विशेष संपादकीय
10 जून 13
सुनील कुमार
भारतीय जनता पार्टी के भीतर जिस धूमधाम से नरेन्द्र मोदी की ताजपोशी हुई है, वह किसी चुनाव समिति के चेयरमेन की नहीं है। और होनी भी नहीं चाहिए थी। इस पार्टी के भीतर एक बाद दूसरा राज्य खोने, इंडिया शाईनिंग की चमक अटल-अडवानी के रहते खोने, और अपने पिछले अध्यक्ष के विवादों में बिदा होने के बाद अब नरेन्द्र मोदी के अलावा भाजपा के पास और कौन सा करिश्मा रह गया था? जो लोग लालकृष्ण अडवानी में अगले चुनाव में करिश्मा दिखाने की उम्मीद अब भी रखते हैं, उनको याद रखना चाहिए कि छह बरस की सत्ता के बाद अटलजी की छत्रछाया में भी अडवानी भाजपा की शाईनिंग बचा नहीं पाए थे। उस वक्त तो यह लग ही रहा था कि अटलजी की बढ़ती उम्र के चलते अबकी बारी अटल बिहारी के बजाय बारी अडवानी की रहेगी। लेकिन वैसा कोई असर हो नहीं पाया था। नतीजा यह है कि आज दस बरस बाद के चुनाव में भाजपा को चमकाने का जिम्मा अगर अडवानी से एक पीढ़ी नीचे के ऐसे नरेन्द्र मोदी को दिया गया है जिन्होंने गुजरात में लगातार तीन बार सरकार चलाई है, तो पार्टी के पास इससे बेहतर और रास्ता ही क्या था? नरेन्द्र मोदी के पास तो यह विकल्प था कि वे एक बार और एनडीए, मतलब भाजपा, को जीतने या हारने का मौका देकर छह बरस बाद के आम चुनाव तक अपनी अच्छी सेहत के साथ इंतजार कर लेते, लेकिन भाजपा 2014 के चुनाव में और इंतजार, किसी और का इंतजार करने की हालत में नहीं थी। नतीजा यह हुआ कि नरेन्द्र मोदी भाजपा की आज की लगभग सर्वसम्मत पसंद भी बन गए, और वे अकेले विकल्प भी थे। मोदी ने भाजपा के भीतर भी इस बात को लगातार साबित किया कि यूपीए के राष्ट्रीय नेतृत्व पर हमला करने के सबसे बड़े हकदार खुद भाजपा के भीतर वे अकेले रह गए हैं, जो अपनी कुछ उपलब्धियों के चलते बड़े बोल बोल सकते हैं। पिछले बरसों में मोदी ने भाजपा के किसी भी राष्ट्रीय नेता के मुकाबले यूपीए पर अधिक धारदार हमले किए, और खुद गुजरात का नेता रहना खत्म ही कर दिया था।
अब गुजरात के नरेन्द्र मोदी की बात करें। गुजरात के 2002 के दंगों को लेकर उन पर से दाग न अभी धुले हैं, न आगे धुलेंगे। इतिहास को क्लासरूम के ब्लैकबोर्ड की लिखावट की तरह मिटाया नहीं जा सकता। अब सवाल यह उठता है कि इतिहास के साथ जिया जाए, या आज के साथ? बीते बरसों के कैलेण्डरों की तारीख देखते हुए शायद आने वाले बरसों को नहीं गढ़ा जा सकता, इसलिए दुनिया में जगह-जगह लोग ऐतिहासिक अपराधों से उबरकर आगे देखना शुरू करते हैं। भारत का इतिहास भी ऐसी घटनाओं से भरा हुआ है। जिस विचारधारा ने गांधी को मारा था, वह अपने मंचों पर गांधी को टांगने लगी, राजघाट पर गांधी की शपथ लेने लगी। जिस विशाल वृक्ष के गिरने से धरती के हिलने की बात के साथ-साथ हजारों सिख मार दिए गए थे, उस वृक्ष की शाखाएं आज लोकतंत्र में चारों तरफ फैली हुई हैं। बाबरी मस्जिद को गिराने वाले हाथों से समाजवादियों ने हाथ मिलाकर धर्मनिरपेक्षता की एक नई परिभाषा देश के सामने रखी। लोग कहते हैं कि राजनीति में हैरान