आदिवासियों पर मप्र सरकार की सनातनी सोच का हमला

विशेष संपादकीय
9 जून 2013
मध्यप्रदेश में सरकारी खर्च पर गरीब तबकों की लड़कियों के सामूहिक विवाह  मुख्यमंत्री कन्यादान योजना के तहत हो रहे हैं। लेकिन अभी बैतूल जिले में जब साढ़े चार सौ जोड़ों की शादी तय हुई, तो सारी तैयारी हो जाने के बाद जिले के अफसरों ने लड़कियों की कौमार्य जांच और गर्भ जांच करवाई कि कहीं वे इस योजना का फायदा उठाने के लिए तो शादी करने नहीं चली आई हैं। इनमें से नौ आदिवासी लड़कियां गर्भवती निकलीं तो शादी के कपड़े उतरवाकर वापिस भेज दिया गया। इस पर जब हल्ला मचा तो उसकी जांच शुरू की गई। 
जैसा कि मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार से उम्मीद की जाती थी, दलितों और आदिवासियों के मुद्दों की उसकी समझ सतही भी नहीं है। यही वजह है कि इस राज्य में लगातार दलितों पर अत्याचार होते हैं, दलितों को जलाया जाता है, उन पर बलात्कार होते हैं। कमोबेश यही हाल आदिवासियों का है, और मनुवादी जाति व्यवस्था में ऊंची ठहराई गई जातियों के नेता और अफसर दलित-आदिवासी, महिला और गरीब के साथ ठीक वैसा ही बर्ताव कर रहे हैं जैसा कि वेदों में सुझाया गया है। मध्यप्रदेश में आए दिन कभी कांगे्रस और कभी भाजपा के नेता महिलाओं के बारे में अपमानजनक बयान देते हैं, और अभी अफसरों ने यह काम किया है। 
आदिवासी समाज में लड़कियों का शादी के पहले अपनी पसंद के लड़के को छांटकर गर्भवती हो जाना कोई अनहोनी बात नहीं है। यह उस समाज के अपने रीति-रिवाज और सामाजिक संस्कारों के हिसाब से एक मान्य बात है। और आज हिंदू समाज के उच्च वर्ण कहे जाने वाले तबके ने आदिवासियों के लिए हिकारत की जो सोच दिखाई है, वह भी कोई नई नहीं है। जो हिंदूवादी सोच आदिवासियों को हिंदू करार देने पर आमादा रहती है, और जिसे यह बात गले नहीं उतरती कि हिंदू धर्म बनने के बहुत पहले से आदिवासियों का अपना धर्म या उनकी अपनी अलग आस्था चली आ रही है, ऐसी सोच आदिवासियों को हिंदू करार देकर उन पर सनातनी हिंदू संस्कार थोपने में लगी रहती है। कभी यह आदिवासियों से मांसाहार छुड़ाना चाहती है, कभी यह उनसे शराब छुड़वाना चाहती है, और पूरे वक्त यह उनको सनातनी हिंदू देवी-देवताओं की तरफ धकेलने में लगी रहती है। इस मुद्दे पर जानकार लोगों ने इतना कुछ लिखा हुआ है कि उन तर्कों को यहां पर  अधिक खुलासे से दुहराना मुमकिन नहीं है। लेकिन यह समझने की जरूरत है कि सत्ता को हांकने वाले लोग खुद जिस जाति के होते हैं, जिस धर्म के होते हैं, उसके लिए अगर उनके मन में कट्टरता होती है, तो वह उनके सार्वजनिक और सरकारी फैसलों और रूख में पूरे वक्त झलकती है। जिस जिले में यह हुआ है वहां पर कलेक्टर राजेश प्रसाद मिश्रा का नाम सामने आया है, राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जाहिर तौर पर गैरआदिवासी हैं। भाजपा की सत्ता में, या जाति आधारित दूसरी पार्टियों की सत्ता में जब गैरदलितों और गैरआदिवासियों का बोलबाला होता है तो उसके ऐसे नतीजे जगह-जगह, समय-समय पर सामने आते रहते हैं। 
