रत्न और कंकड़

01 जनवरी 2012
संपादकीय

नए साल में लोगों को अपनी सामाजिक जिम्मेदारी की अधिक समझ पैदा हो यह शुभकामना हम सबको देना चाहते हैं। आज दूसरा कोई बहुत बड़ा मुद्दा इस जगह लिखने को नहीं है इसलिए कुछ हफ्ते पहले प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष जस्टिस काटजू के कहे एक बयान पर हम चर्चा करना चाहते हैं कि फिल्मी सितारों और क्रिकेट खिलाडिय़ों को भारत रत्न देने के बजाय गालिब सरीखे महान शायर को भारत रत्न देना बेहतर होगा। उनके इस बयान के कई महीने पहले हमने अमिताभ बच्चन और सचिन तेंदुलकर जैसे लोगों को भारत रत्न देने की मांग का विरोध इसी जगह इसी संपादकीय कॉलम में किया था और हमारा यह तर्क था कि अपने पेशे से अरबपति बने हुए इन लोगों का समाज के लिए इतना कम योगदान है कि इन्हें भारत रत्न देने का कोई औचित्य नहीं है। इन्हें अपने अभिनव और अपने खेल से इतना कुछ मिल चुका है कि उस दौलत और शोहरत के बाद वे और किसी अतिरिक्त सम्मान के हकदार नहीं है। अमिताभ बच्चन के बारे में लंबे समय से हमारी यह शिकायत रही है कि अपने ससुराल-गांव भोपाल की गैस त्रासदी के बारे में कभी उनका मुंह नहीं खुला और न ही उन्होंने वहां के तकलीफजदा मरते हुए लोगों के लिए कुछ किया। दरअसल बच्चन परिवार में कारखानों की चिमनियों की तरह हर सदस्य टकसाल सा कमाता है लेकिन समाज के जरूरतमंद लोगों के लिए एक धेला कभी देते हुए उन्हें नहीं देखा गया, सिर्फ मंदिरों में कभी-कभार का चढ़ावा तस्वीरों में आता है। मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्री रहते हुए अमिताभ बच्चन ने उत्तरप्रदेश में अपनी बहू ऐश्वर्या राय बच्चन के नाम पर एक कॉलेज खोलने की घोषणा की थी, लेकिन मुलायम राज जाने के बाद वह घोषणा भी खत्म हो गई। हमारे लिए यह भी एक अजीब बात थी कि अपने स्वर्गीय माता-पिता के नाम पर स्कूल-कॉलेज का नाम रखने की भारतीय परंपरा से परे जाकर अमिताभ बच्चन ने जाने क्या सोचकर अपनी बहू के नाम पर इस कॉलेज की घोषणा की थी। लेकिन अजीब होने के अलावा इस बात में गलत कुछ नहीं था, और यह उनकी अपनी मर्जी थी कि वे नाम किसके नाम पर रखें, लेकिन समाज सेवा का वह एक काम भी नहीं हुआ। दूसरी तरफ हमने सचिन तेंदुलकर की कई बार इस बात को लेकर आलोचना की थी कि जब उन्हें विदेश में कई करोड़ रूपए की एक लक्जरी कार तोहफे में मिली तो उन्होंने भारत सरकार से इसके आयात शुल्क में लगने वाले कुछ करोड़ रूपए की माफी मांगी थी। इसके पहले भी सचिन अरबपति हो चुके थे। 
अखबारों में आए दिन खबरें छपती हैं कि यह देश किस कदर गरीब है, गरीबी के रेखा के नीचे 70 फीसदी आबादी होने का अंदाज भारत सरकार के एक रिपोर्ट में आ चुका है। अर्जुन सेन गुप्ता की ऐसी रिपोर्ट को स्वर्गीय अदम गोंडवी की एक गजल से जोड़कर भी देखा जाता है कि सौ में सत्तर आदमी जब मुल्क में नाशाद हैं, दिल पे रखकर हाथ कहिए मुल्क क्या आजाद है...। ऐसे देश में एक अरबपति खिलाड़ी जब कुछ करोड़ की रियायती ऐसी सरकार से मांगता है जो अपनी तीन चौथाई जनता को भूख से आजादी भी नहीं दिला पा रही है, तो वह कम से कम हमें तो इस देश का ऐसा रत्न नहीं दिखाई पड़ता जिसे कि देश का सबसे बड़ा सम्मान दिया जाए। इस मुद्दे पर लिखने की जरूरत इसलिए है कि चार दिन पहले ही यह खबर आई है कि सचिन तेंदुलकर ने मुंबई के अपने नए मकान का सौ करोड़ का बीमा करवाया है। जिसका घर सौ करोड़ का हो, बाकी जायदाद और पूंजी निवेश अलग हों, और कमाई अभी जारी ही हो, वह सरकार से टैक्स की छूट मांगे! और ऐसे देश में वह उस आयात शुल्क से छूट मांगे जिस छूट के बिना दवाईयां और कई तरह के इलाज के सामान इतने महंगे हो जाते हैं कि गरीब उन्हें खरीद पाने के बजाय मौत को खरीदने को बेबस होते हैं, ऐसे देश में करोड़ों के तोहफे पर करोड़ों की छूट पाने की सोच क्या इस देश का रत्न है? कोई व्यक्ति अपने पेशे में बहुत कामयाब और शायद बहुत महान हो सकता है। लेकिन हम कामयाबी के दाने-दाने को भुना लेने वाले और देश की जरूरतों को पूरी तरह से भुला देना वालों को किसी तरह के रत्न में नहीं गिनते। एक बार फिर जस्टिस काटजू के बयान के बाद रत्नों की चर्चा होने लगी है, सिनेमा और टीवी के पर्दे पर, खेल के मैदान में और इश्तहारों के बाजार में जो रत्न हैं, उनका वहीं कारोबारी सम्मान हो रहा है। हमारे हिसाब से देश के जरूरतमंदों के लिए योगदान के मामले में ये दोनों लोग और इस तरह के और लोग कंकड़ हैं। 

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