जनता के साथ फायनेंस कंपनियों की जालसाजी, और सोती सरकारें

12 मई 2014
संपादकीय
एक तरफ तो पश्चिम बंगाल की खबरें हैं कि वहां सारदा चिटफंड घोटाले की सीबीआई जांच के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ममता बैनर्जी ने कटाक्ष करते हुए कहा है कि अब लोगों का डूबा हुआ पैसा सीबीआई ही वापस करेगी, और दूसरी तरफ एक दूसरी फायनेंस कंपनी सहारा के बारे में सुप्रीम कोर्ट के एक जज ने अदालत के बाहर कहा है कि इस जटिल मामले पर सुनवाई करने के दौरान जजों की दो सदस्यीय पीठ पर दबाव, तनाव और भार अकल्पनीय है। इन दो बातों को अगर देखें, और उसमें यह जोड़ लें कि किस तरह बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांगे्रस के नेताओं से इस सारदा कंपनी का लेना-देना रहा है, जिसने कि जनता के हजारों करोड़ डुबा दिए हैं, और किस तरह इस कंपनी ने ममता बैनर्जी की पेंटिंग्स को करोड़ों में खरीदा है, तो यह समझ आता है कि जालसाजी करने वाली कंपनियों की पहुंच कहां तक है, और किस तरह देश की सबसे बड़ी अदालत ऐसी कंपनियों के सामने बेबस बैठ जाती हैं। 
छत्तीसगढ़ के बारे में बात करें, तो यहां भी हर बरस दो-चार कंपनियां दसियों हजार लोगों के सैकड़ों करोड़ लेकर भागते दिखती हैं, और उनमें पैसा लगाने वाले नासमझ, या बेवकूफ, जो भी कहें, लोग उनको ढूंढते रह जाते हैं। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम ऐसे आर्थिक अपराधों पर लिखते हुए कई बार यह सलाह दे चुके हैं कि केंद्र और राज्य सरकारों की अनगिनत खुफिया और सतर्कता एजेंसियां हैं, और उनकी नजरों में पूंजीनिवेश को लेकर होने वाले ऐसे घोटाले बुलबुले के फूटने के पहले आ जाते हैं, या आ जाने चाहिए। और ऐसी कंपनियों पर समय रहते कार्रवाई होनी चाहिए, आज सरकार की हालत खेतों में खड़े किए गए पुतले की तरह रह गई है, जो कि खेत के चरे जाने के दौरान चुपचाप खड़े रह जाता है। बहुत छोटी-छोटी कमाई वाले लोग अपनी पूंजी का बड़े-बड़े मुनाफे के झांसे में आकर जालसाज कंपनियों में पैसा लगाते हैं, और सरकारें उनके पैसे को डूबते हुए देखती रहती हैं। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। देश में आर्थिक अपराधों पर नजर रखने के लिए केंद्र सरकार की कई एजेंसियां हैं, उनको अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। और राज्य की पुलिस भी चाहे तो जमीन पर यह जालसाजी शुरू होते ही रोक सकती है, या कम से कम केंद्र की एजेंसियों को खबर कर सकती है।
सुप्रीम कोर्ट के जज ने सहारा के मामले में जजों पर पडऩे वाले जिस तरह के दबाव का जिक्र खुद होकर किया है, वह बहुत ही फिक्र की बात है। इस देश में अगर लाखों करोड़ रखने वाले, और दीवालिया होते दिख रहे कारोबारी भी अगर सुप्रीम कोर्ट में इस किस्म का, इस दर्जे का दबाव पैदा कर सकते हैं, तो इस लोकतंत्र में न तो गरीब की जगह है, न ही अमीर के लिए किसी सजा की कोई गुंजाइश है। आर्थिक अपराधों को राजनीति और नेताओं का जिस तरह का साथ मिल रहा है, वह बात अपने-आपमें भयानक है। 
एक बार फिर हम छत्तीसगढ़ के स्तर पर यह कहना चाहेंगे कि जब कभी ऐसी मार्केटिंग कंपनियां जालसाजी दिखती अपनी योजनाओं के लिए पैसा इक_ा करना शुरू करती हैं, तभी राज्य सरकार को उन पर नजर रखनी चाहिए, और उनको ठोंक-बजाकर देख लेना चाहिए कि गरीबों का पैसा खतरे में तो नहीं जा रहा है।

