एक तीसरी राह का मौका

संपादकीय
12 जून 2013
भारत के राजनीतिक दलों में मोदी से जुड़ी हुई ताजा घटनाओं को लेकर करवट बदली जा रही है। जो एनडीए के भीतर थे, जो आज एनडीए में हैं, और जो कल तक यूपीए में थे, ऐसे दल आने वाले दिनों के लिए चुनावी संभावनाएं देख रहे हैं। और यह टटोलना अस्वाभाविक इसलिए नहीं है कि देश के दो बड़े गठबंधनों में उनके मुखिया-दलों के अलावा जो पार्टियां हैं, वे ऐसी मध्यमार्गी पार्टियां हैं जिनके पांव एक नाव से दूसरी नाव पर जाते हुए नहीं लडख़ड़ाते। इनमें इतनी बड़ी संख्या में नेता और उनकी पार्टियां शामिल हैं, कि पिछले तीन-चार चुनावों में देश ने इनके हर किस्म के गठबंधन, पालाबदल, और हमबिस्तरी को देखा है। कश्मीर के नेशनल कांफ्रेंस से शुरू करें तो बसपा, तृणमूल, जैसी कितनी ही पार्टियां हैं जो कि एक वक्त एनडीए के साथ रहीं, फिर कभी यूपीए के साथ रहीं, कभी इन दोनों से बाहर रहीं, और अब इनमें से कई लोग एक नए गठबंधन की संभावनाओं को भी टटोल रहे हैं। 
किसी भी नाम से अगर एक तीसरा मोर्चा बनता है, तो उसमें आने के लिए बहुत सी क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पार्टियों की संभावना बनती है। कश्मीर की दोनों क्षेत्रीय पार्टियां, तृणमूल, जदयू, सपा, राजद, टीआरएस, डीएमके, एडीएमके, राकांपा, मनसे, बीजद, वामपंथी, इस तरह की लिस्ट बहुत लंबी है, जिनमें से कुछ लोग जो एक-दूसरे से भारी परहेजी हैं, उनको छोड़कर बाकी की गिनती ऐसी बन सकती है कि उनके बिना केन्द्र में यूपीए या एनडीए की सरकार ही न बन सके। और एक ऐसी नौबत लाई जा सकती है कि केन्द्र में गठबंधन सरकार की जगह, गठबंधनों की मिलीजुली सरकार बने। कांग्रेस और भाजपा के कट्टर साथियों से परे की पार्टियां मिलकर ऐसा समीकरण बनाने की ताकत रखती हैं, और उनकी जीती लोकसभा सीटों के साथ समझौते के बिना 2014 की केन्द्र सरकार न बने, ऐसी नौबत भी लाई जा सकती है। और ऐसी नौबत को भी हम कैसे खारिज कर सकते हैं कि यह तीसरा मोर्चा सरकार बनाने की हालत में आए, और यूपीए या एनडीए उसके भीतर जाकर या बाहर से उसका समर्थन करे। कुछ लोगों को लग सकता है कि यह तराजू के एक पलड़े पर बहुत से मेंढकों को एक साथ तौलने जैसा काम होगा, लेकिन क्या ऐसा ही लोगों को पच्चीस साल पहले उस वक्त नहीं लगता था जब लोग कांग्रेस का एक विकल्प सोचते थे? आपातकाल ने देश में कांग्रेस का पहला मजबूत विकल्प सामने रखा था, बाद में जनमोर्चा नाम का विकल्प आया, फिर एनडीए बना, फिर यूपीए बना, और आज मोदी के नाम पर जो सहमति और असहमति हो रही है, उससे फिर ऐसे किसी तीसरे विकल्प की राह खुल सकती है। 
ऐसा कोई विकल्प अगर वामपंथियों को साथ में लेकर बन सकता है, तो वह अनिवार्य रूप से एक धर्मनिरपेक्ष विकल्प भी रहेगा, बाजार के भ्रष्टाचार से काफी हद तक आजाद भी रहेगा, और साम्प्रदायिक ताकतों के खिलाफ भी रहेगा। ऐसे विकल्प के रास्ते में कुछ प्रांतीय-आंतरिक टकराव भी रहेंगे, लेकिन कोई भी बड़ा गठबंधन ऐसे टकरावों से आजाद नहीं रह सकता और उनसे उबरकर ही उसे एक नई राह बनानी पड़ेगी। बिहार में लालू और नीतीश में से कोई एक ही ऐसे गठबंधन में रह सकेंगे, बंगाल से ममता या वामपंथी इनमें से कोई एक ही इसमें रह सकेंगे, कश्मीर की दो पार्टियों में से कोई एक ही इसमें रह सकेगी, लेकिन आज देश में क्षेत्रीय दलों की अपने-अपने इलाकों में जितनी पकड़ है, उसके चलते तीसरे मोर्चे की संभावनाएं निकल सकती हैं, और ऐसी कोई संभावना ही यूपीए और एनडीए की बददिमागी का जवाब हो सकती है। एक तरफ यूपीए ने अपनी सरकार के दौर में जितने तरह के गलत काम किए हैं, उनको लेकर वह एक कड़े सबक की हकदार है, और दूसरी तरफ एनडीए की मुखिया भाजपा ने जिस एकतरफा तरीके से मोदी की ताजपोशी की है, उससे वह भी एक विभाजन की हकदार बनती है। आने वाले दिन भारतीय राजनीति में बड़ी दिलचस्पी के साबित हो सकते हैं, और कुछ लोगों को तीसरे मोर्चे के साथ-साथ एक राजनीतिक अस्थिरता का खतरा दिख सकता है, ऐसे लोगों को पिछले नौ बरस की यूपीए की स्थिरता का नुकसान भी देखना चाहिए। 

मुद्दा आज भाजपा नहीं है, अर्धधर्मनिरपेक्ष जदयू है...