मध्यप्रदेश की हिंदू-भाजपा सरकार को यह समझना होगा कि आज की उसकी जो आक्रामक-हिंदुत्ववादी नीति है वह इसी हिंदू धर्म में हमेशा से नहीं रहते आई है। महाभारत काल में हिंदू समाज में ऐसा चलन था कि लड़कियां शादी के पहले अपने पिता के घर में ही गर्भवती हो सकती थीं, और शादी के बाद जाते हुए वे अपने ऐसे बच्चों को लेकर जाती थीं। एक उपनिषद का एक जिक्र पहली नजर में हमको अभी मिला है जिसमें सत्यकाम अपनी मां जबाला से अपना गोत्र पूछता है, तो उसकी मां कहती है- ''बेटा मैं नहीं जानती तू किस गोत्र का है। अपनी युवावस्था में जब मैं अपने पिता के घर आए हुए बहुत से अतिथियों की सेवा में रहती थी, उस समय तू मेरे गर्भ में आया था। मैं नहीं जानती तेरा गोत्र क्या है। मेरा नाम जबाला है, तू सत्यकाम है, अपने को सत्यकाम जबाला बताना।ÓÓ
ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता उपन्यासकार भैरप्पा ने महाभारत की पृष्ठभूमि पर ऐतिहासिक वर्णन के साथ जो विख्यात किताब 'पर्वÓ लिखी है उसमें शल्यराज बैल के मांस को चबाते हुए बैठे रहता है, और उसकी पत्नी अपनी बेटी के मासिक धर्म शुरू होने का जिक्र करते हुए याद दिलाती है कि गर्भधारण की क्षमता आने के बाद गर्भवती न होना धरती को बंजर छोडऩे के बराबर पाप है। पत्नी याद दिलाती है कि-''...हमारे विवाह के पहले मेरा एक पुत्र था न? वहीं जो मेरे मायके में पैदा हुआ था, शादी के समय आप ही ने कहा था कि जब लड़की मेरी हो गई, तो उसके पेट से हुई संतान क्या मेरी नहीं हुई?...ÓÓ
अब ऐसे इतिहास के लिए आज की एक पाखंडी शुद्धतावादी हिंदू सोच में कोई जगह नहीं है। और जब एक राज्य की योजना सरकारी पैसों से चलती है, तो उस राज्य में तो ईसाई भी बसते हैं, जिनके बारे में मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार को यह मालूम होना चाहिए कि उनके धर्म के ईसा मसीह के एक कुंवारी मां से पैदा होने की मान्यता है। तो क्या मध्यप्रदेश के सरकारी पैसों से जनकल्याण के नाम पर चलने वाली योजनाओं को सिर्फ सनातनी संस्कृति के पाखंडी मूल्यों पर चलाया जाएगा? 
भारत के आदिवासियों पर तरह-तरह के हमले हो रहे हैं। देश के कई हिस्सों में आदिवासी और दलित गोमांस खाते हैं, भाजपा का यह एक बड़ा मुद्दा है कि पूरे देश में गोवंश के 'वधÓ पर रोक लगाई जाए। दूसरे जानवर काटे जाते हैं, लेकिन गाय का वध (हत्या) होता है। आदिवासी और दलित खानपान उनकी गरीबी से भी जुड़े रहते हैं, और इसलिए कई किस्म के मांसाहार पर वे आश्रित रहते हैं। आज गोमांस को एक राजनीतिक मुद्दा बनाकर भाजपा अपने-आपको उत्तर-पूर्वी राज्यों के अलावा देश के बहुत से हिस्से के दलितों और आदिवासियों से अपने को दूर कर ले रही है। शहरी, संपन्न, उच्चवर्ण और सनातनी हिंदुत्व की सोच को बाकी देश पर थोपने का दुराग्रह आदिवासियों और दलितों को हिंदू समाज से काटते भी चल रहा है, और लोकतंत्र से भी। यही वजह है कि एक प्रतीकात्मक विरोध के रूप में दिल्ली में वामपंथी, उदारवादी, लोकतंत्रवादी सामाजिक कार्यकर्ता गोमांस का भोज आयोजित करते हैं। यह विरोध उस पाखंडी सनातनी-हिंदू हमले का रहता है जो अपने-आपके उस इतिहास को ही छुपाने में लगे रहता है जिसमें राम और कृष्ण के युग गोमांस खाने के चलन से भरे हुए थे। आज राम और कृष्ण को तो पूरे देश पर लादने की कोशिश है, लेकिन उनके युग के सामाजिक चलन को मानने से भी इंकार है।
कोई हैरानी नहीं कि हिंदू धर्म में पांवों के तलुओं की तरह माने गए दलित बौद्ध और मुस्लिम हो रहे हैं, और आदिवासी ईसाई बन रहे हैं। हिंदू धर्म अपने पाखंडी मूल्यों और संस्कारों के साथ एक बहुत छोटे तबके का ही प्रतिनिधि बनकर रह जाएगा, जिससे कि दलित-आदिवासी कटे हुए हैं ही, समझदार और इंसाफपसंद लोग भी कटते चले जा रहे हैं। 

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