चुनाव का इतना लंबा दौर लोकशिक्षण का अच्छा मौका

11 मई 2014
संपादकीय

भारतके आम चुनाव अब आखिरी दौर में हैं। कल इस वक्त तक मतदान के आखिरी दिन वाले वोट आधे से अधिक डल चुके होंगे, और उसके बाद पार्टियां और नेता अगले कुछ दिन चैन से पांव पसारकर गुजारेंगे, या बेचैनी से। अब चूंकि प्रचार का यह दौर खत्म हो गया है, और नतीजे तकरीबन तय हो चुके हैं, इसलिए नतीजों की अटकलबाजी के बजाय कुछ मुद्दों पर बात करना बेहतर है। 
बहुत से लोगों को यह लगता है कि गुजरात दंगों के दाग वाले मोदी की अगुवाई में चुनाव लडऩे पर भारत का लोकतंत्र खतरे में है। भारतीय लोकतंत्र बहुत लचीला है, और बहुत उदार भी। इस दरियादिली के चलते भारत के संविधान में यह छूट दी गई है कि जब तक अदालतों से कोई कुसूरवार साबित न हो जाएं, तब तक उनको चुनाव लडऩे से नहीं रोका जा सकता। मोदी तो अभी तक किसी अदालती कटघरे में लाए भी नहीं गए हैं, लेकिन दूसरे लोग ऐसे हैं जो कि 1984 के दंगों के मामले झेलते हुए भी न सिर्फ कांग्रेस के उम्मीदवार रहे, बल्कि चुनाव जीतकर सांसद भी रहे। हम एक जुर्म को गिनाकर दूसरे जुर्म को कम आंकना नहीं चाहते, लेकिन लोकतंत्र कानूनों से कम, और परंपराओं से अधिक चलता है, इसलिए इसे अनदेखा भी नहीं किया जा सकता। 
एक दूसरी बात इससे जुड़ी हुई और जरूरी यह है जो मोदी ने दो-चार दिन पहले के अपने इंटरव्यू में कही। उन्होंने कहा कि चुनाव लोक शिक्षण का मौका भी होता है, और नेताओं के भाषण जनता के सामने मुद्दे रखते हैं। हम उनकी इस बात से सहमत हैं, और जनता के राजनीतिक शिक्षण की वकालत हम हमेशा करते आए हैं। अगर चुनाव न होते तो मोदी से जुड़े होते निजी और कारोबारी, सांप्रदायिक और जाति के मामले कैसे सामने आते, और लोगों को कैसे इन मुद्दों पर सोचने का मौका मिलता। भारत के आम चुनाव, और खासकर ऐसे चुनाव जो कि महीनों तक चले, उन्होंने लोगों को बहुत सोचने-समझने का मौका दिया। और नेताओं को कहने का मौका भी इतना ही मिला। अखबारों, और बाकी मीडिया को अपने रूझान के मुताबिक लोगों को राजनीति बताने और समझाने का पूरा मौका मिला। ऐसे में तमाम किस्म के झांसे और झूठ का भांडाफोड़ करने का मौका भी सबके पास था। खुद हमने ही इंटरनेट पर तैरने वाले कई किस्म के झूठ, कई किस्म की जालसाजी उजागर की, और उससे उनके पीछे की बदनीयत उजागर भी हुई। 
चुनाव को लोक शिक्षण का मौका बनाना एक अधिक लोकतांत्रिक तरीका है, और भारत में चाहे मीडिया पर बिक जाने के आरोप लगते हों, या नेताओं पर वोट खरीदने के आरोप लगते हों, लोगों के बीच अपने विचार पहुंचाने की आजादी न सिर्फ बड़ी पार्टियों को थी, बल्कि सबसे गरीब पार्टियों को भी थी। और बात सिर्फ राजनीतिक मुद्दों की नहीं है, सामाजिक और आर्थिक मुद्दे भी खुलकर चर्चा में रहे, और लोगों को उन पर सोचने-समझने का मौका भी मिला। ऐसे में हम इन चुनावों को जागरूकता का एक मौका भी पाते हैं और वोटों की खरीद-बिक्री के बीच भी हम यह पाते हैं कि जनता का कुछ हिस्सा तो परिपक्व होता ही होगा।



झूठ देखें, तो चुप न रहें, मुंह खोलें, और सच सामने रखें

10 मई 2014
संपादकीय

भारत के चुनावों में हर संभव गंदगी नजर आती है। शराब, रिश्वत, मुजरिम, जालसाजी, धोखाधड़ी सब कुछ। लेकिन इस काम में सिर्फ राजनीतिक दल और उनके नेता लगे रहते हों, ऐसा भी नहीं है। राजनीतिक कार्यकर्ताओं से परे समाज में आवाज रखने वाले, पढ़े-लिखे समझे जाने वाले लोग भी अपनी खुद की साख को दांव पर लगाकर झूठे प्रचार में जुट जाते हैं। हम रोजाना ऐसी दर्जनों तस्वीरें इंटरनेट पर देखते हैं, जो किसी एक प्रदेश की कामयाबी को किसी दूसरे प्रदेश के माथे पर चिपकाने में लगी रहती हैं। कई बार तो किसी दूसरे देश के विकास की तस्वीर भारत के किसी एक मुख्यमंत्री के इलाके का विकास बताने के लिए इस्तेमाल कर ली जाती है। किसी एक जगह की लाशों को कहीं और चिपका दिया जाता है, किसी नेता की चार बरस पहले की भीड़ की कामयाबी की तस्वीर, किसी दूसरे मौके पर किसी दूसरे नेता की वाहवाही के लिए इस्तेमाल कर ली जाती है। और चूंकि दुनिया में बेवकूफों की कमी नहीं है, इसलिए बहुत से लोग ऐसे झूठ, और ऐसी जालसाजी के झांसे में भी आ जाते हैं, लेकिन बहुत से लोग बड़ी मामूली समझ का इस्तेमाल करके इंटरनेट पर यह ढूंढ लेते हैं कि रिजर्व बैंक के नाम से चलाया जा रहा 17 रुपए का नोट कहां का है। 
हमारा यह मानना है कि किसी नेता, पार्टी, संगठन, या विचारधारा के समर्थक और विरोधी अगर जालसाजी और झूठ का इस्तेमाल करके किसी का समर्थन या विरोध करते हैं, तो उस फर्जीवाड़े की जिंदगी तो कम रहती ही है, ऐसे लोग अपनी हरकतों की वजह से अपनी खुद की विश्वसनीयता भी खो बैठते हैं, और बाद में वे उस नेता या संगठन के काम के भी नहीं रह जाते, जिसके हिमायती होकर वे जालसाजी करते हैं। बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो किसी बदनीयत के बिना सिर्फ अपनी लापरवाह गैरजिम्मेदारी, और अपनी बेवकूफी के चलते बिना जांचे-परखे झूठ को एक प्रसाद की तरह आगे बढ़ाते चलते हैं, चारों तरफ बांटते हैं, और आज की इंटरनेट-फोन की टेक्नॉलॉजी इसमें उनकी मदद भी करती है। टेक्नॉलॉजी का कुछ हिस्सा मुफ्त रहता है, इसलिए उस पर बिना परखे हुए झूठ को, अफवाह को, या जालसाजी को फैलाना कई लोग अपना हक समझते हैं, और उसमें रोजाना कुछ घंटे लगाकर अपनी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी पूरा करना मान लेते हैं। 
हमें नेताओं और पार्टियों की फिक्र तो कम है, क्योंकि वे जनता के बीच विश्वसनीयता के बिना भी जीने के आदी रहते हैं, और उनका काम धोखाधड़ी के साथ-साथ इसलिए चल जाता है कि भारत की राजनीति में एक बड़ा हिस्सा धोखेबाजों का है, झूठों का है, बेईमानों और भ्रष्ट लोगों का है। लेकिन जिनका पेशा राजनीति नहीं है, उन्हें अपनी साख का ख्याल रखना चाहिए। और न सिर्फ राजनीतिक मामलों में बल्कि बाजार के सामानों के मामलों में, किसी के चाल-चलन के मामले में, खाने-पीने के सामानों के मामले में, किसी धर्म या जाति की आबादी के आंकड़ों के मामले में लोगों को सनसनीखेज बात आगे बढ़ाने के बजाय अपने संपर्क के लोगों की फिक्र भी करना चाहिए, और उन्हें गंदगी और झूठ से नहीं लादना चाहिए। लोगों को यह भी याद रखना चाहिए कि गंदगी फैलाने का सिलसिला अगर आगे चलेगा, लोगों को उसमें मजा आने लगेगा, तो किसी दिन ऐसी गंदगी खुद उन पर भी गिर सकती है। 
राजनीति ने लोगों के मन में नीतियों और सिद्धांतों का महत्व घटा दिया है। और टेक्नॉलॉजी ने घटिया काम को आसानी से करना बहुत आसान बना दिया है। ऐसे में अच्छे और बुरे इंसान की परख भी आसान हो गई है। आपके संपर्क के लोग कितने गैरजिम्मेदार है, या कितनी गंदी और हिंसक बातें कर सकते हैं, यह परखना अब उनके भेजे हुए संदेशों से, इंटरनेट पर पोस्ट किए गए उनके संदेशों से, तस्वीरों से आसान हो गया है। इसलिए जब कभी कहीं पर झूठ देखें, तो चुप न रहें। मुंह खोलें, और सच को सामने रखें।