कर देने वाली अजीब और अजनबी हमबिस्तर निकल आते हैं, इसलिए भारतीय चुनावी इतिहास में संविद से लेकर जनता पार्टी तक, और जनमोर्चे से लेकर एनडीए और यूपीए तक, कितने ही लोगों ने कितने ही लहू सने हाथों से अपने शाकाहारी हाथों को मिलाया, और सरकार की इमारत गढ़ी। इसलिए आज मोदी को लेकर अगर भाजपा के भीतर और भाजपा के बाहर एनडीए के भीतर अगर एक अधिक बर्दाश्त बन चुका है, तो वह लोगों की इस स्वाभाविक सोच के मुताबिक है जिसमें आने वाले कल को बीते हुए कल के मुकाबले अधिक तवज्जो दी जाती है।
लेकिन मोदी के आने के कुछ और मायने भी हैं। लोग साम्प्रदायिकता को अकेली बुराई नहीं समझते। साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिक हत्याएं, हत्यारों की बिरादरी में भी सबको बर्दाश्त नहीं होतीं। लेकिन साम्प्रदायिकता के साथ-साथ भ्रष्टाचार, बेईमानी, जालसाजी और लूटमार, इन सबको भी लोग साम्प्रदायिकता के बराबरी की, या उससे छोटी, या उससे बहुत छोटी सही, बुराई समझते हैं। पिछले बरसों में खुद भाजपा के येदियुरप्पाओं ने जिस तरह की लूटमार देश में की, उससे भाजपा के भीतर मोदी का कद बढ़ा। जिस तरह यूपीए की सरकार ने देश में लूटमार की, उससे चाहे पूरे एनडीए का कद न बढ़ा हो, चाहे पूरी भाजपा का कद न बढ़ा हो, मोदी का कद जरूर बढ़ा। यूपीए की सरकार और राजनीति में से ईमानदारी जिस बड़े पैमाने पर गायब हुई, तो उससे पैदा हुए एक विशाल और विकराल शून्य में मोदी एक अंधड़ की तरह पहुंचकर समा गए। कुदरत का कानून है कि शून्य कहीं खाली रह नहीं पाता, यूपीए ने सार्वजनिक जीवनमूल्यों और नैतिकता का जो शून्य पैदा किया, उसमें लहू सने हाथों सहित एक दागदार मोदी कुर्ता दाखिल हो गया, समा गया और सम्मान पा गया। इसलिए मोदी की ताजपोशी भाजपा के भीतर मोदी की जीत नहीं है, भारतीय लोकतंत्र के भीतर यूपीए का तख्ता लगाकर चल रही धर्मनिरपेक्षता की दूकान का दीवाला निकलना है। मोदी की यह ताजपोशी दरअसल यूपीए की मुखिया कांगे्रस ने की है। आज कांगे्रस को इस बात की फिक्र हो रही है कि भाजपा के भीतर लालकृष्ण अडवानी जैसे बुजुर्ग और वरिष्ठ नेता को हाशिए पर ला दिया गया है, लेकिन इस पल भर की राजनीतिक मसखरी से परे अगर इस पार्टी में कोई गंभीरता होती तो यह पार्टी इस हमदर्दी के पहले यह भी याद रखती कि किस तरह की रथयात्रा के बाद अडवानी ने बाबरी मजिस्द गिरवाने का सामान किया था, और उसके बाद के दंगों में किस तरह हजारों लोगों के मारे जाने की नौबत आई थी। इस मसखरी के बीच कांगे्रस को यह भी याद रहता कि 2002 के दंगों के वक्त यही अडवानी देश के गृहमंत्री थे, एनडीए के भीतर दूसरे नंबर के नेता थे, और उन्होंने ही इसी गोवा के रास्ते विमान में प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी को मोदी के पक्ष में नरम किया था, मोदी को बचाया था। इसलिए मोदी के आने से हड़बड़ाई हुए कांगे्रस को एकाएक अडवानी का इतिहास भूला जा रहा है, और अपना एक मुश्किल चुनावी भविष्य दिख रहा है। मोदी अपनी कामयाबियों की उपज कम