लाल फीता लाल कालीन में कहां पर बदला है?

9 जनवरी 2015
संपादकीय
प्रवासी भारतीयों के सम्मेलन में कल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि एक समय हिंदुस्तानी संभावनाओं को तलाशने के लिए दूसरे देशों में जाते थे, अब संभावनाएं भारत में ही मौजूद हैं, और लोगों को अब भारत आकर यहां काम करना चाहिए। उन्होंने पासपोर्ट और वीजा जैसी कुछ सहूलियतों का जिक्र किया जो कि पिछले महीने में लागू की गई हैं। वे इस तरह की बातें अमरीका और ऑस्ट्रेलिया में भी प्रवासी भारतीयों के बीच बोल चुके हैं, लेकिन भारत में बसे हुए लोग यह जानते हैं कि हकीकत इससे काफी अलग है। भारत में काम करने की ऐसी संभावनाएं रहें, जिनकी वजह से भारत के लोग दूसरे देशों में जाकर काम करने के बजाय यहां काम करना पसंद करें, या बाहर से भारत लौटकर यहां काम आगे बढ़ाएं, ये बातें मोदी की भावनाएं तो हो सकती हैं, लेकिन देश में आज के हालात इस तरह के हैं नहीं।
भाषणों और घोषणापत्रों से परे, भारत के सरकारी दफ्तरों में कामकाज का ढर्रा, यहां पर सरकार के भीतर कदम-कदम पर भयंकर भ्रष्टाचार, यहां अदालतों की धीमी रफ्तार, और सड़कों जैसी सार्वजनिक जगहों पर सत्ता पर काबिज लोगों का सामंती कब्जा, देखने लायक है। आज दूसरे देशों में जो लोग काम कर चुके हैं, वे यह देखकर हक्का-बक्का रह जाते हैं कि भारत में नेता और अफसर, जज और संवैधानिक कुर्सियों पर बैठे हुए तथाकथित-स्वघोषित वीवीआईपी लोग किस तरह आम जनता की जिंदगी को कुचलते हुए अपनी हर राह को राजपथ बनाने पर उतारू रहते हैं। दुनिया के किसी भी सभ्य देश में ऐसा नहीं होता।
दूसरी तरफ देश से लेकर छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेश तक यह चर्चा ही चर्चा चल रही है कि गैरजरूरी कानूनों और नियमों को बदला जाए। यह देश आजाद हुए पौन सदी होने को है, और छत्तीसगढ़ को राज्य बने पन्द्रह बरस हो जाएंगे। ऐसे में सरकारों को अब तक किसने रोका था कि वे गैरजरूरी और मुर्दा कानूनों को अंग्रेजों की विरासत के टोकरे की तरह ढोना बंद करें, और इन्हें खत्म करें। लेकिन कई तरह के आयोग और कई तरह की कमेटियां देश-प्रदेश में बनती रहती हैं, बनते आई हैं, लेकिन उनकी सिफारिशों के बाद भी सरकारी कामकाज आसान करने की कोशिश नहीं हुई। दरअसल सरकारी जटिलताएं जितनी अधिक रहती हैं, उतनी ही गुंजाइश रिश्वत की रहती है। 
कहने को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यह नारा अब जरूर लगा रहे हैं कि उन्होंने हिंदुस्तानी अफसरशाही की कुख्यात लालफीताशाही के लाल फीते से लाल कालीन बुन दिया है जो कि कारोबारियों के स्वागत के लिए बिछा है। लेकिन सरकारी कामकाज से जिनका वास्ता पड़ता है, वे जानते हैं कि पटवारी से लेकर ऊपर तक कदम-कदम पर अडंगा ही अडंगा देखते हैं। छत्तीसगढ़ में पिछले बरसों में जमीनों के मामले में तहसीलदार के स्तर पर इस तरह के नए-नए नियम जोड़े गए हैं जिनका मकसद सिवाय वसूली-उगाही के और कुछ नहीं हो सकता। एक तरफ तो सरकार गैरजरूरी नियम-कानून खत्म करने की बात करती है, दूसरी तरफ उसके कामकाज में लोगों के लिए ऐसे रोड़े बिछाना बढ़ाया जा रहा है कि आम जनता की जिंदगी इतनी मुश्किल हो जाए कि वह हजारों-लाखों की रिश्वत देने पर मजबूर हो। 
हो सकता है कि प्रधानमंत्री के स्तर पर केंद्र सरकार और उनके कहे हुए राज्य सरकारें बड़े-बड़े लोगों के लिए कानूनों को लचीला बना दें, जैसा कि अभी जमीन अधिग्रहण कानून के मामले में किया गया है, लेकिन आम जनता की जिंदगी को नर्क बना देने वाला सरकारी इंतजाम देश की निन्यानवे फीसदी जनता के लिए बदलते नहीं दिख रहा है।

