राज्यसभा में कल हार किसकी हुई, यह समझने की जरूरत


30 दिसंबर 2011
विशेष संपादकीय
सुनील कुमार

लोकपाल विधेयक को लेकर कल राज्यसभा में जो हुआ उसकी व्याख्या हो जाने के पहले से ही टीवी चैनलों पर शुरू हो गई थी और कुछ समाचार चैनलों में पहले से एक ऐसी साजिश की खबर दी थी कि यूपीए अपने पाले के किसी एक विपक्षी दल की मदद से सदन में ऐसा हंगामा करवाएगी जिससे कि उसे मतदान टालने का बहाना मिल जाए। राज्यसभा में जब यह विधेयक लोकसभा और राष्ट्रपति से होते हुए पहुंचा, तब भी यह बात जगजाहिर थी कि यूपीए के पास राज्यसभा में बहुमत तो है ही नहीं, गठबंधन के कुछ साथी इस विधेयक की कुछ बातों को लेकर खुलकर खिलाफ थे और उन संशोधनों के बिना वे साथ देने वाले नहीं थे। लेकिन लोकसभा के बाद विधेयक का राज्यसभा में जाना एक बहुत स्वाभाविक और नियमित संसदीय प्रक्रिया है और लोकसभा में भी इस विधेयक के पेश होने के पहले से न सिर्फ यूपीए को बल्कि गिनती जानने वाले हर भारतीय तक यह जानकारी थी कि कांग्रेस के पास लोकसभा में पूर्ण बहुमत नहीं है और राज्यसभा में वह अल्पमत में है। इसके बावजूद अन्ना की धमकी से डरी-सहमी यूपीए-मुखिया कांग्रेस पार्टी ने इस विधेयक को हड़बड़ी में तैयार किया और सरकार से संसद तक का रास्ता यूपीए मंत्रियों ने एक किस्म से घुटनों पर ही तय किया। उसका एक नतीजा यह था कि इस विधेयक से कोई संतुष्ट नहीं हो पाया और इसकी खामियां-कमजोरियां उजागर होती चली गईं। लेकिन कागजी खामियों से कहीं अधिक यह उजागर होते गया कि सरकार ने अन्ना हजारे के दबाव में, देश में बने हुए बागी तेवरों को देखते हुए ऐसी हड़बड़ी में यह विधेयक बनाया जो कि देश के लोकतंत्र के ढांचे के ही खिलाफ जाते दिख रहा है। राज्यसभा में कल रात मतदान हुआ या नहीं हुआ, यह बात इतनी महत्वपूर्ण नहीं है जितनी महत्वपूर्ण बातें कल वहां रामविलास पासवान, वामपंथी सीताराम येचुरी और जदयू के शिवानंद तिवारी वगैरह ने कहीं। लेकिन उन बातों पर भी हम अभी जाना नहीं चाहते, उनके बारे में पहले भी लिखा गया है और आगे फिर लिखा जाएगा। आज हम यह चर्चा करना चाहते हैं कि कल राज्यसभा में इस विधेयक पर मतदान न होना क्या बताता है।
जैसी कि जानकारी कल आधी रात तक आती रही, लोकसभा में सभी पार्टियों के सामने पेश इस विधेयक पर बहुत से संशोधन सामने आए जिनमें से करीब पौन दर्जन संशोधन सरकार ने मान भी लिए। इसके बाद वहां से कोई विधेयक जब संशोधनों पर राष्ट्रपति सहमति को लेकर राज्यसभा में आता है तो एक संसदीय-संवैधानिक समझ  यह भी है कि पार्टियों ने लोकसभा में संशोधन पेश कर दिए हैं, और अब राज्यसभा में उतना अधिक काम नहीं बचा होगा। राज्यसभा में संशोधनों का एक और मतलब यह होता है कि विधेयक एक बार फिर लोकसभा में जाएगा और वहां पर राज्यसभा के किए हुए संशोधनों पर लोकसभा फिर से फैसला लेगी, और लोकसभा के उस ताजा फैसले पर राष्ट्रपति यह फैसला लेंगी कि लोकसभा को मान लिया जाए या फिर संसद का एक संयुक्त सत्र बुलाकर दोनों सदनों के सदस्यों को एक साथ मतदान का मौका दिया जाए।