संपादकीय
11 जून 2013
भाजपा का यह भूचाल उसके इतिहास का इतना बड़ा पहला हादसा है। राम-लक्ष्मण की जोड़ी की तरह जो अटल-अडवानी जनसंघ के इतिहास से जनता पार्टी होते हुए भाजपा तक पहुंचे थे, उनमें से एक उम्रदराज होकर राजनीति से रिटायर हैं, और दूसरे खफा होकर बिस्तर पर हैं। लालकृष्ण अडवानी का पार्टी के पदों को छोडऩा छोटी बात नहीं है। इससे बड़ा झटका आज की भाजपा को और उसके नए-नए नायक बने नरेन्द्र मोदी को और कुछ भी नहीं लग सकता था। लेकिन इसे कई अलग-अलग पहलुओं से, अलग-अलग नजरियों से समझने की जरूरत है। 
भाजपा के अडवानी-खेमे के नजरिये से देखें तो उनकी असहमति की बाद भी बिजली के कड़कने और गिरने की रफ्तार से जिस तरह नरेन्द्र मोदी को भाजपा की एक अभूतपूर्व जिम्मेदारी दी गई, और ऐसा आभास होने दिया गया कि यह उनके प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने के सफर का एक कदम है, वह तरीका गैरजरूरी था और अडवानी जैसे बड़े नेता के साथ बदतमीजी का था। अडवानी समर्थकों का यह भी मानना है कि उन्हें सहमत कराकर, उनकी मौजूदगी में ऐसा करने का वक्त था, और ऐसी हड़बड़ी की क्या जरूरत थी। 
दूसरी तरफ अडवानी खेमे के बाहर के नेताओं का यह मानना है कि वानप्रस्थ आश्रम की उम्र में पार कर चुके लालकृष्ण अडवानी को इस जमीनी हकीकत को अब समझ जाना चाहिए था कि चुनाव अभियान का बोझ उनके बजाय नरेन्द्र मोदी जैसे लोग बेहतर उठा सकते हैं, और अडवानी को अपनी सीमित चुनावी संभावनाओं, सीमित वोट अपील का ख्याल रखते हुए ही मोदी का विरोध करना था, या भाजपा के लगभग सर्वसम्मत फैसले का विरोध करना था। इस तबके का मानना है कि अडवानी ने इस उम्र में आकर अपनी ऐसी फजीहत करवाई है, जिसका कि भाजपा के पास सिवाय सफेद बालों के प्रति शिष्टाचार के अलावा और कोई इलाज नहीं है। 
भाजपा के बाहर एनडीए के अर्धधर्मनिरपेक्ष-अर्धसाम्प्रदायिक जदयू की दुविधा अब बढ़ गई है, क्योंकि मोदी की ताजपोशी के बाद तो उसके पास जनता से मुंह चुराने के लिए यह तर्क बचा हुआ था कि भाजपा ने मोदी को महज चुनाव-प्रभारी बनाया है, प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी नहीं, लेकिन अडवानी के इस्तीफों के बाद अब जदयू के पास यह ओट भी खत्म हो गई है, और अब उसे एनडीए के भीतर अपनी जगह, भाजपा के साथ अपने रिश्तों, इन सबको लेकर आने वाले कुछ दिनों में ही अपना रूख जनता के सामने रखना पड़ेगा। फिलहाल यह पार्टी फिफ्टी-फिफ्टी मार्के वाले बिस्किट की तरह मीठे और नमकीन के बीच चल रही है। 
भाजपा और एनडीए के बाहर के हमारे जैसे लोगों में से कुछ का यह सोचना है कि यह मौका शायद एनडीए की संभावनाओं के साथ-साथ अडवानी की संभावनाओं का आखिरी मौका था, और इसे नरेन्द्र मोदी ने एक बेसब्र बाज की रफ्तार और अंदाज से झपट्टा मारकर बूढ़े हाथों से छीन लिया, इसके बाद अब खीझ उतारने के अलावा अडवानी के पास और कुछ नहीं बचा था। कुछ दूसरे लोगों का यह मानना है कि 2002 के दंगों के बाद तो जब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को मोदी एक राष्ट्रीय कलंक लग रहे थे, तब तो लालकृष्ण अडवानी ने लगभग हाथ थामकर ही प्रधानमंत्री को रोक दिया था, और मोदी को बचा लिया था। उसके बाद से मोदी का नया जुर्म क्या है? 2002 के बाद से अब तक मोदी ने यह अपराध जरूर किया है कि किसी राज्य में लगातार तीन चुनाव जीतने का एक रिकॉर्ड भाजपा के भीतर बनाया है, और उनकी उस कामयाबी से हो सकता है कि भाजपा के बड़े-बड़े लोगों के कद छोटे दिखने लगे हों, और खासकर लालकृष्ण अडवानी के लिए यह बात एक हीन भावना पैदा करती हो कि 2004 और 2009 के आम चुनावों में वे पार्टी के सबसे बड़े चुनाव प्रचारक थे, और इन दोनों चुनावों में पार्टी ने एनडीए के मुखिया के रूप में उसकी संभावनाओं को डुबाकर रख दिया था। तो अब हारे हुए अडवानी जीते हुए मोदी का विरोध किस हिसाब से कर रहे हैं? 
भाजपा के बाहर के कुछ लोग मोदी को बड़ा साम्प्रदायिक मानते हैं, और अडवानी को मोदी के मुकाबले उदारवादी मानते हैं। लेकिन भाजपा के बाहर के जानकार और समझदार लोग इस बात को कभी नहीं भूल पाते कि सत्ता मेें न रहते हुए अडवानी ने पेट्रोल फैलाने वाले टैंकर पर चढ़कर पूरे देश में जो रथयात्रा निकाली थी, और जिस तरह खड़े रहकर बाबरी मस्जिद गिरवाई थी, और जिस तरह बाबरी के बाद दंगों की नौबत खड़ी की थी, वहां से लेकर 2002 के मुजरिम नरेन्द्र मोदी को बचाने तक अडवानी ने कहां उदारता दिखाई? इन दोनों में क्या फर्क है? सिर्फ यही न कि मोदी में आज बेहतर चुनावी संभावनाएं हैं, उम्र और सेहत से लेकर शोहरत तक मोदी के साथ है, और पार्टी का एक बहुमत भी मोदी के साथ है। 
2002 में गुड़ की भेली को पूरा अकेले खाने वाले अडवानी आज जब गुलगुले के खिलाफ मोर्चा खोलकर बैठे हैं, तो वे अपनी फजीहत करवाने के अलावा कुछ नहीं कर रहे। हिन्दुस्तान की राजनीति की एक दिक्कत यह है कि कोई भी भूतपूर्व नेता नहीं होता, वे मरणोपरान्त भी नेता ही बने रहते हैं। अडवानी को उम्र के इस आखिरी पड़ाव में आकर अगर सिद्धांतों की बात करनी भी थी, तो उन्हें सबसे पहले 1992 पर सफाई देनी थी, देश से माफी मांगनी थी, 2002 पर सफाई देनी थी, देश से माफी मांगनी थी। इसके बिना आज की उनकी बात बेबुनियाद, बिना तर्क की, और बिना वजन की है। सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन में किसी संस्था के भीतर वरिष्ठता, और बुजुर्गियत को तर्कों और सामान्य समझदारी से ऊपर मानना गलत होता है। इसलिए भाजपा अगर अपने एक राजनीतिक फैसले पर टिकी रहती है, और अडवानी के प्रति एक आखिरी शिष्टाचार दिखाती है, तो उसे किसी हिसाब से गलत नहीं कहा जा सकेगा। उनका इस्तीफा वापिस होता है, या नहीं होता है, उससे कोई बहुत फर्क अब भाजपा और मोदी के भविष्य पर नहीं पडऩे जा रहा है। हमारे पाठकों को याद होगा कि दो दिन पहले ही हमने इसी मुद्दे पर इसी जगह लिखा था कि भाजपा के भीतर 2014 के चुनाव को लेकर अडवानी को प्रधानमंत्री के रूप में और मोदी को चुनाव संचालक के रूप में एक जोड़ी के रूप में भी पेश किया जा सकता है, जिससे साथी भी शायद साथ बने रहें, और नरम-गरम का मेल भी जनता के गले कुछ अधिक उतर सके। लेकिन शायद भाजपा के भीतर हड़बड़ी की वजह से, या उससे परे की कुछ वजहों से, ऐसी कोई सोच चर्चा में भी नहीं है। 
गलत और सही का सबसे बड़ा फैसला आज एनडीए के भीतर भाजपा को नहीं जदयू को करना है, और भाजपा के इस आंतरिक संकट, या असुविधा, से परे देश की नजरें अब शरद यादव-नीतीश कुमार पर टिकी हैं। 