फ्रांस के हमले को देखकर भारत को सबक लेना चाहिए

8 जनवरी 2015
संपादकीय
फ्रांस की एक व्यंग्य पत्रिका शर्ली एब्डो पर कल इस्लामी आतंकियों ने हमला किया और दर्जन भर लोगों को मार डाला। इसमें पत्रिका के संपादक सहित फ्रांस के चार सबसे बड़े कार्टूनिस्ट भी थे जो कि फ्रेंच समाज को रोजाना झकझोरने का काम करते थे। यह पत्रिका अपने बुलंद हौसले के लिए जानी जाती थी, और धार्मिक पाखंड और कट्टरता जैसे कई मुद्दों के खिलाफ यह लगातार लिखती थी और कार्टून छापती थी। दो-तीन बरस पहले भी पैगम्बर मोहम्मद के कुछ कार्टून छापने के बाद इस पत्रिका पर पेट्रोल बम से हमला किया गया था, और इस पर मजहबी आतंक का खतरा माना जाता था। ऐसे में जब इसकी एक बैठक में ये तमाम कार्टूनिस्ट एक साथ इक_ा थे, तब एक फौजी तैयारी के साथ ठीक उसी बैठक पर हमला किया गया, और यह नारा भी लगाया गया कि इसके कार्टून ने आईएसआईएस के आतंकी मुखिया की बेइज्जती की थी, और उसका बदला लिया जा रहा है। एक हमलावर पकड़ा गया है और दो की शिनाख्त के बाद उनकी तलाश चल रही है। इसके पीछे किसी शक से परे सीधे-सीधे इस्लामी आतंकियों का हाथ है, और यह आतंकियों के कब्जे के देशों से परे का अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अपने किस्म का सबसे बड़ा हमला है। 
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर हमने कई बार यहां लिखा है। दुनिया के अलग-अलग देशों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पैमाने अलग-अलग हैं। उन देशों की स्थितियां अलग हैं, वहां की संस्कृति अलग है, और वहां लोकतंत्र की परिपक्वता, कानून के राज का असर भी अलग-अलग हैं। अमरीका में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कुछ अलग किस्म की है, वहां पहले से मुनादी करके एक ईसाई चर्च का पादरी कुरान के पन्ने भी जला सकता है। भारत इन मामलों में एक मिले-जुले दर्जे का देश है, यहां पर कई मामलों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, और कई मामलों में लोगों का बर्दाश्त बिल्कुल भी नहीं है, और अपने आपको घायल बताकर कुछ लोग, कुछ तबके, कुछ धर्म और कुछ जातियां दूसरों पर हमला करने को भारतीय कानून के तहत उनको दिया गया हक मानती हैं। भारत में धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाना एक ऐसा लचर कानून है जिसके तहत कोई भी रिपोर्ट लिखा सकते हैं, और एक थानेदार उस पर गिरफ्तारी कर सकता है। ऐसा जगह-जगह होता भी है। फिर कई मौकों पर राजनीतिक दल अतिसक्रिय होकर कुछ मुद्दों को उठाते हैं, और आग लगाना शुरू कर देते हैं। 
कल भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने फ्रांस में हुए इस हमले पर अफसोस जाहिर किया है, लेकिन उन्हीं की पार्टी के लोग, उन्हीं के गठबंधन के लोग, उन्हीं के सहयोगी संगठन लगातार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले करते आए हैं। जिस देश में देवी-देवताओं की नग्न प्रतिमाओं का हजारों बरस का इतिहास रहा है, वहां पर ऐसी पेंटिंग बनाने पर मकबूल फिदा हुसैन को देश ही छोड़कर जाना पड़ा था, और फिर उन्होंने परदेस में ही आखिरी सांसें लीं। लोगों को अच्छे से याद होगा कि किस तरह पुणे के भंडारकर शोध संस्थान पर कई बरस पहले हिन्दू संगठनों ने बुरा हमला किया था, क्योंकि इस इंस्टीट्यूट में एक अमरीकी लेखक को शोध कार्य में मदद की थी, और उस लेखक की एक किताब में शिवाजी के बारे में लिखी गई बातों पर इन संगठनों को आपत्ति थी। इन्होंने वहां घुसकर सारे प्राचीन रिकॉर्ड, पांडुलिपियां, तस्वीरें, और प्राचीन वस्तुएं नष्ट कर दी थीं, और वहां भारी तबाही की थी। अभी ताजा बात अगर देखें, तो दीनानाथ बत्रा नाम के एक हिन्दूवादी शिक्षा शास्त्री ने एक अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन संस्थान को कानूनी कार्रवाई की धमकी देकर, उस पर दबाव डालकर हिन्दू धर्म पर लिखी गई एक किताब को बाजार से वापिस बुलाने पर मजबूर किया, और उसे खत्म करवा दिया। 
दूसरी तरफ हिन्दूवादियों से परे बंगाल में ममता बैनर्जी जैसे लोग हैं जो कि कार्टून बनाने वाले लोगों को जेल में डालते हैं। दो बरस पहले असीम त्रिवेदी नाम के एक कार्टूनिस्ट को एक कार्टून पर राजद्रोह के आरोप में मुम्बई में कांग्रेस की राज्य सरकार ने गिरफ्तार किया था, जिस पर बहुत से लोगों ने विरोध किया था और अदालत तक ने इसका नोटिस लिया था। अब लगे हाथों यहां पर बंगाल की वामपंथी सरकारों का भी जिक्र कर लेना ठीक होगा जिन्होंने राज्य में तस्लीमा नसरीन की किताबों पर प्रतिबंध लगाकर रखा, और तस्लीमा को वहां घुसने भी नहीं दिया। अब ममता बैनर्जी के राज में भी तस्लीमा पर यह रोक जारी है। सलमान रूश्दी की किताब पर भारत में उस समय रोक लगा दी गई थी, जब दुनिया के किसी इस्लामी या मुस्लिम देश में भी उस पर रोक नहीं लगी थी। 
आज अगर भारत के प्रधानमंत्री फ्रांस में इस हमले का विरोध करते हैं, लेकिन पिछले दस-बीस बरस में भारत के भीतर साम्प्रदायिक ताकतों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर जितने हमले किए थे, उनमें से किसी पर भी वे कुछ नहीं कहते, तो यह अपने आपमें एक सैद्धांतिक विरोधाभास है, और इसका खुलासा होना चाहिए। भारत में छोटी-छोटी जगहों पर जिस तरह से साम्प्रदायिकता बढ़ाई जा रही है, उससे यह देश भी एक हिंसा की तरफ बढ़ रहा है, और हिंसा की प्रतिक्रिया में और हिंसा पैदा होना तय रहता है, इसलिए भारत को आज फ्रांस को देखकर सबक  लेना चाहिए, और किसी भी धर्म की साम्प्रदायिकता, कट्टरता को बढऩे से कड़ाई से रोकना चाहिए। हम भारत में आज फ्रांस या योरप की तरह की, या अमरीका की तरह की अभिव्यक्ति की आजादी की संभावना नहीं देखते, और न ही उस दर्जे की आजादी की आज वकालत करते, लेकिन भारत में जिस रफ्तार से साजिश के तहत बर्दाश्त को खत्म किया जा रहा है, उससे हम अभिव्यक्ति की एक अधिक आजादी की तरफ नहीं बढ़ रहे, एक अधिक हिंसा की तरफ बढ़ रहे हैं। इस देश को इस नौबत से बचना चाहिए, वरना हम आज आईएसआईएस की हिंसा का हाल देख ही रहे हैं, भारत में तो एक से अधिक धर्म हिंसा की ऐसी ऊंचाई तक पहुंच सकते हैं। 

साक्षी महाराज जैसों की बातों पर मोदी चुप क्यों?

07 जनवरी 2015
संपादकीय
भाजपा के हमलावर-साम्प्रदायिक सांसद साक्षी महाराज ने एक बार फिर आग लगाने की कोशिश की है, लेकिन इस बार आग वे किसी गैरहिन्दू घर या बस्ती में नहीं लगा पा रहे, सिर्फ हिन्दुओं में उन्होंने आग लगाई है, और इसका नुकसान मोदी सरकार, भाजपा की साख, के साथ-साथ हिन्दुओं को होने जा रहा है। उन्होंने यह खुली सलाह दी है कि हर हिन्दू महिला को चार बच्चे पैदा करना चाहिए। उन्होंने मुस्लिमों का नाम लिए बिना उनके बारे में कहा कि चार बीवियां और चालीस बच्चे यहां नहीं चल सकेंगे, और जवाब में हिन्दू औरत को चार-चार बच्चे पैदा करना चाहिए। 
भाजपा अपने सांसदों और मंत्रियों की वजह से खासी शर्मिंदगी झेल चुकी है, और यह सिलसिला जारी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मुंह खोले बिना उनकी तरफ से ऐसी खबरें बिना किसी हवाले के बाहर आती हैं कि वे साम्प्रदायिक एजेंडा से नाखुश हैं, और संघ परिवार जिस तरह अखबारी सुर्खियों और टीवी की खबरों पर छाया हुआ है, उससे वे फिक्रमंद भी हैं, क्योंकि सरकार की उपलब्धियां धरी रह जा रही हैं। कुछ ऐसी खबरें भी हैं कि विश्व हिन्दू परिषद के भीतर डॉ. प्रवीण तोगडिय़ा के प्रमोशन से भी मोदी नाखुश हैं क्योंकि उन्होंने गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए वहां के सारे तोगडिय़ाओं के पर कतर कर रख दिए थे, और अब तोगडिय़ा देश भर में एक बड़े हिन्दू आक्रामक नेता के रूप में फिर जगह बना रहे हैं। 
दरअसल संघ परिवार और भाजपा के संबंध, संघ परिवार और प्रधानमंत्री के संबंध, देश में ये हमेशा एक अटकल का सामान रहे, और कभी भी यह खुलासा नहीं हो पाता कि इनके अंतरसंबंध क्या हैं, किस पर किसका कितना काबू है। और फिर बीते दशकों में धीरे-धीरे कई ऐसे भगवाधारी भाजपा के रास्ते संसद तक पहुंचे हैं, जो कि आरएसएस के भी नहीं हैं, और भाजपा के भी नहीं हैं, वे महज भगवा हैं, और उनका अपना एक अलग एजेंडा है। ऐसे ही लोगों में साक्षी महाराज नाम के सांसद और एक साध्वी-मंत्री निरंजन ज्योति हैं जो कि पिछले दिनों मीडिया में मोदी से अधिक जगह पाकर पूरी दुनिया में ऐसी तस्वीर बना चुके हैं कि हिन्दुस्तान 22वीं सदी की तरफ नहीं, 6वीं सदी की तरफ बढ़ रहा है। 
हम हर हिन्दू औरत के चार बच्चे पैदा करने की बात पर लौटें, तो इससे अधिक भयानक सलाह हिन्दू समाज के लिए और कुछ नहीं हो सकती। आज जब लोग चार बच्चों से दो की तरफ बढ़ चुके हैं, और ऐसे दो बच्चों को बेहतर पढ़ाने, बेहतर खिलाने, और अधिक कामयाब बनाने का काम चल रहा है, तो चार बच्चों को पैदा करके मुस्लिमों का मुकाबला करने का यह फतवा मानने वाला तो कोई नहीं है, लेकिन इससे देश के भीतर एक साम्प्रदायिक तनातनी खड़ा करने का काम साक्षी महाराज जरूर कर रहे हैं। और शायद उनकी उपयोगिता भी यही है। 
लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को यह सोचना चाहिए कि क्या वे भारत को एक हिन्दू राष्ट्र बनाने के नाम पर बहुमत पाकर प्रधानमंत्री बने हैं, या फिर एक भ्रष्ट सरकार को हटाकर एक बेहतर सरकार लाने के लिए जनता ने उन्हें वोट दिया है? भारत कई बार साम्प्रदायिकता के सैलाब झेल चुका है, और यह तरीका किसी एक चुनाव में कहीं काम आ जाए तो आ जाए, लेकिन अगर पांच बरस ऐसी ही आग लगाई जाती रही, तो जनता आज ही इससे थक चुकी है, और लोग अब यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या इस आग को मोदी की मंजूरी है? मोदी और उनके सिपहसालारों ने यह बात जरूर देखी होगी कि हिन्दी और अंग्रेजी मीडिया के जो दिग्गज लोग पिछले एक बरस से मोदी का झंडा उठाकर चल रहे थे, उनमें से एक-एक करके हर कोई आज के माहौल का और उस पर मोदी की चुप्पी का बहुत बुरा आलोचक बन चुका है। हम भाजपा और मोदी की संभावनाओं की फिक्र नहीं कर रहे, लेकिन प्रधानमंत्री को देश के माहौल को सुलगाने-जलाने की चल रही हरकतों को ऐसा अनदेखा नहीं करना चाहिए, इतिहास उनकी चुप्पी को दर्ज करते चल रहा है।

