यह टाइमपास नहीं, दिमागफेल


31 दिसंबर 2011
संपादकीय

एक साल पूरा होने और दूसरा साल शुरू होने का मौका यूं तो जश्न से परे के लोगों के लिए किसी भी एक दूसरे दिन की तरह का होता है, लेकिन चूंकि कैलेंडर बदलता है, इस मौके पर लोग बहुत सी बातों तय करते हैं। कुछ अपने मन में और कुछ दूसरे लोगों के बीच, कि इस नए साल में कौन-कौन सी बातें नहीं करेंगे और कौन-कौन सी बातें करेंगे। ऐसे में कुछ लोग हमसे भी पूछते हैं कि नए साल के लिए हमारी क्या राय है।
पिछले एक बरस में भारत में एक बड़ी चीज यह देखी कि  खबरों का सैलाब किस तरह लोगों को बहाकर ले जाता है और किसी ऐसी जगह खड़ा कर देता है जिस मंजिल के बारे में, जहां तक पहुंचने की राह के बारे में उन्होंने पहले कभी सोचा भी न रहा हो। समाचारों और विचारों की आज की बाजार व्यवस्था अपने कारोबार से और अधिक किसी की आगे ले जाने के लिए फिक्रमंद नहीं होती। कहने को तो मीडिया न्यूज और व्यूव्ज, खबर और खयाल, से जुड़ा हुआ कारोबार है लेकिन सच और टीआरपी (टीवी की दर्शक संख्या का पैमाना) के बीच जब पसंद की बात आती है तो भारत के अधिकांश टीवी समाचार चैनलों की असली पसंद के बारे में कोई शुबहा नहीं रह जाता। इसी तरह अखबारों का जो गलाकाट मुकाबला चलता है, उसमें सतह पर तैरती सनसनीखेज जानकारी उसी तरह काम की मानी जाती है जिस तरह किसी कोल्ड ड्रिंक की बोतल में भरे हुए बुलबुलों की सनसनी को जरूरी माना जाता है। लेकिन यह तो एक आजाद और उदार अर्थव्यवस्था के भीतर का खुला कारोबार है जिसे किसी भी तरह का कोई मिशन या लोकतंत्र का पाया मानना फिजूल की बात है और हम न इस कारोबार के लिए किसी अतिरिक्त सम्मान को ठीक समझते हैं और न ही इस कारोबार से आदर्शों की किसी अतिरिक्त उम्मीद को जोडऩा ठीक समझते हैं।
तो जब मीडिया को हम समाचारों और विचारों के कारोबार से अधिक जिम्मेदार नहीं मानते तो फिर यह पढऩे, देखने और सुनने वालों की जिम्मेदारी बन जाती है कि वे कैसे बेहतर खबरें पाएं, छांटें और पढ़ें। कैसे बेहतर खबरों को देखें। यह चर्चा जरूरी इसलिए है कि 2011 को भारत में लोगों की भावनाओं को भड़काने वाले साल की तरह भुगता है और इस कदर भुगता है कि शहरी, संपन्न, शिक्षित और मोटे तौर पर सतही समझ के शिकार तबके की लोकतंत्र पर से आस्था हट सी गई थी। मजे की बात यह थी कि यह सब लोकतंत्र के नाम पर ही हो रहा था। नए बरस में अगर हम कोई एक उम्मीद लोगों से करेंगे, तो वह यह है कि लोग अच्छे और बुरे को पढऩे और देखने-सुनने का फर्क ध्यान से करें। जिंदगी में काम और आराम के घंटों के बाद बचे वक्त में से अधिकतर लोग एक चौथाई वक्त अखबार और टीवी पर लगा देते हैं। न तो आराम पर लोगों का बस रहता, न काम के घंटों पर रहता, और बचे हुए वक्त का इस्तेमाल अगर बहुत सोच-समझकर बहुत समझदारी के अखबारों, खबरों और विचारों, टीवी के जिम्मेदार समाचार बुलेटिनों पर नहीं लगाया गया तो अगला हर दिन लोगों को जिम्मेदारी और समझदारी, सच और सरोकार की बातों से परे ले जाएगा और यह लोकतंत्र प्रोपेगंडा के असर में दबा-कुचला रह जाएगा।
इस एक बात के साथ-साथ जुड़ी हुई दूसरी बात यह है कि भारतीय समाज का सबसे मुखर तबका, जो मीडिया में जगह पाता है, और जिसके लिए मीडिया काम करता है, वह देश के बहुत से जरूरी पहलुओं से, असर मुद्दों से और दुनिया की बहुत सी जरूरी बातों से अनछुआ रह जाता है। मिसाल के लिए लोग टीवी के बाकी समाचार चैनल छोड़कर कुछ दिनों के लिए दूरदर्शन और लोकसभा चैनल-राज्यसभा चैनल को देखें तो उन्हें यह पता लगेगा कि टीआरपी की लड़ाई में रात-दिन अपने बखान करने वाले चैनलों की सनसनी भारत के एक बहुत छोटे हिस्से को ही दिखाती है। सरकार के इन चैनलों से भारत की असल जिंदगी से जुड़े हुए बहुत से ऐसे मुद्दों पर खबरें रात-दिन मिलती हैं कि जिनके साथ-साथ सत्ता के पसंदीदा एक-दो नेताओं का कुछ अधिक कवरेज देख लेना कोई नुकसान की बात नहीं होती। हम मीडिया के सामाजिक योगदान को बाजारू-कारोबारी मुकाबले के चलते बहुत बुरी तरह पिछड़ते देख चुके हैं, और यही वजह है कि प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया के मुखिया जस्टिस काटजू को बहुत सी ऐसी कड़वी बातें कहनी पड़ीं जिन्होंने मीडिया के बादशाहों को बौखलाकर रख दिया है। तो देश और दुनिया की जरूरी बातों को, अहमियत वाली बातों को पाठक और दर्शक कहां पर पाएंगे, यह समझ और इसकी जरूरत आने वाले इस बरस में लोगों में बढ़े तो ही देश और दुनिया का एक बड़ा फायदा हो सकता है, या एक बड़ा नुकसान थम सकता है।
जो लोग यह समझते हैं कि अखबार और टीवी के न्यूज चैनल टाइमपास का सामान हैं, वे यह भी समझ लें कि ऐसी समझ पैदा करके एक कारोबार तो पास हो गया है लेकिन मीडिया-कारोबार का ग्राहक फेल हो गया है और उसके साथ-साथ समाज और लोकतंत्र भी फेल हो रहे हैं। बाजार में कुछ चुनिंदा कारोबार जैसे-जैसे आगे बढ़ते हैं वे सोची-समझी साजिश के तहत अपने ग्राहक के दिमाग को छोटा और जेब को बड़ा करने की तरकीबें रात-दिन निकालते रहते हैं और लोगों पर आजमाते भी रहते हैं। उपभोक्तावाद अब सिर्फ वॉलमार्ट से नहीं बढ़ता, मीडिया उसके लिए सबसे बड़ा उपजाऊ खेत हो गया है। लोगों को यह सावधानी रखनी होगी कि टाइमपास करते हुए उनका दिमागफेल तो नहीं हो रहा है।

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