ऐसे में कल जब राज्यसभा में पौने दो सौ से अधिक संशोधन पेश किए गए, और सरकार से यह उम्मीद की गई कि उन सब पर विचार करके, जिनको मानना है मानकर, जिनको न मानना है न मानकर रात के पहले मतदान करवा ले क्योंकि कल सत्र का आखिरी दिन था, तो यह उम्मीद हमारी साधारण संसदीय समझ से कुछ बाहर है। क्या देश में इतना बड़ा कोई कानून ऐसी हड़बड़ी में बनना चाहिए जिसमें 187 संशोधनों पर सदन की कार्रवाई के चलते-चलते सरकार बाहर विचार भी कर ले, और भीतर अपने फैसले की घोषणा भी कर दे? हम इस नौबत के मद्देनजर इस बात को कम महत्वपूर्ण मानते हैं कि सरकार के पास वहां पर कितने वोट थे और कितने नहीं थे। सरकार तो वहां अल्पमत में इस विधेयक के पहुंचने के पहले से थी, और है। इस अल्पमत में और कमी यही आ सकती थी कि तृणमूल कांग्रेस जैसे साथी मतदान में यूपीए का साथ नहीं देते, लेकिन इससे भी मतदान में तो सरकार की हालत में कोई फर्क नहीं पडऩा था। इसलिए हम मतदान को महत्वपूर्ण नहीं मानते और हम इस कानून को महत्वपूर्ण मानते हैं जिसे लेकर देश को पिछले कई महीनों से एक ऐसे उकसावे में रखा गया है कि मानो लोकपाल आज बनेगा और कल एक बंदूक लेकर देश के सारे भ्रष्ट लोगों को 'सिंघमÓ की तरह मार डालेगा। साठ बरस में जब लोकपाल नहीं बना था तो दो-चार महीने के बाद के सत्र तक और कौन सा कहर टूट पड़ रहा था? यह ठीक है कि आज कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार की साख गटर के नीचे पहुंची हुई है, लेकिन जब बात देश के भले के एक कानून की आती है तो हम इतने संशोधनों को एक दिन के भीतर देखकर, उन पर विचार करके सदन में आधी रात तक, या अगले दो-चार दिनों में भी (अगर सत्र बचा होता तो) विधेयक को मतदान के लिए पेश करने की उम्मीद को नाजायज मानते हैं।
भारत का इतिहास गवाह है कि महत्वपूर्ण कानून जब हड़बड़ी में बनते हैं तो उनमें संशोधन अगले ही सत्र से शुरू हो जाते हैं। जिन लोगों को आईपीसी (भारतीय दंड संहिता) के बनने की जानकारी है, वे बता सकते हैं कि डेढ़ सौ बरस पहले यह कानून बनाने में अंग्रेजों ने दस बरस का समय लिया था। यही वजह है कि अपनी कुछ बुराईयों के साथ ही सही, आईपीसी आज तक चली आ रही है। लोकपाल एक बहुत अलग धारणा है और इसमें लोकतंत्र की संवैधानिक संस्थाओं के अधिकारों और जिम्मेदारियों का एक बार फिर सीमांकन हो रहा है। इस देश में अगर कोई किसान अपनी जमीन को पटवारी से नपवाना चाहता है, तो भी व्यवस्था यह है कि बारिश के कीचड़ में वह नाप नहीं होता कि कोई चूक न हो जाए। ऐसे में संसद, सरकार, अदालत और दूसरी संवैधानिक संस्थाओं के बीच, जांच एजेंसियों के बीच, केन्द्र और राज्य के जटिल अंतरसंबंधों के बीच एक नए लोकपाल के ढांचे जब तय करना है तो उसके लिए इस तरह की हड़बड़ी कल दिखाई गई कि मानो एक जनवरी को लोकपाल का काम सम्हाल लेना जरूरी है। किसी बड़ी इमारत को डिजाइन करते हुए जितना वक्त तैयारी में लगाया जाता है, उतनी ही बचत बाद में तोडफ़ोड़ से बचकर होती है। और हम कुछ हफ्तों या कुछ महीनों के बाद के सत्र