ऐसे बड़बोले मांझी देश में विपक्ष के लिए नुकसानदेह

6 जनवरी 2015
संपादकीय


बिहार के बड़बोले और अटपटे, महादलित तबके से आए हुए, और नीतीश कुमार के एक नैतिक-इस्तीफे के बाद वैकल्पिक मुख्यमंत्री बने जीतन राम मांझी ने फिर एक गैरजिम्मेदार बयान दिया है, और अपने-आपको एक आम आदमी बताते हुए कहा है कि मीडिया उनकी सहजता को तोड़-मरोड़कर मतलब निकालता है। उनका ताजा बयान नक्सलियों द्वारा ठेकेदारों और भ्रष्ट अफसरों से वसूली के बारे में है, और उन्होंने कहा है कि भ्रष्टाचार करने वाले ठेकेदार-अफसर से अगर नक्सली टैक्स वसूलते हैं, तो उसमें कुछ गलत नहीं है। इसके पहले मांझी ने गैरजिम्मेदार बयानों का एक लंबा इतिहास अपने कुछ महीनों के इस कार्यकाल में रच दिया है, और उनकी पार्टी के बारे में अब यह सोचना पड़ रहा है कि किस लिए उसने ऐसा मुख्यमंत्री चुना, और किस लिए वह ऐसी बकवास को बर्दाश्त कर रही है? 
नक्सलियों का खतरा झेलने वाले राज्यों में बिहार सबसे बड़ा राज्य है। ऐसे राज्य का मुख्यमंत्री अगर नक्सल-उगाही को सही ठहराने का काम करता है, तो उसके बाद वहां की पुलिस क्या खाकर नक्सलियों को पैसा देने वालों पर कार्रवाई करेगी? लेकिन मांझी ने अपनी राजनीतिक समझ, सोच, और अपनी बेअक्ली को बार-बार साबित किया है, और अब उनको जारी रखने वाली पार्टी इस सिलसिले को आगे बढ़ाकर अपने-आपको गैरजिम्मेदार और बेअक्ल साबित कर रही है। मांझी की ऐसी बातों से एक सामाजिक दिक्कत यह है कि उनके महादलित तबके के बारे में भारत के सवर्ण लोगों की जो सोच है, उसे जायज साबित करने का काम मांझी कर रहे हैं। किसी का आम या सहज होना उसे ऐसा हक नहीं देता कि वह आए दिन निहायत गैरजरूरी और निहायत नाजायज बातें करे। उनकी तरह-तरह की बेतुकी बातों से एक नुकसान यह भी हो रहा है कि आम लोगों को लोग शासन के लायक मानने पर शक कर सकते हैं, और ऐसे में खानदानी या ऊंची जात वाले लोगों की जरूरत बखान की जा सकती है। 
यह बात आज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बिहार में जदयू की सरकार देश में अब गिनीचुनी गैरएनडीए सरकारों में से एक है, और यह पार्टी मोदी के मुकाबले खड़े किए जा रहे जनता परिवार नाम के एक नए गठबंधन का एक प्रमुख हिस्सा रहने वाली है। इसी जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव जब संसद में कुछ बोलने के लिए खड़े होते हैं, तो हमारे जैसे लोग ध्यान से सुनते हैं कि देश की एक प्रमुख सोच सामने आने वाली है। राष्ट्रीय राजनीति में जदयू की भूमिका को देखते हुए यह जरूरी है कि बिहार में भी मुख्यमंत्री के पद पर वह गंभीर सोच रखने वाले किसी व्यक्ति को रखे, उसके बिना यह पार्टी ही गैरगंभीर लगने लगेगी जो कि लोकतंत्र में विपक्ष के लिए बड़े नुकसान की बात होगी। इस पार्टी के लिए यह एक राजनीतिक फैसला हो सकता है कि एक महादलित को मुख्यमंत्री बनाया जाए, लेकिन जाति से परे यह सोचना भी जरूरी है कि एक गैरजिम्मेदार बड़बोड़े को मुख्यमंत्री न बनाया जाए। इस देश ने अंबेडकर की शक्ल में देश के सबसे विद्वान लोगों में से एक को देखा है, जिनकी बातों से न सिर्फ दलितों के बीच, बल्कि तमाम हिंदुस्तानियों के बीच गर्व पैदा होता है। इसलिए भारतीय लोकतंत्र में उटपटांग बातों के लिए किसी को जाति की रियायत नहीं दी जा सकती।