मोदी के मायने

विशेष संपादकीय
10 जून 13
सुनील कुमार
भारतीय जनता पार्टी के भीतर जिस धूमधाम से नरेन्द्र मोदी की ताजपोशी हुई है, वह किसी चुनाव समिति के चेयरमेन की नहीं है। और होनी भी नहीं चाहिए थी। इस पार्टी के भीतर एक बाद दूसरा राज्य खोने, इंडिया शाईनिंग की चमक अटल-अडवानी के रहते खोने, और अपने पिछले अध्यक्ष के विवादों में बिदा होने के बाद अब नरेन्द्र मोदी के अलावा भाजपा के पास और कौन सा करिश्मा रह गया था? जो लोग लालकृष्ण अडवानी में अगले चुनाव में करिश्मा दिखाने की उम्मीद अब भी रखते हैं, उनको याद रखना चाहिए कि छह बरस की सत्ता के बाद अटलजी की छत्रछाया में भी अडवानी भाजपा की शाईनिंग बचा नहीं पाए थे। उस वक्त तो यह लग ही रहा था कि अटलजी की बढ़ती उम्र के चलते अबकी बारी अटल बिहारी के बजाय बारी अडवानी की रहेगी। लेकिन वैसा कोई असर हो नहीं पाया था। नतीजा यह है कि आज दस बरस बाद के चुनाव में भाजपा को चमकाने का जिम्मा अगर अडवानी से एक पीढ़ी नीचे के ऐसे नरेन्द्र मोदी को दिया गया है जिन्होंने गुजरात में लगातार तीन बार सरकार चलाई है, तो पार्टी के पास इससे बेहतर और रास्ता ही क्या था? नरेन्द्र मोदी के पास तो यह विकल्प था कि वे एक बार और एनडीए, मतलब भाजपा, को जीतने या हारने का मौका देकर छह बरस बाद के आम चुनाव तक अपनी अच्छी सेहत के साथ इंतजार कर लेते, लेकिन भाजपा 2014 के चुनाव में और इंतजार, किसी और का इंतजार करने की हालत में नहीं थी। नतीजा यह हुआ कि नरेन्द्र मोदी भाजपा की आज की लगभग सर्वसम्मत पसंद भी बन गए, और वे अकेले विकल्प भी थे। मोदी ने भाजपा के भीतर भी इस बात को लगातार साबित किया कि यूपीए के राष्ट्रीय नेतृत्व पर हमला करने के सबसे बड़े हकदार खुद भाजपा के भीतर वे अकेले रह गए हैं, जो अपनी कुछ उपलब्धियों के चलते बड़े बोल बोल सकते हैं। पिछले बरसों में मोदी ने भाजपा के किसी भी राष्ट्रीय नेता के मुकाबले यूपीए पर अधिक धारदार हमले किए, और खुद गुजरात का नेता रहना खत्म ही कर दिया था।
अब गुजरात के नरेन्द्र मोदी की बात करें। गुजरात के 2002 के दंगों को लेकर उन पर से दाग न अभी धुले हैं, न आगे धुलेंगे। इतिहास को क्लासरूम के ब्लैकबोर्ड की लिखावट की तरह मिटाया नहीं जा सकता। अब सवाल यह उठता है कि इतिहास के साथ जिया जाए, या आज के साथ? बीते बरसों के कैलेण्डरों की तारीख देखते हुए शायद आने वाले बरसों को नहीं गढ़ा जा सकता, इसलिए दुनिया में जगह-जगह लोग ऐतिहासिक अपराधों से उबरकर आगे देखना शुरू करते हैं। भारत का इतिहास भी ऐसी घटनाओं से भरा हुआ है। जिस विचारधारा ने गांधी को मारा था, वह अपने मंचों पर गांधी को टांगने लगी, राजघाट पर गांधी की शपथ लेने लगी। जिस विशाल वृक्ष के गिरने से धरती के हिलने की बात के साथ-साथ हजारों सिख मार दिए गए थे, उस वृक्ष की शाखाएं आज लोकतंत्र में चारों तरफ फैली हुई हैं। बाबरी मस्जिद को गिराने वाले हाथों से समाजवादियों ने हाथ मिलाकर धर्मनिरपेक्षता की एक नई परिभाषा देश के सामने रखी। लोग कहते हैं कि राजनीति में हैरान कर  देने वाली अजीब और अजनबी हमबिस्तर निकल आते हैं, इसलिए भारतीय चुनावी इतिहास में संविद से लेकर जनता पार्टी तक, और जनमोर्चे से लेकर एनडीए और यूपीए तक, कितने ही लोगों ने कितने ही लहू सने हाथों से अपने शाकाहारी हाथों को मिलाया, और सरकार की इमारत गढ़ी। इसलिए आज मोदी को लेकर अगर भाजपा के भीतर और भाजपा के बाहर एनडीए के भीतर अगर एक अधिक बर्दाश्त बन चुका है, तो वह लोगों की इस स्वाभाविक सोच के मुताबिक है जिसमें आने वाले कल को बीते हुए कल के मुकाबले अधिक तवज्जो दी जाती है। 
लेकिन मोदी के आने के कुछ और मायने भी हैं। लोग साम्प्रदायिकता को अकेली बुराई नहीं समझते। साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिक हत्याएं, हत्यारों की बिरादरी में भी सबको बर्दाश्त नहीं होतीं। लेकिन साम्प्रदायिकता के साथ-साथ भ्रष्टाचार, बेईमानी, जालसाजी और लूटमार, इन सबको भी लोग साम्प्रदायिकता के बराबरी की, या उससे छोटी, या उससे बहुत छोटी सही, बुराई समझते हैं। पिछले बरसों में खुद भाजपा के येदियुरप्पाओं ने जिस तरह की लूटमार देश में की, उससे भाजपा के भीतर मोदी का कद बढ़ा। जिस तरह यूपीए की सरकार ने देश में लूटमार की, उससे चाहे पूरे एनडीए का कद न बढ़ा हो, चाहे पूरी भाजपा का कद न बढ़ा हो, मोदी का कद जरूर बढ़ा। यूपीए की सरकार और राजनीति में से ईमानदारी जिस बड़े पैमाने पर गायब हुई, तो उससे पैदा हुए एक विशाल और विकराल शून्य में मोदी एक अंधड़ की तरह पहुंचकर समा गए। कुदरत का कानून है कि शून्य कहीं खाली रह नहीं पाता, यूपीए ने सार्वजनिक जीवनमूल्यों और नैतिकता का जो शून्य पैदा किया, उसमें लहू सने हाथों सहित एक दागदार मोदी कुर्ता दाखिल हो गया, समा गया और सम्मान पा गया। इसलिए मोदी की ताजपोशी भाजपा के भीतर मोदी की जीत नहीं है, भारतीय लोकतंत्र के भीतर यूपीए का तख्ता लगाकर चल रही धर्मनिरपेक्षता की दूकान का दीवाला निकलना है। मोदी की यह ताजपोशी दरअसल यूपीए की मुखिया कांगे्रस ने की है। आज कांगे्रस को इस बात की फिक्र हो रही है कि भाजपा के भीतर लालकृष्ण अडवानी जैसे बुजुर्ग और वरिष्ठ नेता को हाशिए पर ला दिया गया है, लेकिन इस पल भर की राजनीतिक मसखरी से परे अगर इस पार्टी में कोई गंभीरता होती तो यह पार्टी इस हमदर्दी के पहले यह भी याद रखती कि किस तरह की रथयात्रा के बाद अडवानी ने बाबरी मजिस्द गिरवाने का सामान किया था, और उसके बाद के दंगों में किस तरह हजारों लोगों के मारे जाने की नौबत आई थी। इस मसखरी के बीच कांगे्रस को यह भी याद रहता कि 2002 के दंगों के वक्त यही अडवानी देश के गृहमंत्री थे, एनडीए के भीतर दूसरे नंबर के नेता थे, और उन्होंने ही इसी गोवा के रास्ते विमान में प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी को मोदी के पक्ष में नरम किया था, मोदी को बचाया था। इसलिए मोदी के आने से हड़बड़ाई हुए कांगे्रस को एकाएक अडवानी का इतिहास भूला जा रहा है, और अपना एक मुश्किल चुनावी भविष्य दिख रहा है। मोदी अपनी कामयाबियों की उपज कम हैं, देश की बाकी नाकामयाबी की उपज अधिक हैं। मोदी के कद की लकीर तो उसी कद की बनी रह सकती थी, अगर भाजपा की येदियुरप्पा नाम की, और यूपीए की अनगिनत लकीरें अपने-आपकी लंबाई को घटाकर एक बिंदु जितना न बना चुकी होतीं। भाजपा के भीतर और भाजपा के बाहर आज जो लोग भी कुल दस बरस पहले के गुजरात को भूलाकर मोदी को देश का नायक मानना चाह रहे हैं, मान रहे हैं, उनको बाकी बिंदुओं के बीच मोदी एक लकीर दिखता है, तो दिखता है। 
लोकतंत्र, और खासकर भारत के जैसा विविधताओं से भरा हुआ एक बहुत ही जटिल लोकतंत्र, अपने भीतर बहुत किस्म की गुंजाइशों को लेकर चलता है। एक तरफ वे वामपंथी हैं, जिनके तीन दशक से अधिक के लगातार राज के बाद भी उनकी दुश्मन नंबर एक मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने भी उनकी एक भी बेईमानी नहीं पा सकी है। दूसरी तरफ बाकी तकरीबन तमाम पार्टियों पर काबिज अंतहीन ऐसे बेईमान लोग हैं जिनको लोग जेलों में देखने की उम्मीद करते हैं। इनके बीच अलग-अलग जगहों पर अपने कुनबों को मुर्गीखाने की तरह बढ़ाते हुए ऐसे लोग हैं जो कि लोकतंत्र को खानदानी राजतंत्र साबित करने में लगे हैं। देश भर में फैली सत्ता की कुनबापरस्ती, और कुनबों की सत्ता के बीच मोदी एक ऐसा नाम है जिसके न आगे कोई है, न पीछे। इसने भी मोदी को एक अलग साख दी है। इनके बीच ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने अपने राज्यों को तबाह करके रख दिया है और वे राज्य अब उनके फैलाए हुए अंधकार से बाहर ही नहीं आ पा रहे हैं। ऐसे कई पैमानों पर मोदी का काम दूसरों से बहुत बेहतर रहा है, और इन सबने उनके दाग ढांकने का काम भी किया है। 
मोदी के आने के मायने यह भी हैं कि आज भारत की बहुसंख्यक आबादी का बहुसंख्यक तबका धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिकता जैसे मुद्दों के मुकाबले आर्थिक विकास और बेहतर सरकार को अधिक अहमियत देते सुनाई पड़ता है। यह बात हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि जिस तबके की आवाज शहरों से निकलती है, मीडिया तक पहुंचती है, वह तबका पैसों से अधिक जुड़ा हुआ तबका है। अब यह आवाज भाजपा के परंपरागत प्रभावक्षेत्र के बाहर से भी उठ सकेगी या नहीं, यह आने वाले वक्त की बात है। अगले चुनाव में मोदी का करिश्मा भाजपा और एनडीए को कितना फायदा दिला पाएगा, यह तो चुनाव ही बताएगा, लेकिन भाजपा के भीतर उसके सिद्धांतों और मूल्यों के मुताबिक मोदी से बेहतर और कुछ नहीं हो सकता था, 2014 के चुनावों के लिए। इसलिए इस पार्टी ने यूपीए के मुकाबले अपना एक ऐसा चेहरा पेश किया है, जो कि इसकी खुद की मौजूदा लीडरशिप से अधिक करिश्मा रखता है। आज अगर यूपीए और उसकी मुखिया कांगे्रस पार्टी देश के भीतर इतना बड़ा शून्य खड़ा नहीं करतीं, देश की बाकी पार्टियां और बाकी नेता इतनी बुरी मिसालें पेश नहीं करते, तो मोदी एक आम नेता बने रहता। मोदी विरोधियों ने ही मोदी को खास बनाने की नौबत खड़ी की है।

