10 जून 2013
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में सबसे अधिक छपने वाले नामों और तस्वीरों में से एक फरार है। अरबों की कॉलोनी बनाने वाला संजय बाजपेयी नाम का आदमी कई किस्म के जुर्म दर्ज हो जाने के बाद गायब हो गया है, और उसके धोखे के शिकार लोगों में से एक सरकार है जो कि कार्रवाई कर रही है, और दूसरी तरफ सैकड़ों लोग हैं जिन्होंने अपने पैसे लगाकर इस आदमी से जमीन या मकान लेने के सौदे किए थे। लेकिन जमीन-जायदाद के धंधे में जालसाजी और धोखाधड़ी तो चलती ही रहती है, उस पर चर्चा की गुंजाइश बहुत बड़ी नहीं रहती। लेकिन इस आदमी के साथ बहुत सी दूसरी बातें जुड़ी हुई हैं, जिन पर समाज के अलग-अलग तबकों को सोचना होगा।
यह आदमी एक धूमकेतु की तरह जमीन-जायदाद के बाजार में आया और उस पर छा गया। उसके इश्तहारों से कई अखबारों के पन्ने रंगे रहते थे, और ऐसे अखबारों के बाकी पन्ने संजय बाजपेयी की खबरों से रंगे रहते थे। बाजार में यह चर्चा रहती थी कि वह बहुत ऊंचे ब्याज पर अरबों रूपये उठा चुका है, और उसका बुलबुला कभी भी फूट सकता है, लेकिन ऐसी बातों के कोई सुबूत तो रहते नहीं, इसलिए इनकी खबरें नहीं बन पाईं। लेकिन जो खबरें बनीं, वे देखने लायक थीं।
एक बिल्डर या जमीन-जायदाद का एक कारोबारी, एक कॉलोनी बनाने वाला किस तरह रातों-रात छत्तीसगढ़ के चेंबर ऑफ कॉमर्स का सबसे बड़ा और सबसे चर्चित चेहरा बन गया, उसकी छांह तले चेंबर के बड़े-बड़े नेता अपनी तस्वीरें अखबारों में पाने लगे, इश्तहारों में पाने लगे, और सड़क किनारे की होर्डिंग्स में भी पाने लगे। शहर का कोई उर्स या कोई दूसरा जलसा उसके बिना पूरा नहीं हो रहा था, और शहर की दीवारों पर उसके नाम से समाज सुधार के जितने तरह के नारे लिखे हुए थे, उतने नारे बाकी तमाम समाज सुधारकों की तरफ से मिलकर भी नहीं लिखे गए थे।
संजय बाजपेयी नाम के इस कारोबारी के खिलाफ जुआं खेलते पकड़ाने की खबर हो, या जमीनों में जालसाजी की खबर हो, उसके इश्तहारों से लबालब अखबारों में उन खबरों के लिए जगह नहीं निकल पाती थी, लेकिन ऐसा कोई दिन नहीं गुजरता था जब उसकी छपी हुई तस्वीरों की गिनती प्रदेश के मुख्यमंत्री की छपी हुई तस्वीरों से कम होती हो।
एक मसीहा की तरह वह बच्चियों को बचाने वाला समझा जा रहा था, पेड़ लगवाने वाला समझा जा रहा था, और बहुत से लोगों का यह अंदाज भी था कि वह आने वाले विधानसभा चुनाव में इसी राजधानी की किसी सीट से किसी दिग्गज के खिलाफ चुनाव लड़ सकता है। उसके साथ मिलकर अखबार बड़े-बड़े कार्यक्रम करते थे, प्रदेश के बड़े-बड़े नेता और अफसर उसके साथ मंच पर रहते थे।
