई और किस्म की गलतियां न करे।
हमें देश के कई बड़े-बड़े नामी-गिरामी टीवी प्रस्तुतकर्ताओं और पत्रकारों की नाटकीयता पर कल तरस आ रहा था कि अपने दो-चार घंटों के बुलेटिन को नाटकीय और सनसनीखेज बनाने के लिए वे इसे जीत और हार से जोड़ रहे थे, सदन में एक सोचे-समझे हंगामे से जोड़ रहे थे और इसे सरकार की बुरी तरह की हार मान रहे थे। यह सरकार कितनी अच्छी है और कितनी बुरी है इस पर हमारी सोच को हमारे पाठक यहां पर लगभग रोजाना पढ़ते हैं। लेकिन जब तक कोई सरकार सत्ता पर बने रहने का संवैधानिक हक खो नहीं देती तब तक हम उस सरकार को सरकार की तरह काम करते देने के हिमायती हैं। राज्यसभा में कल 187 संशोधनों को देखे-समझे बिना अगर सरकार उन्हें कुछ घंटों में मान लेती या खारिज कर देती तो इसे राज्यसभा के ऐसे सदस्य अपना अपमान मानते या न मानते, हम तो इसे देश की जनता का अपमान मानते हैं। सरकार सिर्फ किसी सदन के लिए जवाबदेह नहीं है, वह देश की जनता के लिए भी जवाबदेह है, और उसे इस काम को करने के लिए जितना वक्त चाहिए वह उसे लगाना चाहिए। भारत की संसदीय राजनीति एक ऐसी तंगदिली से गुजर रही है जहां पर सदन में लोगों की कही बातें कई बार अगले दिन के अखबार की सुर्खियों से अधिक मायने नहीं रखतीं। लोकतंत्र का इतिहास ऐसी बातों को बहुत औसत बातों की तरह दर्ज करता है और ये बातें दुनिया की किसी संसद में मिसाल की तरह इस्तेमाल नहीं होतीं, बल्कि इन खबरों वाले अखबार कुछ दिनों के भीतर फिर लुग्दी बन जाते हैं।
हम सरकार की किसी शिकस्त से कल की राज्यसभा को जोडऩे के बजाय हम विपक्ष को, जिसमें वामपंथी और रामपंथी दोनों शामिल थे, इस बात के लिए हारा हुआ मानेंगे कि उन्होंने अपने ही पेश किए संशोधनों की गंभीरता को खत्म कर दिया। अरूण जेटली से लेकर सीताराम येचुरी तक, किसकी कितनी मानवीय क्षमता है कि वे सदन के चलते-चलते इतने संशोधनों पर विचार करके उनके बारे में अपना पक्ष रखकर मतदान करवा लेते? सरकार की घेराबंदी करने के लिए देश के हितों को अलग रख देना ठीक नहीं है। सरकार को तो राज्यसभा में जीतना वैसे भी मुमकिन नहीं था, विपक्ष जरूर हमारे हिसाब से अपनी एक व्यापक जिम्मेदारी से हार गया और मानो गिनती गिनकर मजा लेते रहा।
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