सरकारी नौकरियां बेचने का मुलायमी समाजवाद

9 मई 2014
संपादकीय
भांडाफोड़ करने के लिए एक मशहूर समाचार वेबसाईट कोबरा पोस्ट ने आज उत्तरप्रदेश में सरकार भर्ती में चल रही भारी धांधली और रिश्वतखोरी के स्टिंग ऑपरेशन से सत्ता के करीबी लोगों को उजागर किया गया है। इसमें मंत्री स्तर के लोग, विधायक और भूतपूर्व विधायक जैसे समाजवादी पार्टी के नेता लाखों रूपए लेकर नियुक्ति करवाने की बात करते पकड़ाए हैं। लोगों को याद होगा कि हरियाणा का कुख्यात चौटाला परिवार सरकारी नियुक्तियों में अपनी सत्ता के दौरान भारी भ्रष्टाचार के मामलों में सजा काटते हुए जेल में है। और इस तरह का काम देश के बहुत से प्रदेशों में आए दिन होते रहता है, और सरकार भी नालायक लोगों से भर जाती है, और लायक लोग बेरोजगार घूमते रहते हैं। 
स्टिंग ऑपरेशनों की वजह से देश में कई जगह कुछ इस्तीफे हुए हैं, कुछ गिरफ्तारियां हुई हैं, और कुछ को सजा भी हुई है। बहुत से सांसदों की सदस्यता भी रिश्वत के स्टिंग ऑपरेशन के चलते खत्म हुई है। लेकिन सरकारी नौकरियों में नियुक्ति का मामला छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में भी भारी भ्रष्टाचार का शिकार रहते आया है, और राज्य लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्य जैसे लोग ऐसे भ्रष्टाचार के मामलों में सुबूत सामने आने के बाद भी दस बरस से अधिक से बिना किसी सजा, मजा करते घूम रहे हैं। जोगी सरकार के वक्त के ऐसे लोग, रमन सरकार के तीसरे कार्यकाल में भी पकड़ से बाहर हैं। 
आज देश-प्रदेश में एक सरकारी नौकरी के लिए हजारों बेरोजगार कतार में रहते हैं। ऐसे में जब रिश्वत लेकर किसी नालायक को नौकरी दे दी जाती है, तो हजारों बेरोजगारों का भरोसा ऐसे लोकतंत्र पर से उठ जाता है। जनता के पैसों से मिलने वाली तनख्वाह एक ऐसे नालायक को मिलती है जो कि पूंजीनिवेश करके नौकरी में आया है, और जिसे बेईमानी करके अपने इस निवेश से कमाई करनी रहती है। ऐसे में रिश्वत लेकर नौकरी देने से, न सिर्फ काबिल का हक छिनता है, बल्कि सरकारी नौकरियों में रिश्वतखोरी की गारंटी भी हो जाती है। छोटे-छोटे से शिक्षाकर्मी जैसी नौकरियों में भी लाखों रूपए की रिश्वत चलते छत्तीसगढ़ में ही देखा गया है। 
हमारा ख्याल है कि सत्ता से जुड़े हुए लोग जब कभी किसी जुर्म में पकड़ाते हैं, तो उनके लिए उस जुर्म के लिए तय अधिकतम संभव सजा से भी खासी अधिक सजा का इंतजाम किया जाना चाहिए। ऐसा इसलिए जरूरी है कि जब मुजरिम ताकतवर होते हैं, और वे बिना किसी बेबसी के हजारों बेरोजगारों का हक छीनते हैं, तो मुजरिम और उसके जुर्म के शिकार के बीच ताकत का इतना बड़ा फर्क होता है, कि उसके लिए एक बहुत बड़ी सजा जरूरी है। आज हरियाणा में जिस तरह चौटाला कुनबा कल के मुख्यमंत्री पद से आज की जेल तक पहुंचा है, उसकी वजह से बहुत से कलेजों को ठंडक पहुंची होगी, और कम से कम कुछ लोगों को तो सबक-नसीहत का फायदा होगा। उत्तरप्रदेश का जो मामला सामने आया है, उसे चुनाव से जोड़कर देखना ठीक नहीं है, और उत्तरप्रदेश हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट तुरंत इस स्टिंग ऑपरेशन पर खुद होकर कार्रवाई करनी चाहिए। जब समाजवादी पार्टी की सरकार से जुड़े हुए बड़े-बड़े लोग ऐसे भ्रष्टाचार में लगे हैं, तो वहां की पुलिस से खुद होकर किसी कार्रवाई की उम्मीद नहीं की जा सकती। ऐसे में अदालत को अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए।