धूमकेतु और उनके मोहताज

10 जून 2013
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में सबसे अधिक छपने वाले नामों और तस्वीरों में से एक फरार है। अरबों की कॉलोनी बनाने वाला संजय बाजपेयी नाम का आदमी कई किस्म के जुर्म दर्ज हो जाने के बाद गायब हो गया है, और उसके धोखे के शिकार लोगों में से एक सरकार है जो कि कार्रवाई कर रही है, और दूसरी तरफ सैकड़ों लोग हैं जिन्होंने अपने पैसे लगाकर इस आदमी से जमीन या मकान लेने के सौदे किए थे। लेकिन जमीन-जायदाद के धंधे में जालसाजी और धोखाधड़ी तो चलती ही रहती है, उस पर चर्चा की गुंजाइश बहुत बड़ी नहीं रहती। लेकिन इस आदमी के साथ बहुत सी दूसरी बातें जुड़ी हुई हैं, जिन पर समाज के अलग-अलग तबकों को सोचना होगा। 
यह आदमी एक धूमकेतु की तरह जमीन-जायदाद के बाजार में आया और उस पर छा गया। उसके इश्तहारों से कई अखबारों के पन्ने रंगे रहते थे, और ऐसे अखबारों के बाकी पन्ने संजय बाजपेयी की खबरों से रंगे रहते थे। बाजार में यह चर्चा रहती थी कि वह बहुत ऊंचे ब्याज पर अरबों रूपये उठा चुका है, और उसका बुलबुला कभी भी फूट सकता है, लेकिन ऐसी बातों के कोई सुबूत तो रहते नहीं, इसलिए इनकी खबरें नहीं बन पाईं। लेकिन जो खबरें बनीं, वे देखने लायक थीं।
एक बिल्डर या जमीन-जायदाद का एक कारोबारी, एक कॉलोनी बनाने वाला किस तरह रातों-रात छत्तीसगढ़ के चेंबर ऑफ कॉमर्स का सबसे बड़ा और सबसे चर्चित चेहरा बन गया, उसकी छांह तले चेंबर के बड़े-बड़े नेता अपनी तस्वीरें अखबारों में पाने लगे, इश्तहारों में पाने लगे, और सड़क किनारे की होर्डिंग्स में भी पाने लगे। शहर का कोई उर्स या कोई दूसरा जलसा उसके बिना पूरा नहीं हो रहा था, और शहर की दीवारों पर उसके नाम से समाज सुधार के जितने तरह के नारे लिखे हुए थे, उतने नारे बाकी तमाम समाज सुधारकों की तरफ से मिलकर भी नहीं लिखे गए थे। 
संजय बाजपेयी नाम के इस कारोबारी के खिलाफ जुआं खेलते पकड़ाने की खबर हो, या जमीनों में जालसाजी की खबर हो, उसके इश्तहारों से लबालब अखबारों में उन खबरों के लिए जगह नहीं निकल पाती थी, लेकिन ऐसा कोई दिन नहीं गुजरता था जब उसकी छपी हुई तस्वीरों की गिनती प्रदेश के मुख्यमंत्री की छपी हुई तस्वीरों से कम होती हो। 
एक मसीहा की तरह वह बच्चियों को बचाने वाला समझा जा रहा था, पेड़ लगवाने वाला समझा जा रहा था, और बहुत से लोगों का यह अंदाज भी था कि वह आने वाले विधानसभा चुनाव में इसी राजधानी की किसी सीट से किसी दिग्गज के खिलाफ चुनाव लड़ सकता है। उसके साथ मिलकर अखबार बड़े-बड़े कार्यक्रम करते थे, प्रदेश के बड़े-बड़े नेता और अफसर उसके साथ मंच पर रहते थे। 
आध्यात्म को लेकर आर्ट ऑफ लिविंग वाले श्रीश्री रविशंकर का इस शहर का सारा कारोबार संजय बाजपेयी के कंधों पर सवार चलता था, और उसकी पत्नी सरिता बाजपेयी यहां पर श्रीश्री रविशंकर की प्रमुख आयोजक थी। लगातार लंबे बरसों से रविशंकर का काम यहां जिस तरह के लोग देख रहे हैं, और उनकी जिस तरह की साख है, उससे उनके आध्यात्म और उनके चिंतन पर, उनकी पसंद पर भी सवाल उठते हैं।
अब समाज को अलग-अलग बहुत से तबकों को यह सोचना है कि आज सरकार से लेकर ग्राहकों तक को जालसाजी और धोखाधड़ी से चूना लगाकर फरार हो गया यह आदमी किस तरह इस शहर का सबसे बड़ा, प्रचारित चेहरा बनकर चल रहा था, और किस बूते पर चल रहा था? जिसकी इश्तहार देने की ताकत हो? जिसकी कार्यक्रमों के आयोजनों की ताकत हो? जिसकी दीवारों पर नारे लिखवाने की, सड़क किनारे होर्डिंग लगवाने की ताकत हो, क्या ऐसे तमाम लोग समाज सुधारक और समाज के मसीहा बनकर छा सकते हैं? और छाने के लिए यह आसमान चेंबर जैसे जिस संगठन से लेकर मीडिया के बड़े-बड़े संस्थानों ने संजय बाजपेयी को मुहैया कराया था, वह देखने लायक था। तो क्या समाज इस कदर खोखला और कमजोर हो गया है कि उसके सिर पर जो चांदी का जूता मारे, उसके सामने समाज सिर झुकाकर बिछ जाएगा?
यह एक मामला बताता है कि कुछ करोड़ खर्च करके लोग किस तरह दर्जनों या सैकड़ों करोड़ की धोखाधड़ी भी कर सकते हैं, और समाज के मसीहा भी बन सकते हैं। समाज उसे उसकी जाति के नायक का सम्मान भी देता है, देश के सबसे बड़े आध्यात्मिक गुरू उसे सम्मान देते हैं, सत्ता उसके साथ भागीदारी करती है, मीडिया उसके सामने बिछे जाता है, और दूसरी खबरें तभी छपती हैं जब ऐसे विज्ञापनदाता की खबरें उस दिन और अधिक नहीं बच जातीं। समाज के बड़े-बड़े लोग ऐसे आदमी के इर्दगिर्द इसलिए खड़े रहते थे कि उसकी तस्वीर तो छपनी ही छपनी है, उसके साथ-साथ अगल-बगल वालों की तस्वीर भी छप जाएगी।
यह एक भयानक हाल है। छत्तीसगढ़ की इसी राजधानी के लोगों को याद होगा कि अभी दो-चार बरस के भीतर ही ऐसा ही एक दूसरा धूमकेतु स्कूलों का एक जाल लेकर सामने आया था और एक अखबार को भारी धूमधड़ाके से शुरू करके तकरीबन रोजाना सत्ता और समाज के साथ मंच पर हिस्सेदारी करने लगा था। उस वक्त भी सरकार और समाज ने, लोगों ने और जांच एजेंसियों ने कभी यह नहीं सोचा कि यह सारा बैंडबाजा आखिर कैसे बज रहा है? 
आज दिक्कत यह है कि जो चांदी के कलदार खनखना सके, उसके दरवाजे समाज के बड़े-बड़े तबके, खासकर ऊंचे समझे जाने वाले तबके कतार लगा लेते हैं। पैसों का बोलबाला इतना हो गया है कि दर्जनों कटघरों में खड़े माफिया भी नगदी खर्च करके मंच, माईक, माला, महत्व खरीद लेते हैं, बाजार में भी, और मीडिया में भी। हर कुछ बरसों में ऐसे लोग आते-जाते हैं, और इनको आसमान पर बिठाने वाले इनके जाने के बाद ऐसे अगले किसी धूमकेतु के मोहताज बने राह तकते हैं कि ऐसा कोई और आए, अपनी थैली लाए।