म्युनिसिपलों में कांगे्रस-भाजपा की उलझी हालत की दिक्कतें

5 जनवरी 2015
संपादकीय

जम्मू-कश्मीर में पिछले एक पखवाड़े में चुनावी नतीजे आने के बाद भी सरकार बनना मुमकिन नहीं हो पा रहा है, क्योंकि बहुमत किसी एक पार्टी या खेमे के पास नहीं है और तरह-तरह की जोड़-तोड़ चल रही है।  दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में कल नगरीय निकायों के जो चुनावी नतीजे सामने आए हैं, उनमें जगह-जगह एक अलग तरह के टकराव की नौबत दिखाई पड़ रही है। महापौर या पालिका-पंचायत अध्यक्ष अगर कांगे्रस के हैं, तो वहां पर पार्षदों का बहुमत भाजपा का है, और ऐसे में वहां सभापति भाजपा का बनना तय है। दोनों पार्टियों के बीच राज्य के स्तर पर जितनी कड़वाहट है, और जितना टकराव है, उसके चलते हो सकता है कि म्युनिसिपल की बैठकों में काम धरे रह जाए, और इन दोनों पार्टियों के बीच टकराव ही चलता रहे। राजधानी रायपुर के नगर निगम में पूरे पांच बरस बैठकों से लेकर सार्वजनिक कार्यक्रमों के मंच तक कांगे्रस की महापौर और भाजपा के सभापति या भाजपा के राज्य सरकार के मंत्री के बीच तनातनी और टकराव का नजारा रहा। 
भारत में लोकतांत्रिक शासन-प्रशासन में म्युनिसिपल और पंचायत के राज की जितनी स्वायत्तता सैद्धांतिक स्तर पर जितनी दिखती है, हकीकत में उतनी नहीं रहती। राज्य सरकार के स्तर से म्युनिसिपलों और पंचायतों पर तरह-तरह से काबू रखा जाता है, और ऐसे में राज्य में सत्तारूढ़ भाजपा बड़ी संख्या में म्युनिसिपलों में जब विपक्ष में रहेगी, तो राज्य सरकार के स्तर से कांगे्रस के निर्वाचत महापौर-अध्यक्ष के काम में दखल का एक खतरा रहेगा। इस तरह का टकराव लोकतांत्रिक परिपक्वता की कमी भी साबित करेगा, और शहरों का विकास भी इससे रूकेगा। हमको ऐसा भी लगता है कि जहां-जहां ऐसे टकराव और तनाव के लिए जो लोग जिम्मेदार रहेंगे, उनको और उनकी पार्टी को अगले चुनाव में नुकसान भी होगा। यह भी हो सकता है कि इस बार के चुनाव में भी नुकसान का कुछ जिम्मा पिछले पांच बरसों के ऐसे टकराव पर रहा हो, लेकिन स्थानीय चुनावों के लिए जितने तरह के अलग-अलग पहलू जिम्मेदार होते हैं, उनके बीच हम जीत-हार के विश्लेषण का अतिसरलीकरण करना भी नहीं चाहते।
कांगे्रस और भाजपा के जो भी निर्वाचित लोग स्थानीय संस्थाओं में पार्टी की राजनीति को ऊपर रखकर काम करना चाहेंगे, वे अपनी जिम्मेदारी के साथ दगाबाजी भी करेंगे। स्थानीय संस्थाओं में पहली जिम्मेदारी वहां के बुनियादी कामकाज की होती है, और इसके ऊपर गुटबाजी या राजनीति को नहीं आने देना चाहिए। यह थोड़ी मुश्किल सलाह इसलिए है कि जब प्रदेश के स्तर पर कांगे्रस और भाजपा के बीच एक टकराव चल रहा है, और वह आगे खड़े पंचायत चुनाव के बाद भी जारी रहते दिख रहा है, तो छोटे निर्वाचित प्रतिनिधियों को काम को प्राथमिकता देना कुछ मुश्किल भी लग सकता है। ऐसे में दोनों पार्टियों के बड़े से लेकर छोटे नेताओं तक एक ऐसे तालमेल और आपसी सहमति की जरूरत है जिसके चलते स्थानीय जिम्मेदारियों की अनदेखी न हो। यह कैसे हो सकेगा, यह अंदाज लगाना हमारे लिए आसान नहीं है, लेकिन यह समझना आसान है कि प्रदेश के जनहित में राज्य सरकार से लेकर एक पार्षद तक, हर किसी को राजनीति से ऊपर काम की जिम्मेदारी को मानना पड़ेगा। ऐसा न करने वाले अपने राजनीतिक भविष्य का नुकसान भी करेंगे।