मीडिया मोदी के हाथों बिका नहीं, औरों को मोदी से सीखने की जरूरत

8 मई 2014
संपादकीय
भारत में चल रहे चुनाव के मीडिया कवरेज को लेकर एक विश्लेषण सामने आया है कि किस पार्टी को, और किस नेता को टीवी समाचार चैनलों के प्राईम टाईम ने किस अनुपात में कवरेज मिला है। इसके मुताबिक नरेन्द्र मोदी को सबसे अधिक महत्व मिला, और उन्हें जितने वक्त खबरों में, बहसों में जगह मिली, उतनी जगह उनके बाद के अगले नौ नेताओं को मिलाकर भी नहीं मिली। अब इसे लेकर दो तरह की बातें सोची जा सकती हैं, और कही जा रही हैं। एक तो यह कि भारत के कारोबारी घराने मोदी की शक्ल में पूंजीनिवेश कर रहे हैं, और उनके असर से भारतीय मीडिया मोदी को अगला प्रधानमंत्री तकरीबन बना ही चुका है। दूसरा यह कि मोदी खुद इतना समाचार-महत्व रखते हैं, कि उन्हें नामी गिनें, या बदनाम कहें, उनके बिना इस चुनाव की कोई खबर पूरी नहीं हो सकती। 
मोदी के महत्व की हकीकत ऊपर की इन दोनों बातों की मिलीजुली भी हो सकती है, या इन दोनों में से किसी एक तरह की भी हो सकती है। दरअसल बड़े चैनलों और बड़े अखबारों की वजह से भारत का मीडिया कारोबार अब इतना खर्चीला और इतना खतरनाक धंधा हो गया है कि उसे जिंदा रखने के लिए उसके मालिकों को कई तरह के कारोबारी समझौते करने पड़ते हैं, या वे खुद होकर खुशी-खुशी ऐसे समझौते करते हैं। दूसरी बात यह है कि २००२ के गुजरात दंगों के बाद से नरेन्द्र मोदी जिस तरह एक राष्ट्रीय खलनायक की तरह पेश किए जाते रहे, तो उससे उनका समाचार-महत्व बने रहा, और आज वे देश में किसी भी पार्टी या गठबंधन के अकेले घोषित प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी हैं। अब देश में अगर ऐसे घोषित उम्मीदवार को भी खबरों में महत्व नहीं मिलेगा, तो और किसे मिलेगा। 
दूसरी कुछ बातें और भी हैं। मीडिया एक तरफ तो अपने मालिकों की विचारधारा, और अपने कारोबारी हितों की प्राथमिकता के तले काम करता है, तो दूसरी तरफ वह अपने पाठकों और दर्शकों की पसंद का ख्याल भी रखता है। और इन दोनों-तीनों बातों के बीच एक संतुलन बड़ी खूबी के साथ कायम करना होता है, वरना बड़े धंधे में सड़क पर आने में वक्त नहीं लगता। आज हिन्दुस्तान के दर्शकों और पाठकों में से अधिकतर ऐसे हैं जो कि मोदी या उनकी तरह की दमदार और नाटकीय बातें करने वालों को सुनना चाहते हैं। और ऐसे लोग राहुल गांधी को सुनकर निराश होते हैं, क्योंकि उनकी बातों में न तो उनकी पार्टी की अगुवाई वाली सरकार की विश्वसनीयता का कोई दम होता है, और न ही उनकी बातों में चटपटी नाटकीयता होती है। इसलिए अगर मीडिया अपने खुद की हस्ती को बचाए रखने के लिए देखने लायक और पढऩे लायक बयानों और इंटरव्यू को जगह देता है, तो इसे हम मोदी की हिमायत में संतुलन खोना नहीं मानते। 
नरेन्द्र मोदी और बाकी पार्टियों के चुनाव प्रचार के तौर-तरीकों में बहुत बड़ा बुनियादी फर्क भी है। राहुल गांधी की किसी सभा की एक तस्वीर भी घंटों तक, या दिनों तक इंटरनेट पर उनकी पार्टी नहीं डालती, दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी के भाषणों का इंटरनेट पर जीवंत प्रसारण देखा जा सकता है, पल-पल पर उनके ट्वीट आते हैं, और उनकी वेबसाईट पर उनके भाषणों के कई भाषाओं में अनुवाद आनन-फानन डाल दिए जाते हैं। दूसरी तरफ दस बरस की सरकारी ताकत के बाद भी कांग्रेस के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की उपलब्धियों के चार्ट और ग्राफ प्रधानमंत्री कार्यालय हिन्दी में नहीं डाल पाया, और हमारे जैसे लोगों को खुद अनुवाद करके उनको छापना पड़ता है। मोदी की अगुवाई में भाजपा ने जिस पेशेवर अंदाज में प्रचार किया है, और चुनावी इंतजाम किया है, वह देखने और सीखने लायक है। दूसरी तरफ दस बरसों की भ्रष्ट सत्ता के बाद यह तो हो नहीं सकता कि कांग्रेस पार्टी मोदी की टक्कर का खर्च करने के लायक न हो, उसका भी खर्च कम नहीं है, लेकिन एक तरफ तो वह बर्बाद हो रहा है, उसका बेअसर इस्तेमाल हो रहा है, और दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में पिछले विधानसभा चुनाव में हमारा यह देखा हुआ है कि किस तरह उसके नेताओं ने अखबारनवीसों को रिश्वत देने के नाम पर खुद ही रकम खा ली थी। जब किसी पार्टी के दिग्गज नेता चुनाव के खर्च को खाने में जुट जाते हैं, तो वे अपनी जीत की संभावना भी खोते हैं, और अपना अविश्वास भी अपनी पार्टी की संभावनाओं पर जाहिर कर देते हैं। 
कांग्रेस पार्टी को इस बार के चुनावी नतीजों के बाद बैठकर यह सीखना चाहिए कि मोदी की तरह का असरदार चुनाव संचालन कैसे किया जाता है। और दूसरी तरफ उसे यह आत्ममंथन भी करना चाहिए कि किसी पार्टी को सरकार कैसे नहीं चलानी चाहिए। इस नौबत को देखें, और यहां पर चर्चा की गई बाकी बातों को देखें, तो इसमें कोई हैरानी नहीं होती कि मीडिया में मोदी को इतना कवरेज क्यों मिला। इसे हम अनुपातहीन नहीं मानते, क्योंकि अगर मीडिया को महज पैसों से खरीदा जा सकता होता, तो उसमें तो कांग्रेस भी बराबरी की ताकत रखती है। आज की नौबत ऐसी किसी खरीद-बिक्री से परे की है, और उसे अनदेखा करना कांग्रेस के लिए आत्मघाती होगा। हमारे बहुत से वामपंथी दोस्त आज के भारतीय मीडिया के रूख को सिर्फ बिका हुआ मीडिया मान रहे हैं, लेकिन ऐसा मानना भी देश में साम्प्रदायिकता-विरोधी ताकतों के लिए गलत होगा, क्योंकि इससे उनको अपने निकम्मेपन के साथ जीने का एक बहाना मिल जाएगा। देश की धर्मनिरपेक्ष ताकतों को यह समझने की जरूरत है कि धर्म और साम्प्रदायिकता के मोर्चों से परे सरकार और भ्रष्टाचार के मोर्चों पर जब लोगों की विश्वसनीयता खत्म होती है, तो उस खाली हुई जगह में, उस शून्य में कम साख वाला कोई इंसान भी आकर जगह बना सकता है। मोदी अच्छे हों या बुरे, उनके प्रचार के तरीकों से लोगों को सीखने की जरूरत है। 

