02 जनवरी 2012
संपादकीय
ब्रिटेन में एक भारतीय छात्र की हत्या के बाद वहां की पुलिस ने इसे एक नस्लीय हत्या मान लिया है। इसके बाद कल कनाडा में एक भारतीय छात्र की गोली मारकर हत्या कर दी गई। पिछले एक-डेढ़ बरस में आस्ट्रेलिया में बहुत से भारतीय लोगों पर हमले हुए हैं जिन्हें कुछ लोग नस्ल की वजह से हुए हमले मानते हैं और कुछ लोग यह भी मानते हैं कि इसके पीछे दूसरे किस्म के तनाव हैं या फिर ये सीधे-सीधे अपराध की घटनाएं हैं।
भारत के लोग आज जिस तरह दुनिया के बहुत से देशों में जाकर पढ़ रहे हैं, काम कर रहे हैं और बसे हुए हैं, उन सबको देखते हुए यह जाहिर है कि वहां के समाज के भीतर भारत के लोगों को लेकर अच्छी और बुरी कई तरह की बातें हो रही होंगी। इसके पीछे धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक फर्क की वजहें तो ही सकती हैं, बहुत से ऐसे मामले हैं जिनमें आर्थिक कारणों से स्थानीय लोग बाहरी लोगों का विरोध करते हैं। ऐसे तनाव देखने के लिए हमको दूर जाने की जरूरत नहीं है, भारत के भीतर ही कभी मुंबई में उत्तर भारतीयों का विरोध होता है तो कभी असम में बड़ी संख्या में हिन्दी भाषी लोग मार डाले जाते हैं। छत्तीसगढ़ में ही बिहार से आए मजदूरों को लेकर कभी विरोध होता है तो कभी उड़ीसा में मारवाड़ी भगाओ आंदोलन चला था। जब स्थानीय लोग काम नहीं पाते और बाहर से आए हुए लोग अधिक मेहनत से काम करते हैं क्योंकि वे बाहर से आए हुए होते हैं और उनका परिवार, समाज उस दूसरी जगह पर बड़ा सीमित होता है, वे अपनी घरेलू जिंदगी की चुनौतियों के साथ नई जगह पर अधिक घंटे, अधिक कड़ा काम करने को तैयार रहते हैं इसलिए वे स्थानीय लोगों के बीच कुछ तनाव की वजह भी बनते हैं।
इन तमाम विकसित देशों के लोगों से बात करें तो यह समझ आता है कि भारत या एशिया के इस हिस्से से गए हुए कामकाजी लोग वहां पर स्थानीय तौर-तरीकों के खिलाफ जाकर बहुत अधिक घंटे काम कर लेते हैं और पाई-पाई को बचाकर रखने की कोशिश करते हैं ताकि उसे घर भेज सकें। ये चूंकि कम मजदूरी पर, कम तनख्वाह पर काम करने को राजी हो जाते हैं इसलिए वे उन विकसित देशों के लोगों के रोजगार के मौकों को कम भी करते हैं। और ऐसा सिर्फ वहां पूरे वक्त काम करने वाले लोगों के साथ नहीं होता, वहां पर पढऩे के लिए गए हुए बच्चे दिन के कुछ घंटे काम करके अपना खर्च निकालते हैं, और इसमें भी वे उनके लिए बांधी गई सीमा से अधिक काम करने लगते हैं, सस्ते में काम करने लगते हैं और उन देशों के स्थानीय बच्चों के लिए एक अनचाहा तनाव भी खड़ा कर बैठते हैं। इसके अलावा कुछ स्थानीय बेरोजगार ऐसे रहते हैं जो खुद मेहनत करना नहीं चाहते लेकिन बाहर के लोगों को मेहनत से आगे बढ़ते देखकर जो बौखलाए रहते हैं। ऐसे निठल्ले लोग हमको छत्तीसगढ़ में भी दिखते हैं जो अपने आपको बेहतर बनाने के बजाए बाहरी लोगों को गालियां देते हुए खाली बैठे रहते हैं। इंसानी मिजाज सभी जगहों पर कमोबेश एक सा होता है इसलिए कई देशों में जब भारतीय लोगों के खिलाफ कोई तनाव होता है तो उसके पीछे ऐसे आर्थिक कारण भी हो सकते हैं जो कि नस्ल के बजाय रोजगार से जुड़े हुए अधिक होते हैं।
और जहां तक नस्ल के आधार पर हमलों की बात है तो भारत के भीतर ही दलितों और आदिवासियों को अपनी जाति की वजह से कितने किस्म की सामाजिक प्रताडऩा, सामाजिक भेदभाव और हिंसक हमले नहीं झेलने पड़ते? यह तो रोजाना की बात है जब देश में कहीं न कहीं जाति या धर्म के आधार पर हमले होते हों। इसलिए यह मान लेना कि अधिक पढ़े-लिखे या अधिक विकसित देश नफरत से आजाद हो गए हों, यह व्यावहारिक बात नहीं होगी। ऐसे तमाम हमलों को इस बात के साथ जोड़कर देखना चाहिए कि वहां पर भारत से गए हुए कितने लोग बसे हैं, वे कितनी आजादी के साथ वहां बराबरी के मौके पाते हैं, आगे बढ़ते हैं, कमाते हैं, बस जाते हैं और अपनी तरक्की का फायदा देश को भी वापिस भेजते हैं। ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया और कनाडा, इन तमाम जगहों पर हिन्दुस्तान के लोग दसियों लाख बसे हुए हैं। इसलिए उनमें से किसी न किसी के साथ कभी न कभी ऐसे तनाव हो जाते होंगे जो कि नस्ल पर भी कभी-कभी आधारित होते हों। हिन्दुस्तान में क्या कोई ऐसा एक भी हफ्ता गुजरता है जब किसी न किसी विदेशी पर्यटक पर हमला न होता हो या उससे बलात्कार न होता हो? इसलिए ऐसी बातों को एक अनुपात में ही, संतुलित नजरिए से ही देखना चाहिए और इन्हें नस्लीय नफरत बढऩे के किसी सुबूत की तरह देखना गलत होगा।

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