छत्तीसगढ़ के नगरों ने भाजपा के लिए बजाई खतरे की घंटी

4 जनवरी 2015
संपादकीय
छत्तीसगढ़ के नगरीय चुनाव के नतीजे प्रदेश में पिछले ग्यारह बरसों से सत्तारूढ़ भाजपा के लिए एक सदमा लेकर आए हैं, और भाजपा के जो शुभचिंतक हैं वे इसे पार्टी और सरकार के लिए आंख खोलने वाले भी मानेंगे। नतीजों के आंकड़े तो आते जा रहे हैं, लेकिन सदमा पूरी तरह से आ चुका है। और चूंकि प्रदेश में व्यापक रूप से भाजपा को झटका लगा है, इसलिए यह मानना ठीक नहीं होगा कि सिर्फ स्थानीय स्तर पर पिछले बार के भाजपा के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के खिलाफ यह नाराजगी या जनादेश है। यह स्थानीय से अधिक, राज्यस्तर का जनादेश है, और उसे उसी तरह लेना भी चाहिए। यह सत्तारूढ़ भाजपा के लिए संभलने का एक अच्छा मौका भी हो सकता है, क्योंकि अगले कुछ हफ्तों में पंचायत के चुनाव तो निपट जाएंगे, उसके बाद चार बरस बिना चुनाव के रहेंगे। अगले विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा को आज यह याद रख लेना चाहिए कि पिछले चुनाव में वह कांगे्रस से कुल पौन फीसदी आगे थी, और आज म्युनिसिपल चुनावों में वह कई फीसदी पीछे हो गई है। 
इस चुनाव में भाजपा ने अपने पार्षदों और अध्यक्षों-महापौरों को बड़ी संख्या में बदल दिया था, और उसे उम्मीद थी कि पांच बरस में जनता की जो नाराजगी स्थानीय निर्वाचित जनप्रतिनिधियों से होती है, वह जीत में आड़े नहीं आएगी, लेकिन वैसा हो नहीं पाया। नए-नए उम्मीदवार भी हारे, भाजपा के जानकार लोगों में पहले से यह चर्चा भी थी कि कई जगहों पर पार्टी ने कमजोर संभावनाओं वाले लोगों को उम्मीदवार बनाया था। अभी हम उतनी बारीकी में जाना नहीं चाहते, लेकिन राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी को आज मोटेतौर पर कई बातों को समझना चाहिए। ऐसे कौन से मुद्दे रहे, राज्यस्तर पर जनता की नाराजगी की कौन सी बातें रहीं, जिन्होंने भाजपा के हाथ से इतने म्युनिसिपल छीन लिए?
हमारे पाठकों को याद होगा कि पिछले महीनों में हम लगातार स्थानीय मुद्दों को लेकर राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी को आगाह करते आ रहे थे कि जिस तरह शहर घूरे में तब्दील हो चुके थे, वह भाजपा को नगरीय चुनाव में भारी पड़ेगा। और हमारा यह भी मानना है कि जब प्रदेश की राजधानी में गंदगी से लोग दहशत में थे, और अफसर कुछ भी नहीं कर पा रहे थे, तो इस शहर में भाजपा के महापौर प्रत्याशी की हार में यह मुद्दा अपने-आपमें काफी था। लेकिन यह पूरा नहीं था, राज्य सरकार अपने इस तीसरे कार्यकाल में राशन कार्डों को लेकर बहुत बुरी तरह से नाराज जनता को झेल रही थी, जिस तरह से बिलासपुर में नसबंदी मौतें हुईं, उससे पूरे प्रदेश में महिला मतदाताओं में खास नाराजगी थी, और देश के बाहर के मीडिया ने भी इसे परले दर्जे की सरकारी लापरवाही माना था। लेकिन इसके बाद राज्य सरकार का जो रूख था, वह अपने बचाव का था, इन मौतों के मुजरिमों को सजा देने का सरकार का इरादा नहीं दिखा, और हमारा मानना है कि पूरे प्रदेश में इसे लेकर लोगों के बीच बहुत नाराजगी थी। 
दूसरी तरफ कांगे्रस की बात करना जरूरी है जो कि प्रदेश के अपने एक सबसे बड़े नेता अजीत जोगी की खुली नाराजगी और खुली बगावत को झेलते हुए भी चुनाव मैदान में बड़े सीमित साधनों के साथ थी। राज्य में ग्यारह बरसों से विपक्ष में रहना आसान नहीं होता, और पूरे देश में कांगे्रस पार्टी की जो बदहाली और फटेहाली है, उसके बोझ को राज्य में ढोना भी छत्तीसगढ़ कांगे्रस के लिए आसान बात नहीं थी। जिस कांगे्रस का देश भर मखौल बन रहा है, उसे वार्ड-वार्ड और शहर-कस्बे तक जिताना एक आसान बात नहीं थी। अपनी पार्टी के नेताओं से नुकसान झेलते हुए छत्तीसगढ़ कांगे्रस ने जिस अंदाज और जिस तेवर में ये चुनाव जीते हैं, वह एक बड़ी शानदार कामयाबी है। हमारे पाठकों को यह भी याद होगा कि कुछ हफ्ते पहले ही हमने इसी जगह छत्तीसगढ़ में कांगे्रस की विपक्षी भूमिका को लेकर लिखा था कि इस प्रदेश में संगठन जिस जिम्मेदारी और सक्रियता से काम कर रहा है, उसे देखकर कांगे्रस के राष्ट्रीय संगठन को भी विपक्ष की भूमिका सीखनी चाहिए। 
हमने इस जगह-जगह बार-बार राज्य सरकार के लिए सलाह लिखी थी, और कांगे्रस पार्टी के विपक्षी तेवरों की तारीफ की थी। अभी पूरे प्रदेश में जो नतीजे आए हैं वे इन्हीं दो बातों के मिले-जुले सुबूत हैं। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने अपनी अच्छी छवि और लोकप्रियता के साथ इस चुनाव में पूरे प्रदेश को मथ डाला था। शायद ही कोई शहर ऐसा था जहां उन्होंने रोड-शो न किया हो। भाजपा के इस स्टार प्रचारक की इतनी कोशिशों के बाद भी ऐसे चुनावी नतीजे आए हैं, और अगर इतनी कोशिश न हुई होती, तो पता नहीं क्या हुआ होता। यह मौका भाजपा को कांगे्रस दोनों के लिए आत्ममंथन का है। दोनों को भविष्य की अपनी संभावनाओं को देखना चाहिए, और लोकतंत्र में अपनी भूमिका को जिम्मेदारी के साथ निभाना चाहिए। विधानसभा और लोकसभा में अपनी जीत के बाद भाजपा अभी शहरों को खो बैठी है, और पंचायतों का मोर्चा खुला ही हुआ है। ऐसे में यह प्रदेश अगले चार-पांच बरस एक कड़े चुनावी मुकाबले की तैयारी का प्रदेश रहेगा, और कांगे्रस के प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल और विधानसभा में कांगे्रस के नेता टी.एस. सिंहदेव इसी सक्रियता से काम करते रहे, तो वे प्रदेश भाजपा सरकार के लिए बहुत बड़ी चुनौती रहेंगे। यह छत्तीसगढ़ में लोकतंत्र के लिए एक बहुत अच्छी बात है कि यहां एक जागरूक विपक्ष है, जो कि आज देश के स्तर पर नहीं रह गया है। और यह बात भाजपा के लिए खतरे की एक बड़ी तेज घंटी भी है।

पहली खबर से सीधे नतीजों पर छलांग लगाते मीडिया के खतरे

03 जनवरी 2015
संपादकीय

गुजरात से लगी हुई भारतीय समुद्र सीमा में पाकिस्तान की तरफ से एक मछुवारा बोट आने की खबर लगी, और भारतीय निगरानी एजेंसियों को इनमें कुछ खतरनाक सामान होने का अंदेशा था। भारत सरकार के मुताबिक इस बोट को रोकने की कोशिश की गई, पीछा किया गया, लेकिन इसने रूकने के बजाय अपने आपको एक विस्फोट से उड़ा दिया।
कल से भारत का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आसमान और समंदर से ली गई इस बोट की विस्फोट के पहले और विस्फोट के बाद की तस्वीरें दिखाकर अटकलबाजी के एक गलाकाट मुकाबले में लग गया है कि यह मुंबई हमले जैसे एक आतंकी हमले के लिए आ रही थी, या गुजरात में होने जा रहे प्रवासी भारतीय सम्मेलन पर हमला करने आ रही थी, या इसका और क्या मकसद था? बड़े-बड़े विश्लेषक इस बात पर बहस कर रहे हैं कि यह कितना बड़ा खतरा था, और इसे रोक पाना कितनी बड़ी कामयाबी थी। लेकिन टीवी की खबरों पर किसी संदेह या किसी आशंका की कोई गुंजाइश छोड़ी नहीं जा रही, और मोटे तौर पर इस बोट को आतंकी हमले का एक हिस्सा मान लिया गया है। हो सकता है कि यह बात पूरी तरह सही हो, लेकिन दूसरी तरफ सच यह है कि अभी आतंक के संदेह से आगे और कुछ भी स्थापित नहीं हुआ है, और आज सुबह कुछ दूसरे जानकार लोगों ने एक दूसरा संदेह जाहिर किया है कि यह बोट हो सकता है कि तस्करों की हो, और उस पर डीजल या दूसरे किस्म के सामान लदे हों, और उसका किसी आतंकी हमले से कुछ लेना-देना न रहा हो।
आज पल-पल की खबर देने वाले मीडिया की वजह से पहली सूचना का तो सैलाब आया रहता है, लेकिन ऐसी सूचना के वजन की फिक्र किए बिना जो सबसे अधिक सनसनीखेज, सबसे अधिक नाटकीय बात हो सकती है, उस निष्कर्ष पर बड़ी तेजी से पहुंचा जाता है। अखबारों के जमाने में यह दिक्कत नहीं होती थी, क्योंकि दिन में दो या तीन वक्त पर निकलने वाले अखबारों के लिए खबरें तैयार करते हुए संवाददाताओं को कई घंटे का वक्त मिलता था, और उतने में सच को ठोक-बजाकर परख लेना हो जाता था। लेकिन अभी ब्रेकिंग न्यूज नाम की एक ऐसी हड़बड़ी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आने के साथ-साथ पैदा हुई है कि जिसके चलते किसी भी तरह की जांच-पड़ताल तकरीबन गैरजरूरी मान ली जाती है।
पाकिस्तान के खिलाफ एक युद्धोन्माद के चलते हुए यह मान लिया जाता है कि उससे जुड़ी खबरों को जांचना-पड़तालना राष्ट्रदोह किस्म का काम है। इन दो देशों के बीच टकराव के चलते भारत में मीडिया इस तंगनजरिए का शिकार हो गया है, जो कि अखबारनवीसी के बुनियादी तौर-तरीकों, तकनीकों, और उसके तकाजे से अनछुआ रहने से पैदा होता है। देश के लिए प्रेम तो अच्छी बात है, लेकिन सच के लिए प्रेम इससे और अधिक अच्छी बात होती है। एक पेशे को अपने आपको सरहद का कैदी नहीं बनाना चाहिए, और सच पर टिके रहना चाहिए। न सिर्फ पाकिस्तान के मामले में, बल्कि किसी भी देश के मामले में, किसी भी प्रदेश के मामले में मीडिया को एक सत्याग्रह पर चलना चाहिए। सत्य के लिए आग्रह यह पत्रकारिता की एक बुनियादी बात होती थी, लेकिन जबसे पत्रकारिता का नाम बदलकर मीडिया हो गया, और अखबारों के साथ टीवी जुड़ गया, और उसके बाद अब इंटरनेट और सोशल मीडिया जुड़ गए, तबसे सत्य का आग्रह खत्म हो गया, और एक बदहवास हड़बड़ी हावी हो गई। इसका नतीजा यह भी हुआ है कि पत्रकारिता की जो साख थी, छपे हुए शब्द की जो विश्वसनीयता थी, वह अब खत्म हो चुकी है, और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से मुकाबले के चलते प्रिंट मीडिया का नजरिया भी एक अभूतपूर्व हड़बड़ी का हो गया है, जिसमें जांचने-परखने की कोई गुंजाइश नहीं है, और न ही जरूरत मानी जाती है।
खबरों का सैलाब समंदर की आती-जाती लहरों की तरह ही मिनट-मिनट आते रहता है, और इसके चलते अब लोग कुछ घंटों पहले भी अधकचरी, अधपकी, और कई बार गलत साबित हो चुकी खबर को भूल भी जाते हैं। टीवी को यह सहूलियत हासिल है, लेकिन अखबारों को अधिक जिम्मेदार रहना पड़ता था क्योंकि पुराने पन्ने और कतरनें बरसों तक मुंह चिढ़ाने के लिए जिंदा रहते थे। एक बार फिर यह जरूरत आन खड़ी हुई है कि खबरों की बुनियादी तकनीक, उनके तथ्यों का तर्कों की कसौटी से गुजरते हुए खबर का हिस्सा बनना, ऐसी तमाम बातों को एक बार फिर गंभीरता से देखा जाए, उनको लागू किया जाए। इसके बिना मीडिया की विश्वसनीयता खत्म हो रही है, और लोकतंत्र में यह एक खतरनाक नौबत है। 