पाखंडी पवित्रता तले कुचली हुई तन-मन की जरूरतें

7 मई 2014
संपादकीय
छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ दिनों में प्रेम-संबंधों को लेकर इतनी अधिक मौतें सामने आई हैं कि उनके बारे में लिखे बिना रहना अब ठीक नहीं होगा। इनमें शादी की इजाजत न मिलने पर मरने-मारने वाले मामले हैं, शादी से परे के रिश्तों को लेकर होने वाली हत्याएं हैं, और एकतरफा प्रेम-संबंधों की वजह से हुई हत्याएं भी हैं। समाज के भीतर जब इतना खून-खराबा सामने आ रहा है तो एक दूसरी बात यह है कि मौतों से कम तनाव के मामले जो सामने नहीं आ रहे हैं वे इनके मुकाबले हजारों गुना अधिक होंगे। 
समाज की ऐसी हालत पर सोचने-विचारने की जरूरत है जिसमें प्यार करने वालों को शादी की इजाजत नहीं मिलती, देह की जरूरत वालों को बाजार में सहूलियत नहीं मिलती, शादीशुदा जोड़ों को आपस में तसल्ली नहीं मिलती, और पति-पत्नी के बीच तनाव होने पर भी तलाक का हौसला नहीं मिलता। भारत के कस्बाई शहर इस किस्म के तनाव को लगातार झेल रहे हैं, और कई पीढिय़ां तरह-तरह की प्रेम और सेक्स से जुड़ी कुंठाओं की शिकार है। इन मौतों को पुलिस और अदालत का मामला मानकर खबर पढऩे के बाद उनको छोड़ देना किसी किस्म का सामाजिक इलाज नहीं है, और लोगों को समाज के भीतर अपने सदस्यों की शारीरिक और मानसिक, भावनात्मक और पारिवारिक जरूरतों को समझना होगा। 
भारतीय समाज आज जाति व्यवस्था टूट जाने के डर से प्रेम-संबंधों के खिलाफ बहुत ही हिंसक हो गया है और जगह-जगह निराश प्रेमी-प्रेमिका हत्या-आत्महत्या के लिए मजबूर किए जा रहे हैं। सरकार में बैठे हुए नेताओं और अफसरों की सोच समाज की मौजूदा व्यवस्था को जारी रखने की हिमायती रहती है, और यही वजह है कि नए साल के मौके पर या वेलेंटाइन डे जैसे दिन पर भी लड़के-लड़कियों को बाग-बगीचे में मिलने से रोकने के लिए पुलिस को फौज की तरह तैयारी के साथ तैनात कर दिया जाता है। ऐसे में न तो प्रेम-संबंधों की जगह रहती, और न ही प्रेम-विवाह की। नतीजा यह होता है कि नौजवान पीढ़ी की निराशा हिंसक होने लगती है, कभी अपने खुद के खिलाफ, तो कभी अपने जोड़ीदार के खिलाफ। 
इसी तरह भारतीय समाज में शादीशुदा जोड़ों के बीच भी सेक्स को एक बुरी बात की तरह देखा जाता है, और इस बुनियादी जरूरत को समाज और परिवार बुरी तरह अनदेखा करते हैं। नतीजा यह होता है कि अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए शादीशुदा लोग भी घर-परिवार से बाहर तन और मन के संबंध बनाने लग जाते हैं, और यही बात आगे चलकर, उजागर होने तक हत्या और आत्महत्या तक पहुंचने लगती है। यहां पर हम याद दिलाना चाहेंगे कि सैकड़ों बरस पहले जिस हिन्दुस्तान में वात्सायन ने सेक्स जीवन में विविधता के लिए एक विशाल ग्रंथ लिखा था, उसे अनदेखा करके, उसे खारिज करके, और उसे बुरा-भला कहकर आज का दकियानूसी और पाखंडी समाज शादीशुदा जोड़ों के बीच भी विविधता की संभावनाओं को खत्म कर देता है, और समाज को एक खतरे की कगार की तरफ धकेल देता है। 
आज जरूरत इस बात की है कि भारतीय समाज इस बात को माने कि वात्सायन से लेकर कालिदास तक, और कृष्ण की प्रेम कथाओं से लेकर दूसरी असली प्रेम कहानियों तक का एक महत्व था, और उनका अस्तित्व था। ऐसा न करके जीवन में इस प्राकृतिक जरूरत को भूखा रखा जा रहा है, और बेचैन तन और मन खतरे में पड़ रहे हैं, नौजवान पीढ़ी खतरे में पड़ रही है, शादीशुदा जिंदगी खतरे में पड़ रही है। समाज को कुछ बहुत ही फर्जी और फरेबी पवित्रतावादी नारों में जकड़कर तन और मन की जरूरतों को कुचल दिया जा रहा है, उन्हें भारतीय संस्कृति के खिलाफ बताया जा रहा है, इस वजह से हिंसा बढ़ रही है। आज भारतीय समाज में अपनी मर्जी से प्रेम करने, अपनी मर्जी से साथ रहने, अपनी मर्जी से शादी करने, और नौबत आए तो अपनी मर्जी से अलग होने की आजादी हर किसी को मिलनी चाहिए, उसके बिना यह समाज एक बीमार समाज रहेगा, जिसके बीमार नागरिकों की उत्पादकता कभी इस देश को पूरी नहीं मिल सकती। 

