आजकल
2 जनवरी 12सुनील कुमार
अन्ना हजारे और दिग्विजय सिंह के बारे में इंटरनेट पर छोटे-छोटे, एसएमएस जैसी लंबाई वाले ट्विटर पिछले महीनों में भरे रहे। अन्ना हजारे की तरफ से कबीर बेदी जैसे जाने-माने लोगों से लेकर उनके दसियों हजार समर्थक इस सबसे लोकप्रिय हो चुकी वेबसाइट पर भ्रष्टाचार के खिलाफ लिखते रहे और मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी, राहुल गांधी और उनकी तरफ से लगभग अकेले लड़ रहे दिग्विजय सिंह के खिलाफ रात-दिन तरह-तरह के नारे गढ़े जाते रहे। दूसरी तरफ दिग्विजय सिंह अन्ना हजारे के अभियान पर जो लिखते रहे, वे उत्तरप्रदेश के चुनाव और राहुल गांधी की ट्रेनिंग से बचे हुए समय में लिखी बातें रहीं, कांग्रेस की तरफ से उसके कोई हमदर्द विरोधियों पर हमला करने वाले यहां नहीं दिखे। अन्ना हजारे के मुद्दों से सहमत कुछ नामी-गिरामी पत्रकार निखिल वागले चौबीसों घंटे ट्विटर पर उनके पक्ष में लिखते रहे और इस हद तक लिखते रहे कि वे मुझ जैसे लोगों को अभियान का एक हिस्सा लगे, और दोस्ताना हमलों में मैंने बार-बार निखिल को यह लिखा भी कि वे अन्ना हजारे का साथ देते हुए लोकतंत्र के खिलाफ चले जा रहे हैं।
ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में अभी कुछ शोधकर्ताओं ने ट्विटर पर जन आंदोलनों को चलाने पर काम किया है। स्पेन में मई के महीने में हुए एक बड़े आंदोलन को ट्विटर से बढ़ावा देने के लिए किस तरह एक छोटा सा समर्पित समूह एक रणनीति के साथ लगे रहा और उसने कैसे धीरे-धीरे इस आंदोलन के बीज दूसरे लोगों में बोए, कैसे समर्थन जुटाया इस पर यह पूरी रिसर्च हुई है। इसी तरह पिछले कुछ महीनों में अरब दुनिया में कई देशों में क्रांतिकारी घटनाएं हुईं, सत्ता पलटी गई, और इस दौरान भी इंटरनेट के ट्विटर जैसे माध्यम में सड़कों से परे एक ऐसा बड़ा आंदोलन चला जिसकी वजह से लाखों लोग सड़कों पर जुटे। तीसरी बड़ी घटना अमरीका में वहां के वित्तीय संस्थानों और वॉलस्ट्रीट नाम के वहां के शेयर बाजार के खिलाफ जनता का एक प्रतीकात्मक आंदोलन रहा। आकुपाई वॉलस्ट्रीट नाम से शुरू हुआ यह आंदोलन बाद में अमरीका के दूसरे शहरों में भी उन शहरों पर कब्जा करने के प्रतीक के रूप में फैला और वहां के जनमत को उसने इस बात के लिए झकझोरा कि कुछ गिनी-चुनी वित्तीय संस्थाएं किस तरह पूरी दुनिया की जिंदगी को कब्जा कर चुकी हैं।
अन्ना हजारे के उठाए हुए जनलोकपाल के मुद्दे को देश के बाहर बसे हुए हिन्दुस्तानियों के एक तबके ने इतना बढ़ावा दिया कि अमरीका के कैलिफोर्निया में जब वहां के भारतीय समुदाय के लोगों ने दांडीमार्च-2 का आयोजन किया तो उसमें शामिल होने के लिए हिन्दुस्तान से अमरीका जाकर करीब 20 दिन मैंने भी लगाए। उस वक्त मुझे जनलोकपाल आंदोलन और अन्ना हजारे की इस बारे में सोच की जानकारी कम थी। लेकिन वहां पन्द्रह दिनों तक रोजाना 18-19 मील पैदल चलते हुए भारतीय समुदाय के लोगों से मिलते हुए, उन्हें यह सुझाते हुए कि किस तरह वे भारत में अपने निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को भ्रष्टाचार के खिलाफ लिखें और किस तरह अपनी पहचान के लोगों को भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में शामिल होने के लिए लिखें। लिखने का यह पूरा सिलसिला अब सिर्फ इंटरनेट पर ही रह गया है और तब से लेकर अब तक दांडीमार्च-2 के हमारे साथ लगातार भारत में भी इस आंदोलन को वहां बैठे हुए बढ़ावा दे रहे हैं।