में इस लोकपाल विधेयक पर मतदान को बेहतर समझेंगे अगर तब तक सरकार उस पर बारीकी से गौर कर सकती है। विपक्ष की कल की हड़बड़ी एक बहुत छोटी सी राजनीतिक बात का मजा लेने की थी कि सरकार का विधेयक राज्यसभा में पास नहीं हो सकता। जब देश की बात है, और जब सत्तारूढ़ पार्टियों और विपक्षी पार्टियों, इन दोनों की सरकारों की लूटपाट देश भर में जगह-जगह दिख रही है, तो जनता की सेहत पर इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि किस सदन में कौन अपना बाहुबल साबित कर पाता है। बेहतर यही है कि कल तक सरकार जिस तरह अन्ना हजारे के दबाव में हड़बड़ी में गिरते-पड़ते यहां तक पहुंची है, अब वह विपक्ष के प्रोपेगंडा के दबाव की हड़बड़ी में गिरते-पड़ते कई और किस्म की गलतियां न करे।
हमें देश के कई बड़े-बड़े नामी-गिरामी टीवी प्रस्तुतकर्ताओं और पत्रकारों की नाटकीयता पर कल तरस आ रहा था कि अपने दो-चार घंटों के बुलेटिन को नाटकीय और सनसनीखेज बनाने के लिए वे इसे जीत और हार से जोड़ रहे थे, सदन में एक सोचे-समझे हंगामे से जोड़ रहे थे और इसे सरकार की बुरी तरह की हार मान रहे थे। यह सरकार कितनी अच्छी है और कितनी बुरी है इस पर हमारी सोच को हमारे पाठक यहां पर लगभग रोजाना पढ़ते हैं। लेकिन जब तक कोई सरकार सत्ता पर बने रहने का संवैधानिक हक खो नहीं देती तब तक हम उस सरकार को सरकार की तरह काम करते देने के हिमायती हैं। राज्यसभा में कल 187 संशोधनों को देखे-समझे बिना अगर सरकार उन्हें कुछ घंटों में मान लेती या खारिज कर देती तो इसे राज्यसभा के ऐसे सदस्य अपना अपमान मानते या न मानते, हम तो इसे देश की जनता का अपमान मानते हैं। सरकार सिर्फ किसी सदन के लिए जवाबदेह नहीं है, वह देश की जनता के लिए भी जवाबदेह है, और उसे इस काम को करने के लिए जितना वक्त चाहिए वह उसे लगाना चाहिए। भारत की संसदीय राजनीति एक ऐसी तंगदिली से गुजर रही है जहां पर सदन में लोगों की कही बातें कई बार अगले दिन के अखबार की सुर्खियों से अधिक मायने नहीं रखतीं। लोकतंत्र का इतिहास ऐसी बातों को बहुत औसत बातों की तरह दर्ज करता है और ये बातें दुनिया की किसी संसद में मिसाल की तरह इस्तेमाल नहीं होतीं, बल्कि इन खबरों वाले अखबार कुछ दिनों के भीतर फिर लुग्दी बन जाते हैं।
हम सरकार की किसी शिकस्त से कल की राज्यसभा को जोडऩे के बजाय हम विपक्ष को, जिसमें वामपंथी और रामपंथी दोनों शामिल थे, इस बात के लिए हारा हुआ मानेंगे कि उन्होंने अपने ही पेश किए संशोधनों की गंभीरता को खत्म कर दिया। अरूण जेटली से लेकर सीताराम येचुरी तक, किसकी कितनी मानवीय क्षमता है कि वे सदन के चलते-चलते इतने संशोधनों पर विचार करके उनके बारे में अपना पक्ष रखकर मतदान करवा लेते? सरकार की घेराबंदी करने के लिए देश के हितों को अलग रख देना ठीक नहीं है। सरकार को तो राज्यसभा में जीतना वैसे भी मुमकिन नहीं था, विपक्ष जरूर हमारे हिसाब से अपनी एक व्यापक जिम्मेदारी से हार गया और मानो गिनती गिनकर मजा लेते रहा।

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