सरकार के आर्थिक अपराधों की जांच के बजाय उनकी खुफिया निगरानी अधिक जरूरी

02 जनवरी 2015
संपादकीय

छत्तीसगढ़ के सिंचाई विभाग के कुछ अफसरों के पास से जितनी नगदी बरामद हुई है, उसमें ठंड में ठिठुरते छत्तीसगढ़ के गरीबों को यह सोचने पर मजबूर किया है  कि सरकारी अमला कितना कमा-खा रहा है? अगर इन अफसरों के पास इतनी बड़ी रकम नगद है, तो उनकी कुल दौलत कितनी होगी, और उन्होंने इतनी दौलत जुटाने के लिए जनता के हक किस हद तक बेचे होंगे? 
सरकारी भ्रष्टाचार के जानकार लोगों का यह मानना है कि किसी भी भ्रष्ट अफसर के पास से कभी भी उसकी कमाई का पांच-दस फीसदी से अधिक बरामद हो ही नहीं सकता। सरकार के जानकार लोगों का यह भी मानना है कि जब कारोबारी या ठेकेदार को सौ रूपए की कमाई होती है, तो ही वे दस रूपए रिश्वत या कमीशन में विभाग के लोगों को बांटते हैं। इस नियमित रिश्वत से परे जब भी मोटी रिश्वत सरकार में किसी को दी जाती है, तो वह सरकारी खजाने में मोटी लूट के लिए दी जाती है, या फिर सरकार को लंबा नुकसान पहुंचाने के एवज में। इसलिए यह माना जाना चाहिए कि जिस अफसर से भ्रष्टाचार की जितनी बरामदगी होती है, जनता के हक उससे सैकड़ों गुना अधिक लुट चुके रहते हैं। 
अब साल में दस-बीस बार भ्रष्ट लोगों पर छापे पड़ जाएं, कुछ दर्जन लोग हर बरस रिश्वत लेते पकड़ा जाएं, और दस-बीस बरस तक मुकदमे चलने के बाद इनमें से अधिकतर लोग छूट भी जाएं, तो सरकार का भ्रष्टाचार कम कैसे होगा? दूसरी बात यह कि किसी भी तरह के रिश्वत-भ्रष्टाचार, या अनुपातहीन संपत्ति के मामलों में जो अफसर पकड़ाते भी हैं, उनमें से अधिकतर अपने ही विभागों की कमाऊ कुर्सियों पर कुछ महीने के भीतर ही नजर आने लगते हैं। ऐसे में आगे के भ्रष्टाचार के रूकने की उम्मीद ही करना बेकार है। सरकार में भ्रष्टाचार के इतने बड़े-बड़े मामले दस-दस बरसों से साबित पड़े हैं, लेकिन उनसे जुड़े हुए अफसर अभी भी सरकार के बड़े-बड़े विभागों को या दफ्तरों को हांक रहे हैं। ऐसे में आगे भ्रष्टाचार की गारंटी रहती है। 
इन दिनों छत्तीसगढ़ में छापेमारी और भ्रष्टाचार पकडऩे की जो हवा दिख रही है, वह पता नहीं कितने दिन टिकती है। और हम ऐसी नौबत आने के पहले सरकार की एक ऐसी खुफिया मशीनरी की सिफारिश बरसों से करते आ रहे हैं जो कि खेत चुग लिए जाने के पहले उसे बचाने का काम कर सके। आज सारा भ्रष्टाचार जब हो चुका रहता है, और भ्रष्ट लोग देश भर में जगह-जगह बेनामी और गुमनामी दौलत बना चुके रहते हैं, तब उनसे आखिरी के कुछ महीनों या एक-दो बरसों की कमाई को छापों में पकडऩे से राज्य का कुछ भला नहीं होता। राज्य के हितों का बचाव तो तभी हो सकेगा जब यह सरकार आर्थिक अपराध निगरानी ब्यूरो बनाकर सरकारी काम में भ्रष्टाचार के दौरान ही उस पर नजर रखने का काम करे, और अपनी जानकारी से सरकार की जांच और कार्रवाई की एजेंसियों को खबर करे। आज सरकार के पास अपने खुद के आर्थिक भ्रष्टाचार को रोकने के लिए सिर्फ जांच ब्यूरो है, निगरानी ब्यूरो नहीं है। जिस तरह नक्सलियों पर नजर रखने के लिए सरकार का खुफिया विभाग है, जिस तरह राजनीतिक या सामाजिक जानकारी इक_ी करने के लिए खुफिया विभाग है, उसी तरह एक अलग दफ्तर सरकार की आर्थिक गड़बड़ी पर नजर के लिए बनना चाहिए, और इस पर होने वाला खर्च राज्य को सस्ता पड़ेगा। 
छत्तीसगढ़ के भ्रष्टाचार के मामलों का इतिहास इस बात का गवाह है कि राज्य बनने के पहले से यहां पर भ्रष्टाचार के पांव मजबूती से जमे हुए हैं, और कांग्रेस की भोपाल या राजधानी की सरकार के चलते भ्रष्टाचार का जो हाल था, वह अभी भी बहुत बदला नहीं है। राजधानी के भोपाल रहने तक तो यह बात थी कि छत्तीसगढ़ वहां से दूर था और इसे लूटना भोपाल को उसी तरह सुहाता था जिस तरह लंदन से अंग्रेज हिन्दुस्तान को लूटते थे। लेकिन अब तस्वीर बदलनी चाहिए। इस राज्य को बने डेढ़ दशक हो रहे हैं, सरकार का बजट बहुत बढ़ चुका है, छत्तीसगढ़ के स्थानीय नेताओं को राज चलाने का अनुभव बहुत लंबा हो चुका है। ऐसे में सरकार के अपने आर्थिक अपराधों को होने का मौका देना ठीक नहीं है, उस पर खुफिया नजर रखकर उसे होने के पहले ही रोकना ठीक है, या जिस तरह रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा जाता है, उसी तरह भ्रष्टाचार होते हुए रंगे हाथों फाइलों को, और उन पर दस्तखत करते हाथों को पकडऩा चाहिए। 