आदिवासियों पर मप्र सरकार की सनातनी सोच का हमला

विशेष संपादकीय
9 जून 2013
मध्यप्रदेश में सरकारी खर्च पर गरीब तबकों की लड़कियों के सामूहिक विवाह  मुख्यमंत्री कन्यादान योजना के तहत हो रहे हैं। लेकिन अभी बैतूल जिले में जब साढ़े चार सौ जोड़ों की शादी तय हुई, तो सारी तैयारी हो जाने के बाद जिले के अफसरों ने लड़कियों की कौमार्य जांच और गर्भ जांच करवाई कि कहीं वे इस योजना का फायदा उठाने के लिए तो शादी करने नहीं चली आई हैं। इनमें से नौ आदिवासी लड़कियां गर्भवती निकलीं तो शादी के कपड़े उतरवाकर वापिस भेज दिया गया। इस पर जब हल्ला मचा तो उसकी जांच शुरू की गई। 
जैसा कि मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार से उम्मीद की जाती थी, दलितों और आदिवासियों के मुद्दों की उसकी समझ सतही भी नहीं है। यही वजह है कि इस राज्य में लगातार दलितों पर अत्याचार होते हैं, दलितों को जलाया जाता है, उन पर बलात्कार होते हैं। कमोबेश यही हाल आदिवासियों का है, और मनुवादी जाति व्यवस्था में ऊंची ठहराई गई जातियों के नेता और अफसर दलित-आदिवासी, महिला और गरीब के साथ ठीक वैसा ही बर्ताव कर रहे हैं जैसा कि वेदों में सुझाया गया है। मध्यप्रदेश में आए दिन कभी कांगे्रस और कभी भाजपा के नेता महिलाओं के बारे में अपमानजनक बयान देते हैं, और अभी अफसरों ने यह काम किया है। 
आदिवासी समाज में लड़कियों का शादी के पहले अपनी पसंद के लड़के को छांटकर गर्भवती हो जाना कोई अनहोनी बात नहीं है। यह उस समाज के अपने रीति-रिवाज और सामाजिक संस्कारों के हिसाब से एक मान्य बात है। और आज हिंदू समाज के उच्च वर्ण कहे जाने वाले तबके ने आदिवासियों के लिए हिकारत की जो सोच दिखाई है, वह भी कोई नई नहीं है। जो हिंदूवादी सोच आदिवासियों को हिंदू करार देने पर आमादा रहती है, और जिसे यह बात गले नहीं उतरती कि हिंदू धर्म बनने के बहुत पहले से आदिवासियों का अपना धर्म या उनकी अपनी अलग आस्था चली आ रही है, ऐसी सोच आदिवासियों को हिंदू करार देकर उन पर सनातनी हिंदू संस्कार थोपने में लगी रहती है। कभी यह आदिवासियों से मांसाहार छुड़ाना चाहती है, कभी यह उनसे शराब छुड़वाना चाहती है, और पूरे वक्त यह उनको सनातनी हिंदू देवी-देवताओं की तरफ धकेलने में लगी रहती है। इस मुद्दे पर जानकार लोगों ने इतना कुछ लिखा हुआ है कि उन तर्कों को यहां पर  अधिक खुलासे से दुहराना मुमकिन नहीं है। लेकिन यह समझने की जरूरत है कि सत्ता को हांकने वाले लोग खुद जिस जाति के होते हैं, जिस धर्म के होते हैं, उसके लिए अगर उनके मन में कट्टरता होती है, तो वह उनके सार्वजनिक और सरकारी फैसलों और रूख में पूरे वक्त झलकती है। जिस जिले में यह हुआ है वहां पर कलेक्टर राजेश प्रसाद मिश्रा का नाम सामने आया है, राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जाहिर तौर पर गैरआदिवासी हैं। भाजपा की सत्ता में, या जाति आधारित दूसरी पार्टियों की सत्ता में जब गैरदलितों और गैरआदिवासियों का बोलबाला होता है तो उसके ऐसे नतीजे जगह-जगह, समय-समय पर सामने आते रहते हैं। 
मध्यप्रदेश की हिंदू-भाजपा सरकार को यह समझना होगा कि आज की उसकी जो आक्रामक-हिंदुत्ववादी नीति है वह इसी हिंदू धर्म में हमेशा से नहीं रहते आई है। महाभारत काल में हिंदू समाज में ऐसा चलन था कि लड़कियां शादी के पहले अपने पिता के घर में ही गर्भवती हो सकती थीं, और शादी के बाद जाते हुए वे अपने ऐसे बच्चों को लेकर जाती थीं। एक उपनिषद का एक जिक्र पहली नजर में हमको अभी मिला है जिसमें सत्यकाम अपनी मां जबाला से अपना गोत्र पूछता है, तो उसकी मां कहती है- ''बेटा मैं नहीं जानती तू किस गोत्र का है। अपनी युवावस्था में जब मैं अपने पिता के घर आए हुए बहुत से अतिथियों की सेवा में रहती थी, उस समय तू मेरे गर्भ में आया था। मैं नहीं जानती तेरा गोत्र क्या है। मेरा नाम जबाला है, तू सत्यकाम है, अपने को सत्यकाम जबाला बताना।ÓÓ
ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता उपन्यासकार भैरप्पा ने महाभारत की पृष्ठभूमि पर ऐतिहासिक वर्णन के साथ जो विख्यात किताब 'पर्वÓ लिखी है उसमें शल्यराज बैल के मांस को चबाते हुए बैठे रहता है, और उसकी पत्नी अपनी बेटी के मासिक धर्म शुरू होने का जिक्र करते हुए याद दिलाती है कि गर्भधारण की क्षमता आने के बाद गर्भवती न होना धरती को बंजर छोडऩे के बराबर पाप है। पत्नी याद दिलाती है कि-''...हमारे विवाह के पहले मेरा एक पुत्र था न? वहीं जो मेरे मायके में पैदा हुआ था, शादी के समय आप ही ने कहा था कि जब लड़की मेरी हो गई, तो उसके पेट से हुई संतान क्या मेरी नहीं हुई?...ÓÓ
अब ऐसे इतिहास के लिए आज की एक पाखंडी शुद्धतावादी हिंदू सोच में कोई जगह नहीं है। और जब एक राज्य की योजना सरकारी पैसों से चलती है, तो उस राज्य में तो ईसाई भी बसते हैं, जिनके बारे में मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार को यह मालूम होना चाहिए कि उनके धर्म के ईसा मसीह के एक कुंवारी मां से पैदा होने की मान्यता है। तो क्या मध्यप्रदेश के सरकारी पैसों से जनकल्याण के नाम पर चलने वाली योजनाओं को सिर्फ सनातनी संस्कृति के पाखंडी मूल्यों पर चलाया जाएगा? 
भारत के आदिवासियों पर तरह-तरह के हमले हो रहे हैं। देश के कई हिस्सों में आदिवासी और दलित गोमांस खाते हैं, भाजपा का यह एक बड़ा मुद्दा है कि पूरे देश में गोवंश के 'वधÓ पर रोक लगाई जाए। दूसरे जानवर काटे जाते हैं, लेकिन गाय का वध (हत्या) होता है। आदिवासी और दलित खानपान उनकी गरीबी से भी जुड़े रहते हैं, और इसलिए कई किस्म के मांसाहार पर वे आश्रित रहते हैं। आज गोमांस को एक राजनीतिक मुद्दा बनाकर भाजपा अपने-आपको उत्तर-पूर्वी राज्यों के अलावा देश के बहुत से हिस्से के दलितों और आदिवासियों से अपने को दूर कर ले रही है। शहरी, संपन्न, उच्चवर्ण और सनातनी हिंदुत्व की सोच को बाकी देश पर थोपने का दुराग्रह आदिवासियों और दलितों को हिंदू समाज से काटते भी चल रहा है, और लोकतंत्र से भी। यही वजह है कि एक प्रतीकात्मक विरोध के रूप में दिल्ली में वामपंथी, उदारवादी, लोकतंत्रवादी सामाजिक कार्यकर्ता गोमांस का भोज आयोजित करते हैं। यह विरोध उस पाखंडी सनातनी-हिंदू हमले का रहता है जो अपने-आपके उस इतिहास को ही छुपाने में लगे रहता है जिसमें राम और कृष्ण के युग गोमांस खाने के चलन से भरे हुए थे। आज राम और कृष्ण को तो पूरे देश पर लादने की कोशिश है, लेकिन उनके युग के सामाजिक चलन को मानने से भी इंकार है।
कोई हैरानी नहीं कि हिंदू धर्म में पांवों के तलुओं की तरह माने गए दलित बौद्ध और मुस्लिम हो रहे हैं, और आदिवासी ईसाई बन रहे हैं। हिंदू धर्म अपने पाखंडी मूल्यों और संस्कारों के साथ एक बहुत छोटे तबके का ही प्रतिनिधि बनकर रह जाएगा, जिससे कि दलित-आदिवासी कटे हुए हैं ही, समझदार और इंसाफपसंद लोग भी कटते चले जा रहे हैं। 

अडवानी और मोदी, भाजपा में दोनों एक साथ क्यों नहीं?

