कुछ बात है कि बढ़ती चली जाती है हस्ती नरेन्द्र मोदी की

संपादकीय
6 जून 2013
भारत की राजनीति की बिसात पर कुछ बातें नरेन्द्र मोदी के काम से उनके पक्ष में हो रही हैं, तो कुछ बातें बिना उनके कुछ किए हुए भी। भाजपा के एक बड़े नेता अरूण जेटली क्रिकेट फिक्सिंग के मामले के बाद से अपनी क्रिकेट-कुर्सी की वजह से गुमसुम से हैं, या शायद अधिक सही यह कहना होगा कि उनकी बोलती बंद है। दूसरी तरफ बिना मोदी के कुछ किए हुए एनडीए के भीतर उनके सबसे बड़े विरोधी नीतीश कुमार को अपने बिहार में लालू यादव के हाथों खासी शर्मिंदगी कल के उपचुनावी-नतीजों में झेलनी पड़ी है। और जैसे ही लालकृष्ण अडवानी ने मध्यप्रदेश के भाजपा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की तारीफ की, उपचुनाव के नतीजों ने साबित कर दिया कि इस भाजपा में मोदी जैसा कोई नहीं। अपने गुजरात में उन्होंने जिस अंदाज में कांग्रेस से लोकसभा और विधानसभा की मिलाकर सारी आधा दर्जन सीटें छीन ली हैं, वह चुनावी कामयाबी कम नहीं है। इससे एनडीए के भीतर, भाजपा के भीतर, और कांग्रेस में मोदी की आलोचना करने वालों के मुंह गुजरात के लड्डुओं से बंद हो गए हैं। इसके पहले भाजपा के अध्यक्ष नितिन गडकरी के खिलाफ उनकी कंपनियों को लेकर जिस तरह के कानूनी मामले खड़े हो गए थे, उनको देखते हुए गडकरी को जाना पड़ा था, और उस वक्त भी नरेन्द्र मोदी अधिक ताकतवर बनकर उभरे थे। 
दरअसल भाजपा और संघ परिवार के पास चाहे-अनचाहे नरेन्द्र मोदी के अलावा दूसरी कोई संभावना या गुंजाइश आज की तारीख में नहीं है। भारत की राजनीति और वोटरों के मिजाज का जितना अंदाज हमको है, उसके मुताबिक यही लगता है कि मोदी के नाम पर एनडीए के जितने वोट कटेंगे, उससे अधिक वोट एनडीए को मोदी के नाम पर आम चुनाव में धार्मिक-साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण से अधिक मिलेंगे। भारत की आबादी का अनुपात साफ है। फिर समान नागरिक अधिकारों और धर्म से परे भी आज जिस मध्यम या उच्च आय वर्ग की शहरी आबादी के लिए आर्थिक विकास और बेहतर शासन-प्रशासन अकेली प्राथमिकता है, उनके लिए नरेन्द्र मोदी ने एक ऐसा हीरो है, जिसके दागदार हाफ कुर्ते के दाग इस तबके को नहीं दिखते। मानवीय कहे जाने वाले मूल्यों के बजाय बाजार के मूल्य जिस तबके के लिए अधिक महत्वपूर्ण रहते हैं, उस तबके का खासा ध्रुवीकरण मोदी के नाम पर देश के एक बड़े हिस्से में हो सकता है। और मोदी के दागदार पिछले बरसों को लोग वोटों से उसी तरह अलग भी रख सकते हैं जिस तरह 1984 के बाद कांग्रेस जीती है, सिक्ख समाज के दशकों के सड़क-संघर्ष के बाद भी कांग्रेस कई बार जीती है। गुजरात दंगों के दौरान मुस्लिमों के थोक में कत्ल के बाद तो अब देश में उसकी चर्चा भी बंद हो चुकी है, सड़कों की लड़ाई तो दूर की बात रही। इसलिए जब सिक्खों की नफरत के बावजूद कांग्रेस कई बार सरकार बना चुकी है, तो गुजरात दंगों के बाद मोदी मुस्लिमों की नफरत से क्यों नहीं उबर सकेंगे, इसका क्या तर्क हो सकता है? गुजरात में उन्होंने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार खड़ा किए बिना अपनी पार्टी को तीसरी बार सत्ता पर पहुंचाया है, और मुस्लिम इलाकों में भी बहुमत हासिल किया है।
अगर भाजपा मोदी को अपने बिना कुर्सी के मुखिया के रूप में भी सामने रखती है, तो यह फैसला उसके चाल-चलन, उसकी रीति-नीति के हिसाब से अधिक ईमानदार होगा। इसके बाद एनडीए के साथियों में कहीं कुछ असमंजस हो सकता है, लेकिन यह भी हो सकता है कि एनडीए के बाहर की कुछ पार्टियां, या बहुत से वोटर ऐसे आक्रामक मोदित्व को एक ईमानदार और खुला हुआ बुरा मानकर उसका साथ भी दें। आज देशभर में भ्रष्ट नेताओं को जो हाल चल रहा है, उसमें नरेन्द्र मोदी यूपीए सरकार के नेताओं पर जमकर हमला करने की नौबत में हैं, क्योंकि उन पर भ्रष्टाचार के कोई ठोस आरोप नहीं लगे हैं, और वे आक्रामक तेवरों के साथ वोटरों का ध्यान खींचने का हुनर भी रखते हैं। आने वाले कुछ दिनों में भाजपा का रूख साफ होगा, और उसके साथ ही देश के अगले चुनाव के लिए यह मुद्दा भी साफ हो जाएगा कि यूपीए और एनडीए के चुनावी नारों में मोदी पर पसंद और नापसंद के नारे में यूपीए या कांग्रेस का कौन सा नाम रहेगा। 

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