सरकार से लेकर समाज तक को कचरे की फिक्र करने की जरूरत

01 जनवरी 2015
संपादकीय
उत्तरप्रदेश सरकार ने अपनी तमाम गलतियों और गलत कामों के साथ-साथ कभी-कभी कुछ ऐसा अच्छा भी किया है कि जिसकी तारीफ करनी ही पड़ती है। कल ही हमने इसी जगह पर फिल्म पीके को मनोरंजन कर मुक्त करने के लिए समाजवादी पार्टी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की तारीफ की थी, और आज वहां की एक और दूसरी खबर है कि सफाई कर्मचारियों की तनख्वाह में सरकार ने खासी बढ़ोत्तरी की है, और साथ-साथ यह भी तय किया है कि गटर सफाई के दौरान अगर कोई सफाई कर्मचारी जान खो बैठता है, तो उसके परिवार को सरकार दस लाख रूपए मुआवजा देगी। 
नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से देश भर में लगातार सफाई को लेकर एक चर्चा चल रही है, और जगह-जगह नाटकीय अंदाज में नेताओं की तस्वीरें खींची जा रही हैं जिनमें वे उन्हीं के लिए ताजा-ताजा बिखेरे गए कचरे को साफ करते दिखते हैं। हवा में खबरें ऐसी हैं कि मानो पूरे देश में लोग सफाई को लेकर चौकन्ने हो गए हैं, जबकि हकीकत यह है कि ऐसा चौकन्नापन किसी घूरे में कचरे के खासे नीचे दबा दिखता है। हम कुछ और खबरों को यहां पर जोडऩा चाहते हैं, पिछले पखवाड़े यह खबर आई थी कि 21वीं सदी में भी भारत में कानून के खिलाफ सफाई कर्मचारियों के हाथों से पखाना उठवाने का इंतजाम जारी है, और पूरे देश में सबसे अधिक मैला ढोने वाले कर्मचारी उत्तरप्रदेश में ही हैं। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में आज से ही पॉलीथीन के थैलों पर रोक लगी है, और इसके पीछे वैज्ञानिक तर्क यह है कि ऐसा पॉलीथीन घूरों और नालियों से होते हुए या तो गाय के पेट तक पहुंच जाता है, और गाय जितना पॉलीथीन नहीं खा पाती है, वह नाली और गटर को चोक कर देता है। कई बरस पहले जब मुंबई में बाढ़ आई थी, तब भी इस तरह पानी के रास्ते को रोकने वाले पॉलीथीन को ही गुनहगार माना गया था। और जहां-जहां गटर में कचरा फंसता है, उसके पीछे मोटे तौर पर पॉलीथीन या इसी किस्म का न घुलने वाला कचरा रहता है। इसलिए उत्तरप्रदेश ने अगर गटर में मौत पर बचे परिवार को दस लाखपति बनाना तय किया है, तो इसके साथ-साथ यह भी तय करना चाहिए कि कभी ऐसा मुआवजा देने की नौबत न आए। 
शहरी कचरे का निपटारा एक बहुत ही वैज्ञानिक और तकनीकी काम है, जिसके लिए निजी क्षेत्र से लेकर स्थानीय म्युनिसिपल तक के अच्छे मैनेजमेंट की जरूरत भी पड़ती है। लेकिन हमने छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ही यह मिसाल देखी है कि किस तरह इस पहली शहरी बुनियादी जरूरत को ठेके का धंधा बना लिया गया था, और दूसरे प्रदेश से आया हुआ एक ठेकेदार किस तरह इस प्रदेश की आंखों में कचरा झोंककर करोड़ों-अरबों लेकर चला गया। ऐसे में भारत के शहरों को ठोस कचरे के निपटारे को एक बड़ी प्राथमिकता बनाकर चलना पड़ेगा, और इसके लिए छत्तीसगढ़ में थोड़ी सी पहल अब दिखाई पड़ रही है, जब प्रदेश की राजधानी ऐसे दिवालिया ठेकेदार से आजाद हुई है, और स्थानीय कर्मचारियों की मदद से शहर अब कुछ साफ दिख रहा है। अब एक तरफ तो अलग-अलग किस्म के कचरे के लिए अलग-अलग घूरे या डिब्बे बनाने की जरूरत है, ताकि उसका निपटारा आसान हो सके, और दूसरी तरफ शहरी कचरे से बिजली और खाद बनाने की जो तकनीक आम हो चुकी है, उसके लिए कुछ भरोसेमंद कंपनियों को साथ लेकर, या सरकार को खुद पहल करनी चाहिए। शहरी कचरा बढ़ते ही चलना है, और इसके कम होने का कोई आसार नहीं है, अगर सरकार बड़े पैमाने पर कई विभागों को और जनता को शामिल करके इसकी पहल नहीं करेगी। हमारे पाठकों को याद होगा कि हम बरसों से सरकार को यह सुझाते आ रहे थे कि राज्य में पॉलीथीन पर पूरी रोक लगाने के पायलट प्रोजेक्ट की तरह प्रदेश के तीन बड़े भीड़ भरे तीर्थस्थानों से शुरुआत करनी चाहिए। हमने दंतेश्वरी, बम्लेश्वरी और रतनपुर की महामाया के मंदिरों का नाम भी लिखा था कि वहां पर पॉलीथीन पूरी तरह रोककर, उसके साथ-साथ वहां कपड़े और जूट के थैलों को उपलब्ध कराने के लिए महिला स्व-सहायता समूहों को आगे बढ़ाना चाहिए, और ऐसे विकल्प आने पर जनता खुद भी पॉलीथीन से बचने की कोशिश करेगी। हमको इस बात पर खुशी है कि आज से छत्तीसगढ़ सरकार का जो प्रतिबंध लागू हो रहा है, उसके साथ-साथ सरकार ने ऐसे विकल्प विकसित करने की बात भी कही है। देर से ही सही, राज्य सरकार की यह पहल अच्छी है। 
अब हम एक बार फिर गटर साफ करने वाले कर्मचारियों की तरफ लौटें, तो मौत से पहले भी उनकी जो जिंदगी रहती है, वह रोज मरने जैसी रहती है। और वे जिस तबके के पैदा किए हुए कचरे को साफ करते हुए रोजाना घंटों गंदगी में डूबे रहते हैं, वह तबका तथाकथित पढ़ा-लिखा, शहरी और संपन्न तबका है, जो कि अपने पैदा किए हुए कचरे के मामले में बिल्कुल ही गैरजिम्मेदार भी है। लोगों पर पैकिंग के कचरे के लिए एक टैक्स लगाना जरूरी है जो कि व्यापार की जगह पर आसानी से लगाया जा सकता है। छत्तीसगढ़ को ऐसा पहला राज्य बनकर एक मिसाल पेश करनी चाहिए कि जिस सामान के साथ जितनी पैकिंग आती है, उस पर कागज, प्लास्टिक, या दूसरे सामानों के पर्यावरण-बोझ के अनुपात में टैक्स लगाया जाए। ऐसा करने पर लोगों को पैकिंग कम करने की आदत भी पड़ेगी, और किसी प्रदेश में इस्तेमाल के सामान के साथ जितना कचरा आता है, उसे निपटाने के लिए एक टैक्स भी मिल सकेगा। छत्तीसगढ़ को इस बारे में सोचना चाहिए, और पूरे देश की जनता को कचरा घटाने, और उसके सावधानी से निपटारे की अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। 

