12 मई 2014
संपादकीय
एक तरफ तो पश्चिम बंगाल की खबरें हैं कि वहां सारदा चिटफंड घोटाले की सीबीआई जांच के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ममता बैनर्जी ने कटाक्ष करते हुए कहा है कि अब लोगों का डूबा हुआ पैसा सीबीआई ही वापस करेगी, और दूसरी तरफ एक दूसरी फायनेंस कंपनी सहारा के बारे में सुप्रीम कोर्ट के एक जज ने अदालत के बाहर कहा है कि इस जटिल मामले पर सुनवाई करने के दौरान जजों की दो सदस्यीय पीठ पर दबाव, तनाव और भार अकल्पनीय है। इन दो बातों को अगर देखें, और उसमें यह जोड़ लें कि किस तरह बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांगे्रस के नेताओं से इस सारदा कंपनी का लेना-देना रहा है, जिसने कि जनता के हजारों करोड़ डुबा दिए हैं, और किस तरह इस कंपनी ने ममता बैनर्जी की पेंटिंग्स को करोड़ों में खरीदा है, तो यह समझ आता है कि जालसाजी करने वाली कंपनियों की पहुंच कहां तक है, और किस तरह देश की सबसे बड़ी अदालत ऐसी कंपनियों के सामने बेबस बैठ जाती हैं।
छत्तीसगढ़ के बारे में बात करें, तो यहां भी हर बरस दो-चार कंपनियां दसियों हजार लोगों के सैकड़ों करोड़ लेकर भागते दिखती हैं, और उनमें पैसा लगाने वाले नासमझ, या बेवकूफ, जो भी कहें, लोग उनको ढूंढते रह जाते हैं। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम ऐसे आर्थिक अपराधों पर लिखते हुए कई बार यह सलाह दे चुके हैं कि केंद्र और राज्य सरकारों की अनगिनत खुफिया और सतर्कता एजेंसियां हैं, और उनकी नजरों में पूंजीनिवेश को लेकर होने वाले ऐसे घोटाले बुलबुले के फूटने के पहले आ जाते हैं, या आ जाने चाहिए। और ऐसी कंपनियों पर समय रहते कार्रवाई होनी चाहिए, आज सरकार की हालत खेतों में खड़े किए गए पुतले की तरह रह गई है, जो कि खेत के चरे जाने के दौरान चुपचाप खड़े रह जाता है। बहुत छोटी-छोटी कमाई वाले लोग अपनी पूंजी का बड़े-बड़े मुनाफे के झांसे में आकर जालसाज कंपनियों में पैसा लगाते हैं, और सरकारें उनके पैसे को डूबते हुए देखती रहती हैं। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। देश में आर्थिक अपराधों पर नजर रखने के लिए केंद्र सरकार की कई एजेंसियां हैं, उनको अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। और राज्य की पुलिस भी चाहे तो जमीन पर यह जालसाजी शुरू होते ही रोक सकती है, या कम से कम केंद्र की एजेंसियों को खबर कर सकती है।
सुप्रीम कोर्ट के जज ने सहारा के मामले में जजों पर पडऩे वाले जिस तरह के दबाव का जिक्र खुद होकर किया है, वह बहुत ही फिक्र की बात है। इस देश में अगर लाखों करोड़ रखने वाले, और दीवालिया होते दिख रहे कारोबारी भी अगर सुप्रीम कोर्ट में इस किस्म का, इस दर्जे का दबाव पैदा कर सकते हैं, तो इस लोकतंत्र में न तो गरीब की जगह है, न ही अमीर के लिए किसी सजा की कोई गुंजाइश है। आर्थिक अपराधों को राजनीति और नेताओं का जिस तरह का साथ मिल रहा है, वह बात अपने-आपमें भयानक है।
एक बार फिर हम छत्तीसगढ़ के स्तर पर यह कहना चाहेंगे कि जब कभी ऐसी मार्केटिंग कंपनियां जालसाजी दिखती अपनी योजनाओं के लिए पैसा इक_ा करना शुरू करती हैं, तभी राज्य सरकार को उन पर नजर रखनी चाहिए, और उनको ठोंक-बजाकर देख लेना चाहिए कि गरीबों का पैसा खतरे में तो नहीं जा रहा है।