बात की बात,

6 may 2014

बच्चों का यौन शोषण जारी समाज-सरकार की ढील भी

6 मई 2014
संपादकीय

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में एक गुरूकुल में आश्रम के अध्यक्ष रामानंद सरस्वती को पुलिस ढूंढ रही है। आश्रम के गरीब और नाबालिग बच्चों का देह शोषण करने के आरोप में धार्मिक-आध्यात्मिक लगते हुए नाम वाला यह अध्यक्ष बहुत सी शिकायतों के बाद पुलिस दखल होते ही भाग निकला। बच्चों की देह शोषण का यह मामला साल भर से चले आ रहा था, और खासकर इसलिए यह अधिक भयानक लगता है कि छत्तीसगढ़ में ही कुछ दूसरी आश्रम शालाओं में बच्चियों के साथ लंबे समय तक वहां के इंचार्ज कर्मचारियों और अधिकारियों द्वारा बलात्कार करने के और मामले सामने आ चुके हैं, और उसके बाद से सरकार के स्तर पर दर्जन भर कड़े आदेश भी जारी हो चुके हैं। ऐसे में राज्य में एक और आश्रम शाला में ऐसा देह शोषण बड़े पैमाने पर सामने आया है, और इसे भी हम पानी में तैरते हुए बर्फ की चट्टान के ऊपर दिखने वाले छोटे से हिस्से की तरह मानते हैं, जिसके नीचे कि पानी में डूबा हुआ बड़ा हिस्सा अभी दिख नहीं रहा है। छोटे-छोटे गरीब बच्चों, आदिवासी और ग्रामीण बच्चों के ऐसे यौन शोषण को लेकर राज्य में जो जागरूकता और चौकन्नापन सरकार और समाज दोनों में आना चाहिए, वह दोनों ही जगहों से गायब है। 
हिन्दुस्तान में एक बड़ी दिक्कत तो यह है कि बच्चों का देह शोषण एक विदेशी तस्वीर मान ली जाती है, और यह माना जाता है कि हिन्दुस्तान में लोग ऐसे मानसिक रोग से पीडि़त नहीं हैं। परिवार के बड़े लोग, आस-पड़ोस, रिश्तेदार, और पारिवारिक मित्रों के अलावा, शिक्षक-प्रशिक्षक, और बच्चों तक पहुंचने वाले किसी भी तरह के हाथों में से बहुत से हाथ यौन शोषण करने को उतारू रहते हैं, और बेताब रहते हैं। ऐसे जुर्म की यह हिंसक सोच इतनी आम है, जितनी कि हिन्दुस्तानी लोग कल्पना नहीं करते हैं। दूसरी बात यह कि पूरी दुनिया में यह माना जाता है कि बाल यौन शोषण की सोच रखने वाले लोग बच्चों को शिकार बनाने के फेर में ऐसी जगहों तक अपनी पहुंच बनाते हैं जहां पर कि कमजोर, गरीब, बेबस बच्चे रहते हों। अनाथाश्रम, रेल्वे प्लेटफार्म, गरीबों के हॉस्टल, आश्रम, ऐसी जगहों पर ऐसे मुजरिमों की खास नजर रहती है, और एक भयानक बात यह भी है कि बच्चों की मदद करने के लिए जो सामाजिक संगठन काम करते हैं, वहां भी ये लोग घुसपैठ कर लेते हैं। उन जगहों पर इनको मुसीबत में फंसे हुए, और परेशानहाल बच्चे मिल जाते हैं, और उनकी मदद करने के नाम पर, उनके साथ हमदर्दी दिखाते हुए ऐसे यौन-शोषकों के हाथ आगे बढऩे लगते हैं। 
हम एक बार फिर सिर्फ छत्तीसगढ़ को लेकर बात करें, तो यहां पर बच्चों के लिए सरकार का जो विभाग है, उसमें जो अफसर और मंत्री हैं, बच्चों की भलाई के लिए बनी हुई संवैधानिक संस्था है, मानवाधिकार आयोग है, और इन सबमें जनता के खर्च पर वेतन-भत्ता, और सुविधाएं पाते हुए अनगिनत लोग हैं। इनकी यह जिम्मेदारी बनती है कि अपने-अपने इलाके में, अपनी जिम्मेदारी के दायरे में जाकर ऐसी नाजुक जगहों पर पहले से पता लगाते रहें, ताकि दर्जनों बलात्कार हो जाने के बाद मुजरिमों को ढूंढने की नौबत न आए, और बच्चों को बलात्कार के पहले ही बचाया जा सके। लेकिन हमारा यह अनुभव रहा है कि सरकार और संविधान की कुर्सियों पर जो लोग काबिज हैं, वे किसी तरह के बचाव में दिलचस्पी कम रखते हैं, और बहुत से मामलों में तो ऐसे जुर्म सामने आ जाने के बाद भी अफसर और मनोनीत लोग जिम्मेदारी को गेंद की तरह एक-दूसरे की तरफ फेंकते हैं। 
बस्तर में एक कन्या आश्रम में बलात्कार के ऐसे लंबे सिलसिले के बाद सरकार संभलकर बैठी थी, और मुख्यमंत्री ने खुद वहां का एक अघोषित दौरा करके उन बच्चियों से बात की थी, और पूरे प्रदेश में अफसरों को इंतजाम जांचने को कहा गया था। लेकिन उसके बाद भी कई जगहों पर ऐसे मामले सामने आए हैं, और ऐसे सेक्स-अपराध के शिकार अधिकतर नाबालिग बच्चे सबसे गरीब, ग्रामीण, और आदिवासियों जैसे कमजोर तबकों के मिले हैं। यह नौबत शर्मनाक है, और इस ताजा जुर्म को देखते हुए अब पूरे प्रदेश में बच्चों से जुड़े हुए तमाम इंतजाम एक बार फिर जांचने चाहिए, ऐसा न होने पर यह राज्य जनकल्याणकारी राज्य नहीं कहा जा सकेगा। 