संपादकीय
8 जून 2013
भारत की राजनीति, यहां का मीडिया और देश के मतदाता, इनके बीच आज सिर्फ एक सवाल तैर रहा है, मोदी पर हां, या ना। एक दूसरा सवाल शायद यह भी है कि मोदी या अडवानी। तीसरा सवाल अभी बहुत दूर है कि भाजपा या कांग्रेस, एनडीए या यूपीए। लेकिन आज के सवाल से भाजपा उस मुहाने पर आकर खड़ी हो गई है जिस मुहाने पर उसे बिहार के उसके साथी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लाना चाहते थे। अंग्रेजी की एक कहावत है कि पुल पार करने का फैसला तब लिया जाएगा, जब पुल तक पहुंचा जाएगा। नीतीश कुमार अपनी सारी सार्वजनिक बयानबाजी से भाजपा को जहां नहीं ला पाए, वहां भाजपा खुद-ब-खुद पहुंच गई। और आज जब यहां पर इस बारे में लिखा जा रहा है तो वहां गोवा में मोदी की ताजपोशी अब या कब का फैसला हो चुका होगा, और उसकी मुनादी कुछ देर में होने को होगी। 
इसके साथ-साथ अब एक सवाल यह भी उठता है कि प्रधानमंत्री पद का भाजपा या एनडीए का अगला कौन सा दावेदार बेहतर होगा? इस बारे में संघ परिवार से लेकर कांग्रेस तक, और मीडिया से लेकर जनता तक, अपनी-अपनी राय है। एक राज्य को अपने अंदाज की कामयाबी के साथ चलाने वाले नरेन्द्र मोदी तीन चुनाव जीतने के बाद भाजपा के भीतर विश्वविजेता की तरह देखे जा रहे हैं, और एनडीए की भारत विजय उन्हीं के हाथों कई लोगों को दिखती हैं। कई लोगों को हिन्दुत्व से लेकर मंदिर तक का रास्ता मोदित्व की पीठ पर सवार होकर ही दिखता है। लेकिन नारों से परे जो लोग थोड़ा सोचते हैं, वे यह भी देखते हैं कि प्रधानमंत्री बनने की अधिक काबिलीयत किसमें है, मोदी में या अडवानी में? अभी हम देश के भीतर एनडीए, और एनडीए के भीतर भाजपा की लीडरशिप की कल्पना करके देखते हैं, और इन दो नामों को तौलते हैं, तो इन दोनों के नाम साम्प्रदायिकता को भड़काने के अलग-अलग दौर जुड़े हुए हैं। जहां मोदी के नाम के साथ ढेरों लहू जुड़ा हुआ है, अडवानी के नाम के साथ देश को बांटने वाली रथयात्रा से लेकर बाबरी मस्जिद को गिराने तक के दाग जुड़े हुए हैं। इसलिए भाजपा के भीतर इन दोनों के रिकॉर्ड में बेदागी जैसी कोई बात नहीं है, एक के हाथ लोगों को रंगे दिखते हैं, तो दूसरे के हाथ में मस्जिद गिराने की कुदाली दिखती है, और बाबरी के बाद के दंगों की जिम्मेदारी दिखती है। एक के पास राज्य को साम्प्रदायिकता के साथ-साथ कामयाबी से चलाने का गहरा तजुर्बा दिखता है, तो दूसरे के पास केन्द्रीय राजनीति का आधी सदी का अनुभव है, और 1977 से लेकर 2000 तक कई बार बड़े मंत्रालय चलाने का अनुभव है। इन दोनों की ही निजी ईमानदारी की साख भारतीय राजनीति के पैमानों पर बेदाग है, और इनके परिवार का कोई कलंक इन पर नहीं हैं।
अब सवाल यह है कि एक पार्टी के रूप में भाजपा अगले चुनाव को लेकर इनमें से किसे प्रधानमंत्री पद के अपने उम्मीदवार के रूप में पेश करे, और किसे चुनाव की कमान थमाए? क्या इन दोनों में से किसी एक को ये दोनों जिम्मेदारी दी जा सकती हैं? या फिर दो अलग-अलग लोग इन दो अलग-अलग कामों को करें? अब एनडीए से बाहर आकर अगर यूपीए को देखें, तो पिछले दो चुनाव सोनिया गांधी की अगुवाई में लड़े गए, और प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह सामने आए। अगर मनमोहन सिंह के नाम पर वोट मांगे जाते, तो शायद पूरे देश में कांग्रेस की जमानत जब्त हुई रहती। इसलिए वोटों को पाने का करिश्मा रखने वाली सोनिया गांधी को नेता की तरह पेश किया गया, वे चुनाव चिन्ह रहीं, उन्हीं का चेहरा पोस्टरों पर हावी रहा, लेकिन चुनाव जीतने के बाद चली सरकार के नौ बरस के मुखिया मनमोहन सिंह रहे। आज भाजपा  भारतीय राजनीति में उसके सामने के इस विकल्प पर पता नहीं सोच रही है या नहीं, लेकिन वोटों की अपील का करिश्मा शायद मोदी के साथ अधिक हो, और केन्द्र सरकार चलाने की काबिलीयत शायद अडवानी के पास अधिक हो। सत्ता के ऐसे दो केन्द्र, यह जिम्मेदारियों का ऐसा बंटवारा पिछले दस बरस में कांग्रेस ने लगातार पेश किया है, और हो सकता है, कि कुछ दूसरी पार्टियों ने भी अलग-अलग जगहों पर ऐसा किया होगा। कम से कम शिवसेना की एक मिसाल सामने है जिसे मिलने वाला हर वोट उस बाल ठाकरे के नाम पर मिलता था, जिन्होंने कभी सत्ता नहीं सम्हाली। वामपंथियों के बीच भी ऐसी मिसाल रहते आई है कि पार्टी की जिम्मेदारी किसी पर रहती है, और राज्य की सरकार कोई दूसरे लोग चलाते हैं। यही वजह थी कि सीपीएम के सामने जब ज्योति बाबू को बंगाल के मुख्यमंत्री से उठाकर देश का प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव था, तब पार्टी ने उस मौके को लात मार दी थी। 
आज की इस चर्चा का भाजपा के भीतर की आज की हकीकत से कोई लेना-देना है या नहीं, पता नहीं। यह हमारी अपनी मौलिक सोच है, और हो सकता है कि भाजपा के भीतर इसको पढऩे वाले लोग भी न हों। लेकिन राजनीति में किसी एक को सबकुछ दे देना जरूरी नहीं होता। इसी तरह किसी एक कंधे पर पूरा बोझ रख देना भी जरूरी नहीं होता। और हो सकता है कि एनडीए के कुछ साथियों को टूटने से बचाने के लिए, और भाजपा के भीतर के आज के विभाजन को रोकने के लिए यह पार्टी भी एनडीए के सामने एक ऐसी जोड़ी पेश कर सकती है, जिसमें से एक चुनाव अभियान का मुखिया हो, और दूसरा भारत की सरकार को चलाने का भाजपा की तरफ से दावेदार हो। हमारी यह बात अभी सिर्फ दिमागी जमाखर्च है, लेकिन हो सकता है कि भाजपा के भीतर भी कोई ऐसा सोच रहा हो। 

लोकतंत्र का शून्य इंटरनेट से किस तरह भरा इसे भी देखें..

