संपादकीय
12 जून 2013
भारत के राजनीतिक दलों में मोदी से जुड़ी हुई ताजा घटनाओं को लेकर करवट बदली जा रही है। जो एनडीए के भीतर थे, जो आज एनडीए में हैं, और जो कल तक यूपीए में थे, ऐसे दल आने वाले दिनों के लिए चुनावी संभावनाएं देख रहे हैं। और यह टटोलना अस्वाभाविक इसलिए नहीं है कि देश के दो बड़े गठबंधनों में उनके मुखिया-दलों के अलावा जो पार्टियां हैं, वे ऐसी मध्यमार्गी पार्टियां हैं जिनके पांव एक नाव से दूसरी नाव पर जाते हुए नहीं लडख़ड़ाते। इनमें इतनी बड़ी संख्या में नेता और उनकी पार्टियां शामिल हैं, कि पिछले तीन-चार चुनावों में देश ने इनके हर किस्म के गठबंधन, पालाबदल, और हमबिस्तरी को देखा है। कश्मीर के नेशनल कांफ्रेंस से शुरू करें तो बसपा, तृणमूल, जैसी कितनी ही पार्टियां हैं जो कि एक वक्त एनडीए के साथ रहीं, फिर कभी यूपीए के साथ रहीं, कभी इन दोनों से बाहर रहीं, और अब इनमें से कई लोग एक नए गठबंधन की संभावनाओं को भी टटोल रहे हैं।
किसी भी नाम से अगर एक तीसरा मोर्चा बनता है, तो उसमें आने के लिए बहुत सी क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पार्टियों की संभावना बनती है। कश्मीर की दोनों क्षेत्रीय पार्टियां, तृणमूल, जदयू, सपा, राजद, टीआरएस, डीएमके, एडीएमके, राकांपा, मनसे, बीजद, वामपंथी, इस तरह की लिस्ट बहुत लंबी है, जिनमें से कुछ लोग जो एक-दूसरे से भारी परहेजी हैं, उनको छोड़कर बाकी की गिनती ऐसी बन सकती है कि उनके बिना केन्द्र में यूपीए या एनडीए की सरकार ही न बन सके। और एक ऐसी नौबत लाई जा सकती है कि केन्द्र में गठबंधन सरकार की जगह, गठबंधनों की मिलीजुली सरकार बने। कांग्रेस और भाजपा के कट्टर साथियों से परे की पार्टियां मिलकर ऐसा समीकरण बनाने की ताकत रखती हैं, और उनकी जीती लोकसभा सीटों के साथ समझौते के बिना 2014 की केन्द्र सरकार न बने, ऐसी नौबत भी लाई जा सकती है। और ऐसी नौबत को भी हम कैसे खारिज कर सकते हैं कि यह तीसरा मोर्चा सरकार बनाने की हालत में आए, और यूपीए या एनडीए उसके भीतर जाकर या बाहर से उसका समर्थन करे। कुछ लोगों को लग सकता है कि यह तराजू के एक पलड़े पर बहुत से मेंढकों को एक साथ तौलने जैसा काम होगा, लेकिन क्या ऐसा ही लोगों को पच्चीस साल पहले उस वक्त नहीं लगता था जब लोग कांग्रेस का एक विकल्प सोचते थे? आपातकाल ने देश में कांग्रेस का पहला मजबूत विकल्प सामने रखा था, बाद में जनमोर्चा नाम का विकल्प आया, फिर एनडीए बना, फिर यूपीए बना, और आज मोदी के नाम पर जो सहमति और असहमति हो रही है, उससे फिर ऐसे किसी तीसरे विकल्प की राह खुल सकती है।
ऐसा कोई विकल्प अगर वामपंथियों को साथ में लेकर बन सकता है, तो वह अनिवार्य रूप से एक धर्मनिरपेक्ष विकल्प भी रहेगा, बाजार के भ्रष्टाचार से काफी हद तक आजाद भी रहेगा, और साम्प्रदायिक ताकतों के खिलाफ भी रहेगा। ऐसे विकल्प के रास्ते में कुछ प्रांतीय-आंतरिक टकराव भी रहेंगे, लेकिन कोई भी बड़ा गठबंधन ऐसे टकरावों से आजाद नहीं रह सकता और उनसे उबरकर ही उसे एक नई राह बनानी पड़ेगी। बिहार में लालू और नीतीश में से कोई एक ही ऐसे गठबंधन में रह सकेंगे, बंगाल से ममता या वामपंथी इनमें से कोई एक ही इसमें रह सकेंगे, कश्मीर की दो पार्टियों में से कोई एक ही इसमें रह सकेगी, लेकिन आज देश में क्षेत्रीय दलों की अपने-अपने इलाकों में जितनी पकड़ है, उसके चलते तीसरे मोर्चे की संभावनाएं निकल सकती हैं, और ऐसी कोई संभावना ही यूपीए और एनडीए की बददिमागी का जवाब हो सकती है। एक तरफ यूपीए ने अपनी सरकार के दौर में जितने तरह के गलत काम किए हैं, उनको लेकर वह एक कड़े सबक की हकदार है, और दूसरी तरफ एनडीए की मुखिया भाजपा ने जिस एकतरफा तरीके से मोदी की ताजपोशी की है, उससे वह भी एक विभाजन की हकदार बनती है। आने वाले दिन भारतीय राजनीति में बड़ी दिलचस्पी के साबित हो सकते हैं, और कुछ लोगों को तीसरे मोर्चे के साथ-साथ एक राजनीतिक अस्थिरता का खतरा दिख सकता है, ऐसे लोगों को पिछले नौ बरस की यूपीए की स्थिरता का नुकसान भी देखना चाहिए।

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