10 मई 2014
संपादकीय
भारत के चुनावों में हर संभव गंदगी नजर आती है। शराब, रिश्वत, मुजरिम, जालसाजी, धोखाधड़ी सब कुछ। लेकिन इस काम में सिर्फ राजनीतिक दल और उनके नेता लगे रहते हों, ऐसा भी नहीं है। राजनीतिक कार्यकर्ताओं से परे समाज में आवाज रखने वाले, पढ़े-लिखे समझे जाने वाले लोग भी अपनी खुद की साख को दांव पर लगाकर झूठे प्रचार में जुट जाते हैं। हम रोजाना ऐसी दर्जनों तस्वीरें इंटरनेट पर देखते हैं, जो किसी एक प्रदेश की कामयाबी को किसी दूसरे प्रदेश के माथे पर चिपकाने में लगी रहती हैं। कई बार तो किसी दूसरे देश के विकास की तस्वीर भारत के किसी एक मुख्यमंत्री के इलाके का विकास बताने के लिए इस्तेमाल कर ली जाती है। किसी एक जगह की लाशों को कहीं और चिपका दिया जाता है, किसी नेता की चार बरस पहले की भीड़ की कामयाबी की तस्वीर, किसी दूसरे मौके पर किसी दूसरे नेता की वाहवाही के लिए इस्तेमाल कर ली जाती है। और चूंकि दुनिया में बेवकूफों की कमी नहीं है, इसलिए बहुत से लोग ऐसे झूठ, और ऐसी जालसाजी के झांसे में भी आ जाते हैं, लेकिन बहुत से लोग बड़ी मामूली समझ का इस्तेमाल करके इंटरनेट पर यह ढूंढ लेते हैं कि रिजर्व बैंक के नाम से चलाया जा रहा 17 रुपए का नोट कहां का है।
हमारा यह मानना है कि किसी नेता, पार्टी, संगठन, या विचारधारा के समर्थक और विरोधी अगर जालसाजी और झूठ का इस्तेमाल करके किसी का समर्थन या विरोध करते हैं, तो उस फर्जीवाड़े की जिंदगी तो कम रहती ही है, ऐसे लोग अपनी हरकतों की वजह से अपनी खुद की विश्वसनीयता भी खो बैठते हैं, और बाद में वे उस नेता या संगठन के काम के भी नहीं रह जाते, जिसके हिमायती होकर वे जालसाजी करते हैं। बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो किसी बदनीयत के बिना सिर्फ अपनी लापरवाह गैरजिम्मेदारी, और अपनी बेवकूफी के चलते बिना जांचे-परखे झूठ को एक प्रसाद की तरह आगे बढ़ाते चलते हैं, चारों तरफ बांटते हैं, और आज की इंटरनेट-फोन की टेक्नॉलॉजी इसमें उनकी मदद भी करती है। टेक्नॉलॉजी का कुछ हिस्सा मुफ्त रहता है, इसलिए उस पर बिना परखे हुए झूठ को, अफवाह को, या जालसाजी को फैलाना कई लोग अपना हक समझते हैं, और उसमें रोजाना कुछ घंटे लगाकर अपनी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी पूरा करना मान लेते हैं।
हमें नेताओं और पार्टियों की फिक्र तो कम है, क्योंकि वे जनता के बीच विश्वसनीयता के बिना भी जीने के आदी रहते हैं, और उनका काम धोखाधड़ी के साथ-साथ इसलिए चल जाता है कि भारत की राजनीति में एक बड़ा हिस्सा धोखेबाजों का है, झूठों का है, बेईमानों और भ्रष्ट लोगों का है। लेकिन जिनका पेशा राजनीति नहीं है, उन्हें अपनी साख का ख्याल रखना चाहिए। और न सिर्फ राजनीतिक मामलों में बल्कि बाजार के सामानों के मामलों में, किसी के चाल-चलन के मामले में, खाने-पीने के सामानों के मामले में, किसी धर्म या जाति की आबादी के आंकड़ों के मामले में लोगों को सनसनीखेज बात आगे बढ़ाने के बजाय अपने संपर्क के लोगों की फिक्र भी करना चाहिए, और उन्हें गंदगी और झूठ से नहीं लादना चाहिए। लोगों को यह भी याद रखना चाहिए कि गंदगी फैलाने का सिलसिला अगर आगे चलेगा, लोगों को उसमें मजा आने लगेगा, तो किसी दिन ऐसी गंदगी खुद उन पर भी गिर सकती है।
राजनीति ने लोगों के मन में नीतियों और सिद्धांतों का महत्व घटा दिया है। और टेक्नॉलॉजी ने घटिया काम को आसानी से करना बहुत आसान बना दिया है। ऐसे में अच्छे और बुरे इंसान की परख भी आसान हो गई है। आपके संपर्क के लोग कितने गैरजिम्मेदार है, या कितनी गंदी और हिंसक बातें कर सकते हैं, यह परखना अब उनके भेजे हुए संदेशों से, इंटरनेट पर पोस्ट किए गए उनके संदेशों से, तस्वीरों से आसान हो गया है। इसलिए जब कभी कहीं पर झूठ देखें, तो चुप न रहें। मुंह खोलें, और सच को सामने रखें।

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