जब तक जनता को साफ पानी नहीं तब तक खास लोग भी बोतल छोड़ें

5 मई 14
संपादकीय
छत्तीसगढ़ में जगह-जगह पीलिया से मौतें हो रही हैं, और इन मौतों के सामने आने वाले आंकड़ों से परे इनसे हजारों गुना अधिक लोग गंदे पानी और उससे होने वाली बीमारियों के शिकार होते रहते हैं, लेकिन खबर मौत की ही बनती है, इसलिए गरीबों की बीमारी चर्चा में नहीं आ पाती। इस बारे में हमने कुछ दिन पहले भी लिखा था, और उसके कुछ दूसरे पहलुओं पर फिर से लिखने की जरूरत है। 
छत्तीसगढ़ सहित हिन्दुस्तान के अधिकतर हिस्सों में पुराने शहरों में म्युनिसिपल के चले आ रहे पुराने इंतजाम दम तोड़ चुके हैं, और नाली और पानी जैसी दो बुनियादी जरूरतें मिलकर करीब-करीब एक हो चुकी हैं। कहां पर पीने का पानी नाली में जा रहा है, और कहां पर नाली का पानी पीने मिल रहा है, यह फर्क गायब हो गया है। इसकी एक वजह यह है कि स्थानीय संस्थाओं के जिम्मे जिन बुनियादी जरूरतों को सबसे अधिक अहमियत का माना जाता था, उन नाली, पानी, रौशनी, सफाई जैसी बातों को किनारे रखकर अब स्थानीय संस्थाएं, उनके निर्वाचित पदाधिकारी और अधिकारी, अपनी जमीन-जायदाद पर बड़े-बड़े प्रोजेक्ट बनाने को कामयाबी मानते हैं, और ऐसी सोच के पीछे की नीयत बहुत साफ भी रहती है। 
हमारा मानना है कि स्थानीय संस्थाओं कारोबारी बनने से रोकना चाहिए, और उनको स्थानीय टैक्स लगाकर बेहतर जनसुविधाएं खड़ी करने के लायक बनाना चाहिए। लोकतंत्र में दरअसल स्थानीय संस्थाओं से बढ़कर अगर नेता ऊपर पहुंचते हैं, तो वे बेहतर विधायक और बेहतर सांसद भी हो सकते हैं, और लोकतंत्र का ऐसा ही ढांचा भारत में कागजों पर है। लेकिन जमीन पर इसका उल्टा हो रहा है, और मध्यप्रदेश के समय से स्थानीय संस्थाओं का ऐसा दीवाला निकलते आया है कि वहां पर तनख्वाह तक देने की नौबत नहीं रहती थी, और हर महीने निर्वाचित महापौर राज्य सरकार के सामने कटोरा लेकर खड़े होने को बेबस कर दिए जाते थे। छत्तीसगढ़ राज्य की बात करें तो यहां पर राज्य बनने के बाद से हालात सुधरे हैं, लेकिन स्थानीय संस्थाओं ने इतना अधिक पैसा देखा है, कि बड़े-बड़े कमाऊ प्रोजेक्ट, और कमाऊ ठेकों से परे, बुनियादी जरूरतों की तरफ से ध्यान हट गया है। यह नौबत खतरनाक है। क्योंकि आज नालियों से गुजरते हुए पीने के पानी के पाईप जितने सड़े हैं, आने वाले दिनों में वे कुछ और अधिक सड़ेंगे, न तो नालियों में बैक्टीरिया कम होंगे, और न ही पानी के लिए म्युनिसिपल के पाईपों पर लोगों की निर्भरता कम होगी। इसलिए नए शहरी ढांचों की तरह छत्तीसगढ़ के मौजूदा शहरों में एक नया इंतजाम करना पड़ेगा, क्योंकि साफ पानी न सिर्फ एक इंसानी हक है, सरकारी जिम्मेदारी है, बल्कि ऐसा इंतजाम सरकार के लिए इलाज के खर्च के मुकाबले सस्ता भी है। 
दरअसल न सिर्फ सरकार में बैठा ताकतवर तबका, बल्कि समाज में किसी भी तरह की ताकत रखने वाला संपन्न या असरदार तबका अपने खुद के लिए साफ पानी जुटाने की ताकत रखता है। उसका नतीजा यह होता है कि समाज का जो कमजोर तबका ताकतवर लोगों के फैसलों का मोहताज रहता है, उस तबके के लिए साफ पानी जुटाना ताकतवर लोगों की निजी मजबूरी नहीं रहती। ऐसे में सत्ता का नजरिया गरीब के लिए अधिक फिक्र का नहीं रह जाता, और लोकतंत्र की बाकी संस्थाएं भी अपनी ताकत से अपने लिए साफ पानी पाती हैं, वक्त-बेवक्त इलाज की जरूरत पडऩे पर उसकी ताकत भी रखती हैं, और गरीब के लिए साफ पानी संसद और विधानसभा की प्राथमिकता पर नहीं आ पाता। हमने कुछ समय पहले इस बारे में लिखा था कि जिस देश का सचिन तेंदुलकर जैसा भारतरत्न एक महंगे वाटर फिल्टर की मॉडलिंग करने से परे, गरीबों के साफ पानी के हक के बारे में कभी मुंह भी न खोले, उस देश में आम जनता की फिक्र हो भी नहीं सकती। 
साफ पानी एक काफी जटिल मसला है, और इस बारे में स्थानीय संस्थाओं के मार्फत शहरी ढांचे को सुधारने, और पंचायतों के रास्ते गांवों की हालत को सुधारने को सबसे बड़ी प्राथमिकता देनी चाहिए, और तब तक होना यह चाहिए कि बड़े नेता, अफसर, और पत्रकार भी सार्वजनिक कार्यक्रमों में स्थानीय सादा पानी ही पियें, न कि बोतलबंद पानी। 

ऐतिहासिक चुनाव- बदजुबानी में, या नतीजों में?

