चुनाव का इतना लंबा दौर लोकशिक्षण का अच्छा मौका

11 मई 2014
संपादकीय

भारतके आम चुनाव अब आखिरी दौर में हैं। कल इस वक्त तक मतदान के आखिरी दिन वाले वोट आधे से अधिक डल चुके होंगे, और उसके बाद पार्टियां और नेता अगले कुछ दिन चैन से पांव पसारकर गुजारेंगे, या बेचैनी से। अब चूंकि प्रचार का यह दौर खत्म हो गया है, और नतीजे तकरीबन तय हो चुके हैं, इसलिए नतीजों की अटकलबाजी के बजाय कुछ मुद्दों पर बात करना बेहतर है। 
बहुत से लोगों को यह लगता है कि गुजरात दंगों के दाग वाले मोदी की अगुवाई में चुनाव लडऩे पर भारत का लोकतंत्र खतरे में है। भारतीय लोकतंत्र बहुत लचीला है, और बहुत उदार भी। इस दरियादिली के चलते भारत के संविधान में यह छूट दी गई है कि जब तक अदालतों से कोई कुसूरवार साबित न हो जाएं, तब तक उनको चुनाव लडऩे से नहीं रोका जा सकता। मोदी तो अभी तक किसी अदालती कटघरे में लाए भी नहीं गए हैं, लेकिन दूसरे लोग ऐसे हैं जो कि 1984 के दंगों के मामले झेलते हुए भी न सिर्फ कांग्रेस के उम्मीदवार रहे, बल्कि चुनाव जीतकर सांसद भी रहे। हम एक जुर्म को गिनाकर दूसरे जुर्म को कम आंकना नहीं चाहते, लेकिन लोकतंत्र कानूनों से कम, और परंपराओं से अधिक चलता है, इसलिए इसे अनदेखा भी नहीं किया जा सकता। 
एक दूसरी बात इससे जुड़ी हुई और जरूरी यह है जो मोदी ने दो-चार दिन पहले के अपने इंटरव्यू में कही। उन्होंने कहा कि चुनाव लोक शिक्षण का मौका भी होता है, और नेताओं के भाषण जनता के सामने मुद्दे रखते हैं। हम उनकी इस बात से सहमत हैं, और जनता के राजनीतिक शिक्षण की वकालत हम हमेशा करते आए हैं। अगर चुनाव न होते तो मोदी से जुड़े होते निजी और कारोबारी, सांप्रदायिक और जाति के मामले कैसे सामने आते, और लोगों को कैसे इन मुद्दों पर सोचने का मौका मिलता। भारत के आम चुनाव, और खासकर ऐसे चुनाव जो कि महीनों तक चले, उन्होंने लोगों को बहुत सोचने-समझने का मौका दिया। और नेताओं को कहने का मौका भी इतना ही मिला। अखबारों, और बाकी मीडिया को अपने रूझान के मुताबिक लोगों को राजनीति बताने और समझाने का पूरा मौका मिला। ऐसे में तमाम किस्म के झांसे और झूठ का भांडाफोड़ करने का मौका भी सबके पास था। खुद हमने ही इंटरनेट पर तैरने वाले कई किस्म के झूठ, कई किस्म की जालसाजी उजागर की, और उससे उनके पीछे की बदनीयत उजागर भी हुई। 
चुनाव को लोक शिक्षण का मौका बनाना एक अधिक लोकतांत्रिक तरीका है, और भारत में चाहे मीडिया पर बिक जाने के आरोप लगते हों, या नेताओं पर वोट खरीदने के आरोप लगते हों, लोगों के बीच अपने विचार पहुंचाने की आजादी न सिर्फ बड़ी पार्टियों को थी, बल्कि सबसे गरीब पार्टियों को भी थी। और बात सिर्फ राजनीतिक मुद्दों की नहीं है, सामाजिक और आर्थिक मुद्दे भी खुलकर चर्चा में रहे, और लोगों को उन पर सोचने-समझने का मौका भी मिला। ऐसे में हम इन चुनावों को जागरूकता का एक मौका भी पाते हैं और वोटों की खरीद-बिक्री के बीच भी हम यह पाते हैं कि जनता का कुछ हिस्सा तो परिपक्व होता ही होगा।



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