हैं, देश की बाकी नाकामयाबी की उपज अधिक हैं। मोदी के कद की लकीर तो उसी कद की बनी रह सकती थी, अगर भाजपा की येदियुरप्पा नाम की, और यूपीए की अनगिनत लकीरें अपने-आपकी लंबाई को घटाकर एक बिंदु जितना न बना चुकी होतीं। भाजपा के भीतर और भाजपा के बाहर आज जो लोग भी कुल दस बरस पहले के गुजरात को भूलाकर मोदी को देश का नायक मानना चाह रहे हैं, मान रहे हैं, उनको बाकी बिंदुओं के बीच मोदी एक लकीर दिखता है, तो दिखता है।
लोकतंत्र, और खासकर भारत के जैसा विविधताओं से भरा हुआ एक बहुत ही जटिल लोकतंत्र, अपने भीतर बहुत किस्म की गुंजाइशों को लेकर चलता है। एक तरफ वे वामपंथी हैं, जिनके तीन दशक से अधिक के लगातार राज के बाद भी उनकी दुश्मन नंबर एक मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने भी उनकी एक भी बेईमानी नहीं पा सकी है। दूसरी तरफ बाकी तकरीबन तमाम पार्टियों पर काबिज अंतहीन ऐसे बेईमान लोग हैं जिनको लोग जेलों में देखने की उम्मीद करते हैं। इनके बीच अलग-अलग जगहों पर अपने कुनबों को मुर्गीखाने की तरह बढ़ाते हुए ऐसे लोग हैं जो कि लोकतंत्र को खानदानी राजतंत्र साबित करने में लगे हैं। देश भर में फैली सत्ता की कुनबापरस्ती, और कुनबों की सत्ता के बीच मोदी एक ऐसा नाम है जिसके न आगे कोई है, न पीछे। इसने भी मोदी को एक अलग साख दी है। इनके बीच ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने अपने राज्यों को तबाह करके रख दिया है और वे राज्य अब उनके फैलाए हुए अंधकार से बाहर ही नहीं आ पा रहे हैं। ऐसे कई पैमानों पर मोदी का काम दूसरों से बहुत बेहतर रहा है, और इन सबने उनके दाग ढांकने का काम भी किया है।
मोदी के आने के मायने यह भी हैं कि आज भारत की बहुसंख्यक आबादी का बहुसंख्यक तबका धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिकता जैसे मुद्दों के मुकाबले आर्थिक विकास और बेहतर सरकार को अधिक अहमियत देते सुनाई पड़ता है। यह बात हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि जिस तबके की आवाज शहरों से निकलती है, मीडिया तक पहुंचती है, वह तबका पैसों से अधिक जुड़ा हुआ तबका है। अब यह आवाज भाजपा के परंपरागत प्रभावक्षेत्र के बाहर से भी उठ सकेगी या नहीं, यह आने वाले वक्त की बात है। अगले चुनाव में मोदी का करिश्मा भाजपा और एनडीए को कितना फायदा दिला पाएगा, यह तो चुनाव ही बताएगा, लेकिन भाजपा के भीतर उसके सिद्धांतों और मूल्यों के मुताबिक मोदी से बेहतर और कुछ नहीं हो सकता था, 2014 के चुनावों के लिए। इसलिए इस पार्टी ने यूपीए के मुकाबले अपना एक ऐसा चेहरा पेश किया है, जो कि इसकी खुद की मौजूदा लीडरशिप से अधिक करिश्मा रखता है। आज अगर यूपीए और उसकी मुखिया कांगे्रस पार्टी देश के भीतर इतना बड़ा शून्य खड़ा नहीं करतीं, देश की बाकी पार्टियां और बाकी नेता इतनी बुरी मिसालें पेश नहीं करते, तो मोदी एक आम नेता बने रहता। मोदी विरोधियों ने ही मोदी को खास बनाने की नौबत खड़ी की है।

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