ब्रिटेन में अभी हुए इस रिसर्च के पहले भी, मैंने कुछ मौकों पर यह लिखा है कि इन दिनों लगातार फिल्मों के लोग, टेलीविजन के लोग और अखबारों के भी लोग किस तरह लगातार अपने काम को ट्विटर और फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों के मार्फत बढ़ावा देते चल रहे हैं। किसी अखबार में एक स्तंभकार के कॉलम को हो सकता है कि लाख लोग पढ़ते हों, लेकिन जब ऐसे स्तंभकार ट्विटर पर करोड़ों लोगों तक अपने कॉलम के बारे में सूचना पहुंचाते हैं, और उस कॉलम तक पहुंचने का ऐसा हॉटलिंक साथ में देते हैं जिससे कि एक क्लिक करते ही लोग उनके पेज तक पहुंच सकें, तो वे अपनी पहुंच को सैकड़ों गुना बढ़ा लेते हैं। भारत के समाचार टीवी चैनलों के कुछ जाने-माने चेहरों के ट्विटर पर पांच-पांच लाख फॉलोअर हैं, और जब ऐसे टीवी प्रस्तुतकर्ता एक लाइन ट्विटर पर डालते हैं तो उन पांच लाख लोगों तक तो वह लाइन सीधे ही पहुंच जाती है, उनमें से जिन लोगों के और दूसरे फॉलोअर हैं, उन तक भी वह बात पहुंच जाती है। मतलब यह कि पांच लाख से कई गुना अधिक लोग उस सूचना को पल भर में देख लेते हैं।
अमिताभ बच्चन से लेकर दूसरे बहुत से लोगों तक, हर किसी को अब यह जरूरी हो गया है कि अगर उन्हें प्रचार चाहिए तो वे टीवी और अखबारों से परे भी इस तरह लगे रहें, और अब अपने-अपने मोबाइल फोन से जब लोग ट्विटर पर पल-पल कुछ डाल सकते हैं, तो यह प्रचार बहुत मायने रखता है। अब दक्षिण भारत के किसी शहर में अगर किसी मरीज को खून की जरूरत है तो उसकी मांग लोग ट्विटर पर डालते हैं, उसके आखिर में आरटी (रीट्वीट) की अपील करते हैं और खून की यह जरूरत ट्विटर पर दुनिया के अलग-अलग कोनों से अलग-अलग लोग अपने सारे फॉलोवरों को पल भर में भेज देते हैं और बिखरे हुए पेट्रोल की आग की तरह कोई भी बात चारों तरफ फैल जाती है।एक वक्त था जब टीवी समाचार चैनल अपनी खबरों के बीच नीचे एक पट्टी पर ब्रेकिंग न्यूज दिखाते थे। अब कोई भी खबर पहली बार किसी चैनल पर नहीं आती, वह अमूमन हर बार ट्विटर पर पहले आती है क्योंकि किसी भी संवाददाता के पहले उस घटना के गवाह, उस घटना के भागीदार लोग ही ट्वीट कर देते हैं। किसी हादसे के शिकार लोग पुलिस और एम्बुलेंस आने के पहले भी घटना और अपने बारे में इंटरनेट पर डालना शुरू कर देते हैं और सूचना इतनी तेजी से देने का काम कोई समाचार माध्यम कैसे कर सकता है?
दूसरी बात यह कि बड़े-बड़े नामी-गिरामी लोग ट्विटर पर जो लिखते हैं, उस पर पल भर के भीतर लोगों की लिखी बातें भी आने लगती हैं और बात शुरू करने वाले ऐसे नामी-गिरामी लोग सीधे-सीधे अपने चाहने वालों से, या नफरत करने वालों से रूबरू हो जाते हैं। देश के बड़े-बड़े अर्थशास्त्री, नामी-गिरामी इतिहासकार, दुनिया के आज के वक्त के बड़े-बड़े दार्शनिक और विचारक, बड़े-बड़े लेखक और कलाकार, खिलाड़ी और पत्रकार अपनी लिखी बातों पर जब पूरी दुनिया के लोगों की प्रतिक्रिया सीधे-सीधे पाने लगते हैं, उनमें से कुछ बातों का जवाब देकर वे जवाब में और भी कुछ पाने लगते हैं, तो लोगों की नब्ज टटोलने का इससे अधिक कारगर और कौन सा तरीका हो सकता है?
