संपादकीय
7 जून 2013
ब्राजील में वहां के आदिवासियों पर हो रहे जुल्म की खबरें मुख्य मीडिया में ठीक से नहीं आतीं, इसलिए अब वहां के आदिवासी इंटरनेट पर मुफ्त में हासिल सोशल मीडिया पर अपने आंदोलन की खबरें डाल रहे हैं। फेसबुक या इस तरह के दूसरे सोशल मीडिया की वजह से उनकी बात ब्राजील के भीतर और ब्राजील के बाहर दूसरों तक पहुंच रही है। लेकिन दूसरी तरफ इस खबर के साथ-साथ भारत को अगर देखें, तो यहां के आदिवासियों के मुद्दे भी मीडिया के बहुत बड़े हिस्से के लिए अछूत रहते हैं। दुख और तकलीफ, जुल्म और ज्यादती, बेइंसाफी और संघर्ष की खबरें और तस्वीरें अखबारों को विज्ञापनदाताओं के लिए रूखा बना देती हैं, इसलिए जहां तक बाजार का काबू चलता है, चकाचौंध वाली ग्लैमरस तस्वीरों वाली चटपटी खबरें ही अखबारों में अधिक चलती हैं, और टीवी पर भी क्रिकेट, क्राइम, सिनेमा, जैसे अंग्रेजी के सी से शुरू होने वाले शब्दों का राज रहता है।
ब्राजील की खबर से यह याद पड़ता है कि भारत में भी अंडमान, बस्तर या ओडिशा के आदिवासियों पर जुल्म की खबरें इंटरनेट पर सोशल मीडिया की वजह से जब छा जाती हैं, गैरपरंपरागत मीडिया इंटरनेट पर जब उनको जगह देता है, तब कहीं जाकर मजबूरी या बेबसी में मेनस्ट्रीम कहा जाने वाला मुख्यधारा का मीडिया उनको छूता है। यह लोकतंत्र और बाजार व्यवस्था दोनों का एक मिलाजुला ऐसा मामला है जिसमें सोशल मीडिया या सामाजिक आंदोलन कारोबारी मीडिया को बेबस करते हैं कि वे जमीन की लड़ाईयों को और अनदेखा न करें। आज हम रोजाना कई घंटे इंटरनेट पर सभी तरह के संघर्ष देखते हैं, और उसकी वजह से यह अंदाज है कि सामाजिक आंदोलन, वैचारिक आंदोलन, अदालतों से लेकर मीडिया तक के बेबस करते हैं कि वे आदिवासियों के मुद्दों को सुनें, और उन पर कोई पहल करें।
इंटरनेट ने एक अलग किस्म के लोकतंत्र को बढ़ावा दिया है। यह माध्यम कुछ लोगों को अराजक लगता है क्योंकि इस पर कानून का, सरकार का बहुत सीधा-सीधा कोई काबू नहीं रहता, और बाजार के इरादे इस पर लागू नहीं होते। मुफ्त में हासिल इंटरनेट और सोशल मीडिया भारत में भी आंदोलनकारियों के लिए, विचारों की लड़ाई के लिए एक बहुत बड़ी चौपाल है, और इसकी वजह से देश के एक बड़े तबके के बीच अखबारों और टीवी से परे बात होती है, बहस होती है, संपर्क होता है, और सामाजिक लड़ाई में साझेदारी भी होती है। आज से दस-पंद्रह बरस पहले जब यह लग रहा था कि भारत का मीडिया बड़े कारोबारियों के बाजारू काबू में चला गया है, तब इंटरनेट लोकतंत्र की एक लहर लेकर आया। जैसा कि किसी भी आजाद माध्यम के साथ होता है, इस पर भी कई किस्म की साम्प्रदायिकता, गंदगी, और पूंजीवादी लड़ाई चलती है, लेकिन इन सबको तो भारत का मीडिया कारोबार पहले भी बढ़ावा देते आया था, जिनके खिलाफ जो उदारवादी तबके हैं, उनकी बातचीत को सोशल मीडिया में ही मुफ्त की जगह मिली।
फिर से हम आदिवासी मुद्दों की बात करें, तो उन इलाकों में जाकर काम करने वाले मीडिया के लोग भी सिर्फ वारदातों के मौकों पर काम करते हैं, और अमूमन वहां के मुद्दों को सामने लाने का काम आंदोलनकारी लोग ही करते हैं। अंडमान के आदिवासियों के बीच विदेशी पर्यटन को एक हिंसक तरीके से फैलाने के खिलाफ जो आंदोलन चला, उसी से इंटरनेट पर बाकी दुनिया को उस बेइंसाफी की खबर हुई। इसी तरह ओडिशा में वेदांत के खिलाफ आदिवासियों की जो लड़ाई जारी है, उसकी खबर सोशल मीडिया और इंटरनेट पर आंदोलनकारियों से ही लोगों को लगती है। मीडिया का परंपरागत कारोबार जब मुद्दों की अनदेखी करने लग गया था, और महज कमाई में जुट गया था, तब उसकी आपसी गलाकाट लड़ाई के बीच मुफ्त का यह इंटरनेट माध्यम आया और इसने एक बड़ी सामाजिक और लोकतांत्रिक जरूरत पूरी की। अब तक जिन लोगों ने सामाजिक संघर्ष और इंटरनेट के इस रिश्ते को गंभीरता से नहीं सोचा है, उनको कुछ वक्त इसे देखने में गुजारना चाहिए, और लोकतंत्र में आ चुका एक शून्य इससे किस तरह भरा यह देखना चाहिए।

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