संपादकीय
7 जून 2013
ब्राजील में वहां के आदिवासियों पर हो रहे जुल्म की खबरें मुख्य मीडिया में ठीक से नहीं आतीं, इसलिए अब वहां के आदिवासी इंटरनेट पर मुफ्त में हासिल सोशल मीडिया पर अपने आंदोलन की खबरें डाल रहे हैं। फेसबुक या इस तरह के दूसरे सोशल मीडिया की वजह से उनकी बात ब्राजील के भीतर और ब्राजील के बाहर दूसरों तक पहुंच रही है। लेकिन दूसरी तरफ इस खबर के साथ-साथ भारत को अगर देखें, तो यहां के आदिवासियों के मुद्दे भी मीडिया के बहुत बड़े हिस्से के लिए अछूत रहते हैं। दुख और तकलीफ, जुल्म और ज्यादती, बेइंसाफी और संघर्ष की खबरें और तस्वीरें अखबारों को विज्ञापनदाताओं के लिए रूखा बना देती हैं, इसलिए जहां तक बाजार का काबू चलता है, चकाचौंध वाली ग्लैमरस तस्वीरों वाली चटपटी खबरें ही अखबारों में अधिक चलती हैं, और टीवी पर भी क्रिकेट, क्राइम, सिनेमा, जैसे अंग्रेजी के सी से शुरू होने वाले शब्दों का राज रहता है। 
ब्राजील की खबर से यह याद पड़ता है कि भारत में भी अंडमान, बस्तर या ओडिशा के आदिवासियों पर जुल्म की खबरें इंटरनेट पर सोशल मीडिया की वजह से जब छा जाती हैं, गैरपरंपरागत मीडिया इंटरनेट पर जब उनको जगह देता है, तब कहीं जाकर मजबूरी या बेबसी में मेनस्ट्रीम कहा जाने वाला मुख्यधारा का मीडिया उनको छूता है। यह लोकतंत्र और बाजार व्यवस्था दोनों का एक मिलाजुला ऐसा मामला है जिसमें सोशल मीडिया या सामाजिक आंदोलन कारोबारी मीडिया को बेबस करते हैं कि वे जमीन की लड़ाईयों को और अनदेखा न करें। आज हम रोजाना कई घंटे इंटरनेट पर सभी तरह के संघर्ष देखते हैं, और उसकी वजह से यह अंदाज है कि सामाजिक आंदोलन, वैचारिक आंदोलन, अदालतों से लेकर मीडिया तक के बेबस करते हैं कि वे आदिवासियों के मुद्दों को सुनें, और उन पर कोई पहल करें। 
इंटरनेट ने एक अलग किस्म के लोकतंत्र को बढ़ावा दिया है। यह माध्यम कुछ लोगों को अराजक लगता है क्योंकि इस पर कानून का, सरकार का बहुत सीधा-सीधा कोई काबू नहीं रहता, और बाजार के इरादे इस पर लागू नहीं होते। मुफ्त में हासिल इंटरनेट और सोशल मीडिया भारत में भी आंदोलनकारियों के लिए, विचारों की लड़ाई के लिए एक बहुत बड़ी चौपाल है, और इसकी वजह से देश के एक बड़े तबके के बीच अखबारों और टीवी से परे बात होती है, बहस होती है, संपर्क होता है, और सामाजिक लड़ाई में साझेदारी भी होती है। आज से दस-पंद्रह बरस पहले जब यह लग रहा था कि भारत का मीडिया बड़े कारोबारियों के बाजारू काबू में चला गया है, तब इंटरनेट लोकतंत्र की एक लहर लेकर आया। जैसा कि किसी भी आजाद माध्यम के साथ होता है, इस पर भी कई किस्म की साम्प्रदायिकता, गंदगी, और पूंजीवादी लड़ाई चलती है, लेकिन इन सबको तो भारत का मीडिया कारोबार पहले भी बढ़ावा देते आया था, जिनके खिलाफ जो उदारवादी तबके हैं, उनकी बातचीत को सोशल मीडिया में ही मुफ्त की जगह मिली। 
फिर से हम आदिवासी मुद्दों की बात करें, तो उन इलाकों में जाकर काम करने वाले मीडिया के लोग भी सिर्फ वारदातों के मौकों पर काम करते हैं, और अमूमन वहां के मुद्दों को सामने लाने का काम आंदोलनकारी लोग ही करते हैं। अंडमान के आदिवासियों के बीच विदेशी पर्यटन को एक हिंसक तरीके से फैलाने के खिलाफ जो आंदोलन चला, उसी से इंटरनेट पर बाकी दुनिया को उस बेइंसाफी की खबर हुई। इसी तरह ओडिशा में वेदांत के खिलाफ आदिवासियों की जो लड़ाई जारी है, उसकी खबर सोशल मीडिया और इंटरनेट पर आंदोलनकारियों से ही लोगों को लगती है। मीडिया का परंपरागत कारोबार जब मुद्दों की अनदेखी करने लग गया था, और महज कमाई में जुट गया था, तब उसकी आपसी गलाकाट लड़ाई के बीच मुफ्त का यह इंटरनेट माध्यम आया और इसने एक बड़ी सामाजिक और लोकतांत्रिक जरूरत पूरी की। अब तक जिन लोगों ने सामाजिक संघर्ष और इंटरनेट के इस रिश्ते को गंभीरता से नहीं सोचा है, उनको कुछ वक्त इसे देखने में गुजारना चाहिए, और लोकतंत्र में आ चुका एक शून्य इससे किस तरह भरा यह देखना चाहिए। 

कुछ बात है कि बढ़ती चली जाती है हस्ती नरेन्द्र मोदी की

संपादकीय
6 जून 2013
भारत की राजनीति की बिसात पर कुछ बातें नरेन्द्र मोदी के काम से उनके पक्ष में हो रही हैं, तो कुछ बातें बिना उनके कुछ किए हुए भी। भाजपा के एक बड़े नेता अरूण जेटली क्रिकेट फिक्सिंग के मामले के बाद से अपनी क्रिकेट-कुर्सी की वजह से गुमसुम से हैं, या शायद अधिक सही यह कहना होगा कि उनकी बोलती बंद है। दूसरी तरफ बिना मोदी के कुछ किए हुए एनडीए के भीतर उनके सबसे बड़े विरोधी नीतीश कुमार को अपने बिहार में लालू यादव के हाथों खासी शर्मिंदगी कल के उपचुनावी-नतीजों में झेलनी पड़ी है। और जैसे ही लालकृष्ण अडवानी ने मध्यप्रदेश के भाजपा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की तारीफ की, उपचुनाव के नतीजों ने साबित कर दिया कि इस भाजपा में मोदी जैसा कोई नहीं। अपने गुजरात में उन्होंने जिस अंदाज में कांग्रेस से लोकसभा और विधानसभा की मिलाकर सारी आधा दर्जन सीटें छीन ली हैं, वह चुनावी कामयाबी कम नहीं है। इससे एनडीए के भीतर, भाजपा के भीतर, और कांग्रेस में मोदी की आलोचना करने वालों के मुंह गुजरात के लड्डुओं से बंद हो गए हैं। इसके पहले भाजपा के अध्यक्ष नितिन गडकरी के खिलाफ उनकी कंपनियों को लेकर जिस तरह के कानूनी मामले खड़े हो गए थे, उनको देखते हुए गडकरी को जाना पड़ा था, और उस वक्त भी नरेन्द्र मोदी अधिक ताकतवर बनकर उभरे थे। 
दरअसल भाजपा और संघ परिवार के पास चाहे-अनचाहे नरेन्द्र मोदी के अलावा दूसरी कोई संभावना या गुंजाइश आज की तारीख में नहीं है। भारत की राजनीति और वोटरों के मिजाज का जितना अंदाज हमको है, उसके मुताबिक यही लगता है कि मोदी के नाम पर एनडीए के जितने वोट कटेंगे, उससे अधिक वोट एनडीए को मोदी के नाम पर आम चुनाव में धार्मिक-साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण से अधिक मिलेंगे। भारत की आबादी का अनुपात साफ है। फिर समान नागरिक अधिकारों और धर्म से परे भी आज जिस मध्यम या उच्च आय वर्ग की शहरी आबादी के लिए आर्थिक विकास और बेहतर शासन-प्रशासन अकेली प्राथमिकता है, उनके लिए नरेन्द्र मोदी ने एक ऐसा हीरो है, जिसके दागदार हाफ कुर्ते के दाग इस तबके को नहीं दिखते। मानवीय कहे जाने वाले मूल्यों के बजाय बाजार के मूल्य जिस तबके के लिए अधिक महत्वपूर्ण रहते हैं, उस तबके का खासा ध्रुवीकरण मोदी के नाम पर देश के एक बड़े हिस्से में हो सकता है। और मोदी के दागदार पिछले बरसों को लोग वोटों से उसी तरह अलग भी रख सकते हैं जिस तरह 1984 के बाद कांग्रेस जीती है, सिक्ख समाज के दशकों के सड़क-संघर्ष के बाद भी कांग्रेस कई बार जीती है। गुजरात दंगों के दौरान मुस्लिमों के थोक में कत्ल के बाद तो अब देश में उसकी चर्चा भी बंद हो चुकी है, सड़कों की लड़ाई तो दूर की बात रही। इसलिए जब सिक्खों की नफरत के बावजूद कांग्रेस कई बार सरकार बना चुकी है, तो गुजरात दंगों के बाद मोदी मुस्लिमों की नफरत से क्यों नहीं उबर सकेंगे, इसका क्या तर्क हो सकता है? गुजरात में उन्होंने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार खड़ा किए बिना अपनी पार्टी को तीसरी बार सत्ता पर पहुंचाया है, और मुस्लिम इलाकों में भी बहुमत हासिल किया है।
अगर भाजपा मोदी को अपने बिना कुर्सी के मुखिया के रूप में भी सामने रखती है, तो यह फैसला उसके चाल-चलन, उसकी रीति-नीति के हिसाब से अधिक ईमानदार होगा। इसके बाद एनडीए के साथियों में कहीं कुछ असमंजस हो सकता है, लेकिन यह भी हो सकता है कि एनडीए के बाहर की कुछ पार्टियां, या बहुत से वोटर ऐसे आक्रामक मोदित्व को एक ईमानदार और खुला हुआ बुरा मानकर उसका साथ भी दें। आज देशभर में भ्रष्ट नेताओं को जो हाल चल रहा है, उसमें नरेन्द्र मोदी यूपीए सरकार के नेताओं पर जमकर हमला करने की नौबत में हैं, क्योंकि उन पर भ्रष्टाचार के कोई ठोस आरोप नहीं लगे हैं, और वे आक्रामक तेवरों के साथ वोटरों का ध्यान खींचने का हुनर भी रखते हैं। आने वाले कुछ दिनों में भाजपा का रूख साफ होगा, और उसके साथ ही देश के अगले चुनाव के लिए यह मुद्दा भी साफ हो जाएगा कि यूपीए और एनडीए के चुनावी नारों में मोदी पर पसंद और नापसंद के नारे में यूपीए या कांग्रेस का कौन सा नाम रहेगा। 