संपादकीय
4 मई 2014

कहा जा रहा है कि भारत एक ऐतिहासिक चुनाव से गुजर रहा है। हर दल, और उसके नेता इसे अपने अपने तरीके से ऐतिहासिक बना रहे हैं। विरोधी दल यूपीए से उसके दस सालों के कामकाज का जवाब मांग रहे हंै, तो कांग्रेस समेत यूपीए गठबंधन के तमाम घटक दल मोदी  की कथित सांप्रदायिकता को चुनावों का सबसे बड़ा मुद्दा बता रहे हंै। इन सबके बीच, नेताओं की निजी जिंदगी के चटाखेदार किस्से भी खबरों में अपने अपने तरीकों से उछाले जा रहे हंै। एक दिन कोई नेता जब किसी के बारे में कोई निहायत ही घटिया बयान देता है, तो लगता है बयानों का स्तर इससे ज्यादा क्या गिर सकता है। लेकिन नहीं, विकास के लिए देश की उम्मीदों को अपेक्षा से कम साबित करने की बजाय, नेता राजनीति की स्तरहीनता, खोखलेपन के स्तर के बारे में जनता के डर को कम साबित कर रहे हंै। जैसे, रोज घटियापन की एक और मिसाल पेश  करके कह रहे हों कि फेंकू और पप्पू जैसे जुमलों के इस्तेमाल पर अफसोस करने वालो- तुम बदजुबानी, मुद्दे से खाली बातें करने की भारत के नेताओं की काबीलियत को कम मत आंको! जनता भी माथे पर हाथ रखकर सोच रही है कि क्या उसे ऐसा ही ऐतिहासिक चुनाव चाहिए था?
देखने लायक बात यह है कि चुनावों के लिए जनता अपने हिस्से का काम पूरा कर रही है। भारी गर्मी में वह नेताओं के भाषण सुनने जाती है, उसने 16 वीं लोकसभा के लिए रिकार्ड तोड़ मतदान किया है। लेकिन राजनीतिक दलों, और नेताओं का बर्ताव आम तौर पर बहुत निराशाजनक है। एक दूसरे के लिए तल्ख और भद्दी जुबान इस्तेमाल कर तंग आ चुके ज्यादातर नेता अब एक दूसरे के चरित्र पर छींटे उछालने पर उतर आए हैं- किसी की निजी जिंदगी के बारे में छींटाकशी करने से लेकर, नेताओं के एक दूसरे से रिश्ते जोडऩे तक, सारी गंदगी हो रही है। अखिलेश, मुलायम और माया की जुबानी जंग देखकर जनता सोच सकती है कि, इनके मुकाबले नारायण दत्त तिवारी क्या बुरे हैं, जो बुढ़ापे में अपनी प्रेमिका की मौजूदगी में भी देशभक्ति के गीत गा रहे हंै। मजाक से परे, यह हालात बहुत अफसोसनाक इसलिए है कि पिछले चुनाव के बाद से आज तक राजनीतिक दलों, और नेताओं के पास, जनता के सामने बयान करने के लिए अपना किया हुआ काम नहीं है, इसलिए उन्हें उसे मुद्दों से भटकाने इस तरह की स्तरहीन बातें करनी पड़ रही है।
ऐसी बदजुबानी की एक वजह जाहिर तौर पर यह भी  है कि सवा महीने जितने लंबे खिंचे चुनाव के लिए प्रचार करना नेताओं की मजबूरी है। ऐसे में उनके पास तीन ही रास्ते बचते हैं, या कि चिलचिलाती धूप में उनकी बात सुनने आई जनता को वह यह बताकर खुश करे कि, उन्होंने उसके लिए कोई ऐसा काम किया है, जिस पर वह खुश हो सकती है, और कोई ऐसा काम करने का इरादा रखते हैं, जिसकी तरफ वह उम्मीद से देख सकती है। दूसरा विकल्प यह है कि अगर कोई काम न किया हो, तो जनता का मनोरंजन करे, उसे अपने विरोधी नेताओं के निजी जीवन की बातें सुनाकर गुदगुदाने की कोशिश करे, या तीसरा यह कि उसकी जातिगत, धार्मिक भावनाएं भड़काए। यही वजह है कि चुनाव आयोग की फटकार खाकर भी बेनी प्रसाद बदजुबानी नहीं रोक रहे, आजम खान सुर्खियों में बने रहने के लिए विवादस्पद बयान दिए जा रहे हंै। अखिलेश, मुलायम, मायावती के बारे में, तो मायावती उनके बारे में ना कही जाने वाली बातें कह रही हंै। नरेन्द्र मोदी गांधी परिवार, और कांग्रेस पर वार करने रोज नए जुमले उछाल रहे हंै। प्रियंका, सोनिया और राहुल, कपिल सिब्बल, सलमान खुर्शीद और चिदम्बरम जिस तेज़ाबी जुबान वाले नेताओं के साथ मिलकर मोदी पर हमले किए जा रहे हंै।  इस बार के चुनाव इस हिसाब से वाकई ऐतिहासिक हंै कि इसके लिए चुनाव प्रचार करते  हुए नेता बदजुबानी की मिसालें पेश करते नहीं थक रहे।
लेकिन सवाल यह है कि देश के चुनाव में वह ऐतिहासिक मोड़ कब आएगा, जब जनता नेताओं को बता देगी, कि उसे मुद्दों से भटकाया नहीं जा सकता, उसे उनकी निजी अदावत , दुश्मनी, पसंद-नापसंद से मतलब नहीं है। चुने हुए नेता उसके सेवक हैं, और उनसे काम का हिसाब मांगना, और पाना उसका हक। इसका हिसाब नहीं देने वालों को राजनीति से बाहर करने की ताकत उसमें है, और वह इसे दिखाने से नहीं चूकेगी। मतदान के आखिरी दो दौर अभी बाकी हैं। मतदाता अगर नेताओं को यह बता सके, कि उसे मूर्ख, वोट बैंक समझने की भूल उन्होंने की है तो उसका खामियाजा वही भुगते, तो यह इन चुनावों को सही मायनों में ऐतिहासिक बनाएगा.. टीवी पर अमेठी चुनाव क्षेत्र का एक बुजुर्ग, गरीब मतदाता वहा प्रियंका गांधी की लगातार मौजूदगी के बारे में जब यह कहता है, कि इस बार उन्हें वोट मांगने आना पड़ा है, तो इसमें यह कांग्रेस को एक राज परिवार की तरह समझने वालों के लिए एक ऐतिहासिक मौका है। छत्तीसगढ़, गुजरात, मध्य प्रदेश, में पिछले तीन कार्यकालों से सरकार चला रही भाजपा ने,या उत्तर प्रदेश में  विधानसभा चुनावों में भारी जीत दर्ज करने वाली सपा, या  तमिलनाडु में एकछत्रीय राज चला रही एआईएडीएमके के नेताओं ने, अगर जनता को अपनी जेब में पड़ा हुआ समझा, या प.बंगाल में मतदाताओं को अपने से डरा हुआ मान लिया तो नतीजे आने के बाद उन्हें पछताने का मौका देना ऐतिहासिक होगा। जब मतदाता का खयाल  पांच साल में एक बार न आए, बल्कि आने वाले सालों में लगातार  बना रहा, तो यह चुनाव ऐतिहासिक कहलाएंगे। जब चुनावी सभाओं में नेता बदजुबानी करने, या विरोधियों पर झूठे आरोप लगाने से डरेंगे, वह चुनाव ऐतिहासिक कहलाएंगे। यह दिन जल्द आए, इसकी कोशिश अपनी, और अपनी औलादों की खातिर इस देश की जनता को करनी होगी। ताकतवर नेताओं के सामने यह कोशिश करना आम जनता के लिए आसान नहीं, उसे ऐसे फैसले लेते समय नेताओं, और उनके चेलों चपाटों की दबंगई से, अपनी पूरी साधनहीनता के साथ जूझना पड़ता है। अजीत पवार जैसे बड़े नेता पर गांव के गरीब लोगों को वोट नहीं मिलने पर पानी बंद कर देने धमकी देने के आरोप की जांच अभी चल ही रही है। लेकिन जिंदा रहने के लिए पानी  जितनी जरूरी चीज की भी परवाह न कर अपने हक के लिए वोट करना भारत के मतदाता के लिए आज हिम्मत की नहीं, जरूरत की बात बन चुकी है, यह अगर उसने समझा होगा, तब यह चुनाव ऐतिहासिक होंगे।