पीके के बारे में बिना पिए हुए

31 दिसंबर 2014
संपादकीय

एक फिल्म पीके में कई धर्मों के पाखंडों, अंधविश्वासों, और रीति-रिवाजों का मजाक उड़ाया गया है, और इसे लेकर कुछ हिन्दू संगठन देश में जगह-जगह नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। उनका मानना है कि एक मुस्लिम अभिनेता आमीर खान ने हिन्दू धर्म का मजाक उड़ाया है, और इस फिल्म पर रोक लगाई जाए। कुछ गंभीर विश्लेषकों ने यह सवाल उठाया है कि कुछ समय पहले इसी किस्म की एक और फिल्म, ओ माई गॉड, आई थी जिसमें हिन्दू धर्म का, धर्म गुरूओं का, और ईश्वर का इससे कहीं अधिक मजाक बनाया गया था, व्यंग्य कसे गए थे, लेकिन उसका ऐसा विरोध इसलिए नहीं हुआ था कि उसके मुख्य अभिनेता एक हिन्दू परेश रावल थे। 
हो सकता है कि यह बात सच हो, हो सकता है कि फिल्म के प्रचार के लिए खुद इसके निर्माता जगह-जगह इसके खिलाफ बखेड़ा करवा रहे हों, क्योंकि मनोरंजन की दुनिया में यह माना जाता है कि बदनाम हुए तो क्या नाम न हुआ? और हो सकता है कि आज देश में जिस तरह धार्मिक उन्माद को बढ़ाने की एक राजनीतिक और गैरराजनीतिक कोशिश हो रही है, उसके तहत भी इस फिल्म का विरोध किया जा रहा हो। लेकिन उत्तरप्रदेश सरकार ने आज एक साहसी फैसला लेकर इस फिल्म को मनोरंजन कर से मुक्त किया है। और समाजवादी पार्टी की सरकार के इस फैसले के दो दिन पहले की उस बात को भी हम साथ-साथ याद करेंगे कि किस तरह भाजपा के आज के सबसे वरिष्ठ सक्रिय नेता लालकृष्ण अडवानी ने इस फिल्म की खुद होकर खुलकर तारीफ की है। अब यह समझना थोड़ा मुश्किल है कि हिन्दू धर्म की भावनाओं को अगर अडवानी नहीं समझ पा रहे हैं, तो फिर और कौन समझ लेगा? 
दुनिया में अलग-अलग धर्मों के लोगों की संवेदनशीलता अलग-अलग होती है। इस्लाम पर बनने वाले कुछ कार्टून ऐसे रहते हैं कि जिनके खिलाफ सिर काट देने के फतवे भी जारी होते हैं। इस्लाम के भीतर ईश्वर की बातों की व्याख्या में ऐसे विरोधाभास भी रहते हैं कि मुस्लिम समुदाय के ही अलग-अलग तबके एक-दूसरे से लड़-भिड़कर सैकड़ों की जान ले लेते हैं। लेकिन भारत में हिन्दू समाज की सहनशीलता परंपरागत रूप से अधिक रही है। यहां पर गणेशोत्सव देखें, तो उनमें भी गणेश के रूप-रंग से लेकर साज-सज्जा तक हर जगह विविधता की आजादी रहती है। हिन्दू धर्म के भजनों को फिल्मी धुन पर ढाल दिया जाता है, गुजरात में हिन्दू धर्म के सबसे बड़े त्यौहार नवरात्रि के गरबा में वहां की सुंदरियों की खुली पोशाक देखते ही बनती है, हिन्दू धर्म के मंदिरों की दीवारों पर पूरे देश भर में कई जगहों पर एक ऐसी सेक्स-आजादी की प्रतिमाएं देखने मिलती हैं, कि जिनको आज कोई उकेरे, तो दंगा हो जाए। इसलिए हिन्दू धर्म एक बड़ी विविधता से भरा हुआ, अधिक सहनशीलता वाला, अधिक लचीलेपन वाला धर्म है, और इसके भीतर सुधारवादी, प्रगतिशील ताकतें हमेशा से काम करते आई हैं। सनातनी कट्टरता के खिलाफ बहुत से समाज सुधारकों ने पिछली सदियों में खूब काम किया है, और धार्मिक मान्यता प्राप्त सतीप्रथा बंद हुई, बालविवाह बंद हुए, और विधवा विवाह शुरू हुए। हिन्दू धर्म के सारे आयोजन ऐसे रहते हैं जिनमें सभी धर्मों के लोग शामिल होते हैं, और इस धर्म के भीतर की जो धर्मान्ध कट्टरता है, वह मु_ी भर लोगों तक सीमित है। ऐसे कुछ संगठन है जो अपने अस्तित्व को साबित करने के लिए, अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए कभी किताबें जलाते हैं, उन्हें पढ़े बिना, कभी नाटक पर रोक की मांग करते हैं, उन्हें देखे बिना, और कभी फिल्म पर प्रतिबंध मांगते हैं, उसे देखे बिना। कुल मिलाकर धार्मिक विरोध के नाम पर कभी साम्प्रदायिक एजेंडा लागू किया जाता है, तो कभी केवल फुटपाथी-हिंसा से खबरों में आया जाता है। हम लालकृष्ण अडवानी की तारीफ करेंगे कि उन्होंने खुलकर इस फिल्म की तारीफ की है। और हिन्दू धर्म के भीतर के जो लोग इसका विरोध करके जिंदा हैं, उनको समझना चाहिए कि अपने आपको बंद कर लेने वाला धर्म कुंद भी हो जाता है, उसका आगे बढऩा थम जाता है। 
भारत में धार्मिक पाखंड को खत्म करने के इतिहास को देखें तो सैकड़ों बरस पहले के उस गरीब और फक्कड़ कबीर पर फख्र होता है जिसने बिना किसी लोकतांत्रिक बचाव के, बिना किसी अदालती सहूलियत के, समाज के पाखंड के खिलाफ यह लिखा था कि कांकर-पाथर जोड़कर मस्जिद लेई बनाए, तां चढ़ मुल्ला बांग दे, बहरा हुआ खुदाए। आज किसी का यह हौसला है कि इतनी बड़ी बात कह सके? लेकिन दुनिया के धर्म, दुनिया की संस्कृतियां उनके कट्टर और पाखंडी लोगों से विकसित नहीं हुए हैं, वे विकसित हुए हैं अपने आप पर हंसने की ताकत रखने वाले लोगों से, वे विकसित हुए हैं अपने आपकी खामियों को दूर करने का हौसला रखने वाले लोगों से। हम इन बातों को लिखने के पहले इस फिल्म को देख चुके हैं, और इसके बारे में हमारी राय वही है जो अडवानी से लेकर अखिलेश यादव तक की है। जो धर्म अपने पाखंड की आलोचना पर भी आक्रामक हो जाता है, उस धर्म का, उसे मानने वालों का क्या हाल होता है, यह दुनिया के कई देशों में तालिबानियों ने दिखा दिया है। वहां पर अगर अपने धर्म की खामियों को दूर करने का हौसला होता, तो आज इतना बुरा हाल नहीं होता।