आध्यात्म को लेकर आर्ट ऑफ लिविंग वाले श्रीश्री रविशंकर का इस शहर का सारा कारोबार संजय बाजपेयी के कंधों पर सवार चलता था, और उसकी पत्नी सरिता बाजपेयी यहां पर श्रीश्री रविशंकर की प्रमुख आयोजक थी। लगातार लंबे बरसों से रविशंकर का काम यहां जिस तरह के लोग देख रहे हैं, और उनकी जिस तरह की साख है, उससे उनके आध्यात्म और उनके चिंतन पर, उनकी पसंद पर भी सवाल उठते हैं।
अब समाज को अलग-अलग बहुत से तबकों को यह सोचना है कि आज सरकार से लेकर ग्राहकों तक को जालसाजी और धोखाधड़ी से चूना लगाकर फरार हो गया यह आदमी किस तरह इस शहर का सबसे बड़ा, प्रचारित चेहरा बनकर चल रहा था, और किस बूते पर चल रहा था? जिसकी इश्तहार देने की ताकत हो? जिसकी कार्यक्रमों के आयोजनों की ताकत हो? जिसकी दीवारों पर नारे लिखवाने की, सड़क किनारे होर्डिंग लगवाने की ताकत हो, क्या ऐसे तमाम लोग समाज सुधारक और समाज के मसीहा बनकर छा सकते हैं? और छाने के लिए यह आसमान चेंबर जैसे जिस संगठन से लेकर मीडिया के बड़े-बड़े संस्थानों ने संजय बाजपेयी को मुहैया कराया था, वह देखने लायक था। तो क्या समाज इस कदर खोखला और कमजोर हो गया है कि उसके सिर पर जो चांदी का जूता मारे, उसके सामने समाज सिर झुकाकर बिछ जाएगा?
यह एक मामला बताता है कि कुछ करोड़ खर्च करके लोग किस तरह दर्जनों या सैकड़ों करोड़ की धोखाधड़ी भी कर सकते हैं, और समाज के मसीहा भी बन सकते हैं। समाज उसे उसकी जाति के नायक का सम्मान भी देता है, देश के सबसे बड़े आध्यात्मिक गुरू उसे सम्मान देते हैं, सत्ता उसके साथ भागीदारी करती है, मीडिया उसके सामने बिछे जाता है, और दूसरी खबरें तभी छपती हैं जब ऐसे विज्ञापनदाता की खबरें उस दिन और अधिक नहीं बच जातीं। समाज के बड़े-बड़े लोग ऐसे आदमी के इर्दगिर्द इसलिए खड़े रहते थे कि उसकी तस्वीर तो छपनी ही छपनी है, उसके साथ-साथ अगल-बगल वालों की तस्वीर भी छप जाएगी।
यह एक भयानक हाल है। छत्तीसगढ़ की इसी राजधानी के लोगों को याद होगा कि अभी दो-चार बरस के भीतर ही ऐसा ही एक दूसरा धूमकेतु स्कूलों का एक जाल लेकर सामने आया था और एक अखबार को भारी धूमधड़ाके से शुरू करके तकरीबन रोजाना सत्ता और समाज के साथ मंच पर हिस्सेदारी करने लगा था। उस वक्त भी सरकार और समाज ने, लोगों ने और जांच एजेंसियों ने कभी यह नहीं सोचा कि यह सारा बैंडबाजा आखिर कैसे बज रहा है?
आज दिक्कत यह है कि जो चांदी के कलदार खनखना सके, उसके दरवाजे समाज के बड़े-बड़े तबके, खासकर ऊंचे समझे जाने वाले तबके कतार लगा लेते हैं। पैसों का बोलबाला इतना हो गया है कि दर्जनों कटघरों में खड़े माफिया भी नगदी खर्च करके मंच, माईक, माला, महत्व खरीद लेते हैं, बाजार में भी, और मीडिया में भी। हर कुछ बरसों में ऐसे लोग आते-जाते हैं, और इनको आसमान पर बिठाने वाले इनके जाने के बाद ऐसे अगले किसी धूमकेतु के मोहताज बने राह तकते हैं कि ऐसा कोई और आए, अपनी थैली लाए।

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