लेकिन मैंने पिछले कुछ महीनों में ट्विटर जैसे धारदार, असरदार औजार पर जितना देखा है, मुझे लगता है कि भारत की सरकारें अब तक इसकी ताकत का अंदाज नहीं लगा पाई हैं। दो-चार मुख्यमंत्री इस पर दिखते हैं और उनमें जम्मू कश्मीर के नौजवान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला खुलकर अपनी बात कहते हैं, लोगों से बहस में उलझते हैं, लेकिन वे अपनी, पार्टी और सरकार की सोच को असरदार तरीके से तकरीबन रोजाना लोगों के सामने रख देते हैं। केन्द्र सरकार के दो-चार मंत्री हैं जो कि अपनी बातों को यहां पर कहते हैं। कांग्रेस पार्टी की तरफ से दिग्विजय सिंह अकेले ही यहां सक्रिय दिखते हैं और कई बार मुझे ऐसा लगता है कि जिन मुद्दों पर कांग्रेस सही रहती है, और वैसे मौकों पर उसकी हिमायत में जो तर्क हम लिखते हैं, वैसे तर्कों को भी कांग्रेस की तरफ से ट्विटर पर लिखने वाले कोई नहीं रहते। दूसरी तरफ भाजपा के नेताओं और उनके समर्थकों की भीड़ इंटरनेट पर दिखती है और सुषमा स्वराज जैसे नेता पल-पल यह बताते रहते हैं कि वे कितने मिनट के भीतर संसद में किस मुद्दे पर भाषण देने वाले हैं, या भंडारा की आमसभा की मंच से सुषमा यह ट्वीट करते रहती हैं कि किस तरह वे रमन सिंह और नितिन गडकरी के साथ शक्कर कारखाने के कार्यक्रम में हैं और ये दोनों नेता क्या कह रहे हैं।
बाजार प्रचार का कोई भी मौका नहीं चूकता। इसलिए लाखों-करोड़ों नामों से बाजार अलग-अलग सामानों और सेवाओं को ढंके-छुपे अंदाज में लोगों तक ट्वीट करते रहता है और इनसे बचकर रहना एक बड़ी चुनौती रहती है ताकि लोग सिर्फ अपनी पसंद की बातों को वहां पढ़ सकें। इसी तरह धार्मिक, आध्यात्मिक और तरह-तरह की नफरत वाली बातें भी सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों से दुनिया के एक तबके तक लगातार पहुंच रही हैं और इस टेक्नालॉजी की सुविधा के चलते ऐसी बातें समर्थकों से आगे हजार-हजार गुना बढ़ती भी जा रही हैं।
भारत की सरकार, यहां के राज्यों की सरकारें, केन्द्र और राज्य के बहुत से सार्वजनिक प्रतिष्ठान, संवैधानिक संस्थाएं मुफ्त में हासिल ऐसी वेबसाइटों का इस्तेमाल करते नहीं दिख रहीं जबकि कम्प्यूटर-इंटरनेट या मोबाइल-इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले तमाम लोगों तक पहुंचने के लिए यह एक बहुत कारगर तरीका हो सकता है। सरकारी प्रचार के परंपरागत तरीके पत्र-पत्रिकाओं और रेडियो-टीवी के लायक तो हैं, लेकिन सामाजिक अंतरजाल को खड़ा करने और उसके माध्यम से अपनी बात को एक बढ़ते चल रहे तबके तक पहुंचाने का काम अभी नहीं दिख रहा है। एक तरफ तो केन्द्र सरकार के पास सैम पित्रोदा से लेकर नंदन निलेकेणी तक बहुत से ऐसे जानकार लोग हैं जो कि अपनी तकनीकी खूबियों के चलते ही सरकार तक पहुंचे हैं। और फिर आज तो सोशल नेटवर्किंग की क्षमता को दुहने का काम तो बहुत कम जानकार, बेरोजगार नौजवान भी करते दिखते हैं।
पूरी दुनिया में आंदोलनों के लिए कहीं औजार और कहीं हथियार की तरह इस्तेमाल होने वाली सोशल नेटवर्किंग की क्षमता का जनहित में इस्तेमाल सरकारों, स्थानीय संस्थाओं और जनकल्याणकारी संगठनों को सोचना चाहिए।
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