पर्यावरण की फिक्र का सालाना जलसा

संपादकीय
5 जून 2013
साल में एक बार पर्यावरण पर फिक्र का जलसा होता है। और साल के हर दिन उसको बर्बाद करने का सिलसिला चलता है। एक बड़ी अजीब सी बात है कि पर्यावरण की बात करें तो पहली तस्वीर दिमाग में जंगल की बनती है, और आज पर्यावरण सबसे अधिक बर्बाद इंसान के जंगली रूख से हो रहा है। जंगल का रूख जंगल के जानवरों के लिए ठीक रहता है। वहां पर सबसे ताकतवर अपने से नीचे के लोगों को काबू में रखते हैं, और अपनी जरूरत के मुताबिक उनको खाते-पीते हैं। जो जानवर दूसरे जानवरों को नहीं खाते, वे भी घास-पत्तों को खाते हैं, और उनकी बिरादरी में भी ताकत का बोलबाला होता है। इंसान ने जंगल के जानवरों से सबसे ताकतवर के राज वाला रूख तो ले लिया है, लेकिन उसे जब इंसानी हवस के साथ जोड़कर इस्तेमाल किया जाता है, तो धरती तबाह हो जाती है, हो रही है, हो चुकी है। 
आज सबसे संपन्न और सबसे ताकतवर देश और इंसान दुनिया के प्राकृतिक साधनों का सबसे अधिक इस्तेमाल करते हैं। दुनिया के सबसे गरीब और कमजोर देशों और लोगों का धरती पर जो बराबरी का हक होना चाहिए, उसे मानो जंगल के ताकतवर जानवरों के अंदाज में संपन्न लोग छीन लेते हैं, और धरती को निचोड़कर रख देते हैं। आज अमरीका में सामानों की प्रति व्यक्ति खपत को देखें, तो अफ्रीका और भारत जैसे देशों के सौ-सौ लोगों जितनी खपत अमरीका के एक-एक इंसान की होगी। और अब जंगलों को, तेल के कुओं को, जमीन और पानी को जंगल सरीखे बाहुबल से हासिल करने की जंग चल रही है, फर्क यही है कि जंगल के जानवर अपनी अगली पीढिय़ों के लिए इमारतें नहीं छोड़ जाते। इंसान अपने दिमाग का खूंखार इस्तेमाल करते हुए दूसरों से छीने हुए हकों से अपनी तिजोरियां भी भरते हैं।
पर्यावरण की सारी बातें अपने से नीचे के लोगों को पर्यावरण बचाने की नसीहत देने वाली होती है। अपने इस्तेमाल को कम करने वाले लोग कम ही होते हैं, कम से कम ताकतवर तबकों में तो बिल्कुल ही नहीं होते। नतीजा यह होता है कि ताकत से हासिल अधिक से अधिक साधन और सुविधाओं के अधिक से अधिक इस्तेमाल से खपत आसमान पर पहुंच जाती है, और धरती लहूलुहान हो जाती है। मुंबई में मुकेश अंबानी का 27 मंजिला घर बनता है और उसमें इतनी बिजली लगती है कि गरीबों की दर्जनों बस्तियां उतने में रौशन हो जाएं। भारत जैसे लोकतंत्र में जब कोई कारखानेदार कंपनियों के खर्च पर, तो सरकारों में बैठे लोग जनता की जेब से हिंसक अंदाज में अपने लिए साधन जुटाते हैं, तो वे जरूरत से कई गुना अधिक फिजूलखर्ची करते हैं। और यह सब दुनिया में फैल चुकी पूंजीवादी व्यवस्था के गुलाम बने लोकतंत्र में बढ़ते ही चल रहा है। 
दुनिया के प्राकृतिक साधनों पर जब कोई देश फौजी हमले से फिल्म अवतार की तरह कब्जा करने में लगा हुआ है, तो ऐसी जंग के बाद कब्जे में आए प्राकृतिक साधनों को और अधिक बेदर्दी से खर्च किया जाएगा। अमरीका जैसे पर्यावरण के दुश्मन देश अपने फौजी विमानों से बमों के साथ जिस लोकतंत्र को दूसरे देशों पर बरसाते हैं, वे उन गरीब देशों, या असहमत देशों की कुदरती दौलत को कब्जाने की नीयत से ऐसा करते हैं। जंग के बाद भी लूट के माल को बेरहमी से ही खर्च किया जाता है। इसलिए आने वाले दिन कमजोर देश और लोग पर्यावरण की चर्चा करते गुजारेंगे, और बाहुबली देश और लोग पर्यावरण पर, प्राकृतिक साधनों पर दूसरों के हकों को छीनकर बेहिसाब फिजूलखर्ची के साथ गुजारेंगे। इस माहौल में पर्यावरण का सालाना फिक्र के जलसे की क्या अहमियत है? 

महंत की चुनौतियां

संपादकीय 
4 जून 2013
बस्तर के नक्सल हमलों में अपने दो बड़े नेताओं सहित बहुत से लोगों को खोने के बाद कांगे्रस पार्टी अब फिर छत्तीसगढ़ में काम शुरू कर रही है। इस राज्य से केंद्र में अकेले मंत्री, और यहां के अकेले कांगे्रसी लोकसभा सदस्य डॉ. चरणदास महंत को छत्तीसगढ़ कांगे्रस का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है। उनके साथ-साथ दूसरा बड़ा जिम्मा पार्टी के एक भूतपूर्व विधायक भूपेश बघेल को दिया गया है।
नक्सलियों का शिकार हुए पिछले प्रदेश कांगे्रसाध्यक्ष नंद कुमार पटेल ने अपने कार्यकाल में कांगे्रस को एक मजबूत विपक्ष बनाने की खाशी कोशिश की थी। वे भाजपा से पार पाने की तरफ तो बढ़ रहे थे लेकिन अपनी खुद की पार्टी की गुटबाजी उनकी रफ्तार के पांवों में बेडिय़ां बनी रहीं। यह शायद अकेला ऐसा प्रदेश होगा जहां कांगे्रस की गुटबाजी की खबरों में, कांगे्रस की बातचीत में, संगठन-खेमा, और जोगी-खेमा, जैसे शब्द इस्तेमाल होते हैं। बाकी पार्टी से बिल्कुल ही  अलग चलते हुए भूतपूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी अपनी पार्टी के मंचों पर भी यह साबित करते रहे कि पार्टी में उनका सोनिया गांधी के अलावा किसी से कोई लेना-देना नहीं है। पार्टी के बाकी नेताओं और पार्टी संगठन के लिए उनकी बेरूखी और हिकारत मंच और माइक से इतनी बार दर्ज हो चुकी है, कि उसकी हद नहीं।
एक बार पहले भी प्रदेश कांगे्रस के मुखिया रह चुके महंत को उस वक्त जोगी के आक्रामक विरोध के चलते बेवक्त और बेवजह हटाया गया था। और कांगे्रस पार्टी के ताजा मुखिया के रूप में यही मोर्चा महंत के लिए चुनौती है, भाजपा नहीं। भाजपा अपने मुख्यमंत्री की पीठ पर सवार होकर तीसरी बार भी उम्मीद से है, लेकिन बगल में तैरने की कोशिश करने जा रही कांगे्रस के पांवों को उसके अपने पंजे ही पीछे खींचने के आदी हैं। कांगे्रस इस नौबत से कैसे उबर सकती है, यह लाख रूपये का सवाल है।
डॉ. चरणदास महंत से बेहतर पसंद छत्तीसगढ़ कांगे्रस के लिए और कुछ नहीं हो सकती थी। चुनाव को वक्त चाहे कम बचा हो, अपनी पार्टी के चुनाव में लीड करने की हर खूबी उनमें है। हम उनकी जाति और अनुभव की जानी-पहचानी पुरानी बातों को यहां दुहराना नहीं चाहते, लेकिन वे आज मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के लिए सबसे बड़ी चुनौती रहेंगे। नक्सल हमले की जिम्मेदारी की वजह से राज्य में भाजपा का खासा नुकसान हुआ है। उनका जो विकास-रथ डॉ. रमन सिंह पूरे प्रदेश में ले जा रहे थे, वह थम गया है। उसके पहले भी भाजपा के बहुत से मंत्रियों और विधायकों के हारने के दावे जानकारों में चल ही रहे थे। अब ताजा हालात में कांगे्रस की चुनावी संभावनाएं भाजपा से बहुत अलग नहीं दिखतीं। देखना यह है कि चरणदास महंत को काम कितना करने दिया जाएगा। कांगे्रस, भाजपा से तो जीत सकती है, लेकिन अपने भीतर की जीत-हार के बाद उसमें कोई दमखम बचा रहेगा, तो ही।
हम चुनाव से परे भी देश-प्रदेश में मजबूत विपक्ष के हिमायती हैं। इस भ्रष्ट लोकतंत्र में अगर सवाल लेकर विपक्ष खड़ा न रहता हो, तो सत्ता बेलगाम हो जाती है। जनता के मुद्दे धरे रह जाते हैं और राज्यसभा में विपक्ष के मुखर नेता अरूण जेटली का मुंह भी क्रिकेट माफिया पर खुलना बंद हो जाता है। इसलिए देश-प्रदेश में किसी की भी सत्ता हो, मजबूत विपक्ष जरूरी है। छत्तीसगढ़ कांगे्रस को ऐसे नुकसान के बाद उबरकर मजबूत बनने के लिए हमारी शुभकामनाएं।